नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
व्यसनसमुद्देशः ८३ अतिव्ययोऽपात्रव्ययश्चार्थदूषणम् ॥ १६ ॥ अत्यन्त व्यय करना और अपात्र में बुरे कामों आदि में व्यय करना अर्थ दोष है । हर्षामर्षाभ्यामकारणं तृणांकुरमपि नोपहन्यात् किं पुनर्मनु- ष्यम् ॥ २० ॥ हर्ष और अमर्ष अर्थात् प्रसन्नता और क्रोध के भावावेश में आकर घास के अंकुर को भी न नष्ट करे फिर मनुष्य को नष्ट करने की तो बात ही क्या है ? श्रूयते हि निष्कारणं भूतावमानिनौ वातापिरिल्वलश्चासुरावगस्त्या- शनाद् विनेशतुरिति ॥ २१ ॥ यह सुना जाता है कि जीवों से अकारण द्वेष करने वाले वातापि और इल्वल नाम के दानव अगस्त्य ऋषि के द्वारा भक्षित होकर विनष्ट हो गये । यथादोषं कोटिरपि गृहीता न दुःखायते ॥ २२ ॥ दोष और अपराध के अनुसार करोड़ रूपया भी छीन लिया जाय तो दुःखदायक नहीं होता । अन्यायेन तृणशलाकापि गृहीता प्रजाः खेदयति ॥ २३ ॥ अन्यायपूर्वक यदि तिनका भी छीन लिया जाय तो उससे प्रजा दुःखी होती है । तरुच्छेदेन फलोपभोगः सकृदेव ॥ २४ ॥ पेड़ काट कर फलों का उपभोग एक ही बार तो किया जा सकता है । प्रजाविभवो हि स्वामिनोऽद्वितीयं भाण्डागारमतो युक्तितस्तमु- पयुञ्जीत ॥ २५ ॥ राजा के लिये प्रजा का धन-धान्य से सम्पन्न होना अनुपम और अक्षय भण्डार के समान है अतः उसका उपयोग उसे युक्तिपूर्वक करना चाहिए । राजपरिगृहीतं तृणमपि काञ्चनीभवति जायते च पूर्वसञ्चितस्या- प्यर्थस्यापायः ॥ २६ ॥ तिनके के बराबर तुच्छ भी राजकीय वस्तु का ग्रहण चोरी आदि सोने के समान हो जाती है अर्थात् उसका बहुत बड़ा दण्ड चुकाना पड़ता है जिससे पूर्व सञ्चित भी धन नष्ट हो जाता है । वाक्पारुष्यं शस्त्रपातादपि विशिष्यते ॥ २७ ॥ वाणी की कठोरता शस्त्र पात से भी अधिक कठोर होती है । ज्ञानिवयोवृत्तविद्याविभवानुचितं हि वचनं वाक्पारुष्यम् ॥ २८ ॥
८४ नीतिवाक्यामृतम् किसी की जाति, अवस्था, सदाचार, और विद्या तथा ऐश्वर्य के अनुकूल वचन का प्रयोग न करना ही वाक् पारुष्य अर्थात् वाणी की कठोरता है। स्त्रियम्, अपत्यं, भृत्यं वा तथोक्त्या विनयं ग्राहयेद् यथा हृदय- प्रविष्टाच्छल्यादिव वचनतो न ते दुर्मनायन्ते ॥ २९ ॥ अपनी स्त्री, सन्तान और सेवक को ऐसे वचनों से विनयी बनावे जिससे वे हृदय में प्रविष्ट तीर के समान दुःखद दुर्वचनों से दुःखी न हों। वधः परिक्लेशोऽर्थहरणं वा क्रमेण दण्डपारुष्यम् ॥ ३० ॥ किसी का वध कर देना, जेल आदि में रख कर यन्त्रणा देना और धन छीन लेना ये क्रमशः दण्ड पारुष्य हैं। एकेनापि व्यसनेनोपहतश्चतुरङ्गवानपि राजा विनश्यति किं पुनर्नाष्टा- दशभिः ॥ ३१ ॥ एक भी व्यसन में लिप्त राजा सेना, हाथी, घोड़ा और पैदल इन चतुरङ्गों से युक्त होने पर भी विनष्ट हो जाता है फिर अठारह दोषों से युक्त के विषय में तो कहना ही क्या है ? [ इति व्यसन समुद्देशः ] १७. स्वामि समुद्देशः दो सूत्रों द्वारा 'स्वामी' के आवश्यक गुणों का वर्णन— धार्मिकः कुलाचाराभिजनविशुद्धः प्रतापवान् नयानुगतवृत्तिश्च स्वामी ॥ १ ॥ धार्मिक, विशुद्ध वंश, आचार और परिवार वाला, प्रतापशाली तथा नीति के अनुसार आचरण करने वाला जो हो वह स्वामी है। कोपप्रसादयोः स्वतन्त्रता आत्मातिशयवर्धनं वा यस्यास्ति स स्वामी ॥ २ ॥ क्रोध और प्रसाद में जो स्वतन्त्र हो अर्थात् क्रोध करे तो कुछ बिगाड़ सके और प्रसन्न हो तो कुछ दे सके तथा अपना उत्कर्ष करने में जो साधन सम्पन्न हो वह स्वामी है। स्वामी की आवश्यकता— स्वामिमूलाः सर्वाः प्रकृतयो भवन्त्यभिप्रेतप्रयोजना नास्वामिकाः ॥३॥ समस्त प्रजा स्वामी के ही आधार से अपना अभीष्ट सिद्ध करने में समर्थ होती है बिना स्वामी के नहीं। अस्वामिकाः प्रकृतयः समृद्धा अपि निस्तरीतुं न शक्नुवन्ति ॥ ४ ॥
स्वामिसमुद्देशः ८५ बिना स्वामी की प्रजा समृद्ध होने पर भी अपना उद्धार नहीं कर सकती । दृष्टान्त— अमूलेषु तरुषु किं कुर्यात् पुरुषप्रयत्नः ॥ ५ ॥ बिना जड़ के वृक्षों में पुरुष प्रयत्न करके भी क्या कर सकता है । असत्यवादिता के दोष— असत्यवादिनो विनश्यन्ति सर्वे गुणाः ॥ ६ ॥ असत्यवादी के सब गुण नष्ट हो जाते हैं । वञ्चक के दोष— वञ्चकेषु न परिजनो नापि चिरमायुः ॥ ७ ॥ दूसरों को ठगने और धोखा देने वालों के समीप न तो सेवक होते हैं न वे दीर्घायु होते हैं । धनदाता की लोकप्रियता— स प्रियो लोकानां यो ददात्यर्थम् ॥ ८ ॥ जो धन देता हैं वह लोकप्रिय होता है । अर्थात् दानी पुरुष शीघ्र ही सबका प्यारा बन जाता है । महान् दाता का स्वरूप— स दाता महान् यस्य नास्ति प्रत्याशोपहतं चेतः ॥ ९ ॥ महान् दाता वह है जिनके चित्त में दान के अनन्तर किसी प्रत्युपकार की आशा नहीं होती । प्रत्युपकर्त्तुरुपकारः सवृद्धिकोऽर्थन्यास इव ॥ १० ॥ प्रत्युपकार करनेवाले के प्रति उपकार करना बढ़ने वाली धरोहर के समान है । उपकार प्रत्युपकार की परम्परा की आवश्यकता— तज्जन्मान्तरेषु न केषामृणं येषामप्रत्युपकारं परार्थानुभवनम् ॥११॥ जो बिना प्रत्युपकार के परोपकार करते हैं उनका वह परोपकार जन्मा- न्तर में ऋण तुल्य होता है । अर्थात् उपकार के बदले उपकार की भावना रखनी चाहिए और उपकार के बदले उपकार करते रहना चाहिए अन्यथा वह दूसरे का उपकार अपने ऊपर जन्मान्तर तक ऋण सा लदा रहता है । दृष्टान्त— किं तया गवा या न क्षरति क्षीरं न गर्भिणी वा ॥ १२ ॥ उस गाय से क्या लाभ जो न दूध देती है न गर्भिणी होती है ?
