नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
मन्त्रिसमुद्देशः ६३ दृष्टान्त— क्रुद्धो हि सर्प इव यमेवाग्रे पश्यति तत्रैव दोषविषमुत्सृजति ॥१७१॥ क्रोधी व्यक्ति सर्प के समान होता है वह जिसे ही आगे पाता है उसी पर अपना क्रोधरूपी विष उगलता है । कार्य के समय योग्य व्यक्ति का ही आगमन श्रेयस्कर है— अप्रतिविधातुरागमानाद् वरमनागमनम् ॥ १७२ ॥ जो किसी बात का प्रतीकार न कर सके अर्थात् आई हुई आपत्ति आदि को दूर न कर सके ऐसे आदमी का न आना ही आने से अच्छा है। क्योंकि ऐसा आदमी कुछ काम तो आवेगा नहीं और व्यर्थ समय नष्ट करेगा । [ इति मन्त्रिसमुद्देशः ] ११. पुरोहितसमुद्देशः राजपुरोहित के गुण— पुरोहितमुदितोदितकुलशीलं षडंगवेदे, दैवे, निमित्ते, दण्डनीत्यां च प्रवीणमथर्वज्ञमतिविनीतमभिनीतम् , आपदां दैवीनां मानुषीणाञ्च प्रतिक- र्त्तारं कुर्वीत ॥ १ ॥ राजा अपना पुरोहित ऐसा चुने जिसमें निम्न गुण हों । प्रख्यातवंश और शील-स्वभाव वाला, शिक्षा, व्याकरण आदि षडङ्ग युक्त वेद में निष्णात, दैवी तथा ग्रहादि के कारण उत्पन्न होनेवाले उत्पात दूर करने में निपुण, शासन में प्रवीण अथर्ववेद में उक्त अभिचार और शान्तिकर्म का ज्ञाता, अत्यन्त विनययुक्त और सुसंस्कृत अथवा मैत्रीपूर्ण, दैवी और मानुषी आप- त्तियों को दूर करने वाला । राजा के लिये मन्त्री और पुरोहित की महत्ता— राज्ञो हि मन्त्रिपुरोहितौ मातापितरौ, अतस्तौ न केषुचिद् वाञ्छि- तेषु विसूरयेत् , दुःखयेद्दुर्वि नयेद् वा ॥ २ ॥ राजा के लिये मन्त्री और पुरोहित माता और पिता के समान हैं अतः उनको किसी भी अभिलषित वस्तु के लिये दुःखित अथवा तिरस्कृत न करे । आपत्तियों की गणना— अमानुषोऽग्निः, अवर्षम् , अतिवर्षम् , मारको, दुर्भिक्षम् सस्योप- पघातः, जन्तूसर्गा, व्याधि-भूत-पिशाच-शाकिनी-सर्प-व्याल-मूपक क्षोभ- श्चेत्यापदः ॥ ३ ॥
६४ नीतिवाक्यामृतम् आपत्तियां निम्न प्रकार की हैं—बिजली गिरने से अथवा उल्कापात से अग्नि लग जाना, वर्षा का न होना, अतिवृष्टि का होना, महामारी, हैजा, प्लेग आदि का फैलना, अकाल पड़ना, पौधों में कीड़ों का लगना, टिड्डी दल आदि का आना, रोग, भूत-पिशाच, डाकिनी शाकिनी अर्थात् चुड़ैल आदि सर्प ओर अन्य हिंसक जन्तु तथा चूहों आदि का उपद्रव। राजकुमारों की शिक्षा के विषय— शिक्षालापक्रियाक्षमो राजपुत्रः सर्वासु लिपिषु, प्रसंख्याने पद-प्रमाण- प्रयोगकर्मणि नीत्यागमेषु, रत्नपरीक्षायां सम्भोगप्रहरणोपवाह्यविद्यासु च साधु विनेतव्यः ॥ ४ ॥ राजा को चाहिए कि जब राजकुमार शिक्षा ग्रहण करने योग्य, बातचीत के योग्य और काम-काज करने योग्य हो जाय तब उसे सब प्रकार की लिपियों में, गणित में, व्याकरण और न्याय शास्त्र के व्यावहारिक प्रयोग में नीति- शास्त्रों में, रत्न परीक्षा में, काम शास्त्र, संग्राम विद्या और तरह तरह की सवारियों की विद्या में भली प्रकार सुशिक्षित बनावे। गुरुसेवा— अस्वातन्त्र्यमुक्तकारित्वं, नियमो विनीतता च गुरूपवासनकार- णानि ॥ ५ ॥ स्वच्छन्द न होना, गुरु की आज्ञाओं का पालन करना, नियमपूर्वक रहना और विनीत होना, ये सब गुण गुरु की उपासना के कारण हैं। विनय का स्वरूप— व्रतविद्यावयोऽधिकेषु नीचैराचरणं विनयः ॥ ६ ॥ किसी व्रत विशेष के पालन से, ज्ञान से और अवस्था से जो अपने से उत्कृष्ट हों उनके आगे अत्यन्त विनम्र-व्यवहार करना विनय है। विनय का फल— पुण्यावाप्तिः, शास्त्ररहस्यपरिज्ञानं, सत्पुरुषाधिगम्यत्वं च विनय- फलम् ॥ ७ ॥ पुण्य की प्राप्ति, शास्त्र के गूढ रहस्य का ज्ञान और सत्पुरुषों के साथ समागम यह सब विनय के फल हैं। विनय से ये चीजें अनायास प्राप्त होती हैं। परम्परागत ज्ञान की आवश्यकता— अभ्यासः कर्मसु कौशलमुत्पादयत्येव यद्यस्ति तज्ज्ञेभ्यः सम्प्र- दायः ॥ ८ ॥ कोई भी काम यदि उसके जानने वालों से परम्परागत प्राप्त होता है और
२. समुद्देश ११-२०: मन्त्रि, पुरोहित, सेनापति, दूत, चार (गुप्तचर), प्रमाद व व्यसन-दोष
