न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 115, कुल 410 में से
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२४. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ९७ आत्ममनसोः सन्निकर्षाभावे नोत्पद्यते प्रत्यक्षम्, इन्द्रियार्थसन्निकर्षाभाव- वदिति ॥ २२ ॥ सति चेन्द्रियार्थसन्निकर्षे ज्ञानोत्पत्तिदर्शनात् कारणभावं ब्रुवतः- दिग्देशकालाकाशेष्वप्येवं प्रसङ्गः ? ॥ २३ ॥ दिगादिषु सत्सु ज्ञानभावात् तान्यपि कारणानीति ? । अकारणभावेऽपि ज्ञानोत्पत्तिः, दिगादिसन्निधेरवर्जनीयत्वात् । यदाप्यकारणं दिगादीनि ज्ञानोत्पत्तौ, तदापि सत्सु दिगादिषु ज्ञानेन भवितव्यम्, न हि दिगा- दीनां सन्निधिः शक्यः परिवर्जयितुमिति । तत्र कारणभावे हेतुवचनम्-एतस्मा- द्धेतोर्दिगादीनि ज्ञानकारणानीति ॥ २३ ॥ आत्ममनःसन्निकर्षस्तर्ह्युपसङ्ख्येय इति ? [ सिद्धान्तपक्षः ] तत्रेदमुच्यते- ज्ञानलिङ्गत्वादात्मनो नानवरोधः१ ॥ २४ ॥ आत्मा तथा मन के सन्निकर्ष के बिना प्रमेय का प्रत्यक्ष नहीं होता, जैसे इन्द्रियार्थ- सन्निकर्ष के बिना उसका प्रत्यक्ष नहीं होता; अतः आत्ममनःसन्निकर्ष भी प्रत्यक्ष में कारण है ॥ २२ ॥ [मध्यस्थ पुरुष पूर्वपक्षी तथा सिद्धान्ती, दोनों को आपत्ति दे रहा है-] इन्द्रियार्थ- सन्निकर्ष की सत्ता से ज्ञान (प्रत्यक्ष) की उत्पत्ति देखी जाने से उक्त सन्निकर्ष को प्रत्यक्ष का कारण बतलानेवाले के मत में- दिशा देश, काल, आकाश में भी यही प्रसङ्ग होने लगेगा ॥ २३ ॥ प्रत्यक्ष के समय दिशा-आदि भी रहते हैं तो इन्हें भी प्रत्यक्ष का कारण मान लिया जाये ? [मध्यस्थ पुरुष को इस आपत्ति का भाष्यकार परिहार करते हैं-] यदि उक्त दिशा-आदि को ज्ञान का कारण न मानें तो भी उनके सामीप्य को हटाना दुःशक है अर्थात् उनको कारण मानने या न मानने पर भी ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व वे रहते ही हैं, अतः उनका सामीप्य निराकृत करना असम्भव है। उनका कारणत्व सिद्ध करने के लिए आप (मध्यस्थ) को कोई हेतु दिखाना चाहिये कि इस हेतु से वे दिगादिक प्रत्यक्ष में कारण हैं ॥ २३ ॥ [पूर्वपक्षी सिद्धान्ती से पूछता है-] तो प्रत्यक्षलक्षण में 'आत्ममनःसन्निकर्ष' का उपसङ्ख्यान कर देना चाहिये ? सिद्धान्ती उत्तर देता है- आत्मा की ज्ञानरूप हेतु से सिद्धि होने के कारण (प्रत्यक्ष-लक्षण में) उसका असंग्रह नहीं है ॥ २४ ॥ १. 'नाऽवरोधः' इति, 'नानवबोधः' इति च पाठ० । न्या०-द० ७