८६ नीतिवाक्यामृतम् स्वामी की कृपा का स्वरूप— किं तेन स्वामिप्रसादेन यो न पूरयत्याशाम् ॥ १३ ॥ स्वामी की उस प्रसन्नता से क्या लाभ जिससे आशा न पूर्ण हो । क्षुद्रमण्डल के दोष— क्षुद्रपरिषत्कः सर्पवानाश्रय इव न कस्यापि सेव्यः ॥ १३ ॥ जिसकी सभा में क्षुद्र पुरुष हों अर्थात् जिसके परामर्श दाताओं के मण्डल में क्षुद्र विचार के लोग होते हैं उसका उस स्वामी का आश्रय कोई भी उसी प्रकार नहीं ग्रहण करता जिस प्रकार सर्प से बसे हुए घर में कोई नहीं रहता । कृतघ्नता का दोष— अकृतज्ञस्य व्यसनेषु न सन्ति सहायाः ॥ १५ ॥ कृतघ्न पुरुष को दुःख पड़ने पर कोई सहायक नहीं होता । प्रत्येक व्यक्ति में विशेष गुण की आवश्यकता— अविशेषज्ञः शिष्टैर्नाश्रीयते ॥ १६ ॥ जिसमें कोई विशेष गुण नहीं होता शिष्ट पुरुष उसका आश्रय नहीं लेते । अतिस्वार्थ का दोष— आत्मम्भरिः कलत्रेणापि त्यज्यते ॥ १७ ॥ केवल अपना पेट भरना जाननेवाले को अर्थात् अत्यन्त स्वार्थी को उसकी स्त्री भी छोड़ देती है । उत्साह की महिमा— अनुत्साहः सर्वव्यसनानामागमद्वारम् ॥ १८ ॥ अनुत्साह सब प्रकार के दुःखों के आने का द्वार है । अर्थात् जहां उत्साह नहीं वहां अनेक आपत्तियां आती रहती हैं । उत्साह के गुण— शौर्यममर्षः शीघ्रकारिता सत्कर्मप्रवीणत्वमित्युत्साहगुणाः ॥ १६ ॥ पराक्रम, अन्यायी पर क्रोध और कार्यों को शीघ्र करना तथा सत्कर्म में कुशल होना ये उत्साह के गुण हैं । अन्यायाचरण का दोष— अन्यायप्रवृत्तेर्न चिरं सम्पदो भवन्ति ॥ २० ॥ अन्यायाचरण करनेवाली की सम्पत्ति चिरस्थायी नहीं होती । स्वेच्छाचार का दोष— यत्किंचनकारी स्वैः परैर्वा हन्यते ॥ २१ ॥
स्वामीसमुद्देशः ८७ जो चाहे सो करने वाला अर्थात् अत्यन्त स्वेच्छाचारी पुरुष कभी न कभी आत्मीय अथवा पराए लोगों के द्वारा मार डाला जाता है। ऐश्वर्य का फल— आज्ञाफलमैश्वर्यम् ॥ २२ ॥ आज्ञा प्रदान करना और उसका पूर्ण होना ऐश्वर्य का फल है। अर्थात् ऐश्वर्य और अधिकार तभी सफल है जब आज्ञा देने का सामर्थ्य हो और लोग उसका पालन करें। धन का फल— दत्तभुक्तफलं धनम् ॥ २३ ॥ दान देना और उसका उपभोग करना धन का फल है। अर्थात् धन तभी सफल है जब दान दिया जाय और तदनुकूल सुख भोगा जाय। 'स्त्री' की उपयोगिता— रतिपुत्रफला दाराः ॥ २४ ॥ सम्भोग और सन्तान की प्राप्ति स्त्री होने का फल है। अर्थात् सुखप्राप्ति और सन्ततिलाभ न हुआ तो स्त्री का होना व्यर्थ है। राजाज्ञा की उत्कृष्टता — राजाज्ञा हि सर्वेषामलङ्घ्यः प्राकारः ॥ २५ ॥ राजाज्ञा सब के लिये अलङ्घ्य प्राकार-चहारदीवारी या खाई के समान है। जिस प्रकार किले की रक्षा के लिये बनाया गया प्राकार दुर्लङ्घ्य होता है उसी प्रकार राजाज्ञा का भी उल्लङ्घन नहीं किया जा सकता। अपनी आज्ञा के विषय में राजा का कर्तव्य— आज्ञाभङ्गकारिणं सुतमपि न सहेत ॥ २६ ॥ राजा को चाहिए कि यदि उसका पुत्र भी उसकी आज्ञा का उल्लङ्घन करे तो उसको सहन नहीं करना चाहिए। कस्तस्य चित्रगतस्य च राज्ञो विशेषो यस्याज्ञा नास्ति ॥ २७ ॥ जिसकी आज्ञा का पालन नहीं होता उस राजा में और चित्र में बने हुए राजा में क्या विशेषता है ? उल्लङ्घन का दण्ड— राजाज्ञावरुद्धस्य पुन-स्तदाज्ञाऽप्रतिपादनेन उत्तमःसाहसोदण्डः ॥ २८ ॥ जो राजा की आज्ञा से अवरुद्ध हुआ हो अर्थात् जेल आदि में बन्दी हो और पुनः आज्ञा का उल्लङ्घन करे तो उसे १००० पण का 'उत्तम साहस' दण्ड देना चाहिए। सम्बन्धाभावे तदातुश्च ॥ २९ ॥
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ८८ नीतिवाक्यामृतम् अपराध से अपराधी का सम्बन्ध न सिद्ध हो तो जिस न्यायकर्त्ता ने दण्ड दिया हो उसे उत्तम साहस दण्ड दे । बोलने का नियम— परमर्म्मस्पर्शिकरम्, अश्रद्धेयम्, असत्यम्, अतिमात्रं च न भाषेत ॥ ३० ॥ दूसरे को मर्मान्तिक पीड़ाकारी, अविश्वास योग्य, असत्य और बहुत ज्यादा न बोले । वेष का नियम -- वेषमाचारं वाऽनभिजातं न भजेत् ॥ ३१ ॥ ऐसा वेष और व्यवहार न करे जो अभिजात न हो । अभिजात का अर्थ होता है कुलीन, सद्वंश में उत्पन्न और शिष्ट, अतः अनभिजात इससे प्रतिकूल अर्थ का वाची हुआ। इस प्रकार इस सूत्र का स्पष्टार्थ होगा कि मनुष्य को चाहिए कि वह ऐसी वेष भूषा न धारण करे जो शिष्ट समाज में न व्यवहृत होती हो तथा ऐसा व्यवहार भी किसी से न करे जो शिष्ट परम्परा के अनुकूल न हो । राजा के अनुसार प्रजा का आचार-व्यवहार— प्रभौ विकारिणि को नाम न विकुरुते ॥ ३२ ॥ राजा के विकृत होने पर कौन नहीं विकृत होता ? अधर्मपरे राज्ञि को नाम नाधर्मपरः ॥ ३३ ॥ राजा के अधार्मिक होने पर कौन नहीं अधार्मिक होता ? राजा के द्वारा मानापमान का महत्त्व— राज्ञावज्ञातो यः स सर्वैरवज्ञायते ॥ ३४ ॥ जो राजा से तिरस्कृत होता है वह सब के द्वारा तिरस्कृत होता है । पूजितं हि पूजयन्ति लोकाः ॥ ३५ ॥ राजा से पूजित और सम्मानित को सब लोग पूजते हैं अर्थात् सम्मान करते हैं । प्रजा की देखभाल के विषय में राजा का कर्त्तव्य— प्रजाकार्यं स्वयमेव पश्येत् ॥ ३६ ॥ राजा को चाहिए कि वह प्रजा के कामों को स्वयं देखे । यथावसरमप्रतीहारसंगं द्वारं कारयेत् ॥ ३७ ॥ अवसर के अनुकूल राजा अपने द्वार परसे द्वारपाल को भी हटा दे जिससे लोग सरलता से राजा से मिल सकें । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