पुरोहितसमुद्देशः ६५ उसका अभ्यास किया जाता है तो उस कर्म में कुशलता अवश्य प्राप्त होती है । गुरु की आज्ञा का पालन— गुरुवचनमनुल्लङ्घनीयमन्यत्राधर्मानुचिताचारात्मप्रत्यवायेभ्यः ॥ ९ ॥ जो धर्मानुकूल हों, उचित आचरण के प्रतिकूल न हों तथा जिनसे आत्म- कल्याण होता हो ऐसे गुरुवचनों का उल्लङ्घन नहीं करना चाहिए ! गुरु की विशेषता— युक्तमयुक्तं वा गुरुरेव जानाति यदि न शिष्यः प्रत्यर्थवादी ॥ १० ॥ यदि शिष्य गुरु के प्रतिकूल बोलने वाला नहीं है तो उसके लिये उचित और अनुचित कर्त्तव्यों को गुरु ही जानता है । क्रोधित गुरुजनों के प्रति कर्त्तव्य— गुरुजनरोपेऽनुत्तरदानमभ्युपपत्तिश्चौषधम् ॥ ११ ॥ गुरु लोग जब कुपित हों तब उत्तर न देना और सेवा करना ही उस क्रोध की शान्ति के लिये औषध है । गुरु के प्रति कर्त्तव्यों का निर्देश— शत्रूणामभिमुखः पुरुषः श्लाघ्यो न पुनर्गुरूणाम् ॥ १२ ॥ पुरुष वह प्रशंसनीय है जो शत्रुओं से मोर्चा ले न कि गुरुओं से । आराध्यं न प्रकोपयेद् यद्यसावाश्रितेषु कल्याणशंसी ॥ १३ ॥ यदि आराध्य गुरु अपने आश्रितों के सदा कल्याणकामी हों तो उनको कुपित नहीं करना चाहिए । गुरुभिरुक्तं नातिक्रमितव्यं यदि नेहिकामुत्रिकफलविलोपः ॥ १४ ॥ यदि इहलोक और परलोक की फलप्राप्ति में बाधा न पड़ती हो तो गुरुओं के वचन का उल्लङ्घन नहीं करना चाहिए । सन्दिहानो गुरुम् अकोपयन्नापृच्छेत् ॥ १५ ॥ पढ़ते समय किसी बात में संशय होने पर गुरुजी क्रोधित न हों इस बात का ध्यान रखते हुए सन्दिग्ध विषय को पुनः पूछ ले । गुरूणां पुरतो न यथेष्टमासितव्यम् ॥ १६ ॥ गुरुओं के आगे मनमाने ढंग से न बैठे । नानभिवाद्योपाध्यायाद् विद्यामाददीत ॥ १७ ॥ अभिवादन किये बिना गुरु से विद्या न ग्रहण करे । अध्ययनावस्था का आचार— अध्ययनकाले व्यासङ्गं पारिप्लवमन्यमनस्कतां च न ब्रजेत् ॥ १८ ॥ अध्ययन के समय विरोधी विचार, चञ्चलता और अन्यमनस्कता न करे। ५ नी०
६६ नीतिवाक्यामृतम् सहाध्यायी के प्रति कर्त्तव्य— सहाध्यायिषु बुद्धयतिशयेन नाभिभूयेत ॥ १९ ॥ अपनी बुद्धि यदि अन्य छात्रों की अपेक्षा अधिक तीक्ष्ण हो तो उससे सह- पाठियों का पराभव-तिरस्कार न करे । गुरु के साथ व्यवहार— प्रज्ञायातिशायानो न गुरुमवज्ञायेत ॥ २० ॥ अपनी बुद्धि यदि गुरु से अधिक श्रेष्ठ हो तो उससे गुरु का अनादर न करे । सकिमभिजातो मातरि यः पुरुषः शूरो वा पितरि ॥ २१ ॥ क्या वह पुत्र कुलीन कहा जा सकता है जो कि माता अथवा पिता के प्रति शूरता प्रदर्शित करता है । अननुज्ञातो न क्वचिद् व्रजेत् ॥ २२ ॥ गुरु से बिना आज्ञा लिये हुए कहीं न जाय । मार्गमचलं जलाशयं च नैकोऽवगाहयेत् ॥ २३ ॥ लम्बे मार्ग पर, पहाड़ पर और जलाशय पर अकेले नहीं जाना चाहिए। पितरमिव गुरुमुपचरेत् ॥ २४ ॥ पिता के समान ही गुरु की सेवा करे । गुरुपत्नीं जननीमिव पश्येत् ॥ २५ ॥ गुरुपत्नी को माता के समान देखे । गुरुमिव गुरुपुत्रं पश्येत् ॥ २६ ॥ गुरु के समान ही गुरु पुत्र को भी समझे । सब्रह्मचारिणि बान्धव इव स्निह्येत् ॥ २७ ॥ साथी ब्रह्मचारियों और सहपाठियों के साथ बान्धवों के समान स्नेह करे । ब्रह्मचर्यमाषोडशाद्वर्षात्ततो गोदानपूर्वकं दारकर्म चास्य ॥ २८ ॥ सोलह वर्ष तक ब्रह्मचर्य से रहे अनन्तर गोदान करके विवाह करे । पढ़ने का क्रम— समविद्यैः सहाधीतं सर्वदाभ्यस्येत ॥ २९ ॥ पढ़े हुए विषय का अपने सहपाठियों के साथ सदा अभ्यास करे । अपनी दुर्दशा का गुप्त रखना — गृहदौःस्थित्यमागन्तुकानां पुरतो न प्रकाशयेत् ॥ ३० ॥ अपने घर की दुरवस्था आगन्तुकों के आगे न प्रकाशित करे ।
पुरोहितसमुद्देशः ६७ कुछ स्वाभाविक मनः स्थितियां— परगृहे सर्वोऽपि विक्रमादित्यायते ॥ ३१ ॥ पराये घर में सभी विक्रमादित्य के समान पराक्रम प्रदर्शित करने को उद्यत होते हैं। स खलु महान् स्वकार्येष्विव परकार्येषूत्सहते ॥ ३२ ॥ महान् वह है जो अपने काम के समान पराये काम में भी उत्साह प्रद- र्शित करे। परकार्येषु को नाम न शीतलः ॥ ३३ ॥ दूसरे के कार्य के लिये कौन नहीं मन्दोत्साह होता। स्वभावतः लोग पराये काम के लिये उत्साही नहीं होते। राजासन्नः को नाम न साधुः ॥ ३४ ॥ राजा के समीप कौन नहीं साधु बन जाता अर्थात् राजा के समीपवर्त्ती होने पर राजदण्ड के भय से सभी लोग सद्व्यवहार करते हैं। अर्थपरेष्वनुनयः केवलं दैन्याय ॥ ३५ ॥ लोभी से अनुनय-विनय करना केवल अपनी दीनता प्रदर्शित करना है। को नामार्थार्थी प्रणामेन तुष्यति ॥ ३६ ॥ कौन धनार्थी प्रणाम से सन्तुष्ट होता है अर्थात् धन मांगने वाला धन पाने से ही प्रसन्न हो सकता है प्रणाम मात्र से नहीं। समस्त आश्रितों के प्रति समान व्यवहार का उपदेश— आश्रितेषु कार्यतो विशेषकारणेऽपि प्रियदर्शनालापाभ्यां सर्वत्र सम- वृत्तिस्तन्त्रं वर्धयत्यनुरंजयति च ॥ ३७ ॥ आश्रितों में प्रयोजन-वश किसी विशेष व्यक्ति से अधिक कार्य निकलने पर भी राजा को चाहिये कि वह समस्त आश्रितों के प्रति समान प्रेम संभा- षण और दर्शन व्यवहार रक्खे। सर्वत्र सम व्यवहार करने से राज्य की वृद्धि होती है और प्रजा का अनुरञ्जन होता है अर्थात् प्रजा अनुरक्त बनी रहती है। तनुधनादर्थग्रहणं मृतमारणमिव ॥ ३८ ॥ स्वल्प धनवाले अर्थात् दरिद्र से धन लेना मरे हुए को मारने के समान है। अप्रतिविधातरि कार्यनिवेदनमरण्यरुदितमिव ॥ ३९ ॥ जो व्यक्ति कार्य की सिद्धि में असमर्थ हो उससे अपने कार्य के लिये निवेदन करना जंगल में रोने के समान व्यर्थ है। दुराग्रहस्य हितोपदेशो बधिरस्याग्रतो गानमिव ॥ ४० ॥
