न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 410 में से
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१०६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० इति । अवयवैस्तावदवयवान्तरस्य व्यवधानादशेषग्रहणं नोपपद्यते । प्राप्तिग्रहण- मपि नोपपद्यते; प्राप्तिमतामग्रहणात् । सेयमेकदेशग्रहणसहचरिता वृक्षबुद्धि- र्द्रव्यान्तरोत्पत्तौ कल्पते, न समुदायमात्रे इति ॥ ३३ ॥ प्रसङ्गोपात्ता अवयविपरीक्षा साध्यत्वादवयविनि सन्देहः ? ॥ ३४ ॥ यदुक्तम्—'अवयविसद्भावात्' इति, अयमहेतुः, साध्यत्वात् । साध्यं तावत्- एतत्कारणेभ्यो द्रव्यान्तरमुत्पद्यते इति, अनुपपादितमेतत् । एवं च सति विप्रति- पत्तिमात्रं भवति, विप्रतिपत्तेश्चावयविनि संशय इति ? ॥ ३४ ॥ सर्वग्रहणमवयव्यसिद्धेः ॥ ३५ ॥ यद्यवयवी नास्ति सर्वस्य ग्रहणं१ नोपपद्यते । किं तत् सर्वम् ? द्रव्यगुणकर्म- सामान्यविशेषसमवायाः । कथं कृत्वा ? परमाणुसमवस्थानं तावद् दर्शनविषयो न भवति, अतीन्द्रियत्वादणूनाम् । द्रव्यान्तरं चावयविभूतं दर्शनविषयो नास्ति, दर्शनविषयस्थाश्चेमे द्रव्यादयो गृह्यन्ते, ते निरधिष्ठाना न गृह्येरन् ! गृह्यन्ते तु- समुदाय रूप से वृक्ष मानें या उन समुदायियों की परस्पर प्राप्ति (संयोग) मानें, दोनों ही नयों में समुदायभूत (अवयवी) वृक्ष का ग्रहण नहीं हो पायेगा; क्योंकि अवयवों से अव- यवान्तर का व्यवधान होने के कारण ग्रहण नहीं बन सकेगा । अवयवों के परस्पर संयोग से भी ग्रहण नहीं हो सकेगा । क्योंकि संयोगवाले अवयवों में यह ग्रहण नहीं होता, अतः यह एकदेशग्रहण के साथ होनेवाली 'यह वृक्ष है' ऐसी बुद्धि द्रव्यान्तरोत्पत्ति मानने पर तो बन सकती है, अवयवों का समुदायमात्र मानने पर नहीं बनेगी ॥ ३३ ॥ साध्य होने से अवयवों से भिन्न अवयवी में संशय है ॥ ३४ ॥ पूर्वोक्त ३३ वें सूत्र में एकदेशोपलब्धि न होने में 'अवयवसिद्भाव' हेतु दिया गया था, यह हेतु साध्य है। अर्थात् प्रमाणों से यह सिद्ध करना चाहिये कि 'इन कारणों से द्रव्यान्तर उत्पन्न होता है'। क्योंकि यह सिद्ध नहीं किया गया, अतः अयुक्त है। इस तरह उक्त हेतु में विप्रतिपत्ति होने लगेगी, तथा विप्रतिपत्ति से अवयवी में संशय होगा ॥ ३४ ॥ और अवयवी की सिद्धि न होने से सम्पूर्ण का ग्रहण न होगा ॥ ३५ ॥ यदि अवयवी सिद्ध न होगा तो सम्पूर्ण का ग्रहण न होगा । वह सम्पूर्ण क्या है ? द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय । क्यों ऐसा होगा ? परमाणु का परस्परसंयोग प्रत्यक्ष का विषय नहीं हुआ करता; क्योंकि परमाणु अतीन्द्रिय हैं। यदि उन्हें अवयवी मानें तो तुम्हारे मत से द्रव्यान्तर कह कर कोई अवयवी नहीं है। द्रव्यादि तो दर्शनविषय (अवयवी) में ही रहते हैं, अवयवी के न रहने पर वे निरधिष्ठान होते हुए प्रत्यक्ष कैसे होंगे ! लोक में अवयवी वृत्ति के लिये यह व्यवहार देखा जाता है—यह घट १. अवयव्यसिद्धेः प्रत्यक्षाभावः, प्रत्यक्षाभावेऽनुमाद्यभावः इति सर्वप्रमाणाग्रहणमिति वार्त्तिकेऽर्थान्तरमपि व्याख्यातम् ।