न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० प्रयोजनश्च व्यवहार उपपद्यते । सोऽयं तावत्येव निर्वर्त्तते । न चास्ति व्यवहारा- न्तरमनवस्थासाधनीयम्, येन प्रयुक्तोऽनवस्थामुपाददीतेति ॥ २० ॥ प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् [ २१-३७ ] प्रत्यक्षलक्षणपरीक्षा सामान्येन प्रमाणानि परीक्ष्य विशेषेण परीक्ष्यन्ते । तत्र— [ पूर्वपक्षः ] प्रत्यक्षलक्षणानुपपत्तिरसमग्रवचनात् ॥ २१ ॥ आत्ममनःसन्निकर्षो हि कारणान्तरं नोक्तमिति । न चासंयुक्ते द्रव्ये संयोगजन्यस्य गुणस्योत्पत्तिरिति, ज्ञानोत्पत्तिदर्शनादात्म- मनःसन्निकर्षः कारणम् । मनःसन्निकर्षानपेक्षस्य चेन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य ज्ञान- कारणत्वे युगपदुत्पद्येरन् बुद्धय इति मनःसन्निकर्षोऽपि कारणम् । तदिदं सूत्रं पुरस्तात् कृतभाष्यम्¹ ॥ २१ ॥ नात्ममनसोः सन्निकर्षाभावे प्रत्यक्षोत्पत्तिः ॥ २२ ॥ तद्विरुद्ध को छोड़ने के लिए किये गये समग्र व्यवहार चलते हैं । ये व्यवहार उतने पर आकर अपने व्यापार से निवृत्त हो जाते हैं । अन्य कोई व्यवहार अवशिष्ट नहीं जिसमें अनवस्था दी जा सके, या जिसके द्वारा अनवस्था का ग्रहण कर सके ॥ २० ॥ प्रमाणों की सामान्यरूप से परीक्षा की जा चुकी, अब विशेषरूप से परीक्षा कर रहे हैं । उनमें सर्वप्रथम प्रत्यक्ष के विषय में विचार करते हैं— लक्षण पूर्ण विषयविषयक न होने से प्रत्यक्ष का लक्षण नहीं बनता ॥ २१ ॥ आत्ममनःसन्निकर्ष भी प्रत्यक्ष में कारण है, वह आपने प्रत्यक्ष-लक्षण में नहीं दिखाया (अतः आपका प्रत्यक्षलक्षण पूर्ण नहीं है) । असंयुक्त द्रव्य संयोगजन्य गुण की उत्पत्ति नहीं होती; जब कि ज्ञानोत्पत्ति होती है तब आत्ममनःसन्निकर्ष से लोक में ज्ञानोत्पत्ति देखे जाने से यह भी प्रत्यक्ष का कारण है । मनःसन्निकर्ष की अपेक्षा न रखते हुए इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को ही प्रत्यक्ष का कारण मानने पर अनेक ज्ञान एक साथ उत्पन्न होने लगेंगे, अतः मनःसन्निकर्ष भी प्रत्यक्ष में कारण है । इस सूत्र के व्याख्यान में कथनीय विषय का विस्तृत विवेचन हम पहले ( १. १. ४ ) कर चुके हैं ॥ २१ ॥ आत्ममनःसन्निकर्ष के बिना प्रत्यक्ष की उत्पत्ति नहीं होती ॥ २२ ॥ १. अत्र तात्पर्यकाराः—‘‘तदिदम् ‘नात्ममनसोः सन्निकर्षा०' इत्यादि सूत्रं पाठस्य पुरस्तात् कृतभाष्यम्''—एवं व्याचक्षते, तत् युक्तिपूर्वकं न्यायपरिशुद्धौ खण्डितम् ।