६८ नीतिवाक्यामृतम् हठी को हित उपदेश देना बहिरे के आगे गाने के समान निष्फल है । अकार्यज्ञस्य शिक्षणमन्धस्य पुरतो नर्त्तनमिव ॥ ४१ ॥ कर्त्तव्य ज्ञान से शून्य पुरुष को शिक्षा देना अन्धे के आगे नाचने के समान व्यर्थ है । अविचारकस्य युक्तिकथनं तुषकण्डनमिव ॥ ४२ ॥ विचारशून्य व्यक्ति से युक्तियुक्त बात कहना भूसे को कूटने के समान निरर्थक है । नीचेषूपकृतमुदके विशीर्णं लवणमिव ॥ ४३ ॥ नीच व्यक्तियों के साथ उपकार करना पानी में विखेरे गये नमक के समान है । अविशेषज्ञे प्रयासः शुष्कनदीतरणमिव ॥ ४४ ॥ विशेष बुद्धि न रखने वाले अर्थात् मूर्ख को समझाने का प्रयास सूखी नदी में तैरने के समान है । परोक्षे किलोपकृतं सुप्तसंवाहनमिव ॥ ४५ ॥ परोक्ष में किया गया उपकार सोये हुए व्यक्ति के पैर दबाने के समान है । अकाले विज्ञप्तमूपरे कृष्टमिव ॥ ४६ ॥ अनवसर में कही गई बात ऊसर जमीन जोतने के समान है ।, उपकृत्योद्घाटनं वैरकरणमिव ॥ ४७ ॥ उपकार करके उसे प्रकाशित करना शत्रुता करने के समान है । अफलवतः प्रसादः काशकुसुमस्येव ॥ ४८ ॥ परिणाम में कुछ न कर सकने वाले व्यक्ति का प्रसन्न होना काश के फूल के समान है । 'काश' में केवल फूल होते हैं फल नहीं लगते उसी प्रकार जो व्यक्ति अथवा नृपति न कुछ भलाई कर सके न कुछ द्रव्य आदि दे सके उसे प्रसन्न करना या उसकी कृपा व्यर्थ है । गुणदोषाननिश्चित्यानुग्रहनिग्रहविधानं ग्रहाभिनिवेश इव ॥ ४९ ॥ गुण और दोष का निश्चय किये बिना अनुग्रह अथवा निग्रह-दण्ड देना- राहु, केतु आदि ग्रहों के अभिनिवेश के समान है अर्थात् अपना ही बाधक होता है । उपकारापकारासमर्थस्य तोषरोपकरणमात्मविडम्बनमिव ॥ ५० ॥ उपकार अथवा अपकार करने में असमर्थ व्यक्ति को संतुष्ट करना अपनी ही परिहास कराना है । शूद्रस्त्रीविद्रावणकारी गलगर्जितं ग्रामशूराणाम् ॥ ५१ ॥
सेनापतिसमुद्देशः ६६ केवल गांव भर के लिये शूर आदमी का गरजना चिल्लाना शूद्रों और स्त्रियों को ही भयभीत करने वाला होता है अर्थात् जो वस्तुतः शूर नहीं होता उससे चतुर पुरुष भयभीत नहीं होते । स विभवो मनुष्याणां यः परोपभोग्यः ॥ ५२ ॥ मनुष्य का वही धन धन है जो दूसरों के उपभोग में आवे । स ननु व्याधिर्यः स्वस्यैवोपभोग्यः ॥ ५३ ॥ वह धन निश्चय एक व्याधि के समान है जो केवल अपने भोग के योग्य हो । स किं गुरुः पिता सुहृद्वा योऽभ्यसूयागर्भं बहुषु दोषं प्रकाशयन् शिक्षते ॥ ५४ ॥ जो अपने शिष्य, पुत्र अथवा मित्र के दोषों की निन्दा करते हुए बहुतों के प्रकाश में लावे और तब शिष्यादि को शिक्षा देना चाहे वह गुरु, पिता और मित्र निन्दनीय है । स किं प्रभुर्यश्चिरसेवकस्यैकमप्यपराधं न सहते ॥ ५५ ॥ वह स्वामी निन्दनीय है जो अपने बहुत दिनों के सेवक का एक भी अपराध न क्षमाकर सके । [ इति पुरोहित समुद्देशः ] १२. सेनापति समुद्देश सेनापति के गुणों का वर्णन— अभिजनाचारप्रज्ञानुरागसत्यशौचशौर्यसम्पन्नः, प्रभाववान् बहुबा- न्धवपरिवारो निखिलनयोपायप्रयोगनिपुणः समभ्यस्तसमस्तवाहना- युधयुद्धलिपिभाषात्मपरस्थितिः सकलतन्त्रसामन्ताभिमतः साङ्ग्रामि- कामिरामिकाकारशरीरो भर्तुरभ्युदयदेशहितवृत्तिषु निर्विकल्पः स्वामि- नात्मवन्मानार्थप्रतिपत्तिराजचिह्नैः संभावितः सर्वक्लेशायाससहः स्वैः परैश्चाप्रधृष्यप्रकृतिरिति सेनापतिगुणाः ॥ १ ॥ सेनापति के निम्नलिखित गुण हैं। कुलीन, सदाचारी, बुद्धिमान्, अनु- रागी, सत्यवादी, शुचिता और शूरता से सम्पन्न, प्रभावशाली, बहुत से बन्धु- बान्धवों वाला, समस्त नीतियों और युक्तियों के प्रयोग में निपुण, समस्त प्रकार की सवारी, अस्त्र, युद्ध, लिपि और भाषा का ज्ञानी, आत्मज्ञानी, समस्त प्रजा और सामन्तों को प्रिय लगने वाला, सङ्ग्राम के योग्य और
