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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

१०० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० तैरिन्द्रियैरर्थैश्च व्यपदिश्यन्ते ज्ञानविशेषाः । कथम् ? घ्राणेन जिघ्रति, चक्षुषा पश्यति, रसनया रसयतीति; घ्राणविज्ञानं चक्षुर्विज्ञानं रसनविज्ञानं गन्धविज्ञानं रूपविज्ञानं रसविज्ञानमिति च । इन्द्रियविषयविशेषाच्च पञ्चधा बुद्धिर्भवति । अतः प्राधान्यमिन्द्रियार्थसन्निकर्षस्येति ॥ २८ ॥ यदुक्तम्—‘इन्द्रियार्थसन्निकर्षग्रहणं कार्यम्, नात्ममनसोः सन्निकर्षस्येति, कस्मात् ? सुप्तव्यासक्तमनसामिन्द्रियार्थयोः सन्निकर्षस्य ज्ञाननिमित्तत्वात्' इति, सोऽयम्— व्याहतत्वादहेतुः ॥ २९ ॥ यदि तावत् क्वचिदात्मनसोः सन्निकर्षस्य ज्ञानकारणत्वं नेष्यते ? तदा 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्' ( १. १. १६ ) इति व्याहन्येत । नेदानीं मनसः सन्निकर्षमिन्द्रियार्थसन्निकर्षोऽपेक्षते । मनःसंयोगानपेक्षायां च युगपद् ज्ञानोत्पत्तिप्रसङ्गः । अथ मा भूद् व्याघात इति सर्वविज्ञानानामात्ममनसोः सन्निकर्षः कारणमिष्यते ? तदवस्थमेवेदं भवति—'ज्ञानकारणत्वादात्ममनसोः सन्निकर्षस्य ग्रहणं कार्यम्' इति ॥ २९ ॥ उन उन इन्द्रिय तथा अर्थों से वे वे ज्ञान व्यवहृत होते हैं । जैसे—नाक से सूंघता है, आँख से देखता है, जिह्वा से चखता है; या यह नाक से प्रत्यक्ष हुआ ज्ञान है, यह आँख से हुआ ज्ञान है, यह घ्राणेन्द्रिय से उत्पन्न गन्ध का ज्ञान है, यह चक्षुरिन्द्रिय से उत्पन्न रूप का ज्ञान है और यह जिह्वेन्द्रिय से उत्पन्न रस का ज्ञान है आदि । इन्द्रिय तथा उनके विषयों के भेद से यह ज्ञान पाँच प्रकार का है । अस्तु । इस लिये भी इन्द्रियार्थसन्निकर्ष के प्रधान होने से प्रत्यक्षलक्षण में इस 'इन्द्रियार्थसन्निकर्ष' का शब्दतः ग्रहण हुआ है ॥ २८ ॥ पूर्वपक्ष—यह जो कहा था कि 'इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को ही प्रत्यक्षलक्षण में लेना चाहिये, आत्ममनःसन्निकर्ष को नहीं; क्योंकि सुप्त तथा व्यासक्तमना पुरुषों के आकस्मिक ज्ञान में इन्द्रियार्थसन्निकर्ष ही प्रधानतया कारण हैं'—यह हेतु विरोधी होने के कारण असद्धेतु है ? ॥ २९ ॥ क्योंकि यदि आत्ममनःसन्निकर्ष को कहीं प्रत्यक्ष ज्ञान में कारण न मानोगे तो 'युगपज्ज्ञानानुत्पाद ही मन की सत्ता में हेतु हैं' (१.१.१६)—यह वचन-भंग हो जायेगा; क्योंकि सुप्त-व्यासक्तमना पुरुषों का इन्द्रियार्थसन्निकर्षज ज्ञान मनःसन्निकर्ष की अपेक्षा नहीं रखता । यदि यह ज्ञान मनःसन्निकर्ष की अपेक्षा न रखेगा तो फिर युगपद् अनेक ज्ञान भी उत्पन्न होने लगेंगे । और यदि, उक्त वचनभङ्ग न हो, इसलिए सभी प्रत्यक्ष ज्ञानों में आत्ममनःसन्निकर्ष मानोगे तो फिर वही बात मान लेनी होगी कि ज्ञानकारण होने से आत्ममनःसन्निकर्ष का भी प्रत्यक्षलक्षण में ग्रहण करना चाहिए ? ॥ २९ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

३०. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०१

३०. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०१ नार्थविशेषप्राबल्यात् ॥ ३० ॥ नास्ति व्याघातः, न ह्यात्ममनःसन्निकर्षस्य ज्ञानकारणत्वं व्यभिचरति । इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य प्राधान्यमुपादीयते ; अर्थविशेषप्राबल्याद्धि सुप्तव्यासक्त- मनसां ज्ञानोत्पत्तिरेकदा भवति । अर्थविशेषः = कश्चिदेवेन्द्रियार्थः, तस्य प्राबल्यम् = तीव्रता-पटुते । तच्चार्थविशेषप्राबल्यमिन्द्रियार्थसन्निकर्षविषयम्, नात्ममनसोः सन्निकर्षविषयम् । तस्मादिन्द्रियार्थसन्निकर्षः प्रधानमिति । असति प्रणिधाने, सङ्कल्पे चासति, सुप्तव्यासक्तमनसां यदिन्द्रियार्थसन्न्रि- कर्षादुत्पद्यते ज्ञानं तत्र मनःसंयोगोऽपि कारणमिति मनसि क्रियाकारणं वाच्यमिति ? यथैव ज्ञातुः खल्वयमिच्छाजनितः प्रग्रहो१ मनसः प्रेरक आत्मगुणः, एव- मात्मनि गुणान्तरं सर्वस्य साधकं प्रवृत्तिदोषजनितमस्ति, येन प्रेरितं मन इन्द्रियेण सम्बध्यते । तेन ह्यप्रेर्यमाणे मनसि संयोगाभावाद् ज्ञानानुत्पत्तौ सर्वार्थताऽस्य निवर्त्तते । एषितव्यं चास्य गुणान्तरस्य द्रव्यगुणकर्मकारणत्वम्; उत्तरपक्ष- किसो इन्द्रियविशेष के प्रवल होने से (वचनव्याघात नहीं है) ॥ ३० ॥ वचनव्याघात नहीं है, अर्थात् आत्ममनःसनिकर्ष का ज्ञानकारणत्व व्यभिचरित नहीं होता । हम तो इन्द्रियार्थसन्निकर्ष कारण को प्रत्यक्षज्ञान में प्रधानतामात्र दे रहे हैं; क्यों- कि सुप्त या व्यासक्तमना पुरुषों को अर्थविशेष के प्राधान्य से उस-उस समय में वैसा-वैसा ज्ञानोत्पाद हो जाता है । अर्थविशेष से तात्पर्य है कोई खास इन्द्रियार्थ, उसका प्राबल्य अर्थात् तीव्रता या पटुता । यह अर्थविशेष की प्रबलता इन्द्रियार्थसन्निकर्षविषयक ही है, न कि आत्ममनःसन्निकर्षविषयक । अतः इन्द्रियार्थसन्निकर्ष ही प्रत्यक्षज्ञान में प्रधान है । . शङ्का-इच्छा तथा सङ्कल्प के न रहने पर सुप्त तथा व्यासक्तमना पुरुषों का जो इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से ज्ञान उत्पन्न होता है, वहाँ मनःसंयोग भी कारण है तो उस संयोग को उत्पन्न करनेवाली मनःक्रिया किस कारण से होती है-यह बताना चाहिये ? उत्तर-जैसे आत्मा ( ज्ञाता ) का इच्छाजनित प्रयत्न मन का प्रेरक है, उसी प्रकार आत्मा में एक और ( अदृष्ट ) गुण है जो कि समग्र भोग तथा उनके साधनों का जनक है, तथा पूर्वोक्त ( १.१.१७-१८ ) प्रवृत्ति तथा दोष से जनित है, इसकी प्रेरणा से मन इन्द्रिय के साथ सम्बद्ध होता है । वह अदृष्ट आत्मगुण यदि मन को प्रेरणा न करे तो संयोग न होने से ज्ञानोत्पत्ति न हो सकने से इसकी सर्वार्थता (.सब कार्यों का कारण होना ) निवृत्त हो जाती है; अदृष्ट गुण को द्रव्य, गुण तथा कर्मों का कारण मानना भी आवश्यक है; अन्यथा पृथ्वी-आदि चार भूतों के मूल कारण अणु सूक्ष्म १. 'प्रयत्नः' इति पाठ० ।