स्वामिसमुद्देशः ८६ दुर्दर्शो हि राजा कार्याकार्यविपर्यासमासन्नैः कार्यतेऽतिसंधीयते च द्विषद्भिः ॥ २८ ॥ जो राजा प्रजा के कार्यों को स्वयम् नहीं देखता उस दुर्दर्श, राजा के भले और बुरे कामों को उसके आसन्न वर्ती अर्थात् पास रहने वाले लोग उलट-पुलट देते हैं और शत्रु भी ऐसे राजा को धोखा देते और ठगते हैं । राजा के सङ्कट से सेवकों की लाभ की प्रवृत्ति— वैद्येषु श्रीमतां व्याधिवर्धनादिव नियोगिषु भर्तुर्व्यसनवर्धनादपरो नास्ति जीवनोपायः ॥ ३६ ॥ जिस प्रकार धनी पुरुषों की व्याधियों के बढ़ने के अतिरिक्त दूसरा उपाय वैद्य की आजीविका का नहीं है उसी प्रकार सेवकों के लिये स्वामी के संकट में पड़ने के अतिरिक्त दूसरा जीविका का उपाय नहीं है अथवा स्वामी के द्यूत मद्यपान आदि के दुर्व्यसनी होने के अतिरिक्त दूसरा उपाय नहीं है। राजा यदि दुर्व्यसनों में लिप्त हो जाता है तो नौकर चाकर उसी छल से राजा के धन का अपहरण करते रहते हैं ।
- घूसखोरी के विषय में निर्देश और उपदेश— कार्यार्थिनो लंचो लुञ्चति ॥ ४० ॥ कार्यार्थी पुरुष को घूस-भेंट आदि लेने वाला अधिकारी लूटता है । निशाचराणां भूतबलिं न कुर्यात् ॥ ४१ ॥ राजा को चाहिए कि घूस-रिश्वत लेने वाले निशाचरों के लिये अपने भूत अर्थात् प्रजावर्ग को बलि न बनावे । अर्थात् राजा प्रजा को घूस-खोरों से बचावे । लंचो हि सर्वपातकानामागमनद्वारम् ॥ ४२॥ घूस सब पापों के आने का द्वार रूप है । मातुः स्तनमपि लुंनंति लंचोपजीविनः ॥ ४३ ॥ घूस रिश्वत से जीविकार्जन करनेवाले व्यक्ति अपनी माता का भी स्तन काट लेते हैं । लंचेन कार्याभिरुद्धः स्वामी विक्रीयते ॥ ४४ ॥ जिस स्वामी के यहाँ लंच अर्थात् घूस के कारण काम रुकता हो वह स्वामी घूसखोरों के हाथ बिक सा जाता है । घूस देने वाला उसके यहां न्याय- अन्याय सभी प्रकार के कार्य कराता है । प्रासादविध्वंसनेन लोहकीलकलाभ इव लंचेन राज्ञोऽर्थलाभः ॥४५॥ घूस रिश्वत के द्वारा धन का लाभ राजा के लिये वैसा ही है जैसे महल
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ६० नीतिवाक्यामृतम् गिराकर लोहे की कील प्राप्त करने में हैं। अर्थात् घूसखोर राजा का राज्य ही नष्ट हो जाता है। राज्ञो लंचेन कार्यकरणं कस्य नाम कल्याणम् ॥ ४६ ॥ राजा का घूस लेकर काम करना किसी के लिये भी कल्याणकारक नहीं है। देवतापि यदि चौरेषु मिलति कुतः प्रजानां कुशलम् ॥ ४७ ॥ देवतारूप राजा भी यदि चोरों में मिल जाय तो प्रजा का कुशल- मङ्गल कहां से होगा ? अर्थात् रक्षक ही यदि भक्षक बन गया तो फिर कल्याण कहां ? लंचेनार्थोपायं दर्शयन् देशं कोशं भिन्नं तन्त्रं च भक्षयति ॥ ४८ ॥ राजा को घूस से अर्थलाभ प्रदर्शित करनेवाला अमात्य राजा के देश, कोश, मित्र और सैन्य वर्ग को खा जाता है अर्थात् विनष्ट कर देता है। राजा के द्वारा अन्याय और न्यायाचार— राज्ञोऽन्यायकरणं समुद्रस्य मर्यादाल्लङ्घनम् , आदित्यस्य तमः पोष- णम् , मातुः स्वापत्यभक्षणमिति कलिकालविजृम्भितानि ॥ ४६ ॥ राजा का अन्याय करना समुद्र के मर्यादा लंघन के समान, सूर्य के द्वारा अन्धकार का पोषण होने के समान और माता का अपनी सन्तान के भक्षण के समान है और यह सब कलियुग का विलास है। राजा कालस्य कारणम् ॥ ५० ॥ प्रजा के दुःखमय अथवा सुखमय समय व्यतीत करने का कारण राजा होता है। न्यायतः परिपालके राज्ञि प्रजानां कामदुघा भवन्ति सर्वा दिशः काले च वर्षति मघवान् , सर्वाश्चेतयः प्रशाम्यन्ति ॥ ५१ ॥ जब राजा न्यायपूर्वक प्रजा का पालन करता है तब प्रजा के लिये समस्त दिशाएँ कामधेनु के समान हो जाती हैं—प्रजा की समस्त अभिलाषाएं पूर्ण होती हैं इन्द्र समय से वर्षा करता है और राज्य की समस्त 'ईतियां' शान्त रहती हैं। अतिवृष्टि, अनावृष्टि, टिड्डी दल आदि का आना, मूषकों का और चिड़ियों का उपद्रव, और राजाओं का चढ़ाई कर देना यह छह ईतियां है। राजपद की महत्ता — राजानमनुवर्त्तन्ते सर्वेऽपि लोकपालास्तेन मध्यममप्युत्तमं लोकपालं राजानमाहुः ॥ ५२ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
स्वामिसमुद्देशः ६१ समस्त लोकपाल राजा का अनुसरण करते हैं। अतः मध्यम श्रेणी का भी राजा उत्तम लोकपाल कहा जाता है। राजसहायता के अधिकारी— अव्यसनेन क्षीणधनान् मूलधनप्रदानेन कुटुम्बिनः प्रतिसंभाव- येत् ॥ ५३ ॥ द्यूत, मद्यपान आदि किसी व्यसन के कारण नहीं, किन्तु अन्य किसी कारण से अर्थात् चोरी, व्यापारिक घाटा आदि से जिनका धन नष्ट हो गया हो ऐसे कुटुम्बियों को राजा मूलधन-पूंजी के निमित्त धन प्रदान कर समा- दृत करे। राजा का कुटुम्ब और कलत्र— राज्ञो हि समुद्रावधिर्मही स्वकुटुम्बम्, कलत्राणि तु वंशवर्धन- क्षेत्राणि ॥ ५४ ॥ समुद्रपर्यन्त पृथिवी राजा का अपना कुटुम्ब है और उसके उर्वर खेत उसका वंशवर्धन करनेवाले कलत्र हैं। भेंट और उपहार के विषय में राजा का कर्त्तव्य— अर्थिनामुपायनमप्रतिकुर्वाणो न कुर्यात् ॥ ५५ ॥ उपकार न कर सके तो राजा कार्यार्थियों की भेंट न स्वीकार करे। हास-उपहास के नियम— आगन्तुकैरसहनैश्च सह नर्म न कुर्यात् ॥ ५६ ॥ अपरिचित और असहिष्णु व्यक्तियों के साथ परिहास-हंसी मजाक न करे। बड़ों से संभाषण का नियम— पूज्यैः सह नाधिरुह्य वदेत् ॥ ५७ ॥ आदरणीय व्यक्तियों के साथ कुर्सी पलंग आदि किसी आसन पर चढ़कर बातें न करें। झूठी आशा देना अनुचित— भृत्यमशक्यमप्रयोजनं च जनं नाशया क्लेशयेत् ॥ ५८ ॥ असमर्थ, सेवक और निःस्वार्थ व्यक्ति को झूठी आशा देकर पीडित न करे। दासता और धन— पुरुषो हि न पुरुषस्य दासः किन्तु धनस्य ॥ ५९ ॥ पुरुष पुरुष का दास नहीं होता किन्तु धन का दास होता है। यही बात महाभारत के भीष्मपर्व में भीष्म ने युधिष्ठिर से कही है।
६२ नीतिवाक्यामृतम् "अर्थस्य पुरुषो दासः दासस्त्वर्थो न कस्यचित् । इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः ॥" को नाम धनहीनो न भवति लघुः ॥ ६० ॥ कौन धनहीन पुरुष छोटा नहीं हो जाता ? पराधीनेषु नास्ति शर्मसम्पत्तिः ॥ ६१ ॥ पराधीन व्यक्ति के पास सुखरूप सम्पत्ति नहीं होती। अर्थात् पराधीनता में सुख कहाँ ? विद्या की प्रशंसा— सर्वधनेषु विद्यैव प्रधानमहार्यत्वात् सहानुयायित्वाच्च ॥ ६२॥ सब प्रकार के धनों में विद्या ही प्रधान है क्योंकि उसका कोई अपहरण नहीं कर सकता और मनुष्य जहाँ भी जाता है वह उसके संग लगी रहती है। सरित् समुद्रमिव नीचमुपगतापि विद्या दुर्दर्शमपि राजानं संगमर्यात परन्तु भाग्यानां भवति व्यापारः ॥ ६३ ॥ निम्न मार्ग से बहने वाली भी नदी जिस प्रकार अपने साथ बहने वाले छोटे से छोटे और हल्के से हल्के घास-फूस को भी समुद्र से मिला देती है उसी प्रकार नीच और क्षुद्र पुरुष के भी पास की विद्या उसे दुर्लभ दर्शन वाले राजा से मिला देती है, किन्तु वहाँ पहुँच जाने पर अल्प या अधिक अर्थलाभ भाग्य के ऊपर निर्भर होता है। संयोजयति विद्यैव नीचगापि नरं सरित् । समुद्रमिव दुर्धर्षं नृपं भाग्यमतः परम् ॥ सा खलु विद्या विदुषां कामधेनुर्यतो भवति समस्तजगतः स्थिति- ज्ञानम् ॥ ६४ ॥ विद्वानों के लिये वह विद्या कामधेनु के समान है जिससे समस्त जगत् की स्थिति का ज्ञान होता है। (संभवतः यहाँ ज्योतिष विद्या की प्रशंसा की गई है) लोक व्यवहार जानने का महत्व— लोकव्यवहारज्ञो हि सर्वज्ञोऽन्यस्तु प्राज्ञोऽप्यवज्ञायत एव ॥ ६५ ॥ लोक व्यवहार को जाननेवाला ही सर्वज्ञ है दूसरा तो विद्वान् होने पर भी अनादृत होता है। प्रज्ञापारमित का लक्षण— ते खलु प्रज्ञापारमिताः पुरुषाः ये कुर्वन्ति परेषां प्रतिबोधनम् ॥६६॥ उन पुरुषों को "प्रज्ञापारमित" कहते हैं जो दूसरों को उनके कर्त्तव्य का बोध कराने में समर्थ होते हैं।
अमात्यसमुद्देशः ६३ अनुपयोगिना महतापि किं जलधिजलेन ॥ ६७ ॥ समुद्र की उस विशाल जलराशि से क्या लाभ है जो खारी होने के कारण उपयोग में नहीं आ सकती। [ इति स्वामिसमुद्देशः ] १८. अमात्यसमुद्देशः अमात्य पद की महत्ता— चतुरङ्गयुतोऽपि नानमात्यो राजास्ति कि पुनरन्यः ॥ १ ॥ हाथी, घोड़े, रथ और पैदल की चतुरङ्गिणी सेना से युक्त भी राजा बिना अमात्य के अपना अस्तित्व स्थिर नहीं रख सकता फिर अन्य के विषय में क्या कहा जाय ? नैकस्य कार्यसिद्धिरस्ति ॥ २ ॥ अकेले राजा को कार्यसिद्धि नहीं हो सकती। नह्येकचक्रं परिभ्रमति ॥ ३ ॥ रथ का अकेला पहिया नहीं घूमता। किमवातः सेन्धनोऽपि वह्निर्ज्वलति ॥ ४ ॥ क्या बिना वायु के लकड़ी से युक्त भी आग कहीं जलती है ? अमात्य का स्वरूप— स्वकर्मोत्कर्षापकर्षयोर्दानमानाभ्यां सम्पत्तिविपत्ती येषां तेऽमा- त्याः ॥ ५ ॥ अपने कर्म के अनुसार उन्नति और अवनति के अवसर पर राजा के द्वारा प्रदत्त दान-मानादि से जिनको हर्ष और विषाद हो वे अमात्य हैं। अमात्य के मुख्य कर्तव्य— आयो व्ययः स्वामिरक्षा-तन्त्रपोषणं चामात्यानामधिकारः ॥ ६ ॥ आय और व्यय की देखभाल, राजा की सुरक्षा तथा सैन्य शक्ति का संरक्षण और पोषण ये चार अमात्य के मुख्य कर्त्तव्य हैं। आय-व्यय विषय का विचार— आयव्ययमुखयोर्मुनिकमण्डलुनिदर्शनमेव ॥ ७ ॥ आय और व्यय के विषय में मुनि का कमण्डलु दृष्टान्त रूप है। कमण्डलु में ऊपरी मुख चौड़ा और बड़ा होता है जिससे जल जल्दी भर जाता है और जल गिराने की टोंटी का मुख छोटा होता है जिससे गिराने में जल धीरे-धीरे
६४ नीतिवाक्यामृतम् करके ढेर में गिरता है । इसी प्रकार राज्य में आय का मुख अर्थात् साधन विशाल-अनेक होना चाहिए किन्तु व्यय नियमित और कम होना चाहिए । आयो द्रव्यस्योत्पत्तिमुखम् ॥ ८ ॥ आय द्रव्य की उत्पत्ति का द्वार है । यथा स्वामिशासनमर्थस्य विनियोगो व्ययः ॥ ६ ॥ स्वामी की आज्ञा के अनुकूल अर्थ का निकास व्यय है । आयमनालोच्य व्ययमानो वैश्रवणोऽप्यवश्यं श्रमणायतएव ॥ १० ॥ आय का ध्यान न रखकर व्यय करने वाला कुवेर भी श्रमण अर्थात् भिक्षु बन जाता है । स्वामी शब्द का अभिप्राय— राज्ञः शरीरं, धर्मः कलत्रमपत्यानि च स्वामिशब्दाथाः ॥ ११ ॥ राजा का शरीर, उसके कर्त्तव्य और धर्म, पत्नियां और पुत्र-पुत्री -स्वामि शब्द का आशय है । तन्त्र का स्वरूप— तन्त्रं चतुरङ्गबलम् ॥ १२ ॥ हाथी, घोड़े, रथ अथवा अश्वारोही और पैदल इन चार प्रकार की सैन्य- शक्ति का नाम तन्त्र है । अमात्य पद के अयोग्य व्यक्तियों का क्रमशः निरूपण— तीक्ष्णं बलवत्पक्षमशुचिं व्यसनिनमशुद्धाभिजनमशक्यप्रत्यावर्तन- मतिव्ययशीलमन्यदेशायातमतिचिक्कणं चामात्यं न कुर्वीत ॥ १३ ॥ जो बहुत उग्रस्वभाव वाला हो, जिसके दल या पार्टी में बहुत लोग हों, जो पवित्र और स्वच्छ ढंग से न रहता हो, जिसको द्यूत मद्यपान आदि का कोई व्यसन हो, जिसका कुल शुद्ध न हो, अशक्य प्रत्यावर्त्तन अर्थात् हठी ऐसा कि किसी काम में लगा दिया और फिर उसे रोकना चाहें तो रुके नहीं, और जो अत्यन्त व्यय करने वाला हो, दूसरे देश से आया हो, और अत्यन्त चिक्कण अर्थात् बहुत ही मृदु हो ऐसे आदमियों को राजा अमात्य न बनावे । तीक्ष्णोऽभियुक्तः स्वयं म्रियते मारयति वा स्वामिनम् ॥ १४ ॥ अत्यन्त उग्रस्वभाववाला व्यक्ति यदि मन्त्रिपद पर नियुक्त होता है तो या तो वह स्वयं कभी क्रोधवश आत्महत्या आदि कर लेता है अथवा स्वामी को ही क्रोधवश मार डालता है । बलवत्पक्षो नियोज्यभियुक्तो व्यालगज इव समूलं नृपाङ्घ्रिपमुन्मू- लयति ॥ १५ ॥
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri अमात्यसमुद्देशः ६५ प्रबल दल वाला व्यक्ति यदि अमात्यरूप अधिकारी के पद पर नियुक्त किया जाता है तो वह मतवाले पागल हाथी की भांति जड़सहित राजारूपी वृक्ष को उखाड़ डालता है। अल्पायतिर्महाव्ययो अक्षयति राजार्थम् ॥ १६ ॥ थोड़ी आय करके बहुत व्यय करने वाला अमात्य राजा के अर्थ कोष का नाश कर देता है। अल्पायुमुखो महाजनं परिग्रहं च पीडयति ॥ १७ ॥ थोड़ी आय वाला अमात्य जनता और राज-परिवार को कष्टकारक होता है। नागन्तुकेष्वर्थाधिकारः प्राणाधिकारो वास्ति यतस्ते स्थित्वाऽपि- गन्तारोऽपकर्त्तारो वा ॥ १८ ॥ परदेशी व्यक्ति को अर्थाधिकार अर्थात् वित्तमन्त्री और प्राणाधिकार अर्थात् सैन्यमन्त्री नहीं बनाना चाहिए क्योंकि ऐसे आदमी कुछ दिनों तक काम करने के बाद भी अपने देश चले जाते हैं अथवा राजा का अपकार करते हैं। स्वदेशजेष्वर्थः कूपे पतित इव कालान्तरादपिलब्धुं शक्यते ॥ १९ ॥ जिस प्रकार कुंए में गिरी हुई वस्तु या धन किसी समय निकाला भी जा सकता है उसी प्रकार स्वदेश वासी मन्त्री को अर्थाधिकार देने से उसके द्वारा गबन किया गया धन कभी न कभी किसी न किसी रूप से वसूल किया जा सकता है पर जो परदेशी होगा वह तो द्रव्यराशि लेकर अपने देश भाग जायगा और उससे फिर वह अर्थ नहीं मिल सकेगा। चिक्कणादर्थलाभः पाषाणाद् वल्कलोत्पाटनमिव ॥ २० ॥ चिक्कण अर्थात् अत्यन्त मृदुस्वभाव वाले मन्त्री से अर्थ लाभ की आशा करना पत्थर की छाल निकालने के समान है जो अत्यन्त कोमल स्वभाव का होगा वह कठोरता के साथ कर आदि की वसूली न कर सकेगा और इस प्रकार राज्य-कोष क्षीण होता जायगा। चिक्कण का कृपण भी अर्थ दिया गया है। अधिकारी बनने योग्य व्यक्ति— सोऽधिकारी यः स्वामिना सति दोषे सुखेन निगृहीतुमनुग्रहीतुं च शक्यते ॥ २१ ॥ वही व्यक्ति अधिकारी बनने योग्य है जो अपराधी सिद्ध होने पर सुविधा- पूर्वक दण्डित और पुरस्कृत किया जा सके। ब्राह्मणः क्षत्रियः सम्बन्धी वा नाधिकर्त्तव्यः ॥ २२ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