७० नीतिवाक्यामृतम् मनोहर आकृति तथा शरीरवाला, स्वामी के अभ्युदय और देश के कल्याण के विषय में स्थिर बुद्धि रखनेवाला स्वामी के द्वारा आत्मतुल्य समझा जाकर सम्मानित और धन से पुरस्कृत, राजचिह्नों से विभूषित समस्त प्रकार के क्लेश और परिश्रम को सहन करनेवाला और आत्मीयों तथा शत्रुओं से अजेय स्वभाव वाला। सेनापति के दोष— स्त्रीजितत्वमौद्धत्यं व्यसनिता, क्षयव्ययप्रवासोपहतत्वं तन्त्राप्रती- कारः, सर्वैः सह वैरविरोधो, परपरिवादः, परुषभाषित्त्वमनुचितज्ञता संविभागित्वं स्वातन्त्र्यात्मसंभावनोपहतत्वं स्वामिकार्यव्यसनोपेक्षा सहकारिकृतकार्यविनाशो राजहितवृत्तिषु चेर्ष्या लुब्धत्वमिति सेनापति- दोषाः ॥ २॥ स्त्री के वशीभूत होना, उद्दण्डता, द्यूतमद्यपान आदि व्यसनों में लिप्त होना, क्षयरोग, व्ययाधिक्य और चिरप्रवास से आक्रान्त होना, शत्रु के द्वारा प्रयुक्त प्रयोगों को दूर करने में असमर्थ, सबके साथ लड़ाई झगड़ा, दूसरों की निन्दा करना, कठोर वचन बोलना, अनुचित बातों को ही जानने वाला, रुपया पैसा आदि दूसरों को बिना बांटे भोगने वाला, स्वतन्त्रता और आत्म सम्मान की भावना से आक्रान्त अर्थात् गुरुजन आदि किसी का भी थोड़ा अंकुश न चाहनेवाला और अपने लिये बहुत सम्मान चाहने वाला, स्वामी के कार्य और दुःखों की उपेक्षा करनेवाला, सहकारियों के कार्यों को बिगाड़ने वाला, राजा के हितकारी कार्यों में ईर्ष्यालु होना और लोभ करना, ये सब सेनापति के दोष हैं। प्रजा का अनुरञ्जन राज्य का मुख्य कर्तव्य— स चिरंजीवी राजपुरुषो यो नगरनापित इवानुवृत्तिपरः सर्वासु प्रकृतिषु ॥ ३ ॥ नगर भर के लोगों का कार्य करने वाला नाई जिस प्रकार लोकप्रिय होकर सुखी जीवन व्यतीत करता है उसी प्रकार जो राजपुरुष-राजकर्मचारी समस्त प्रजा के अनुरञ्जन में तत्पर रहता है वह चिरकाल तक राजसेवा में रहता हुआ सुख का उपभोग करता है। [ इति सेनापति समुद्देशः ]
दूतसमुद्देशः ७१ १३. दूत समुद्देशः दूत और उसके गुण— अनासन्नेष्वर्थेषु दूतो मन्त्री ॥ १ ॥ दूर के कामों के लिये भेजा जाने वाला दूत है और वह मन्त्री के तुल्य है । स्वामिभक्तिरव्यसनिता, दाक्ष्यं शुचित्वममूर्खता प्रागल्भ्यं प्रतिभावत्त्वं क्षान्तिः परमर्मवेदित्वं जातिश्च प्रथमे दूत गुणाः ॥ २ ॥ स्वामि-भक्ति, जुआ शराब आदि का व्यसन न होना, चातुर्य, पवित्रता, मूर्खता का अभाव, प्रगल्भता, प्रतिभावान् होना, सहिष्णुता, दूसरे के मर्म को जानना, और उत्तम जाति का होना ये दूत के मुख्य गुण हैं । स च त्रिविधो निःसृष्टार्थः परिमितार्थः शासनहरश्चेति ॥ ३ ॥ दूत के भेद— दूत तीन प्रकार के हैं निःसृष्टार्थ, परिमितार्थ, और शासनहर । यत्कृतौ स्वामिनः सन्धिविग्रहौ प्रमाणं स निःसृष्टार्थो यथा कृष्णः पाण्डवानाम् ॥ ४ ॥ जिस दूत के किये हुए सन्धि और विग्रह को स्वामी प्रामाणिक स्वीकार कर लेता है वह 'निःसृष्टार्थ' दूत है, जैसे कृष्ण पाण्डवों के निःसृष्टार्थ दूत थे । (जिससे कुछ सीमित कार्य ही कराया जाय वह परिमितार्थ और जो केवल चिट्ठी पत्री आदि ले जाय वह शासनहर है) । दूत के कर्त्तव्य— अविज्ञातो दूतः परस्थानं न प्रविशेन्निर्गच्छेद् वा ॥ ५ ॥ दूत शत्रु राजा को अपना परिचय दिये बिना न तो उसके राज्य में प्रविष्ट हो, न वहां से बाहर आवे । मत्स्वामिनमतिसंधातुकामः परो मां विलम्बयितुमिच्छतीत्यविज्ञातो- ऽपि दूतोऽपसरेद् गूढपुरुषान् वावसर्पयेत् ॥ ६ ॥ मेरे स्वामी को धोखे में डाल रखने की इच्छा से शत्रु मुझे अपने यहां रोक रखना चाहता है यह ज्ञात होने पर दूत शत्रु राजा को बिना बताये हुए भी वहां से भाग आवे अथवा गुप्त दूत को वहां से अपने राजा के पास भेजे । परेणाशुसंप्रेषितो दूतः कारणं विमृशेत् ॥ ७ ॥ शत्रु के द्वारा शीघ्र ही वापस कर दिया गया दूत उस शीघ्रता का कारण सोचे । कृत्योपग्रहः कृत्योत्थापनं सुतदायादावरुद्धोपजापः स्वमण्डल-
७२ नीतिवाक्यामृतम् प्रविष्टगूढपुरुषपरिज्ञानम् अन्तर्भूमिपालाटाविकसम्बन्धः कोशदेशतन्त्र- मित्रावबोधः कन्यारत्नवाहनविनिस्त्रावणं स्वामीष्टपुरुषप्रयोगात् परप्रकृति- क्षोभकरणं च दूतकर्म ॥ ८ ॥ शत्रु द्वारा प्रयुक्त कृत्या की शान्ति करना, शत्रु के लिये कृत्या का उत्थापन करना, कारागार आदि में अवरुद्ध शत्रु के पुत्र और पट्टोदार आदि को फोड़ना, द्रव्यादि देकर अपनी ओर मिलाना—अपनी टोली में प्रविष्ट शत्रु के गुप्त-पुरुष का पता लगाना, अन्तःपुर और अरण्य के रक्षकों से सम्बन्ध स्थापित करना, शत्रु के कोष का, देश की भीतरी बातों का, शासन का और उसके मित्रों का पता लगाना, कन्या, रत्न और वाहन का निकलवा ले जाना, अपने अनुकूल पुरुषों के प्रयोग से शत्रु की प्रजा में क्षोभ उत्पन्न करना ये दूत के काम हैं । मन्त्रिपुरोहितसेनापतिप्रतिबद्धाप्तजनोपचारविस्रम्भाभ्यां शत्रोरिति- कर्तव्यतामन्तःसारतां च विन्द्यात् ॥ ६ ॥ शत्रु के मन्त्री पुरोहित सेनापति और दृढ़ विश्वास पात्र व्यक्तियों की सेवा और विश्वास से शत्रु के लक्ष्य और उद्देश्य तथा उसकी भीतरी शक्ति का पता लगावे । स्वयमशक्तः परेणोक्तमनिष्टं सहेत् ॥ १० ॥ स्वयम् असमर्थ बनकर शत्रु के द्वारा कथित अप्रिय बातों को सहन करे । गुरुषु स्वामिषु वा परिवादे नास्ति क्षान्तिः ॥ ११ ॥ गुरु अथवा स्वामी की निन्दा सुनने पर क्षमा भाव से काम न लेकर उसका प्रतिवाद करे । शत्रु पर आक्रमण करने की नीति— स्थित्वापि यास्यतोऽवस्थापनं केवलमपक्षयहेतुः ॥ १२ ॥ प्रथम तो बैठा हो पुनः जाने की अर्थात् आक्रमण की इच्छा करे और फिर स्थिर हो जाय तो इससे केवल अपनी ही हानि होती है । शत्रु को यह समझने का अवसर मिलता है कि इसमें शक्ति नहीं है इस लिये रुक गया है । शत्रु के दूत से मिलने का ढंग — वीरपुरुषपरिवारितः शूरपुरुषान्तरितान् परदूतान् पश्येत् ॥ १३ ॥ स्वयं वीर पुरुषों से संयुक्त होकर शूर पुरुषों के बीच छिपे हुए शत्रु के दूतों को देखे अर्थात् इनसे भेंटकरे । दृष्टान्त— श्रूयते हि किल चाणक्यस्तीक्ष्णदूतप्रयोगेणैकं नन्दं जघानेति ॥ १४ ॥
मन्त्रिसमुद्देशः ७३ इतिहास में प्रसिद्ध है कि चाणक्य ने तीक्ष्ण दूत के प्रयोग से अकेले नन्द को मार डाला था। शत्रु के द्वारा प्रेषित वस्तु लेने के विषय में विचार— शत्रुप्रहितं शासनमुपायनं च स्वैरपरीक्षितं नोपाददीत ॥ १५ ॥ शत्रु के द्वारा प्रेषित आज्ञापत्र और भेंट उपहार आदि को बिना अपने वैद्य आदि से परीक्षित कराये हुए ग्रहण न करे। दृष्टान्त— श्रूयते हि स्पर्शविषवासिताद्भुतवस्त्रोपायनेन करहाटपतिः कैटभो वसुनामानं राजानमाशीविष-विषोपेतरत्नकरण्डकप्राभृतेन च करवालः करालं जघानेति ॥ १६ ॥ सुना जाता है कि स्पर्श-विष से वासित अद्भुत वस्त्र की भेंट देकर करहाट देश के राजा कैटभ ने वसु नामक राजा को तथा सर्प विष से संयुक्त रत्न की पिटारी का उपहार देकर करवाल नामक राजा ने कराल नामक राजा को मार डाला था। दूत की अवध्यता— महत्यपकारेऽपि न दूतमुपहन्यात् ॥ १७ ॥ बहुत बड़ा अपकार करने पर भी दूत का वध न करे। उद्धृतेष्वपि शस्त्रेषु दूतमुखा वै राजानः ॥ १८ ॥ शस्त्र उठ जाने पर भी अर्थात् लड़ाई छिड़ जाने पर भी राजाओं की परस्पर वार्ता दूतों के द्वारा ही होती है। तेषामन्त्यावसायिनोऽप्यवध्याः किमङ्ग पुनर्ब्राह्मणः ॥ १९ ॥ दूत नीच जाति का हो तब भी अवध्य है फिर ब्राह्मण के विषय में तो कहना ही क्या है? वध्याभावाद् दूताः सर्वं जल्पन्ति ॥ २० ॥ वध्य न होने के कारण दूत कहने न कहने योग्य सभी बातों को कहता है। कः सुधीर्दूतवचनात् परोत्कर्षं स्वात्मापकर्षं च मन्येत ॥ २१ ॥ कौन बुद्धिमान् दूत के कहने मात्र से शत्रु की उत्कृष्टता और अपनी हीनता मानता है? शत्रु दूत का परीक्षण— तदाशयरहस्यपरिज्ञानार्थं परदूतः स्त्रीभिरुभयवेतनैः तद्गुणाचार- शीलानुवर्तिभिर्वा प्रणिधातव्यः ॥ २२ ॥ शत्रु के आशय और गुप्त भेदों को जानने के लिये शत्रु के दूत को स्त्रियों
७४ नीतिवाक्यामृतम् के द्वारा, दोनों ओर से वेतन पाने वाले दूतों के द्वारा अथवा उसके शील और आचार आदि का आचरण करने वालों के द्वारा अपने वश में करे । शत्रु के लिये पत्र भेजने का प्रकार— चत्वारि वेष्टनानि खड्गमुद्रा च प्रतिपक्षलेखानाम् ॥ २३ ॥ शत्रु के लिये लेखों-पत्र आदि को चार वेष्टनों में लपेटे और ऊपर से अपने तलवार की मुद्रा लगा दे । [ इति दूत समुद्देशः ] १४. चारसमुद्देशः गुप्तचरों का महत्त्व— स्वपरमण्डलकार्याकार्यावलोकने चाराश्चक्षूंषि क्षितिपतीनाम् ॥ १ ॥ अपने और शत्रु के मण्डल ( जिले ) का भला और बुरा काम देखने के लिये राजाओं के गुप्तचर ही उनके नेत्र हैं । गुप्तचर के गुण— अलौल्यममान्द्यममृषाभाषित्त्वमभ्यूहकत्वं चेति चारगुणाः ॥ २ ॥ चाञ्चल्य न होना, आलस्य न होना, झूठ न बोलना और शत्रु के मर्मज्ञान की क्षमता का होना, ये गुप्तचर के गुण हैं । गुप्तचर सम्बन्धी अन्य विचार— तुष्टिदानमेव चाराणां वेतनम् ॥ ३ ॥ सन्तुष्टि पर्यन्त पुरस्कार देना ही गुप्तचरों का वेतन है । तेहि तल्लोभात् स्वामिकार्येष्वतीव त्वरन्ते ॥ ४ ॥ पुरस्कार के लोभ से वे स्वामी के कार्य को अधिक शीघ्रता के साथ करते हैं । सन्दिग्धविषये त्रयाणामेकवाक्ये संप्रत्ययः ॥ ५ ॥ एक गुप्तचर की बातों से जब किसी विषय में सन्देह होता हो तो तीन गुप्तचरों के ऐकमत्य से निश्चय करना चाहिए । अनवसर्पो हि राजा स्वैः परैश्चातिसंधीयते ॥ ६ ॥ गुप्तचरहीन राजा अपने आदमियों से और शत्रुओं के द्वारा वञ्चित होता हैं । किमस्त्ययामिकस्य निशि कुशलम् ॥ ७ ॥ जिसके पास रात को पहरा देने वाला आदमी नहीं है क्या उसकी रात