१०२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० अन्यथा हि चतुर्विधानामणूनां भूतसूक्ष्माणां मनसां च ततोऽन्यस्य क्रियाहेतो- रसम्भवात् शरीरेन्द्रियविषयाणामनुत्पत्तिप्रसङ्गः ॥ ३० ॥ विषयपरीक्षा प्रत्यक्षमनुमानमेकदेशग्रहणादुपलब्धेः ? ॥ ३१ ॥ यदिदमिन्द्रियार्थसन्निकर्षादुत्पद्यते ज्ञानम् 'वृक्ष' इति एतत् किल प्रत्यक्षम्, तत् खल्वनुमानमेव । कस्मात् ? एकदेशग्रहणात् वृक्षस्योपलब्धेः । अर्वाग्भागमयं गृहीत्वा वृक्षमुपलभते; न चैकदेशो वृक्षः । तत्र यथा धूमं गृहीत्वा वह्निमनु- मिनोति तादृगेव तद् भवति ? ॥ ३१ ॥ किं पुनर्गुह्यमाणादेकदेशाद् अर्थान्तरमनुमेयं मन्यसे ! अवयवसमूहपक्षे अवयवान्तराणि, द्रव्यान्तरोत्पत्तिपक्षे तानि चावयवी चेति ? अवयवसमूह- पक्षे तावदेकदेशग्रहणाद् वृक्षबुद्धेरभावः, नागृह्यमाणमेकदेशान्तरं वृक्षो गृह्य- भूत तथा इस मन में अदृष्ट गुण को छोड़कर अन्य कोई क्रियोत्पादक कारण न होने से शरीर, इन्द्रिय तथा विषयों की उत्पत्ति ही नहीं बनेगी—यह एक नयी बाधा आ खड़ी होगी ! ॥ ३० ॥ [ इस प्रकार प्रत्यक्षलक्षण के स्वरूप की परीक्षा करने के बाद उसके विषय की परीक्षा प्रारम्भ की जा रही है—] प्रत्यक्ष अनुमान ही है, क्योंकि अवयवी का एकदेश के ग्रहण से ज्ञान होता है ? ॥३१॥ इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से उत्पन्न 'वृक्ष' यह प्रत्यक्ष ज्ञान एक तरह से अनुमान ही है; क्योंकि यह वृक्ष के एक भाग ( कुछ अवयवों ) का ग्रहण करके ही हो जाता है । वृक्ष के अगले हिस्से को देखकर यह वृक्ष का ज्ञान कर लेता है, परन्तु अगला हिस्सा ही तो वृक्ष नहीं है ! वहाँ ( अनुमान में ) जैसे धूम को देखकर वह्नि का अनुमान होता है, वही स्थिति यहाँ ( वृक्ष के प्रत्यक्ष में ) भी है। इस प्रकार 'प्रत्यक्षादि चार प्रमाण हैं' सिद्धान्ती की यह प्रतिज्ञा नष्ट हो गयी ? ॥ ३१ ॥ सिद्धान्ती पूछता है कि आप चक्षुःसन्निकर्ष से ज्ञायमान वृक्ष के अग्रभाग से अनुमान . करने योग्य दूसरा क्या पदार्थ मानते हैं ? इसके उत्तर में पूर्वपक्षी कहता है कि यहाँ हमें दो विप्रतिपत्तियां हैं—१. 'अवयवी अवयवों से पृथक् नहीं हैं' इस अवयवसमूहपक्ष में अन्य अवयवों ( जो दिखायी नहीं दिये थे ) का अनुमान करते हैं, तथा २. 'अवयवों से कोई अवयवी नामक अर्थान्तर ही उत्पन्न होता हैं'—इस द्रव्यान्तरोत्पत्तिपक्ष में अवशिष्ट अवयवों तथा अवयवी का अनुमान करते हैं? इस पर सिद्धान्ती का उत्तर है—अवयवसमूहपक्ष में, एकदेश ( अग्रभाग ) के ग्रहण से 'यह वृक्ष है' ऐसी बुद्धि नहीं हो सकती; इसी प्रकार, गृह्यमाण एकदेश की तरह

३२. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०३

३२. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०३ माणैकदेशवदिति । अथ एकदेशग्रहणादेकदेशान्तरानुमाने समुदायप्रतिसन्धानात् तत्र वृक्षबुद्धिः ? न तर्हि वृक्षबुद्धिरनुमानमेवं सति भवितुमर्हतीति । द्रव्यान्तरो- त्पत्तिपक्षे नावयव्यनुमेयः, अस्यैकदेशसम्बद्धस्याग्रहणात्, ग्रहणे चाविशेषादनु- मेयत्वाभावः । तस्माद् वृक्षबुद्धिरनुमानं न भवति । एकदेशग्रहणमाश्रित्य प्रत्यक्षस्यानुमानत्वमुपपाद्यते । तच्च— न; प्रत्यक्षेण यावत्तावदप्युपलम्भात् ॥ ३२ ॥ न प्रत्यक्षमनुमानम् । कस्मात् ? प्रत्यक्षेणैवोपलम्भात् । यत् तदेकदेशग्रहण- माश्रीयते, प्रत्यक्षेणासावुपलम्भः । न चोपलम्भो निर्विषयोऽस्ति । यावच्चार्थ- जातं तस्य विषयः, तावदभ्यनुज्ञायमानं प्रत्यक्षव्यवस्थापकं भवति । किं पुनस्ततोऽन्यदर्थजातम् ? अवयवी, समुदायो वा । न चैकदेशग्रहणम- नुमानं भावयितुं शक्यम्; हेत्वभावादिति । अन्यथापि च प्रत्यक्षस्य नानुमानत्वप्रसङ्गः; तत्पूर्वकत्वात् । प्रत्यक्षपूर्वकम्- नुमानं सम्बद्धावग्निधूमौ प्रत्यक्षतो दृष्टवतो धूमप्रत्यक्षदर्शनादग्नावनुमानं भवति । तत्र यच्च सम्बद्धयोर्लिङ्गलिङ्गिनोः प्रत्यक्षम्, यच्च लिङ्गमात्रप्रत्यक्ष- अगृह्यमाण एकदेश (अवशिष्ट अवयव) भी वृक्ष नहीं है, तब तो 'यह वृक्ष है' इस बुद्धि का ही अपलाप होने लगेगा ! यदि यह कहो कि एकदेश के ग्रहण से अवशिष्ट एक- देश का अनुमान करके समूहप्रतिसन्धान से 'यह वृक्ष है'—ऐसी बुद्धि हो सकती है ? हम कहते हैं कि तत्र भी 'यह वृक्ष है'—ऐसी बुद्धि कैसे बनेगी; क्योंकि तुमने अवयवान्तरों का ही अनुमान किया है, वृक्ष का तो अनुमान किया नहीं ! द्रव्यान्तरोत्पत्तिपक्ष में भी— अवयवान्तरसम्बद्ध होकर अवयवी कैसे गृहीत होगा ? यदि होता है तो दृश्यमान अवयव से सम्बद्ध होकर अवयवी का प्रत्यक्ष हो गया, तब वह अनुमेय नहीं होगा ! एकदेश का ग्रहण होकर वृक्षप्रत्यक्ष का अनुमान में अन्तर्भाव करना उचित— नहीं; क्योंकि उस अवशिष्ट एकदेश का ग्रहण भी प्रत्यक्ष से ही होता है ॥ ३२ ॥ प्रत्यक्ष अनुमान में अन्तर्भूत नहीं हो सकता; क्योंकि पूर्वपक्षी द्वारा गृहीत उस वृक्ष के अवशिष्ट एकदेश का भी प्रत्यक्ष होता है । जिसके एकदेश का ग्रहण आधार माना जाता है वह भी प्रत्यक्षविषय है । ऐसा कोई ज्ञान नहीं, जो विषय-रहित हो; क्योंकि जितने अग्रभाग के साथ अर्थसमुदाय विषय होंगे वे सब प्रत्यक्ष-व्यवस्थापक हैं—ऐसा मानने पर प्रत्यक्ष भी सिद्ध हो जाता है । दृश्यमान अवयवों से भिन्न इस अवशिष्ट अर्थसमूह को आप क्या मानते हैं ? अव- यवी, या समुदाय ! तब हेतु के न रहते उस एकदेश का ग्रहण अनुमान से कैसे होगा ! एक दूसरी युक्ति भी प्रत्यक्ष के अनुमानान्तर्भाव की बाधिका है, वह है—तत्पूर्वकत्व । अर्थात् अनुमान तो स्वयं प्रत्यक्षपूर्वक होता है, उसमें प्रत्यक्ष का अन्तर्भाव कैसे हो पावेगा ! CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१०४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० ग्रहणम्, नेतदन्तरेणानुमानस्य प्रवृत्तिरस्ति । नत्वेतदनुमानम्; इन्द्रियार्थसन्निकर्ष- जत्वात् । न चानुमेयस्येन्द्रियेण सन्निकर्षादनुमानं भवति । सोऽयं प्रत्यक्षानु- मानयोर्लक्षणभेदो महानाश्रयितव्य इति ॥ ३२ ॥ न चैकदेशोपलब्धिरवयविसद्भावात् १ ॥ ३३ ॥ न चैकदेशोपलब्धिमात्रम् । किं तर्हि ? एकदेशोपलब्धिः, तत्सहचरितावयव्यु- पलब्धिश्च । कस्मात् ? अवयविसद्भावात् । अस्ति ह्ययमेकदेशव्यतिरिक्तोऽवयवी, तस्यावयवस्थानस्योपलब्धिकारणप्राप्तस्यैकदेशोपलब्धावनुपलब्धिरनुपपन्नेति । अकृत्स्नग्रहणादिति चेद्, न; कारणतोऽन्यस्यैकदेशस्याभावात् । न चावयवाः पहले कभी धूम-अग्नि को एक साथ प्रत्यक्ष देखने वाले को ही अब धूम के प्रत्यक्षदर्शन से अग्नि का अनुमान हो पाता है। अन्यथा अनुमान की इस पूरी प्रक्रिया में सम्बद्ध लिङ्ग ( धूम ) तथा लिङ्गी ( वह्नि ) का पहले प्रत्यक्ष, तथा अनुमानकाल में लिङ्गदर्शन के बिना अनुमान की प्रवृत्ति कैसे होगी ? इसे आप अनुमान तो कह नहीं सकते; क्योंकि यह इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य ही है । अनुमेय ( वह्नि ) का यदि इन्द्रियसन्निकर्ष हो जाये तो वह अनुमान क्यों कर होगा ! यह अनुमान और प्रत्यक्ष का सबसे बड़ा भेद है—इसे प्रत्येक जिज्ञासु को समझे रखना चाहिये ॥ ३२ ॥ [ नैयायिकों के मत से घटावयवों से भिन्न एक अलग घटादि अवयवी होता है, परन्तु बौद्धों के मत में यह अवयवी कोई पृथक् प्रमेय नहीं है, अपितु वह परमाणुरूप अवयवसमूह ही है। बौद्धों के मत में परमाणुरूप कतिपय अवयवों का प्रत्यक्ष होता है, परन्तु नैयायिकों के मत में अवयवी का भी होता है। अतः बौद्धों का आक्षेप है कि घटादि अवयवी का प्रत्यक्ष नहीं होगा, इसका समाधान कर रहे हैं—] एकदेश का ही प्रत्यक्ष नहीं होता, अपितु उसके साथ अवयवी का भी प्रत्यक्ष होता है; क्योंकि वहाँ अवयवी भी रहता है ॥ ३३ ॥

  • एकदेश ( अवयव ) मात्र का ही प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता; अपितु एकदेश के ज्ञान के साथ तत्सहचरित अवयवी का भी ज्ञान हो जाता है। कैसे ? क्योंकि उस इन्द्रियार्थ- सन्निकर्ष के समय अवयव के साथ उस अवयवी की भी सत्ता रहती है। यद्यपि यह अवयवी अपने उस अवयव से पृथक् है, परन्तु जब वह अवयवसंस्थानविशेष के रूप में में उपलब्धि-कारण हो तब एकदेश की उपलब्धि के समय कारण बन कर प्रत्यक्षज्ञान करा देगा तो वहीं मौजूद अवयवी का ज्ञान न हो—यह कैसे हो सकेगा ! यदि कहो कि एकदेश का ग्रहण होने से वह नहीं दिखायी देगा ? तो यह भी नहीं कह सकते; क्योंकि समवायिकारण को छोड़कर दूसरा एकदेश पृथक् नहीं है। पूर्वपक्षी कहता है कि १. इदं न सूत्रं किन्तु भाष्यमेवेति केचित् । केचित्पुनरवयविसद्भावादित्येव सूत्रमिति वदन्ति । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

३३. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०५

३३. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०५ कृत्स्ना गृह्यन्ते, अवयवैरेवावयवान्तरव्यवधानाद्; नावयवी कृत्स्नो गृह्यते इति, नायं गृह्यमाणेष्ववयवेषु परिसमाप्त इति सेयमेकदेशोपलब्धिरनिवृत्तैवेति ? कृत्स्न- मिति वै खल्वशेषतायां सत्यां भवति, अकृत्स्नमिति शेषे सति । तच्चैतत्तदवयवेषु बहुष्वस्ति, अव्यवधाने ग्रहणाद् व्यवधाने चाग्रहणादिति । अङ्ग तु भवान् पृष्टो व्याचष्टाम्-गृह्यमाणस्यावयविनः किमगृहीतं मन्यते, येनैकदेशोपलब्धिः स्यादिति; न ह्यस्य कारणेभ्योऽन्ये एकदेशा भवन्तीति तत्राव- यववृत्तं नोपपद्यत इति ! इदं तस्य वृत्तम्-येषामिन्द्रियसन्निकर्षाद् ग्रहणम्, अवयवानां तैः सह गृह्यते, येषामवयवानां व्यवधानाद् ग्रहणं तैः सह न गृह्यते । न चैतत्कृतोऽस्ति भेद इति । समुदाय्यशेषता वा समुदायो वृक्षः स्यात्, तत्प्राप्तिर्वा; उभयथा ग्रहणा- भावः । मूलस्कन्धशाखापलाशादीनामशेषता वा समुदायो वृक्ष इति स्यात्, प्राप्तिर्वा समुदायिनामिति, उभयथा समुदायभूतस्य वृक्षस्य ग्रहणं नोपपद्यते सम्पूर्ण अवयवों का उस समय ग्रहण नहीं होता; क्योंकि पृष्ठभाग के अवयव अग्रभाग के अवयवों से व्यवहित हैं-इसलिये समग्र अवयवी भी गृहीत नहीं होता, तथा गृह्यमाण अवयवों में अवयवी पर्याप्त नहीं है, अतः एकदेशोपलब्धि में अवयव्युपलब्धि कैसे होगी ? उत्तर है-'कृत्स्न'-ऐसा कथन तभी बन सकता है, जब कोई शेष न बचे; 'अकृत्स्न'- ऐसा भी तब कहते हैं, जब कोई शेष बच जाये। यह 'कृत्स्न' या अकृत्स्न' व्यवहार अनेक अवयवों के होने पर ही हो सकता है। तब जिन अवयवों में व्यवधान होता है, उनका ग्रहण नहीं हो पाता, अव्यवहितों का प्रत्यक्ष हो जाता है। अवयवी को कृत्स्न या अकृत्स्न कैसे कहा जा सकता है ?-पूछने पर, पूर्वपक्षी सम्भवतः यह भी कहने लगे कि ज्ञायमान वृक्षावयवी का क्या नहीं जाना गया मानते हो, जिससे मदुक्त एकदेशोपलब्धि बन सके; वृक्षावयवी का समवायिकारण शाखा, पत्र, मूल से अतिरिक्त कोई एकदेश नहीं होता, जिससे उसमें अवयवस्वभाव उपपन्न नहीं होता ! परन्तु पूर्वपक्षी का यह कथन अयुक्त है; क्योंकि उस अवयवी का यह स्वभाव है कि जिन अवयवों के साथ इन्द्रिय का सन्निकर्ष व्यवधान होने से न हो उनके साथ वह गृहीत नहीं होता, तथा अव्यवहितों के साथ इन्द्रियसन्निकर्ष से वह गृहीत हो जाता है। इतनी बात को लेकर वस्तुतः कोई भेद नहीं बनता। [ अब भाष्यकार 'परमाणुरूप अवयवसमूह ही अवयवी (वृक्ष) होता है' इस बौद्धमत का खण्डन कर रहे हैं-] समुदायवाले परमाणुओं की अशेषता (सम्पूर्णता) ही अवयव- समुदाय वृक्ष हो, या उन अवयवों का संयोग-उभयथा ही वृक्षबुद्धि का ग्रहण नहीं होगा। तात्पर्य यह है कि मूल, स्कन्ध शाखा पत्र-आदि अवयवों की समग्रता को ही

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१०६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० इति । अवयवैस्तावदवयवान्तरस्य व्यवधानादशेषग्रहणं नोपपद्यते । प्राप्तिग्रहण- मपि नोपपद्यते; प्राप्तिमतामग्रहणात् । सेयमेकदेशग्रहणसहचरिता वृक्षबुद्धि- र्द्रव्यान्तरोत्पत्तौ कल्पते, न समुदायमात्रे इति ॥ ३३ ॥ प्रसङ्गोपात्ता अवयविपरीक्षा साध्यत्वादवयविनि सन्देहः ? ॥ ३४ ॥ यदुक्तम्—'अवयविसद्भावात्' इति, अयमहेतुः, साध्यत्वात् । साध्यं तावत्- एतत्कारणेभ्यो द्रव्यान्तरमुत्पद्यते इति, अनुपपादितमेतत् । एवं च सति विप्रति- पत्तिमात्रं भवति, विप्रतिपत्तेश्चावयविनि संशय इति ? ॥ ३४ ॥ सर्वग्रहणमवयव्यसिद्धेः ॥ ३५ ॥ यद्यवयवी नास्ति सर्वस्य ग्रहणं१ नोपपद्यते । किं तत् सर्वम् ? द्रव्यगुणकर्म- सामान्यविशेषसमवायाः । कथं कृत्वा ? परमाणुसमवस्थानं तावद् दर्शनविषयो न भवति, अतीन्द्रियत्वादणूनाम् । द्रव्यान्तरं चावयविभूतं दर्शनविषयो नास्ति, दर्शनविषयस्थाश्चेमे द्रव्यादयो गृह्यन्ते, ते निरधिष्ठाना न गृह्येरन् ! गृह्यन्ते तु- समुदाय रूप से वृक्ष मानें या उन समुदायियों की परस्पर प्राप्ति (संयोग) मानें, दोनों ही नयों में समुदायभूत (अवयवी) वृक्ष का ग्रहण नहीं हो पायेगा; क्योंकि अवयवों से अव- यवान्तर का व्यवधान होने के कारण ग्रहण नहीं बन सकेगा । अवयवों के परस्पर संयोग से भी ग्रहण नहीं हो सकेगा । क्योंकि संयोगवाले अवयवों में यह ग्रहण नहीं होता, अतः यह एकदेशग्रहण के साथ होनेवाली 'यह वृक्ष है' ऐसी बुद्धि द्रव्यान्तरोत्पत्ति मानने पर तो बन सकती है, अवयवों का समुदायमात्र मानने पर नहीं बनेगी ॥ ३३ ॥ साध्य होने से अवयवों से भिन्न अवयवी में संशय है ॥ ३४ ॥ पूर्वोक्त ३३ वें सूत्र में एकदेशोपलब्धि न होने में 'अवयवसिद्भाव' हेतु दिया गया था, यह हेतु साध्य है। अर्थात् प्रमाणों से यह सिद्ध करना चाहिये कि 'इन कारणों से द्रव्यान्तर उत्पन्न होता है'। क्योंकि यह सिद्ध नहीं किया गया, अतः अयुक्त है। इस तरह उक्त हेतु में विप्रतिपत्ति होने लगेगी, तथा विप्रतिपत्ति से अवयवी में संशय होगा ॥ ३४ ॥ और अवयवी की सिद्धि न होने से सम्पूर्ण का ग्रहण न होगा ॥ ३५ ॥ यदि अवयवी सिद्ध न होगा तो सम्पूर्ण का ग्रहण न होगा । वह सम्पूर्ण क्या है ? द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय । क्यों ऐसा होगा ? परमाणु का परस्परसंयोग प्रत्यक्ष का विषय नहीं हुआ करता; क्योंकि परमाणु अतीन्द्रिय हैं। यदि उन्हें अवयवी मानें तो तुम्हारे मत से द्रव्यान्तर कह कर कोई अवयवी नहीं है। द्रव्यादि तो दर्शनविषय (अवयवी) में ही रहते हैं, अवयवी के न रहने पर वे निरधिष्ठान होते हुए प्रत्यक्ष कैसे होंगे ! लोक में अवयवी वृत्ति के लिये यह व्यवहार देखा जाता है—यह घट १. अवयव्यसिद्धेः प्रत्यक्षाभावः, प्रत्यक्षाभावेऽनुमाद्यभावः इति सर्वप्रमाणाग्रहणमिति वार्त्तिकेऽर्थान्तरमपि व्याख्यातम् ।

३६. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०७

३६. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०७ 'कुम्भोऽयं श्याम एको महान् संयुक्तः स्पन्दते अस्ति मृन्मयश्च' इति । सन्ति चेमे गुणादयो धर्मा इति । तेन सर्वस्य ग्रहणात् पश्यामः—अस्ति द्रव्यान्तरभूतोऽव- यवीति ॥ ३५ ॥ धारणाऽऽकर्षणोपपत्तेश्च ॥ ३६ ॥ अवयव्यर्थान्तरभूत इति । संग्रहकारिते वै धारणाऽऽकर्षणे । संग्रहो नाम संयोगसहचरितं गुणान्तरं स्नेहद्रवत्वकारितमपां संयोगादामे कुम्भे, अग्निसंयोगात् पक्वे । यदि त्ववयवि- कारिते अभविष्यताम्, पांशुराशिप्रभृतिष्वप्यज्ञास्येताम्; द्रव्यान्तरानुत्पत्तौ च तृणोपलकाष्ठादिषु जतुसंगृहीतेष्वपि नाभविष्यतामिति ? अथावयविनं प्रत्याचक्षाणको 'मा भूत् प्रत्यक्षलोपः' इत्यणुसमुच्चयं दर्शनविषयं प्रतिजानानः किमनुयोक्तव्य इति ? एकमिदं द्रव्यमित्येकबुद्धेर्विषयं पर्य॑नुयोज्यः । किमेकबुद्धिरभिन्नार्थविषयेति ? काला है, एक है, बड़ा है, द्रव्यान्तर से संयुक्त है, इसमें चेष्टा है, इसकी सत्ता है, यह मृन्मय है'—इत्यादि । (अवयवों के बारे में ऐसा कोई व्यवहार नहीं देखते ।) ये गुणादि धर्म भी उस अवयवी (घट द्रव्य) में हैं, (न कि अवयवसमूह में) ! अतः इस 'सम्पूर्ण' के ग्रहण से हम मानते हैं कि अवयवी अवयवसमूह से पृथक् है ॥ ३५ ॥ तभी उसमें धारणा तथा आकर्षण भी बनेंगे ॥ ३६ ॥ धारण (इकट्ठा पकड़कर उठाना), आकर्षण (इकट्ठा खींचना) की उपपत्ति से भी अवयवी द्रव्यान्तर सिद्ध होता है । अर्थात् यह दृश्यमान घटादि अवयवी अवयवों से पृथक् नहीं है, अन्यथा इसमें धारण तथा आकर्षण नहीं बनेंगे । शङ्का—धारण तथा आकर्षण अवयवों के संग्रह होते हैं, संग्रह से तात्पर्य है—संयोग- सहचार से गुणान्तर का आ जाना, जैसे कच्चे घड़े में जल के संयोग से स्नेहद्रवत्व- प्रयुक्त गुणान्तर है तथा अग्नि के संयोग से पक्के घड़े में गुणान्तर । यदि ये कार्य (धारण, आकर्षण) अवयवी के कारण होते तो पांशुराशि (धूलिसमूह) में भी दिखायी देने चाहियें । अथच, द्रव्यान्तर की अनुत्पत्ति में ये न होते तो तृण, उपल, काष्ठ-आदि में या लाक्षा से संगृहीत मोती आदि में ये धारण-आकर्षण नहीं होने चाहिये; क्योंकि सिद्धान्ती के मत में भी वहाँ कोई अवयवी द्रव्यान्तर नहीं है ? मध्यस्थ की शङ्का—अवयवी का खण्डन करनेवाले पूर्वपक्षी (बौद्ध) को—जो कि प्रत्यक्षप्रमाण का लोप न हो जाये, इसलिए विवशतः परमाणुसमूह में ही प्रत्यक्ष की स्थापना कर रहा है, क्या उत्तर देना चाहिए ? उत्तर—'यह एक द्रव्य है'—यहाँ एकबुद्धि का विषय क्या होगा ? यह उससे

१०८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० आहोस्वित् भिन्नार्थविषयेति ? अभिन्नार्थविषयेति चेद्, अर्थान्तरानुज्ञानादव- यविसिद्धिः। नानार्थविषयेति चेद्, भिन्नेष्वेकदर्शनानुपपत्तिः। अनेकस्मिन्नेक इति व्याहता बुद्धिर्न दृश्यत इति ॥ ३६॥ सेनावनवद् ग्रहणमिति चेन्नातीन्द्रियत्वादणूनाम् ॥ ३७ ॥ यथा सेनाङ्गेषु वनाङ्गेषु च दूरादगृह्यमाणपृथक्त्वेष्वेकमिदमित्युपपद्यते बुद्धिः, एवमणुषु सञ्चितेष्वगृह्यमाणपृथक्त्वेष्वेकमिदमित्युपपद्यते बुद्धिरिति ? यथा गृह्यमाणपृथक्त्वानां सेनावनाङ्गानामारात् कारणान्तरतः पृथक्त्वस्याग्रहणम्, यथा गृह्यमाणजातीनाम् ‘पलाश इति वा’, ‘खदिर इति वा’ नाराज्जाति- ग्रहणं भवति, यथा गृह्यमाणप्रस्पन्दानां ना रात् स्पन्दग्रहणम्, गृह्यमाणे चार्थजाते पृथक्त्वस्याग्रहणादेकमिति भाक्तः प्रत्ययो भवति; न त्वणूनामगृह्यमाण- पृथक्त्वानां कारणतः पृथक्त्वाग्रहणाद् भाक्त एकप्रत्ययोऽतीन्द्रियत्वादणूनामिति । पूछना चाहिए। क्या वह एकबुद्धि एकविषयक है, या नानार्थविषयक ? यदि एकार्थ- विषयक है तो अर्थान्तर की स्वीकृति से अवयवी की सिद्धि भी हो गयी। यदि वह नानार्थविषयक है तो अनेक में एक ज्ञान कैसे बनेगा ? ‘अनेक में एक’—यह विरोधी ज्ञान कहीं नहीं देखा गया ॥ ३६ ॥ सेना या वन की तरह अनेक में एक का ग्रहण हो जायेगा--ऐसा भी नहीं मान सकते; क्योंकि परमाणु अतीन्द्रिय हैं, उनका इन्द्रिय से सन्निकर्ष नहीं हो सकता ॥ ३७ ॥ जैसे सेना के अवयवों या वन के अवयवों में उनका पार्थक्य दूर से दिखायी न देने से अनेकों में एक बुद्धि हो जाती है, इसी तरह पार्थक्य से अगृहीत परमाणुसङ्घात में एकबुद्धि हो सकती है ? सेनाङ्ग या वनाङ्ग के पृथक्त्व का ग्रहण हो सकता है, परन्तु दूरतारूपी कारणान्तर से उस पृथक्त्व का ग्रहण नहीं होता, और जैसे पलाश आदि की जाति गृहीत हो सकती है कि ‘यह पलाश है’ या ‘यह खदिर है’, परन्तु दूरता के कारण उसका जातिग्रहण नहीं हो पाता, तथा समीप में चेष्टाओं का स्पन्दन गृहीत हो सकता है परन्तु दूरता के कारण नहीं हो पाता; ऐसे-ऐसे अर्थसमूह को जब गृहीत करते हैं तो उसके पार्थक्य के अगृहीत होने से उसमें औपचारिक एकबुद्धि हो जाती है। यही बात परमाणुओं के बारे में नहीं कह सकते; क्योंकि परमाणुओं का तो पृथक्त्व गृहीत नहीं होता। कारणवशात् उनके पृथक्त्व गृहीत नहीं हैं तो एकबुद्धि परमाणुपुञ्ज में कैसे बन सकती है; कारण, अणु. तो अतीन्द्रिय हैं।

३७ सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०९

३७ सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०९ इदमेव च परीक्ष्यते—किमेकप्रत्ययोऽणुसञ्चयविषयः, आहोस्वन्नेति ? अणुसञ्चय एव सेनावनाङ्गानि । न च परीक्ष्यमाणमुदाहरणमिति युक्तम्; साध्यत्वादिति । दृष्टमिति चेत् ? न; तद्विषयस्य परीक्षोपपत्तेः । यदपि मन्यते—दृष्टमिदं सेनावनाङ्गानां पृथक्त्वस्याग्रहणादभेदेनैकमिति ग्रहणम्, न च दृष्टं शक्यं प्रत्या- ख्यातुमिति ? तच्च नैवम्; तद्विषयस्य परीक्षोपपत्तेः । दर्शनविषय एवायं परी- क्ष्यते । योऽयमेकमिति प्रत्ययो दृश्यते, स परीक्ष्यते—किं द्रव्यान्तरविषयो वा, अथाणुसञ्चयविषय इति ? अत्र दर्शनमन्यतरस्य साधकं न भवति । नानाभावे चाणूनां पृथक्त्वस्याग्रहणादभेदेनैकमिति ग्रहणम् अतस्मिंस्तदिति प्रत्ययः, यथा स्थाणौ पुरुष इति । ततः किम् ? अतस्मिंस्तदिति प्रत्ययस्य प्रधानापेक्षित्वात् प्रधानसिद्धिः । स्थाणौ पुरुष इति प्रत्ययस्य किं प्रधानम्¹ ? योऽसौ पुरुषे पुरुषप्रत्ययस्त- इस प्रसङ्ग में यही परीक्ष्य है कि क्या अणुसमूह 'एक' इस बुद्धि का विषय बनता है ? या नहीं ? सेनाङ्ग या वनाङ्ग वाले उदाहरण भी अणुसमूह की तरह ही समझें । अणुसमूह के समान वे भी यहाँ, साध्य होने से परीक्षा के विषय हैं, उन्हें, उदाहरणरूप में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता । उनका वैसा ( अभेदेन ) प्रत्यक्ष होता है—यह नहीं कह सकते; क्योंकि वह प्रत्यक्ष परीक्षा ( संशय ) का विषय बन सकता है । यह जो मानते हो—"सेनाङ्ग या वनाङ्गों का पार्थक्य गृहीत न होने से 'अभेदेन एक हैं' ऐसा प्रत्यक्ष होता है, एक बार कृतप्रत्यक्ष का प्रत्याख्यान हो नहीं सकता" ? यह बात भी उचित नहीं है; क्योंकि उसी प्रश्न पर तो वहाँ विचार हो रहा है कि दर्शनविषय कौन बन सकता है । 'एक—इस बुद्धि का विषय कौन बने—क्या उस बुद्धि का विषय द्रव्यान्तर है या वही अणुसमूह ?' इस परीक्षा के अवसर पर किसी एक ( सेना इत्यादि ) का उदाहरण प्रत्यक्षसाधक रूप से प्रयुक्त नहीं किया जा सकता । अणुओं के नाना होने पर भी पृथक्त्व के गृहीत न होने से 'अभेदेन एक' यह ज्ञान तो वैसा ही है जैसा तदभाववान् में सत्ता का आरोपित ज्ञान, जैसे स्थाणु में पुरुषत्व का आरोप । इससे क्या नुकसान ( अनिष्ट ) होगा ? 'अतत् में तत् का सत्ताज्ञान' के प्रधानापेक्षी होने से प्रधान ( अणुसमूह में अभेदेन एकत्व ) की सिद्धि होने लगेगी । 'स्थाणु में पुरुष'—इस ज्ञान में प्रधान कौन है ? यह जो 'पुरुष' में पुरुषबुद्धि है उसके रहते पुरुषसामान्य का ग्रहण हो कर 'यह पुरुष है' यह ज्ञान स्थाणु में भी होता १. येन प्रत्ययेन विपरीतारोपः सम्पाद्यते सादृश्यवशात् तत्प्रधानम्, यथा—स्थाणौ पुरुषप्रत्ययस्य पुरुषे पुरुषप्रत्ययः । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

११० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० स्मिन् सति पुरुषसामान्यग्रहणात् स्थाणौ पुरुषोऽयमिति । एवं नानाभूतेष्वेक- मिति सामान्यग्रहणात् प्रधाने सति भवितुमर्हति । प्रधानं च सर्वस्याग्रहणादिति नोपपद्यते । तस्मादभिन्न एवायमभेदप्रत्यय एकमिति । इन्द्रियान्तरविषयेष्वभेदप्रत्ययः प्रधानमिति चेद्, न; विशेषहेत्वभावात् दृष्टान्ताव्यवस्था । श्रोत्रादिविषयेषु शब्दादिष्वभिन्नेष्वेकप्रत्ययः प्रधानमने- कस्मिन्नेकप्रत्ययस्येति । एवं च सति दृष्टान्तोपादानं न व्यवतिष्ठते; विशेषहेत्व- भावात् । अणुषु सञ्चितेष्वेकप्रत्ययः किमतस्मिंस्तदिति प्रत्ययः स्थाणौ पुरुष- प्रत्ययवत् ? अथाथंस्य तथाभावात्तस्मिंस्तदिति प्रत्ययः, यथा—शब्दस्यैकत्वादेकः शब्द इति ? विशेषहेतुपरिग्रहणमन्तरेण दृष्टान्तौ संशयमापादयत इति । कुम्भ- वत् सञ्चयमात्रं गन्धादयोऽपीत्यनुदाहरणं गन्धादय इति । एवं परिमाणसंयोगस्पन्दजातिविशेषप्रत्ययानप्यनुयोक्तव्यः, तेषु चैवं प्रसङ्ग इति । १. एकत्वबुद्धिस्तस्मिंस्तदिति इति विशेषहेतुर्महदिति प्रत्ययेन सामाना- हें । इसी प्रकार 'अनेकों में एक'—इस.सामान्यग्रहण से कोई प्रधान हो तो अनेक में एकत्व गृहीत हो सकता है, पर अणुओं के नाना होने से सब का ग्रहण न हो पाने के कारण उनमें प्रधानत्व उपपन्न नहीं हो पा रहा है। अतः अभिन्न में अभेद का प्रत्यय ही, 'एक' ऐसी बुद्धि हैं ! यदि यह कहो कि श्रवणादि इन्द्रियान्तर के विषयों (शब्दादि) में अभेदज्ञान को ही यहाँ प्रधान मान लिया जाये ? तो यह भी नहीं कह सकते; क्योंकि विशेष हेतु न होने से इस दृष्टान्त की अव्यवस्था बनेगी । तात्पर्य यह है कि श्रोत्रादि के प्रत्यक्षविषया'शब्दादि अभिन्न में एक प्रत्यय का यहाँ (चाक्षुषपरीक्षाप्रसङ्ग में) प्राधान्येन उपन्यास करना— युक्तियुक्त नहीं है; क्योंकि आपका यह दृष्टान्त विशेष हेतु न होने से स्वयं अव्यवस्थित है । इकट्ठे अणुओं में एकबुद्धि क्या 'अतत् में तत्ता' ज्ञान है, जैसे—स्थाणु में पुरुष का ज्ञान ? या अर्थ ही वैसा होने से स्वसत्ताज्ञान, जैसे एक शब्द होने से उसमें एकत्वबुद्धि ? यों दोनों ही तरह से, विशेष हेतु न मिलने के कारण आपके दृष्टान्त संशयग्रस्त हैं । जैसे—'घट की तरह गन्धादि भी अणुसञ्चय मात्र हैं' इसमें गन्धादि उदाहरण संशायापन्न है; क्योंकि उनकी सञ्चयता भी घटादि की तरह साध्य है । इस प्रसङ्ग में इस अणुसमूहवादी से—एकवृद्धि की तरह परिमाण, संयोग, चेष्टा, जाति-विशेष, आदि के ज्ञान को लेकर भी प्रश्न करना चाहिये । १. तत् में एकत्वप्रत्यय विशेष हेतु है तो इस साध्य में 'महत्' ज्ञान से सामानाधि- करण्य होने के कारण 'यह एक हैं' तथा 'महान् हैं'—ये दोनों ज्ञान एक ही विषय तथा

३७. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १११

३७. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १११ धिकरणयात् । एकमिदं महच्चेति एकविषयौ प्रत्ययौ समानाधिकरणौ भवतः, तेन विज्ञायते—यन्महत्तदेकमिति । अणुसमूहातिशयग्रहणं महत्प्रत्यय इति चेत् ? सोऽयममहत्सु अणुषु महत्प्रत्ययोऽतस्मिंस्तदिति प्रत्ययो भवतीति । किं चातः ? अतस्मिंस्तदिति प्रत्ययस्य प्रधानापेक्षित्वात् प्रधानसिद्धिरिति भवितव्यं महत्येव महत्प्रत्ययेनेति । अणुः शब्दो महानिति च व्यवसायात् प्रधानसिद्धिरिति चेत् ? न; मन्द- तीव्रताग्रहणमियत्तानवधारणाद्, यथा द्रव्ये । अणुः शब्दोऽल्पो मन्द इत्येतस्य ग्रहणं महान् शब्दः पटुस्तीव्र इत्येतस्य ग्रहणम् । कस्मात् ? इयत्तानवधारणात् । न ह्ययम् 'महान् शब्दः' इति व्यवस्यन् 'इयानयम्' इत्यवधारयति, यथा बदरा- मलकबिल्वादिनी । २. संयुक्ते इमे इति च द्वित्वसमानाश्रयप्राप्तिग्रहणम् । द्वौ समुदायावाश्रयः संयोगस्येति चेत्—कोऽयं समुदायः ? प्राप्तिरनेकस्य, अनेका वा प्राप्तिरेकस्य समुदाय इति चेत् ? प्राप्तेरग्रहणं प्राप्त्याश्रितायाः । संयुक्ते इमे वस्तुनी इति नात्र द्वे प्राप्ती संयुक्ते गृह्येते । समान अधिकरण में हो रहे हैं। इससे ज्ञात होता है कि 'जो महान् है वही एक हैं' । यदि यह कहो कि अणुसमूह का अतिशय ( आधिक्य ) बोधन के लिए यहाँ मह- च्छब्द का प्रयोग है ? तो यह भी नहीं कह सकते; क्योंकि तब यह अमहान् ( लघु ) अणुओं में महत्त्व बतलाना 'अतत् में तत्ता' बोधन (आरोप) होगा, वास्तविक नहीं। इससे अनिष्ट यह होगा कि 'अतत् में तत्ता' ज्ञान के प्रधानापेक्षी होने से प्रधान की सिद्धि हुआ करती है, अतः 'महत्' का प्रत्यय 'महत्' में ही होगा, द्रव्यान्तर ( अणु ) में नहीं। 'शब्द अणु भी है हैं महान् भो हैं'—ऐसा व्यवसाय होने से शब्द में प्रधान की सिद्धि हो जायेगी ? शब्द में अणुता, तीव्रता, पटुता आदि परिमाणविशेष का ज्ञान 'इयत्ता' का निश्चय न होने से नहीं होता, जैसा द्रव्य में हो जाता है। इयत्तानिश्चय न होने से 'शब्द अणु है, अल्प है, मन्द हैं'—यह ज्ञान तथा 'शब्द महान् है, तीव्र हैं'—यह ज्ञान नहीं होता । प्रयोक्ता पुरुष 'यह महान् शब्द हैं'—ऐसा निश्चय करता हुआ 'यह इतना बड़ा हैं'— ऐसा अवधारण नहीं कर पाता, जैसा बेर आमला-आदि फलों के विषय में कर लेता है । २. 'ये दोनों संयुक्त हैं'—यह संयोग-ज्ञान भी तभी बन सकता है जब द्वित्व के समान आश्रय में वह हो । पूर्वपक्षी यदि यह कहे—दो समुदाय इस संयोग के आश्रय हैं, तो उनसे हम पूछते हैं कि यह समुदाय कौन है ? क्या अनेक का एक संयोग या एक में अनेक संयोग ? तो संयोगाश्रित संयोग का ग्रहण नहीं हुआ करता । 'ये दोनों वस्तु संयुक्त होकर हैं'—इन ज्ञान में दो संयोग संयुक्त में गृहीत नहीं होते ।

११२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० अनेकसमूहः समुदाय इति चेद्, न; द्वित्वेन समानाधिकरणस्य ग्रहणात् । द्वाविमौ संयुक्तावर्थाविति ग्रहणे सति नानेकसमूहाश्रयः संयोगो गृह्यते । न च द्वयोरण्वोर्ग्रहणमस्ति । तस्मान्महती द्वित्वाश्रयभूते द्रव्ये संयोगस्य स्थानमिति । ३. प्रत्यासत्तिः प्रतीघातावसाना संयोगो नार्थान्तरमिति चेत् ? न; अर्थान्तर- हेतुत्वात् संयोगस्य । शब्दरूपादिस्यन्दनां हेतुः संयोगः । नच द्रव्ययोर्गुणान्त- रोपजनन मन्तरेण शब्दे रूपादिषु स्पन्दे च कारणत्वं गृह्यते तस्माद् गुणान्तरम्, प्रत्ययविषयश्चार्थान्तरं तत्प्रतिषेधो वा-कुण्डली गुरुः, अकुण्डलश्छात्र इति । संयोगबुद्धेश्च यद्यर्थान्तरं न विषयः, अर्थान्तरप्रतिषेधस्तर्हि विषयः ? तत्र प्रति- षिध्यमानवचनम् । ‘संयुक्ते द्रव्ये' इति यदर्थान्तरमन्यत्र दृष्टमिह प्रतिषिध्यते, तद्वक्तव्यमिति । द्वयोर्महतोराश्रितस्य ग्रहणान्नाण्वाश्रय इति । अनेक संयोगसमूह को समुदाय मान लें ? नहीं मान सकते; क्योंकि युक्त द्वित्व से समानाधिकरणत्व का ही संयोग में ग्रहण कर पाता है, 'ये दो अर्थ ( घट पट ) संयुक्त हैं—इस ज्ञान में अनेकसमूह में संयोग गृहीत नहीं होता ! ओर फिर दो अणु का तो ( अतीन्द्रिय होने से ) ज्ञान भी नहीं हो पाता । अतः निष्कर्ष यह निकला कि द्वित्वा- श्रयभूत महान् द्रव्य में ही संयोग बन सकता है । ३. अवरोध ( रोक ) समाप्त होकर समीप आ जाना ही संयोग है, इसके अतिरिक्त यह कुछ नहीं ? —ऐसा कहना भी उचित नहीं; क्योंकि संयोग अर्थान्तर का हेतु हैं, न कि स्वयं अर्थान्तर । संयोग शब्द, रूप आदि तथा स्पन्द का हेतु हैं। दो द्रव्यों में गुण- विशेष की उत्पत्ति के बिना, शब्द, रूप तथा स्पन्द निरूपित कारणत्व ( जनकत्व ) नहीं गृहीत हो सकता, अतः यह गुणान्तर है । इस अर्थान्तर का या उसके प्रतिषेध का प्रत्यक्ष भी होता है, जैसे 'गुरु कुण्डल धारण किये हुए हैं' 'छात्र कुण्डल धारण किये हुए नहीं हैं' । (यदि यह अर्थान्तर न होता तो 'कुण्डलगुरु' या 'गुरुकुण्डल' ऐसा शब्द प्रयुक्त होता, न कि मत्वर्थक 'कुण्डली' । इसी प्रकार 'अकुण्डल छात्र' या 'छात्रांकुण्डल' शब्द-प्रयोग होता, न कि बहुव्रीहि समास' वाला । यह अर्थान्तर हैं तभी 'समर्थः पदविधिः' (२. १. १) इस पाणिनि के अनुशासन से मतुप्प्रत्यय तथा बहुव्रीहि .समास की प्रवृत्ति हुई; क्योंकि उक्त शास्त्र अर्थ-सम्बन्ध में ही प्रवृत्त होता है; अन्यथा लोकशास्त्रविरोध- प्रसङ्ग होने लगेगा । 'गुरु कुण्डल से संयुक्त हैं' इस बुद्धि का यदि अर्थान्तर विषय नहीं है, तो अर्थान्तरप्रतिषेध ही उसका विषय मानना पड़ेगा। तब वहाँ प्रतिषिध्यमान क्या है—यह स्पष्टतः बतावें । अर्थात् उस 'संयुक्त द्रव्य में' इस प्रतीति में जो अर्थान्तर अन्यत्र देखा गया है, परन्तु उसका यहाँ प्रतिषेध कर रहे हैं तो उसे शब्दतः बताइये कि वह क्या है ! दो 'महत्' में समवायेन वृत्तिमान् संयोग का ग्रहण होने से वह अण्वाश्रित नहीं हो सकता (;क्योंकि वैसा सम्भव नहीं है) ।

३७. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ११३

३७. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ११३ जातिविशेषस्य प्रत्ययानुवृत्तिलिङ्गस्याप्रत्याख्यानम्, प्रत्याख्याने वा प्रत्यय- व्यवस्थानुपपत्तिः । व्यधिकरणस्यानभिव्यक्तेरधिकरणवचनम् । अणुसमवस्थानं विषय इति चेत् ? प्राप्ताप्राप्तसामर्थ्यवचनम् । किमप्राप्ते अणुसमवस्थाने तदाश्रयो जातिविशेषो गृह्यते ? अथ प्राप्ते इति ? अप्राप्ते ग्रहणमिति चेत् ? व्यवहित- स्याणुसमवस्थानस्याप्युपलब्धिप्रसङ्गः, व्यवहितेऽणुसमवस्थाने तदाश्रयो जाति- विशेषो गृह्येत । प्राप्ते ग्रहणमिति चेत् ? मध्यपरभागयोरप्राप्तावनभिव्यक्तिः । यावत्प्राप्तं भवति तावत्यभिव्यक्तिरिति चेत् ? तावतोऽधिकरणत्वमणुसमवस्था- नस्य । यावति प्राप्ते जातिविशेषो गृह्यते तावदस्याधिकरणमिति प्राप्तं भवति । तत्रैकसमुदाये प्रतीयमानेऽर्थभेदः । एवं च सति योऽयमणुसमुदायो वृक्ष इति प्रतीयते, तत्र वृक्षबहुत्वं प्रतीयेत—यत्र यत्र ह्यणुसमुदायस्य भागे वृक्षत्वं गृह्यते स स वृक्ष इति । तस्मात् समुदिताणुसमवस्थानस्यार्थान्तरस्य जातिविशेषाभिव्यक्तिविषयत्वा- दवयव्यर्थान्तरभूत इति ॥ ३७ ॥ ४. एकाकारप्रतीतिक हेतु के जातिविशेष का अप्रत्याख्यान भी, समूह को अवयवी मानने पर, नहीं बनेगा । यदि किसी तरह बन भी जाये तो भी उक्त प्रतीतिव्यवस्था नहीं बन पायेगी; क्योंकि आश्रयप्रतीति के बिना जातिप्रतीति कैसे होगी ! यदि व्यधिकरण की अभिव्यक्ति न होने से परमाणु का अधिकरणत्व अप्रत्याख्यात होता है तो जाति मानेंगे तब वह व्यधिकरण कौन सा है ? बताइये । यदि कहें कि परमाणु ही किसी संयोगविशेष से रहते हुये उस जाति को व्यक्त करते हैं, तो यह बता- इये कि संयुक्त अणुसमूह में जातिविशेष को व्यक्त करता है, या असंयुक्त अणुसमूह में । यदि असंयुक्त में व्यक्त करता है ? तो व्यवहित अणुसंयुक्त को उपलब्धि होने लगेगी; अर्थात् व्यवहित अणुसंयुक्त में भी तदाश्रित जातिविशेष गृहीत होने लगेगा । यदि कहें कि संयुक्त में ग्रहण होता है ? तो उस अणुसमूह के मध्य तथा पृष्ठभाग से संयोग न होने के कारण उनमें ही अनभिव्यक्ति रहेगी । यदि कहें कि जितने के साथ संयोग हुआ, उतने में जाति की अभिव्यक्ति हो जायेगी ? तो अभिव्यक्त जातिविशेष का अधिकरण कौन है—यह बताइये । अर्थात् जितने अणुसमूह के संयुक्त होने पर जातिविशेष गृहीत होता है, उतना उसका अधिकरण हो जायेगा । एवं च—वहाँ एकसमुदाय की प्रतीति में विषय का बहुत अर्थभेद है । इस तरह जो 'अणुसमुदाय वृक्ष है'—ऐसी प्रतीति होती है, वहाँ वृक्षबहुत्व प्रतीत होने लगेगा । उस अणुसमुदाय के जिस जिस भाग में वृक्षत्व गृहीत होगा वह वह भाग वहाँ 'वृक्ष' कहलायेगा । इसलिए निष्कर्ष यह निकला कि वृक्षत्व का अधिकरण कह कर जो लिया जाता है वह अणुसमूह न होकर अर्थान्तर ही जातिविशेष का आश्रय बन सकता है । वह अर्थान्तर अवयवी हो सकता है, न कि अणुसमूह ॥३७॥ न्याय द० : ८

अनुमानपरीक्षाप्रकरणम् [ ३८-४४ ]

११४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० अनुमानपरीक्षाप्रकरणम् [ ३८-४४ ] परीक्षितं प्रत्यक्षम् । अनुमानमिदानीं परीक्ष्यते— रोधोपघातसादृश्येभ्यो व्यभिचारादनुमानमप्रमाणम् ? ॥ ३८ ॥ अप्रमाणमिति—एकदाप्यर्थस्य न प्रतिपादकमिति । रोधादपि नदी पूर्णा गृह्यते, तदा च ‘उपरिष्टाद् वृष्टो देवः’ इति मिथ्यानुमानम् । नीडोपघातादपि पिपीलिकाण्डसञ्चारो भवति, तदा च ‘भविष्यति वृष्टिः’ इति मिथ्यानुमान- मिति । पुरुषोऽपि मयूरवाशितमनुकरोति, तदापि शब्दसादृश्यान्मिथ्यानुमानं भवति ? ॥ ३८ ॥ न; एकदेशत्राससादृश्येभ्योऽर्थान्तरभावात् ॥ ३९ ॥ नायमनुमानव्यभिचारः, अनुमाने तु खल्वयमनुमानाभिमानः । कथम् ? नाविशिष्टो लिङ्गं भवितुमर्हति । पूर्वोदकविशिष्टं खलु वर्षोदकं शीघ्रतरत्वं प्रत्यक्ष का परीक्षण किया जा चुका, अब अनुमान का परीक्षण किया जा रहा है— रोध, उपघात, तथा सादृश्य से अनुमान मिथ्या सिद्ध होने के कारण वह भी अप्रमाण है ॥ ३८ ॥ पीछे जो आप अनुमान के तीन भेद कर आये, उनमें एक भी अर्थ का यथार्थप्रतिपादक नहीं है । जैसे शेषवदनुमान का उदाहरण है—नदी भरी हुई दिखायी देने से अनुमान होता है—‘ऊपर कहीं वर्षा हुई हैं’; परन्तु कहीं आगे अवरोध ( रुकावट ) होने पर भी तो नदी भरी हुई दिखायी दे सकती है, अतः भरी हुई नदी देख कर वृष्टि का अनुमान मिथ्यानुमान है; क्योंकि यहाँ पूर्णत्वहेतु व्यभिचारी है । इसी तरह पूर्ववदनुमान का उदाहरण—‘चींटी अण्डा उठाये ले जा रहीं हैं, अतः वृष्टि होगी’—भी मिथ्यानुमान है, क्योंकि यहाँ ‘चींटियों का अण्डे उठाना’ हेतु उनके विल ( शरणस्थल ) के नष्टभ्रष्ट होने से भी हो सकता है, अतः वह व्यभिचारी है । इसी प्रकार सामान्यतोदृष्टानुमान का उदाहरण—‘मोर बोल रहे हैं, अतः वर्षा होगी’ भी मिथ्यानुमान ही हैं; क्योंकि पुरुष भी परिहास या आजीविका के लिये मोर की वोली बोल लेते हैं, अतः यह ‘मोर की वोली’ हेतु यहाँ व्यभिचारी है ॥ ३८ ॥ नहीं; क्योंकि एकदेश, त्रास, सादृश्य हेतुओं से उन उदाहरणों में अर्थान्तर आ जाता है ॥ ३९ ॥ आपके द्वारा अनुमान के खण्डन में जो हेतु दिये हैं, उनसे अनुमान में व्यभिचार नहीं आता । ये उक्त उदाहरण सही ‘अनुमान’ नहीं; बल्कि अनुमान में अनुमानाभिमान हैं । कैसे ? सामान्य नदीवृद्धि विशेषण से अविशिष्ट होकर अनुमान में हेतु नहीं बनती, अपितु पहले के जल से विशिष्ट वर्षा का जल, प्रवाह का वेग, बहुत से झाग, फल, सूखे CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

