भारतकोश
नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

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मन्त्रिसमुद्देशः ६३ दृष्टान्त— क्रुद्धो हि सर्प इव यमेवाग्रे पश्यति तत्रैव दोषविषमुत्सृजति ॥१७१॥ क्रोधी व्यक्ति सर्प के समान होता है वह जिसे ही आगे पाता है उसी पर अपना क्रोधरूपी विष उगलता है । कार्य के समय योग्य व्यक्ति का ही आगमन श्रेयस्कर है— अप्रतिविधातुरागमानाद् वरमनागमनम् ॥ १७२ ॥ जो किसी बात का प्रतीकार न कर सके अर्थात् आई हुई आपत्ति आदि को दूर न कर सके ऐसे आदमी का न आना ही आने से अच्छा है। क्योंकि ऐसा आदमी कुछ काम तो आवेगा नहीं और व्यर्थ समय नष्ट करेगा । [ इति मन्त्रिसमुद्देशः ] ११. पुरोहितसमुद्देशः राजपुरोहित के गुण— पुरोहितमुदितोदितकुलशीलं षडंगवेदे, दैवे, निमित्ते, दण्डनीत्यां च प्रवीणमथर्वज्ञमतिविनीतमभिनीतम् , आपदां दैवीनां मानुषीणाञ्च प्रतिक- र्त्तारं कुर्वीत ॥ १ ॥ राजा अपना पुरोहित ऐसा चुने जिसमें निम्न गुण हों । प्रख्यातवंश और शील-स्वभाव वाला, शिक्षा, व्याकरण आदि षडङ्ग युक्त वेद में निष्णात, दैवी तथा ग्रहादि के कारण उत्पन्न होनेवाले उत्पात दूर करने में निपुण, शासन में प्रवीण अथर्ववेद में उक्त अभिचार और शान्तिकर्म का ज्ञाता, अत्यन्त विनययुक्त और सुसंस्कृत अथवा मैत्रीपूर्ण, दैवी और मानुषी आप- त्तियों को दूर करने वाला । राजा के लिये मन्त्री और पुरोहित की महत्ता— राज्ञो हि मन्त्रिपुरोहितौ मातापितरौ, अतस्तौ न केषुचिद् वाञ्छि- तेषु विसूरयेत् , दुःखयेद्दुर्वि नयेद् वा ॥ २ ॥ राजा के लिये मन्त्री और पुरोहित माता और पिता के समान हैं अतः उनको किसी भी अभिलषित वस्तु के लिये दुःखित अथवा तिरस्कृत न करे । आपत्तियों की गणना— अमानुषोऽग्निः, अवर्षम् , अतिवर्षम् , मारको, दुर्भिक्षम् सस्योप- पघातः, जन्तूसर्गा, व्याधि-भूत-पिशाच-शाकिनी-सर्प-व्याल-मूपक क्षोभ- श्चेत्यापदः ॥ ३ ॥