६६ नीतिवाक्यामृतम् ब्राह्मण, क्षत्रिय और अपने सम्बन्धी को अधिकारयुक्त पद नहीं देना चाहिए । ब्राह्मणो जाति-वशात्सिद्धमप्यर्थं कृच्छ्रेण प्रयच्छति न प्रयच्छति वा ॥ २३ ॥ ब्राह्मण जातिगत स्वभाव के कारण प्राप्त धन को भी कठिनाईपूर्वक देता है अथवा नहीं भी देता । क्षत्रियोऽनियुक्तः खड्गं दर्शयति ॥ २४ ॥ क्षत्रिय को अधिकारी बनाने पर वह तलवार दिखाता है । अर्थात् उसने यदि गबन किया और राजा ने दण्ड देना चाहा तो वह राजा को ही मार डालना चाहेगा । ज्ञातिभावेनातिक्रम्य बन्धुः सामवायिकान् सर्वमप्यर्थं ग्रसते ॥२५॥ राजा यदि अपने किसी बन्धु-बान्धव अथवा सम्बन्धी को अधिकारी बनाता है तो वह अन्य समस्त अधिकारियों को "मैं राजा का सम्बन्धी हूँ। इस प्रकार के प्रभाव से प्रभावित कर सर्वाधिकार ले लेता है और धन को हड़प जाता है । सम्बन्ध के तीन भेद— सम्बन्धस्त्रिविधः श्रौतो मौखो यौनश्चेति ॥ २६ ॥ श्रोत, मोख और यौन भेद से सम्बन्ध तीन प्रकार का है । सहदीक्षितः सहाध्यायी वा श्रौतः ॥ २७ ॥ किसी गुरु महात्मा आदि से साथ-साथ दीक्षा ली हो अथवा साथ-साथ पढ़ा हो तो वह सम्बन्ध श्रौत है । मुखेन परिज्ञातो मौखः ॥ २८ ॥ बातचीत में जिससे सम्बन्ध स्थापित हुआ हो वह मौख सम्बन्ध है । योनेर्जातो यौनः ॥ २९ ॥ एक ही माता के उदर से उत्पन्न होनेपर यौन सम्बन्ध होता है । वाचिकसम्बन्धे नास्ति सम्बन्धान्तरानुवृत्तिः ॥ ३० ॥ बातचीत के माध्यम से समुत्पन्न सम्बन्ध में अन्य यौन आदि सम्बन्ध की अपेक्षा नहीं होती । अधिकारी की नियुक्ति के समय विचार योग्य बातें— न तं कमप्यधिकुर्यात् सत्यपराधे यमुपहृत्यानुशयीत ॥ ३१ ॥ ऐसे किसी भी व्यक्ति को अधिकारी न बनावे जिसे कारणवश दण्ड देने पर पश्चात्ताप करना पड़े या हो ।
अमात्यसमुद्देशः ६७ मान्योऽधिकारी राजाज्ञामवज्ञाय निरवग्रहश्चरति ॥ ३२ ॥ जो व्यक्ति राजा के द्वारा समादरणीय और पूज्य हो उसे अधिकारी बनाने से वह राजाज्ञा का उल्लंघन कर निर्द्वन्द्व होकर घूमता है। चिरसेवको नियोगी नापराधेष्वाशङ्कते ॥ ३३ ॥ पुराने सेवक को अधिकारी बना देने से वह अपराध कर बैठने पर भी नहीं डरता। उपकर्त्ताधिकारी उपकारमेव ध्वजीकृत्य सर्वमवलुम्पति ॥ ३४ ॥ जिसने अपने संग कोई उपकार किया हो ऐसे व्यक्ति को अधिकारी बनाने से वह अपने उपकार का ही सदा गुणगान करता हुआ स्वामी का सर्वस्व अपहरण कर लेता है। सहपांसुक्रीडितोऽमात्योऽतिपरिचयात् स्वयमेव राजायते ॥ ३५ ॥ धूल मिट्टी में संग खेले हुए व्यक्ति को अधिकारी अथवा अमात्य बनाने से वह अत्यन्त परिचय के कारण स्वयं राजा के समान आचरण करता है। अन्तर्दुष्टो नियुक्तः सर्वमनर्थमुत्पादयति ॥ ३६ ॥ जिसका हृदय कलुषित हो ऐसे को अधिकारी बनाने से वह सब प्रकार के उपद्रव करता है। शकुनिशकटालावत्र दृष्टान्तौ ॥ ३७ ॥ इस विषय में शकुनि और शकटाल दृष्टान्त के रूप में है। गान्धार राज सुबल का पुत्र शकुनि दुर्योधन का मामा लगता था। दुर्योधन ने उसे अपना मन्त्री बनाया वह हृदय से दुष्ट प्रकृति का था अतः उसके कारण पाण्डवों से और दुर्योधन से वैर ठना और परिणामस्वरूप शकुनि और दुर्योधन दोनों का नाश हुआ। शकटाल राजा नन्द का मन्त्री था। वह भी स्वभाव से ही दुष्ट था। एक बार नन्द ने उसे कारागार का दण्ड दिया अनन्तर कुछ दिनों के बाद उसे ही पुनः मन्त्री बनाया उसने नन्द का उपकार भूल कर उसको नष्ट करने की सोची और चाणक्य से मिलकर नन्द का नाश किया। सोऽधिकारी चिरं नन्दति यः स्वामिप्रसादेन नोत्सेकयति ॥ ३८ ॥ वह अधिकारी चिरकाल तक आनन्द का उपभोग करता है जो स्वामी का कृपापात्र बनने पर गर्व नहीं करता। सुहृदि नियोगिन्यवश्यं भवति धनमित्रत्वनाशः ॥ ३६ ॥ मित्र को अधिकारी बनाने से निश्चय ही धन और मित्र भाव का नाश होता है। ७ नी०
६८ नीतिवाक्यामृतम् मूर्खस्य नियोगे भर्तुर्धर्मार्थयशसां सन्देहो, निश्चितौ चानर्थ नरक- पातौ ॥ ४० ॥ मूर्ख पुरुष को अधिकारी बनाने से स्वामी के धर्म अर्थ और यश सन्दिग्ध हो जाते हैं तथा अनर्थ और नरक गमन तो निश्चित ही होता है। किं तेन परिच्छदेन यत्रात्मक्लेशेन कार्य सुखं वा (स्वामिनः) ॥४१॥ उस अधिकारिवर्ग से क्या लाभ है जिसके रहते हुए स्वामी को स्वयं कष्ट उठाना पड़े और तब उसका कार्य पूर्ण हो अथवा सुख प्राप्त हो। का नाम निर्वृतिः स्वयमूढतृणभोजिनो गजस्य ॥ ४२ ॥ स्वयं ढोकर लाई गई घास को खाने वाले हाथी को क्या सुख होगा ? सैन्धवाश्वधर्माणः पुरुषाः कर्मसु विनियुक्ता विकुर्वते तस्मादहन्यहनि तान् परीक्षेत ॥ ४३ ॥ सिन्धु देशीय घोड़ों के समान आचरणशील अधिकारी पुरुष जब कार्यों में लगा दिये जाते हैं तब बिगड़ जाते हैं अतः राजा को चाहिए कि प्रतिदिन इन अधिकारियों के विषय में जांच करता रहे। कहा जाता है कि सिन्धु देश के घोड़े जब गाड़ी आदि में जोते जाते हैं अथवा उनसे सवारी का काम लिया जाने लगता है तब वे उपद्रव करना प्रारम्भ करते हैं और सवार को गिरा देते हैं गाड़ी को उलट देते हैं इत्यादि। इसी प्रकार कुछ अधिकारी भी अधिकार पाकर स्वच्छन्द अथवा मदमत्त होकर राज्य की प्रतिष्ठा की हानि करते हैं। मार्जारेषु दुग्धरक्षणमिव नियोगिषु विश्वासकारणम् ॥ ४४ ॥ बिल्ली से दूध की रक्षा होने के समान नियोगियों—अधिकारियों पर विश्वास करना व्यर्थ है। ऋद्धिश्चित्तविकारिणी नियोगिनामिति सिद्धानामादेशः ॥ ४५ ॥ सिद्ध महात्माओं का यह आदेश है कि ऐश्वर्य अधिकारियों के चित्त को विकृत बना देता है। सर्वोऽप्यतिसमृद्धो भवत्यायत्यामसाध्यः कृच्छ्रसाध्यः स्वामिपदामि- लाषी वा ॥ ४६ ॥ प्रायः समस्त अधिकारी अत्यन्त ऐश्वर्यशाली हो जाने पर अन्त में स्वामी के वश में नहीं होते अथवा बड़ी कठिनता से अनुकूल होते हैं या फिर स्वयं स्वामि-पद प्राप्ति का अभिलाष करते हैं। भक्षणमुपेक्षणं, प्रज्ञाहीनत्वमुपरोधः प्राप्ताप्रवेशो द्रव्यविनिमयश्चे- त्यमात्यदोषाः ॥ ४७ ॥ राज्य सम्पत्ति को आत्मसात् करना, राज्य सम्पत्ति की सुरक्षा में घोर
CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri अमात्यसमुद्देशः ६६ आय में उपेक्षा भाव रखना, बुद्धि शून्यता, कार्यों को रोक रखना, प्राप्त द्रव्य को लेखा पुस्तक में न लिखना, और द्रव्य विनिमय-सोना मिले पर कोष में जमा करे चांदी, मिले मोहर रखे रुपया, इस तरह के छह अमात्य दोष हैं। बहुमुख्यमनित्यं च करणं स्थापयेत् ॥ ४८ ॥ राजा को चाहिए कि वह अपने राज्य तन्त्र को सुचारू रूप से चलाने के लिये अनेक मुख्य अधिकारियों की नियुक्ति अस्थायी रूप में करें। एक ही व्यक्ति को स्थायी रूप से सर्वप्रमुख अधिकारी बना देने से वह कुछ भी अनर्थ कर सकता है । स्त्रीष्वर्थेषु च मनागप्यधिकारे न जातिसम्बन्धः ॥ ४६ ॥ अपनी स्त्रियों और सम्पत्ति के विषय का थोड़ा भी अधिकार देते समय यह ध्यान रक्खे कि अधिकार पाने वाला जातीय सम्बन्धी न हो। स्वपरदेशजावनपेक्ष्यावनित्यश्चाधिकारः ॥ ५० ॥ अधिकारी की नियुक्ति करते समय स्वदेशज परदेशज का ख्याल न करके अस्थायी अधिकार दे। अर्थात् योग्य अधिकारी ही चाहे वह अपने देश का हो या दूसरे देश का किन्तु नियुक्ति उसकी अस्थायी हो । विभागीय अध्यक्ष का पद— आदायक-निबन्धक-प्रतिबन्धक-नीवीग्राहक-राजाध्यक्षाः करणानि ॥५१॥ आय, कर आदि ग्रहण करनेवाला, आय को लेखाबही में लिखनेवाला, उसकी जांच करनेवाला और आय-व्यय की शोध करने के अनन्तर बचे हुए द्रव्य को जमा करने वाला और राजाध्यक्ष-सर्वप्रमुख अधिकारी ये राजा के करण अर्थात् इतने प्रकार के विभागीय अध्यक्ष होते हैं। "नीवी" की परिभाषा— आयव्ययविशुद्धं द्रव्यं नीवी ॥ ५२ ॥ आय में से आवश्यक व्यय करने के पश्चात् बचा हुआ द्रव्य 'नीवी' है। आय-व्यय की जांच का नियम— नीवीनिबन्धनपुस्तकग्रहणपूर्वकमायव्ययौ विशोधयेत् ॥ ५३ ॥ बही को अपने अधिकार में लेकर तब 'आय-व्यय' की 'जांच पड़- ताल' करे। आयव्ययविप्रतिपत्तौ कुशलकरणकार्यपुरुषेभ्यस्तद्विनिश्चयः ॥ ५४ ॥ जब आय और व्यय में समानता हो और किसी कार्य विशेष के लिये अधिक व्यय करना हो तो चतुर कार्य पुरुषों से परामर्श कर व्यय का निश्चय करना चाहिए। उनके परामर्श से आय से अधिक भी व्यय कभी-कभी किया जा सकता है । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
१०० नीतिवाक्यामृतम् भ्रष्टाचार रोकने का उपाय— नित्यपरीक्षणं, कर्मविपर्ययः, प्रतिपत्तिदानं च नियोगिष्वर्थग्रहो- पायाः ॥ ५५ ॥ अधिकारियों द्वारा अन्यायोपार्जित धन को प्राप्त करने के लिये राजा के पास तीन उपाय हैं। हिसाब की नित्य जाँच करते रहना, सौंपे गये काम की बदला-बदली करते रहना और समय-समय पर अधिकारियों को पुरस्कृत करते रहना। नापीडिता नियोगिनो दुष्टव्रणा इवान्तः सारमुद्वमन्ति ॥ ५६ ॥ जिस प्रकार दूषित फोड़े का भीतरी दोषयुक्त पदार्थ मवाद आदि बिना कसकर दबाये हुए नहीं निकलता उसी प्रकार बिना दण्ड के अधिकारी छिपाये हुए धन को नहीं देते। पुनः पुनरभियोगो नियोगिषु महीपतीनां वसुधारा ॥ ५७ ॥ राजकीय आय का अपहरण करनेवाले अधिकारियों की पुनः पुनः भर्त्सना करते रहना राजा के लिये धन का स्रोत बन जाता है। सकृन्निष्पीडितं स्नानवस्त्रं किं जहाति सार्द्रताम् ॥ ५८ ॥ एक बार निचोड़े गये स्नान-वस्त्र से क्या पूरा जल निकल जाता है ? देशमपीडयन् बुद्धिपुरुषकाराभ्यां पूर्वनिबन्धमधिकं कुर्वन्नर्थमानौ लभते ॥ ५६ ॥ देशवासियों को कष्ट न देकर जो अपने बुद्धि कौशल और उद्योग के द्वारा राज्य की सम्पत्ति को पूर्वापेक्षा अधिक कर सके वह अमात्य राजा के द्वारा सम्पत्ति और सम्मान दोनों ही प्राप्त करता है। यो यत्र कर्मणि कुशलस्तं तत्र विनियोजयेत् ॥ ६० ॥ जो जिस कार्य में कुशल हो उसे उसी कार्य में लगावे । अर्थात् आदमी के योग्यता के अनुकूल काम सौंपना राजा का कर्तव्य है। न खलु स्वामिप्रसादः सेवकेषु कार्यसिद्धिनिबन्धनं किन्तु बुद्धि- पुरुषकारावेव ॥ ६१ ॥ सेवक के द्वारा कार्य की सिद्धि स्वामी की कृपा मात्र से नहीं होती किन्तु उसके लिये उसकी अपनी बुद्धि और उद्योग ही मूल कारण होते हैं। शास्त्रविदप्यदृष्टकर्मा कर्मसु विषादं गच्छेत् ॥ ६२ ॥ कार्य का अनुभव न रहने पर शास्त्रों को जाननेवाला भी व्यक्ति किंकर्तव्य विमूढ हो जाता है। अनिवेद्य भर्त्तने किञ्चिदारम्भं कुर्यादन्यत्रापत्प्रतीकारेभ्यः ॥ ६३ ॥
अमात्यसमुद्देशः १०१ स्वामी के ऊपर आनेवाली आपत्ति को दूर कर देने वाले कार्य के अति- रिक्त कोई भी कार्य स्वामी से बिना बताये हुए प्रारम्भ न करे । सहसोपचितार्थो मूलधनमात्रेणावंशेषयितव्यः ॥ ६४ ॥ राज्य में यदि किसी व्यक्ति के पास अकस्मात् धन की वृद्धि हो तो राजा को चाहिए कि वह उसका मूल धन मात्र उसके पास रहने दे और शेष बढ़ा हुआ धन अपने कोष के लिये ले ले यतः अकस्मात् धनवृद्धि चोरी डाका जुआ आदि किसी अन्याय मार्ग से ही होती है । परस्परकलहो नियोगिषु भूभुजां निधिः ॥ ६४ ॥ अधिकारियों में परस्पर कलह होना राजा के लिये निधि प्राप्ति है । यतः परस्पर वैर होने से वे एक दूसरे की बुराई घूसखोरी षड्यन्त्र आदि राजा को बताते रहेंगे जिससे राजा को बहुधा उनका अन्याय का धन छीन लेने से धन प्राप्ति भी होगी और राजा को सब का भेद भी मालूम होता रहेगा । नियोगिषु लक्ष्मीः क्षितीश्वराणां द्वितीयः कोषः ॥ ६५ ॥ अधिकारियों के पास प्रचुर धन का होना राजा का अपना दूसरा कोष होने के समान है यतः राजा को आवश्यकता होने पर उनसे धन लिया जा सकता है । धान्य सङ्ग्रह की महत्ता— सर्व संग्रहेषु धान्यसङ्ग्रहो महान् ॥ ६६ ॥ सब प्रकार के संग्रहों में धान्य ( अन्न ) का संग्रह श्रेष्ठ है । यन्निबन्धनं जीवितं सकलः प्रयासश्च ॥ ६७ ॥ यतः अन्न के ही आधार पर मनुष्यमात्र का जीवन और समस्त प्रकार का उद्योग है । न खलु मुखे प्रक्षिप्तं महदपि द्रव्यं प्राणत्राणाय यथा धान्यम् ॥ ६८ ॥ मुख में डाली गई महान् द्रव्यराशि जैसे सोने का टुकड़ा आदि से उस प्रकार प्राण रक्षा नहीं हो सकती जिस प्रकार अन्न के खाने से । कोदों की विशेषता— सर्वधान्येषु चिरं जीविनः कोद्रवाः ॥ ६६ ॥ सब प्रकार के अन्नों में कोदों नाम का अन्न चिरकाल स्थायी अन्न है । अन्न सङ्ग्रह करने का क्रम— अनवं नवेन वर्धयितव्यं व्ययितव्यं च ॥ ७० ॥ पुराने अन्न की वृद्धि नये अन्न से करे अर्थात् जब दूसरे वर्ष नया अन्न उत्पन्न हो उससे अपना भण्डार भरे और पुराने अन्न को खर्च कर डाले ।
१०२ नीतिवाक्यामृतम् नमक के सङ्ग्रह की आवश्यकता— लवणसंग्रहः सर्वरसानामुत्तमः ॥ ७१ ॥ नमक का संङ्ग्रह सब रसों के सङ्ग्रह से श्रेष्ठ है । सर्वरसमप्यलवणमन्नं गोमयायते ॥ ७२ ॥ दूध दही आदि सब रसों के होने पर भी बिना नमक का भोजन गोबर के समान लगता है । [ इत्यमात्यसमुद्देशः ] १९. जनपदसमुद्देशः राष्ट्र का लक्षण— पशुधान्यहिरण्यसम्पदा राजते शोभते इति राष्ट्रम् ॥ १ ॥ पशु, अन्न और सुवर्ण सम्पत्ति से जो सुशोभित हो वह राष्ट्र है । देश का लक्षण— भर्तुर्दण्डकोशवृद्धिं ददातीति देशः ॥ २ ॥ जो राजा को अधिकार और कोशवृद्धि दे वह देश है । विषय का लक्षण— विविधवस्तु प्रदानेन स्वामिनः सद्मनि गजान् वाजिनश्च विसिनोति बध्नाति इति विषयः ॥ ३ ॥ नाना प्रकार की वस्तुओं को देकर राजा के घर में हाथी घोड़े बंधाने के कारण ( देश को ) विषय कहा गया है । मण्डल का अर्थ— सर्वकामदुघात्वेन पतिहृदयं मण्डयत्ति भूषयतीति मण्डलम् ॥ ४ ॥ कामधेनु के समान सब प्रकार के मनोरथों को पूर्ण करके स्वामी के हृदय को मण्डित करने के कारण ( राज्यकी ) मण्डल संज्ञा है । जनपद का अर्थ— जनस्य वर्णाश्रमलक्षणस्य द्रव्योत्पत्तेर्वा पदं स्थानमिति जनपदः ॥ ५ ॥ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र इन चार वर्णों और ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास इन चार आश्रम वालों के रहने के स्थान और द्रव्य की उत्पत्ति का पद अर्थात् स्थान होने के कारण जनपद संज्ञा है । "दरत्" का अर्थ— निजपतेरुत्कर्षजनकत्वेन शत्रुहृदयं दारयति भिनत्तीति दरत् ॥ ६ ॥