४०. सू० ] अनुमानपरीक्षाप्रकरणम् ११५

४०. सू० ] अनुमानपरीक्षाप्रकरणम् ११५ स्रोतसो बहुत्वरफेनफलपर्णकाष्ठादिवहनं चोपलभमानः पूर्णत्वेन नद्याः 'उपरि वृष्टो देवः' इत्यनुमिनोति, नोदकवृद्धिमात्रेण । पिपीलिकाप्रायस्याण्डसञ्चारे 'भविष्यति वृष्टिः' इत्यनुमीयते, न कासाञ्चिदिति । 'नेदं मयूरवाशितं तत्सदृशो- ऽयं शब्दः' इति विशेषापरिज्ञानान्मिथ्यानुमानमिति । यस्तु विशिष्टाच्छब्दाद् विशिष्टमयूरवाशितं गृह्णाति तस्य विशिष्टोऽर्थो गृह्यमाणो लिङ्गम्, यथा— सर्पादीनामिति । सोऽयमनुमातुरपराधो नानुमानस्य, योऽर्थविशेषेणानुमेयमर्थं विशिष्टार्थदर्शनेन बुभुत्सत इति ॥ ३९ ॥ वर्तमानकालपरीक्षा त्रिकालविषयमनुमानं त्रैकाल्यग्रहणादित्युक्तम्, अत्र च— वर्त्तमानाभावः, पततः पतितपतितव्यकालोपपत्तेः ? ॥ ४० ॥ वृन्तात्प्रच्युतस्य फलस्य भूमौ प्रत्यासीदतो यदूर्ध्वं स पतितोऽध्वा, तत्संयुक्तः कालः पतितकालः, योऽधस्तात् स पतितव्योऽध्वा, तत्संयुक्तः कालः पतितव्य- पत्ते, जंगल की लकड़ी-आदि उस जल में वेग से बहते हुए देखे और साथ में नदी को भी बढ़ा हुआ देखे तब वह अनुमान में हेतु बनती है कि 'ऊपर वर्षा हुई है, नदी बढ़ी होने से', अर्थात् केवल उदकवृद्धि से नहीं । इसी तरह बहुत-सी चींटियों के बराबर गमनागमन से 'वृष्टि होगी' यह अनुमान होता है, न कि कुछ चींटियों के गमनागमन से । 'यह मोर की बोली नहीं है, उसी तरह की पुरुष की बोली है'—ऐसा विशेष ज्ञान न होने से मिथ्यानुमान होता है । जो प्रमाता विशिष्ट शब्द से विशिष्ट मयूर ध्वनि ( बोली ) को जब ग्रहण करता है तब उस ध्वनि का विशिष्ट अर्थ गृहीत होता हुआ हेतु बनता है, जैसे सर्पादियों को मयूर की खास बोली सुनकर ही उनके अस्तित्व का अनुमान हो जाता है । इस प्रकार अनुमाता का ही यह अपराध माना जायेगा कि वह अर्थविशेष हेतु से अनुमेय अर्थ को सामान्य अर्थ से जानने की इच्छा करता है, अनुमान का इसमें क्या दोष ! ॥ ३९ ॥ पूर्वपक्ष—पीछे (१.१.५ में) आप 'त्रिकालयुक्त अर्थ अनुमान से गृहीत होते हैं, अतः अनुमान त्रिकालविषय है'—ऐसा कह आये हैं; और यहाँ— वर्तमानकाल नहीं है; क्योंकि गिरती हुई वस्तु के केवल पतितकाल तथा पतितव्य- काल ही उपपन्न हैं ? ॥ ४० ॥ डाल से टूटे फल के भूमि की ओर आते समय ऊपर (डाल और फल के बीच) का मार्ग पतित-मार्ग हुआ, उसमें लगने वाला काल 'पतितकाल' कहलाया । जो नीचे भूमि तक आने का मार्ग है वह पतितव्य-मार्ग हुआ, उसमें लगने वाला काल 'पतितव्य-

११६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १ . आ० कालः; नेदानीं तृतीयोऽध्वा विद्यते यत्र पततीति वर्त्तमानः कालो गृह्येत ! तस्माद् वर्त्तमानः कालो न विद्यत इति ? ॥ ४० ॥ तयोरप्यभावो वर्त्तमानाभावे; तदपेक्षत्वात् ॥ ४१ ॥ नाध्वव्यङ्ग्यः कालः; किं तर्हि ? क्रियाव्यङ्ग्यः—'पतति' इति । यदा पतन- क्रिया व्युपरता भवति स कालः पतितकालः, यदोत्पत्स्यते स पतितव्यकालः, यदा द्रव्ये वर्त्तमाना क्रिया गृह्यते स वर्त्तमानः कालः । यदि चायं द्रव्ये वर्त्तमानं पतनं न गृह्णाति कस्योपरममुत्पत्स्यमानतां वा प्रतिपद्यते ! पतितः काल इति भूता क्रिया, पतितव्यः काल इति चोत्पत्स्यमाना क्रिया । उभयोः कालयोः क्रियाहीनं द्रव्यम्, अधः पततीति क्रियासम्बद्धम् । सोऽयं क्रियाद्रव्ययोः सम्बन्धं गृह्णातीति वर्त्तमानः कालः, तदाश्रयौ चेतरौ कालौ तदभावे न स्याता- मिति ॥ ४१ ॥ अथापि— नातीतानागतयोरितरेतरापेक्षासिद्धिः ॥ ४२ ॥ काल' कहलायेगा; अब ऐसा तीसरा कौन मार्ग रह गया जिसे हम 'गिरता है'— ऐसा कहते हुये वर्तमान काल कह सकें ! अतः वर्तमान काल ही नहीं है—ऐसा हम मान लें ? ॥ ४० ॥ उत्तर देते हैं— वर्तमानकाल न मानोगे तो वर्तमानापेक्षित भूत, भविष्यत् काल की भी अनुपपत्ति होने लगेगी ॥ ४१ ॥ समय मार्ग से नहीं, अपितु 'पड़ता है'—इस क्रिया से व्यक्त होता है । 'पड़ता है' से आरंभ होकर जब पतन-क्रिया समाप्त हो जाती है वह काल 'पतितकाल', तथा जब पतन-क्रिया उत्पन्न होगी वह काल 'पतितव्य काल' कहलाता है, और जब फल आदि द्रव्य में वर्तमान पतन-क्रिया गृहीत होती है, वह 'वर्तमानकाल' कहलाता है । यदि यह पूर्वपक्षी वर्तमान पतनक्रिया को नहीं जानता है तो वह समाप्ति (भूतकाल) तथा प्रागभाव (भविष्यत्काल) किसके सम्बन्ध में प्रतिपादन करेगा ? पतितकाल भूत-क्रिया का तथा पतितव्यकाल भविष्यत्क्रिया का बोधक है । इन दोनों ही कालों में द्रव्य क्रियाहीन रहता है । 'नीचे गिरता है'—यह वर्तमानकाल अवश्य वर्तमान क्रिया से सम्बद्ध है । यह वर्तमानकाल द्रव्य-क्रिया का सम्बन्ध ग्रहण करता है, बाकी दोनों काल इसी पर आश्रित हैं, यदि यह न होगा तो वे कहाँ से होंगे ! ॥ ४१ ॥ भूत भविष्यत् को परस्परनिरूपणाधीन मान लें, उनके लिये एक पृथक् वर्तमानकाल मानने की क्या आवश्यकता है ? इसपर सूत्रकार कहते हैं— अतीत (भूत) अनागत (भविष्यत्) की इतरेतरापेक्षया सिद्धि नहीं हो सकती ॥ ४२ ॥

४२. सू० ] अनुमानपरीक्षाप्रकरणम् ११७ यद्यतीतानागता वितरेतरापेक्षौ सिद्ध्येताम्, प्रतिपद्येमहि वर्त्तमानविलोपम् । नातीतापेक्षाऽनागतसिद्धिः, नाप्यनागतापेक्षाऽतीतसिद्धिः । कया युक्त्या ? केन कल्पेनातीतः कथमतीतापेक्षाऽनागतसिद्धिः, केन च कल्पेनानागतः कथमनागता- पेक्षातीतसिद्धिरिति नैतच्छक्यं निर्वक्तुम्, अव्याकरणीयमेतद्वर्त्तमानलोप इति । यच्च मन्येत—'ह्रस्वदीर्घयोः, स्थलनिम्नयोः, छायाऽऽतपयोश्च यथेतरेतरा- पेक्षया सिद्धिरेवमतीतानागतयोः' इति ? तन्नोपपद्यते, विशेषहेत्वभावात् । दृष्टा- न्तवत् प्रतिदृष्टान्तोऽपि प्रसज्यते, यथा—रूपस्पर्शौ गन्धरसौ नेतरेतरापेक्षौ सिध्यतः; एवमतीतानागताविति, नेतरेतरापेक्षा कस्यचित्सिद्धिरिति । यस्मादे- काभावेऽन्यतराभावादुभयाभावः । यद्येकस्यान्यतरापेक्षा सिद्धिरन्यतरस्येदानीं किमपेक्षा ? यद्यन्यतरस्यैकापेक्षा सिद्धिरेकस्येदानीं किमपेक्षा ? एवमेकस्याभावे अन्यतरन्न सिध्यतीत्युभयाभावः प्रसज्यते ॥ ४२ ॥ अर्थसद्भावव्यङ्ग्यश्चायं वर्त्तमानः कालः—'विद्यते द्रव्यम्, विद्यते गुणः, विद्यते कर्म' इति । यस्य चायं नास्ति, तस्य—

