भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१०० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० तैरिन्द्रियैरर्थैश्च व्यपदिश्यन्ते ज्ञानविशेषाः । कथम् ? घ्राणेन जिघ्रति, चक्षुषा पश्यति, रसनया रसयतीति; घ्राणविज्ञानं चक्षुर्विज्ञानं रसनविज्ञानं गन्धविज्ञानं रूपविज्ञानं रसविज्ञानमिति च । इन्द्रियविषयविशेषाच्च पञ्चधा बुद्धिर्भवति । अतः प्राधान्यमिन्द्रियार्थसन्निकर्षस्येति ॥ २८ ॥ यदुक्तम्—‘इन्द्रियार्थसन्निकर्षग्रहणं कार्यम्, नात्ममनसोः सन्निकर्षस्येति, कस्मात् ? सुप्तव्यासक्तमनसामिन्द्रियार्थयोः सन्निकर्षस्य ज्ञाननिमित्तत्वात्' इति, सोऽयम्— व्याहतत्वादहेतुः ॥ २९ ॥ यदि तावत् क्वचिदात्मनसोः सन्निकर्षस्य ज्ञानकारणत्वं नेष्यते ? तदा 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्' ( १. १. १६ ) इति व्याहन्येत । नेदानीं मनसः सन्निकर्षमिन्द्रियार्थसन्निकर्षोऽपेक्षते । मनःसंयोगानपेक्षायां च युगपद् ज्ञानोत्पत्तिप्रसङ्गः । अथ मा भूद् व्याघात इति सर्वविज्ञानानामात्ममनसोः सन्निकर्षः कारणमिष्यते ? तदवस्थमेवेदं भवति—'ज्ञानकारणत्वादात्ममनसोः सन्निकर्षस्य ग्रहणं कार्यम्' इति ॥ २९ ॥ उन उन इन्द्रिय तथा अर्थों से वे वे ज्ञान व्यवहृत होते हैं । जैसे—नाक से सूंघता है, आँख से देखता है, जिह्वा से चखता है; या यह नाक से प्रत्यक्ष हुआ ज्ञान है, यह आँख से हुआ ज्ञान है, यह घ्राणेन्द्रिय से उत्पन्न गन्ध का ज्ञान है, यह चक्षुरिन्द्रिय से उत्पन्न रूप का ज्ञान है और यह जिह्वेन्द्रिय से उत्पन्न रस का ज्ञान है आदि । इन्द्रिय तथा उनके विषयों के भेद से यह ज्ञान पाँच प्रकार का है । अस्तु । इस लिये भी इन्द्रियार्थसन्निकर्ष के प्रधान होने से प्रत्यक्षलक्षण में इस 'इन्द्रियार्थसन्निकर्ष' का शब्दतः ग्रहण हुआ है ॥ २८ ॥ पूर्वपक्ष—यह जो कहा था कि 'इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को ही प्रत्यक्षलक्षण में लेना चाहिये, आत्ममनःसन्निकर्ष को नहीं; क्योंकि सुप्त तथा व्यासक्तमना पुरुषों के आकस्मिक ज्ञान में इन्द्रियार्थसन्निकर्ष ही प्रधानतया कारण हैं'—यह हेतु विरोधी होने के कारण असद्धेतु है ? ॥ २९ ॥ क्योंकि यदि आत्ममनःसन्निकर्ष को कहीं प्रत्यक्ष ज्ञान में कारण न मानोगे तो 'युगपज्ज्ञानानुत्पाद ही मन की सत्ता में हेतु हैं' (१.१.१६)—यह वचन-भंग हो जायेगा; क्योंकि सुप्त-व्यासक्तमना पुरुषों का इन्द्रियार्थसन्निकर्षज ज्ञान मनःसन्निकर्ष की अपेक्षा नहीं रखता । यदि यह ज्ञान मनःसन्निकर्ष की अपेक्षा न रखेगा तो फिर युगपद् अनेक ज्ञान भी उत्पन्न होने लगेंगे । और यदि, उक्त वचनभङ्ग न हो, इसलिए सभी प्रत्यक्ष ज्ञानों में आत्ममनःसन्निकर्ष मानोगे तो फिर वही बात मान लेनी होगी कि ज्ञानकारण होने से आत्ममनःसन्निकर्ष का भी प्रत्यक्षलक्षण में ग्रहण करना चाहिए ? ॥ २९ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri