नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्यसनसमुद्देशः ८३ अतिव्ययोऽपात्रव्ययश्चार्थदूषणम् ॥ १६ ॥ अत्यन्त व्यय करना और अपात्र में बुरे कामों आदि में व्यय करना अर्थ दोष है । हर्षामर्षाभ्यामकारणं तृणांकुरमपि नोपहन्यात् किं पुनर्मनु- ष्यम् ॥ २० ॥ हर्ष और अमर्ष अर्थात् प्रसन्नता और क्रोध के भावावेश में आकर घास के अंकुर को भी न नष्ट करे फिर मनुष्य को नष्ट करने की तो बात ही क्या है ? श्रूयते हि निष्कारणं भूतावमानिनौ वातापिरिल्वलश्चासुरावगस्त्या- शनाद् विनेशतुरिति ॥ २१ ॥ यह सुना जाता है कि जीवों से अकारण द्वेष करने वाले वातापि और इल्वल नाम के दानव अगस्त्य ऋषि के द्वारा भक्षित होकर विनष्ट हो गये । यथादोषं कोटिरपि गृहीता न दुःखायते ॥ २२ ॥ दोष और अपराध के अनुसार करोड़ रूपया भी छीन लिया जाय तो दुःखदायक नहीं होता । अन्यायेन तृणशलाकापि गृहीता प्रजाः खेदयति ॥ २३ ॥ अन्यायपूर्वक यदि तिनका भी छीन लिया जाय तो उससे प्रजा दुःखी होती है । तरुच्छेदेन फलोपभोगः सकृदेव ॥ २४ ॥ पेड़ काट कर फलों का उपभोग एक ही बार तो किया जा सकता है । प्रजाविभवो हि स्वामिनोऽद्वितीयं भाण्डागारमतो युक्तितस्तमु- पयुञ्जीत ॥ २५ ॥ राजा के लिये प्रजा का धन-धान्य से सम्पन्न होना अनुपम और अक्षय भण्डार के समान है अतः उसका उपयोग उसे युक्तिपूर्वक करना चाहिए । राजपरिगृहीतं तृणमपि काञ्चनीभवति जायते च पूर्वसञ्चितस्या- प्यर्थस्यापायः ॥ २६ ॥ तिनके के बराबर तुच्छ भी राजकीय वस्तु का ग्रहण चोरी आदि सोने के समान हो जाती है अर्थात् उसका बहुत बड़ा दण्ड चुकाना पड़ता है जिससे पूर्व सञ्चित भी धन नष्ट हो जाता है । वाक्पारुष्यं शस्त्रपातादपि विशिष्यते ॥ २७ ॥ वाणी की कठोरता शस्त्र पात से भी अधिक कठोर होती है । ज्ञानिवयोवृत्तविद्याविभवानुचितं हि वचनं वाक्पारुष्यम् ॥ २८ ॥