यदि अतीत व अनागत काल एक दूसरे के आश्रय से सिद्ध हो सकें तो हम भी वर्तमानकाल को न मानें; परन्तु न भूत की अपेक्षा रखकर भविष्यत् की सिद्धि की जा सकती है, न भविष्यत् की अपेक्षा रखकर भूत की । किस तर्क से ? किस समर्थ प्रमाण से वह अतीत है तथा उसपर आश्रित अनागत की सिद्धि हो पायेगी ! अथ च, किस समर्थ प्रमाण से अनागत है तथा तदपेक्ष अतीत की सिद्धि हो पायेगी ! —इसका आप निर्वचन नहीं कर सकते, अतः वर्तमान का न मानना भी सभी को निर्वचन में बाधक होगा ! जो यह मानता है कि—'जैसे ह्रस्व-दीर्घ की, उच्च-नीच स्थल की, छाया-आतप की इतरेतरापेक्षया सिद्धि होती है, उसी तरह अतीत-अनागत की भी मान लें' ? यह नहीं मान सकते; क्योंकि ऐसा मानने में कोई विशेष हेतु नहीं है । दृष्टान्त की तरह प्रतिदृष्टान्त ( विपरीत दृष्टान्त ) भी प्रसक्त होता है; जैसे रूप तथा स्पर्श, गन्ध तथा रस इतरेतरापेक्षया सिद्ध नहीं किये जा सकते, इसी प्रकार अतीत अनागत में समझना चाहिये । और इतरेतरापेक्षया किसी की भी सिद्धि नहीं होती; क्योंकि एक का अभाव होने पर दूसरे का अभाव ( अन्यतराभाव ) होने से दोनों का ही अभाव (उभयाभाव) हो जायेगा । यदि एक की दूसरे की अपेक्षा से सिद्धि मानें तो बाकी बचे दूसरे की किसकी अपेक्षा से सिद्धि होगी ? यदि अन्यतर की एकापेक्षया सिद्धि मानें तो उस एक की अब किसकी अपेक्षा से सिद्धि होगी ? इस प्रकार एक का अभाव होने पर दूसरा भी सिद्ध नहीं हो पायेगा, अतः दोनों का ही असिद्धि-प्रसङ्ग आ पड़ेगा ॥ ४२ ॥ यह वर्त्तमानकाल न केवल पतनादि क्रिया से, अपितु अर्थ-सत्ता से भी व्यक्त होता है, जैसे—'यह द्रव्य वर्तमान है', 'यह गुण वर्तमान है', 'यह कर्म विद्यमान है'—आदि। जिस अर्थ की सत्ता नहीं होती, उसके—

११८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० वर्त्तमानाभावे सर्व्वाग्रहणं प्रत्यक्षानुपपत्तेः ॥ ४३ ॥ प्रत्यक्षमिन्द्रियार्थसन्निकर्षजम्, न चाविद्यमानमसदिन्द्रियेण सन्निकृष्यते । न चायं विद्यमानं सत्किञ्चिदनुजानाति । प्रत्यक्षनिमित्तं प्रत्यक्षविषयः प्रत्यक्षज्ञानं सर्वं नोपपद्यते, प्रत्यक्षानुपपत्तौ तत्पूर्वकत्वादनुमानागमयोरनुपपत्तिः । सर्वप्रमाण- विलोपे सर्वग्रहणं न भवतीति ॥ ४३ ॥ उभयथा च वर्त्तमानः कालो गृह्यते-क्वचिदर्थसद्भावव्यङ्ग्यः, यथा-अस्ति द्रव्यमिति; क्वचित् क्रियासन्तानव्यङ्ग्यः, यथा-पचति, छिनत्तीति । नानाविधा चैकार्था क्रिया क्रियासन्तानः क्रियाभ्यासश्च । नानाविधा चैकार्था क्रिया पचतीति स्थाल्यधिश्रयणमुदकासेचनं तण्डुलावपनमेधोऽपसर्पणमग्न्यभिज्वालनं दर्वीघट्टनं मण्डस्रावणमधोऽवतारणमिति । छिनत्तीति क्रियाभ्यासः, उद्यम्योद्यम्य परशुं दारुणि निपातयन् छिनत्तीत्युच्यते । यच्चेदं पच्यमानं छिद्यमानं च तत्क्रिय- माणम् । तस्मिन् क्रियमाणे—


वर्तमान के अभाव में प्रत्यक्ष न होने से सभी का ग्रहण नहीं होगा ॥ ४३ ॥ प्रत्यक्ष इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य होता है, और अविद्यमान असत् इन्द्रिय से सन्निकृष्ट नहीं हो सकता । यह पूर्वपक्षी विद्यमान सत् को कुछ स्वीकार नहीं करता, तो उसके मतमें प्रत्यक्ष का कारण, प्रत्यक्ष का विषय तथा प्रत्यक्ष ज्ञान—यह सब उपपन्न नहीं हो सकेगा । अनुमान तथा शब्द प्रमाण के प्रत्यक्षपूर्वक होने से, प्रत्यक्ष के अभाव में वे दोनों भी अनुपपन्न ही रहेंगे । यों, सब प्रमाणों के विलुप्त हो जाने से सभी का ग्रहण न हो सकेगा ॥ ४३ ॥ वर्तमानकाल दो प्रकार से गृहीत होता है—कहीं वह अर्थ-सत्ता से व्यक्त होता है, जैसे—'यह द्रव्य है'; कहीं क्रियासन्तान से व्यक्त होता है, जैसे—'पकाता है', 'काटता है' आदि । एक अर्थ के लिये होने वाली नाना प्रकार की क्रियायें 'क्रियासन्तान' तथा 'क्रियाभ्यास' कहलाती हैं । 'क्रियासन्तान' का उदाहरण है—'पचति' । यहाँ एक अर्थ के लिये—बटलोई (पात्र) का चूल्हे पर चढ़ाना, उसमें जल भरना, चावल डालना, चूल्हे में अग्नि जलाना, अग्नि तेज करने के लिये लकड़ी सरकाना, करछी से चावल को हिलाना, मांड़ पसारना, अन्त में बटलोई को नीचे उतारना—आदि अनेक प्रकार की क्रियायें होती हैं । 'छिनत्ति'—यह 'क्रियाभ्यास' का उदाहरण है, यहाँ 'कुठार को ऊपर उठा उठाकर काष्ठ पर पटकता हुआ काटता है'—ऐसा अर्थ निकलता है । इन दोनों क्रियाओं में पकाया जा रहा तथा काटा जा रहा 'क्रियमाण' (वर्तमान क्रिया-कर्म) कहलाता है । उस क्रियमाण में—

४५. सू०] उपमानपरीक्षाप्रकरणम् ११९

४५. सू०] उपमानपरीक्षाप्रकरणम् ११९ कृतताकर्त्तव्यतोपपत्तेस्तूभयथा ग्रहणम् ॥ ४४ ॥ क्रियासन्तानोऽनारब्धश्चिकीर्षितोऽनागतः कालः—पक्ष्यतीति । प्रयोजना- वसानः क्रियासन्तानोपरमः अतीत: काल:—अपाक्षीदिति । आरब्धक्रियासन्तानो वर्त्तमानः कालः—पचतीति । तत्र या उपरता सा 'कृतता', या चिकीर्षिता सा 'कर्त्तव्यता', या विद्यमाना सा 'क्रियमाणता' । तदेवं क्रियासन्तानस्थस्त्रैकाल्य- समाहारः—'पचति', 'पच्यते' इति वर्त्तमानग्रहणेन गृह्यते । क्रियासन्तानस्य ह्यत्रा- विच्छेदो विधीयते; नारम्भः, नोपरम इति । सोऽयमुभयथा वर्त्तमानो गृह्यते— अपवृक्तः, व्यपवृक्तश्च अतीतानागताभ्याम् । स्थितिव्यङ्ग्यः—विद्यते द्रव्यमिति । क्रियासन्तानाविच्छेदाभिधायी च त्रैकाल्यान्वितः—पचति, छिनत्तीति । अन्यश्च प्रत्यासत्तिप्रभृतेरर्थस्य विवक्षायां तदभिधायी बहुप्रकारो लोकेषु उत्प्रेक्षितव्यः । तस्मादस्ति वर्त्तमानः काल इति ॥ ४४ ॥ उपमानपरीक्षाप्रकरणम् [ ४५-४९ ] अत्यन्तप्रायैकदेशसाधर्म्यादुपमानासिद्धिः ? ॥ ४५ ॥ कृतता (भूत व्यापार) तथा कर्त्तव्यता (भविष्यत्)—दोनों की उपपत्ति होने से दोनों ही तरह से शाब्दबोध बन जाता है ॥ ४४ ॥ जब क्रियासन्तान आरम्भ नहीं किया परन्तु आरम्भ करने की इच्छा है, वह अनागत काल है—'पकायेगा' ऐसा । जहाँ पाकप्रयोजन निवृत्त हो जाये, क्रियासन्तान का उपरम हो जाये वह काल अतीत काल है—'पका चुका' ऐसा । जब क्रियासन्तान आरम्भ किया जा चुका हो, वह वर्तमान काल है—'पकाता है' ऐसा । इसमें जो क्रिया समाप्त हो चुकी उसे 'कृतता' कहते हैं, जो अभी प्रारम्भ नहीं हुई परन्तु करने की इच्छा है, वह कहलायी 'कर्त्तव्यता', और जो क्रिया विद्यमान है उसे कहेंगे 'क्रियमाणता' । इस प्रकार क्रियासन्तानस्थ यह त्रैकाल्यव्यवहार 'पकाता है' या 'पकाया जाता है'—यों वर्तमान के ग्रहण से गृहीत होता है । इस वर्तमान काल में क्रियासन्तान का केवल नैरन्तर्यविधान है, न कि आरम्भ या उपरम । यों यह वर्तमान, अतीत एवं अनागत उभय रीति में उभयथा गृहीत होता है— अतीत में अन्वपवृक्त (पश्चात्) तथा अनागत में व्यपवृक्त (पूर्व) । वर्तमान में सत्ता- क्रिया का उदाहरण है—'द्रव्य है' । क्रियासन्तान के नैरन्तर्य का बोधक तथा त्रैकाल्यान्वित (त्रिकाल में होनेवाला क्रियासमूह) का उदाहरण है—'पकाता है' या 'काटता है' । सामीप्य आदि की अर्थविवक्षा में तद्बोधक अन्य उदाहरणों की लोकव्यवहार को देखकर कल्पना कर लेना चाहिये । अस्तु ! निष्कर्ष यह निकाला कि वर्तमान काल भी है, अतः अनुमान प्रमाण में त्रैकाल्यविषयों का ग्रहण हो सकता है ॥ ४४ ॥ अत्यन्तसादृश्य, प्रायसादृश्य तथा एकदेशसादृश्य के कारण उपमान की सिद्धि नहीं हो सकती ? ॥ ४५ ॥