चारसमुद्देशः ७५ 'में कुशल है ? अर्थात् धनी के पास रात का पहरेदार न हो और राजा के पास गुप्तचर न हो तो दोनों की कुशल नहीं है। गुप्तचरों के भेद और उनके पृथक् पृथक् लक्षण— कार्पटिकोदास्थितिक·गृहपतिक·वैदेहक·तापस·कितव·किरात·यमपट्टि- काहितुण्डिक·शौण्डिक·शौभिक·पाटच्चर·विट·विदूषक·पीठमर्दक·नट·नर्तक- गायक·वादक·वाग्जीवक·गणक·शाकुनिक·भिषगैन्द्रजालिक·नैमित्तिक·सूदा- रालिक·संवाहिक·तीक्ष्ण·क्रूर·रसद्·जड·मूक·बधिरान्धच्छद्मनावस्थायियायि- भेदेनावसर्पवर्गः ॥ ८ ॥ कार्पटिक (छात्रवेष में गुप्तचर) उदास्थित (अध्यापक वेष में गुप्तचर) पटवारी, महाजन, तपस्वी, जुआ खेलने वाला, किरात, घर-घर घूमकर यमलोक यातना आदि के चित्र दिखाने वाला; मदारी, कलवार, बहुरूपिया, चोर अथवा बन्दी का वेष रखनेवाला, व्यसनी पुरुषों का संदेशादि वाहक, विदूषक, कामशास्त्री, नट, नर्तक, गायक, वादक, कथावाचक, ज्योतिषी, सगुनिया, वैद्य, जादूगर, नैमित्तिक, रसोईदार, विचित्र-विचित्र भोजन बनाने वाला, मालिश करने वाला, तीखे, रूखे, आलसी, जड़, गूंगे, बहिरे अन्धे आदि के कपट वेष में स्थायी और चर भेद से उक्त प्रकार के गुप्तचर होते हैं। परमर्मज्ञः प्रगल्भश्छात्रः कार्पटिकः ॥ ९ ॥ शत्रु के गूढ रहस्य को जाननेवाला धृष्ट छात्र 'कार्पटिक' है। यं कंचन समयमास्थाय प्रतिपन्नाचार्याभिषेकः प्रभूतान्तेवासी प्रज्ञातिशययुक्तो राजपरिकल्पितवृत्तिरुदास्थितः ॥ १० ॥ इच्छानुसार किसी भी सम्प्रदाय का आश्रय लेकर आचार्य पद पर प्रतिष्ठित होकर बहुत से शिष्यों को पढ़ाने वाला तथा तीक्ष्ण बुद्धि सम्पन्न और राजा के द्वारा निश्चित जीविकावाला व्यक्ति 'उदास्थित' है। गृहपतिवैदेहिकौ ग्रामकूटश्रेष्ठिनौ ॥ ११ ॥ गांव के मुखिया (पटवारी) और सूद पर रुपया बाँटने वाले गांव के महाजन 'गृहपति' और 'वैदेहिक' हैं। बाह्यव्रतविद्याभ्यां लोकदंभहेतुस्तापसः ॥ १२ ॥ दिखावटी व्रत और विद्या के नाम पर लोगों को ठगनेवाला 'तापस' संज्ञक गुप्तचर है। कितवो द्यूतकारः ॥ १३ ॥ जुआ खेलाने वाले का नाम कितव है। अल्पाखिलशरीरावयवः किरातः ॥ १४ ॥
७६ नीतिवाक्यामृतम् जिसके समस्त शरीर के अङ्ग छोटे हों वह 'किरात' है। यमपट्टिको गलत्रोटिकः ॥ १५ ॥ गले में डोरा बाँधकर उसमें नरक के दृश्यों का चित्र पट लटकाए हुए घर-घर घूमने वाले का नाम 'यमपट्टिक' है। आहितुण्डिकः सर्पक्रीडाप्रसरः ॥ १६ ॥ सांप का खेल दिखानेवाला मदारी 'आहितुण्डिक' है। शौण्डिकः कल्पपालः ॥ १७ ॥ शराब बेचने वाला शौण्डिक है। शौभिकः क्षपायां काण्डपटावरणेन नानारूपदर्शी ॥ १८ ॥ रात्रि के समय पर्दा डालकर अनेक प्रकार का रूप प्रदर्शित करनेवाला 'शौभिक' (बहुरूपिया) है। पाटच्चरश्चौरो बन्दीकारो वा ॥ १९ ॥ चोर अथवा वन्दी के वेष में वर्त्तमान गुप्तचर 'पाटच्चर' है। व्यसनिनां प्रेषणाजीवी विटः ॥ २० ॥ वेश्यादि के व्यसनी पुरुषों को वेश्याओं आदि के यहां पहुँचा कर जीविकोपार्जन करने वाले को 'विट कहते है। सर्वेषां प्रहसनपात्रं विदूषकः ॥ २१ ॥ सबको हंसी का पात्र 'विदूषक' है। कामशास्त्राचार्यः पीठमर्दकः ॥ २२ ॥ कामशास्त्र के आचार्य की 'पीठमर्दक' संज्ञा है। गीताङ्गपटावरणेन नृत्यवृत्त्याजीवी नर्त्तको नाटिकाभिनयरङ्ग- नर्तको वा ॥ २३ ॥ सङ्गीत में सहायक वस्त्रों से सुसज्जित होकर नृत्य कला द्वारा अपनी जीविका चलाने वाला अथवा नाटक नाटिका के अभिनय में रङ्गभूमि में नृत्य करने वाला 'नर्त्तक' है। रूपाजीवानृत्युपदेष्टा गायकः ॥ २४ ॥ वेश्याओं को उनकी जीविका का साधनभूत नृत्यगान का उपदेश देने वाला 'गायक' है। गीतप्रबन्धगतिविशेषवादकचतुर्विधातोद्यप्रचारकुशलो वादकः ॥ २५ ॥ गीत की रचना के अनुसार विशेष ताल लय के साथ सितार, मृदङ्ग, बांसुरी, मजीरा आदि चार प्रकार के वाद्य में कुशल व्यक्ति 'वादक' है। वाग्जीवी वैतालिकः सूतो वा ॥ २६ ॥ कविता कथा आदि के द्वारा अपनी वाणी के बल पर जीविकानिर्वा
