न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०७ 'कुम्भोऽयं श्याम एको महान् संयुक्तः स्पन्दते अस्ति मृन्मयश्च' इति । सन्ति चेमे गुणादयो धर्मा इति । तेन सर्वस्य ग्रहणात् पश्यामः—अस्ति द्रव्यान्तरभूतोऽव- यवीति ॥ ३५ ॥ धारणाऽऽकर्षणोपपत्तेश्च ॥ ३६ ॥ अवयव्यर्थान्तरभूत इति । संग्रहकारिते वै धारणाऽऽकर्षणे । संग्रहो नाम संयोगसहचरितं गुणान्तरं स्नेहद्रवत्वकारितमपां संयोगादामे कुम्भे, अग्निसंयोगात् पक्वे । यदि त्ववयवि- कारिते अभविष्यताम्, पांशुराशिप्रभृतिष्वप्यज्ञास्येताम्; द्रव्यान्तरानुत्पत्तौ च तृणोपलकाष्ठादिषु जतुसंगृहीतेष्वपि नाभविष्यतामिति ? अथावयविनं प्रत्याचक्षाणको 'मा भूत् प्रत्यक्षलोपः' इत्यणुसमुच्चयं दर्शनविषयं प्रतिजानानः किमनुयोक्तव्य इति ? एकमिदं द्रव्यमित्येकबुद्धेर्विषयं पर्य॑नुयोज्यः । किमेकबुद्धिरभिन्नार्थविषयेति ? काला है, एक है, बड़ा है, द्रव्यान्तर से संयुक्त है, इसमें चेष्टा है, इसकी सत्ता है, यह मृन्मय है'—इत्यादि । (अवयवों के बारे में ऐसा कोई व्यवहार नहीं देखते ।) ये गुणादि धर्म भी उस अवयवी (घट द्रव्य) में हैं, (न कि अवयवसमूह में) ! अतः इस 'सम्पूर्ण' के ग्रहण से हम मानते हैं कि अवयवी अवयवसमूह से पृथक् है ॥ ३५ ॥ तभी उसमें धारणा तथा आकर्षण भी बनेंगे ॥ ३६ ॥ धारण (इकट्ठा पकड़कर उठाना), आकर्षण (इकट्ठा खींचना) की उपपत्ति से भी अवयवी द्रव्यान्तर सिद्ध होता है । अर्थात् यह दृश्यमान घटादि अवयवी अवयवों से पृथक् नहीं है, अन्यथा इसमें धारण तथा आकर्षण नहीं बनेंगे । शङ्का—धारण तथा आकर्षण अवयवों के संग्रह होते हैं, संग्रह से तात्पर्य है—संयोग- सहचार से गुणान्तर का आ जाना, जैसे कच्चे घड़े में जल के संयोग से स्नेहद्रवत्व- प्रयुक्त गुणान्तर है तथा अग्नि के संयोग से पक्के घड़े में गुणान्तर । यदि ये कार्य (धारण, आकर्षण) अवयवी के कारण होते तो पांशुराशि (धूलिसमूह) में भी दिखायी देने चाहियें । अथच, द्रव्यान्तर की अनुत्पत्ति में ये न होते तो तृण, उपल, काष्ठ-आदि में या लाक्षा से संगृहीत मोती आदि में ये धारण-आकर्षण नहीं होने चाहिये; क्योंकि सिद्धान्ती के मत में भी वहाँ कोई अवयवी द्रव्यान्तर नहीं है ? मध्यस्थ की शङ्का—अवयवी का खण्डन करनेवाले पूर्वपक्षी (बौद्ध) को—जो कि प्रत्यक्षप्रमाण का लोप न हो जाये, इसलिए विवशतः परमाणुसमूह में ही प्रत्यक्ष की स्थापना कर रहा है, क्या उत्तर देना चाहिए ? उत्तर—'यह एक द्रव्य है'—यहाँ एकबुद्धि का विषय क्या होगा ? यह उससे