चारसमुद्देशः ७७ करने वाला वैतालिक-चारण भाट, बन्दी आदि और सूत-कथा वाचक ये 'वाग्जीवो' हैं। गणकः संख्याविद् दैवज्ञो वा ॥ २७ ॥ गणित का पण्डित अथवा ज्योतिषी 'गणक' है। शाकुनिकः शकुनवक्ता ॥ २८ ॥ तरह-तरह के भले-बुरे सगुन बताने वालों का नाम शाकुनिक है। भिषगायुर्वेदविद्वैद्यः शल्यकर्मविच्च ॥ २९ ॥ आयुर्वेद जानने वाला वैद्य और शस्त्र कर्म अर्थात् चीड़-फाड़ जानने वाला भिषक् है। ऐन्द्रजालिकस्तन्त्रयुक्त्या मनोविस्मयकरो मायावी वा ॥ ३० ॥ तन्त्रशास्त्रों की युक्तियों द्वारा मन को चकित कर देने वाला मायावी 'ऐन्द्रजालिक' कहा जाता है। नैमित्तिको लक्ष्यवेधदैवज्ञो वा ॥ ३१ ॥ लक्ष्यवेध करने वाला अथवा, दैवज्ञ 'नैमित्तिक' है। महानसिकः सूदः ॥ ३२ ॥ रसोई बनाने वाला 'सूद' है। विचित्रभक्ष्यप्रणेता अरालिकः ॥ ३३ ॥ विभिन्न प्रकार के भोजन बनाने वाले को आरालिक कहते हैं। अङ्गमर्दनकलाकुशलो भारवाहको वा संवाहकः ॥ ३४ ॥ अङ्गमर्दन की कला में कुशल अथवा बोझा ढोने वाले कुली की 'संवा- हक' संज्ञा है। द्रव्यहेतोः कृच्छ्रेण कर्मणा यः स्वजीवितविक्रयी स तीक्ष्णोऽसह्यो वा ॥ ३५ ॥ पैसे के लिये अत्यन्त कठोर कर्म शेर बाघ आदि से लड़ना आदि के द्वारा जो अपने प्राणों तक की बाजी लगा दे उसको 'तीक्ष्ण' अथवा 'असह्य' कहते हैं। बन्धुषु निःस्नेहाः क्रूराः ॥ ३६ ॥ बन्धु-बान्धवों के प्रति स्नेह रहित व्यक्ति को 'क्रूर' कहते हैं। अलसाश्च रसदाः ॥ ३७ ॥ आलसी आदमियों की 'रसद' संज्ञा है। [ इति चारसमुद्देशः ]
७८ नीतिवाक्यामृतम् १६. विचारसमुद्देशः यहां १ से १० सूत्रों तक विचार की महत्ता और उसके स्वरूप का चिंतन किया गया है— नाविचार्य कार्यं किमपि कुर्यात् ॥ १ ॥ बिना विचार के कोई भी कार्य न करे। प्रत्यक्षानुमानागमैर्यथावस्थितवस्तुव्यवस्थापनहेतुर्विचारः ॥ २ ॥ प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम प्रमाण के द्वारा जो वस्तु जैसी है उसे इसी रूप में निश्चित करने के कारण का नाम विचार है। स्वयं दृष्टं प्रत्यक्षम् ॥ ३ ॥ अपनी आंखों देखा दृश्य प्रत्यक्ष कहा जाता है। न ज्ञानमात्रात् प्रेक्षावतां प्रवृत्तिर्निवृत्तिर्वा ॥ ४ ॥ किसी भी कार्य में विचारकों की प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति केवल ज्ञान से नहीं होती अर्थात् चिन्तनशील पुरुष किसी काम को तभी छोड़ते हैं या उसमें लगते हैं जब वे उसे प्रत्यक्ष अनुमान आदि से ठीक समझते हैं। स्वयं दृष्टेऽपि मतिर्विमुह्यति, संशेते विपर्यस्यति वा किं पुनर्न परोपदिष्टे ॥ ५ ॥ जब कि स्वयं देखे हुए भी पदार्थ में मनुष्य की बुद्धि मोह, संशय और भ्रम में पड़ जाती है तब क्या दूसरों के द्वारा बताई या कही गई वस्तु में उसे मोहादि नहीं होगा ? स खलु विचारज्ञो यः प्रत्यक्षेणोपलब्धमपि साधु परीक्ष्यानुतिष्ठति ॥६॥ विचारक वह है जो प्रत्यक्ष देखी वस्तु का भी सम्यक् परीक्षण करने के अनन्तर कार्य में प्रवृत्त होता है। अतिरभसात् कृतानि कार्याणि किं नामानर्थं न जनयन्ति ॥ ७ ॥ अत्यन्त शीघ्रता से किये गये कार्य कौन सा अनर्थ नहीं उत्पन्न करते ? अर्थात् बिना सोचे समझे किसी कार्य को जल्दबाजी में कर डालने से अनेक कठिनाइयां और उपद्रव सामने आते हैं। अविचार्याचरिते कर्मणि पश्चात् प्रतिविधानं गतोदके सेतुबन्धन- मिव ॥ ८ ॥ बिना विचारे किये गये काम में आई हुई आपत्तियों का बाद में प्रती- कार करना पानी बह जाने पर बांध बांधने के समान व्यर्थ है। कर्मसु कृतेनाकृतावेक्षणमनुमानम् ॥ ९ ॥ किये गये काम से बिना किये हुए काम को बुद्धि से समझ लेना अर्थात्
विचारसमुद्देशः ७६ किसी काम को थोड़ा सा करने के बाद उस पूरे काम की रूपरेखा को बुद्धि- बल से ज्ञान कर लेना निश्चय कर लेना अनुमान है । सम्भावितैकदेशो नियुक्तं विद्यात् ॥ १० ॥ किसी कार्य का एक अंश पूरा कर लेने पर पूर्ण कार्य का निश्चय कर ले । अर्थात् किसी व्यक्ति ने यदि किसी काम के प्रारंभिक अंश को सफलता के साथ कर लिया तो समझना चाहिए कि वह पूरा काम सफलता के साथ कर लेगा । होनहार राजकुमार के लक्षण— आकारः शौर्यं प्रज्ञा-सम्पत्तिरायतिर्विनयश्च राजपुत्राणां भाविनो राज्यस्य लिङ्गानि ॥ ११ ॥ शारीरिक सुन्दर आकार, शूरता, बुद्धिबल, प्रभाव, और विनय ये सब गुण राजकुमारों के भावी राज्य-शासन के चिह्न हैं । अर्थात् उक्त गुणों को देखकर यह अनुमान कर लिया जाता है या किया जा सकता है । प्राणियों के भविष्य की पहिचान— प्रकृतेर्विकृतिदर्शनं हि प्राणिनां भविष्यतोः शुभाशुभयोर्लिङ्गम् ॥१२॥ स्वभाव की विकृति ही प्राणियों के भावी शुभाशुभ का चिह्न हैं । अर्थात् किसी व्यक्ति के स्वभाव में जैसा कुछ भला-बुरा परिवर्तन समय-समय पर दिखाई पड़े वैसा ही उसका भविष्य जीवन समझे । एक कार्य में सफल व्यक्ति को अन्य कार्य में सफलता की संभावना— एकस्मिन् कर्मणि दृष्टबुद्धिपुरुषकारः कथं नाम न कर्मान्तरे समर्थः ॥१३॥ किसी एक काम में जो अपना बुद्धि और पौरुष प्रदर्शित कर चुका है वह दूसरे काम में क्यों नहीं समर्थ होगा ? आगम का लक्षण— आप्तपुरुषोपदेश आगमः ॥ १४ ॥ आप्त पुरुषों के उपदेश को आगम कहते हैं । आप्त का लक्षण— यथानुभूतामितश्रुतार्थाऽविसंवादिवचनः पुमानाप्तः ॥ १५ ॥ अनुभव, अनुमान और शास्त्रश्रुत अर्थ के अनुसार वचन बोलने वाला पुरुष आप्त है । युक्तिहीन वाक्य की व्यर्थता— सा वागुक्ताऽप्यनुक्तसमा, यत्र नास्ति सद्युक्तिः ॥ १६ ॥ जिसमें कोई अच्छी युक्ति न दी गई हो ऐसी बात कही हुई भी न कही जाने के समान है ।
८० नीतिवाक्यामृतम् व्यक्तित्व और वाणी का सम्बन्ध— वक्तृगुणगौरवाद् वचनगौरवम् ॥ १७ ॥ बोलनेवाले के गुणों की गुरुता के कारण उसकी वाणी का गौरव होता है। धन के उपयोग के विषय में— किं मितम्पचेषु धनेन चण्डालसरसि वा जलेन यत्र सतां नोप- भोगः ॥ १८ ॥ अपने ही भोजन भर को थोड़ा सा पकाने वाले अर्थात् कृपण पुरुष को धन होने से और चण्डाल के तालाब में जल होने से क्या लाभ है जब कि सामान्यरूप से सत् पुरुष उसका उपभोग नहीं कर सकते । जनता की गतानुगति— लोकस्तु गतानुगतिको यतोऽसौ सदुपदेशिनीमपि कुट्टिनीं धर्मेषु न तथा प्रमाणयति यथा गोघ्नमपि ब्राह्मणम् ॥ १९ ॥ संसार गतानुगतिक अर्थात् 'देखा-देखी' काम करने वाला है, जैसा एक करता है वैसा ही दूसरे भी करने लगते हैं। क्योंकि कुट्टिनी-वेश्या धर्म के सम्बन्ध में कैसा भी सदुपदेश क्यों न दे लोग उसे वैसा न मानेंगें जैसा गौ के भी हत्यारे ब्राह्मण के उपदेश को । [ इति विचारसमुद्देशः ] १६. व्यसन समुद्देश व्यसन और उसका भेद— व्यस्यति पुरुषं श्रेयसः इति व्यसनम् ॥ १ ॥ व्यक्ति को कल्याण मार्ग से विचलित अथवा भ्रष्ट करनेवाले कार्यों का नाम व्यसन है । व्यसनं द्विविधं सहजमाहार्यं च ॥ २ ॥ व्यसन दो प्रकार के हैं : १. सहज २. आहार्य अर्थात् एक स्वाभाविक, दूसरा दूसरों को द्यूत, मद्यपान आदि में प्रवृत्त देखकर स्वयं भी उसमें पड़ना । सहज व्यसन को दूर करने के उपाय— सहजं व्यसनं धर्मसंभूताभ्युदयहेतुभिरधर्मजनितमहाप्रत्यवायप्रति- पादनैरुपाख्यानैर्योगपुरुषैश्च प्रशमं नयेत् ॥ ३ ॥ मनुष्य को चाहिए कि वह अपने सहज व्यसनों को धर्ममूलक कल्याण- कारी साधनों और उपायों से और अधर्म से होने वाले महान् सङ्कटों को
व्यसनों से उसका मोह दूर कर सकें वे योग पुरुष हैं।
Wait, in line 8: उन-
Line 9: उन व्यसनों से उसका मोह दूर कर सकें वे योग पुरुष हैं।
आहार्य व्यसन को दूर करने के उपाय- शिष्ट-संसर्गदुर्जनासंसर्गाभ्यां पुरातनमहापुरुषचरितोत्थिताभिश्च कथाभिराहार्यं व्यसनं प्रतिबध्नीयात् ॥ ५ ॥ पुरुष अपने आहार्य व्यसनों को सत्पुरुषों की संगति करके और दुष्ट पुरुषों का संसर्ग त्यागकर तथा प्राचीन महापुरुषों के चरित्र से सम्बद्ध कथाओं से दूर करे ।
अठारह प्रकार के दुर्व्यसनों का क्रमशः उल्लेख और उनके दोष आदि
का चर्चा-
Wait, is it का चर्चा- or की चर्चा-?
Line 17: का चर्चा— (Wait, looks like का चर्चा— with 'क' and 'ा' - yes, का चर्चा—).
स्त्रियमतिभजमाने भवत्यवश्यं तृतीया प्रकृतिः ॥ ६ ॥ स्त्री का अत्यधिक सेवन करने से मनुष्य अवश्य ही नपुंसक हो जाता है। सौम्यधातुक्षय
digit in line 3:
In line 3, does the digit have a flat horizontal line with a downward tail?
NO! It curves inward in the middle, and curves down at the bottom!
WAIT! It DOES look like a ३!
Wait, but could it be १२ in a different font? No, this whole book is handset letterpress in the same font.
Wait, why would line 3 be १३, line 9 be १३, and line 13 be १३?
Wait, three 13s in a row?!
Let me re-examine line 3 digit very carefully!
Wait! Look at line 3:
यश्च ॥ १२ ॥? Wait, look at the second digit:
Top: rounded.
Middle: goes left.
Bottom: rounded?
Wait! Look at line 21: ॥ १५ ॥. The ५ has a vertical and curve.
Line 25: ॥ १६ ॥. The ६ has a curve to the left.
Line 28: ॥ १७ ॥. The ७ has a curve.
Line 32: ॥ १८ ॥. The ८ looks like ८.
Line 18: ॥ १४ ॥. The ४ looks like ४.
Line 21: ॥ १५ ॥. The ५ looks like ५.