भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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११८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० वर्त्तमानाभावे सर्व्वाग्रहणं प्रत्यक्षानुपपत्तेः ॥ ४३ ॥ प्रत्यक्षमिन्द्रियार्थसन्निकर्षजम्, न चाविद्यमानमसदिन्द्रियेण सन्निकृष्यते । न चायं विद्यमानं सत्किञ्चिदनुजानाति । प्रत्यक्षनिमित्तं प्रत्यक्षविषयः प्रत्यक्षज्ञानं सर्वं नोपपद्यते, प्रत्यक्षानुपपत्तौ तत्पूर्वकत्वादनुमानागमयोरनुपपत्तिः । सर्वप्रमाण- विलोपे सर्वग्रहणं न भवतीति ॥ ४३ ॥ उभयथा च वर्त्तमानः कालो गृह्यते-क्वचिदर्थसद्भावव्यङ्ग्यः, यथा-अस्ति द्रव्यमिति; क्वचित् क्रियासन्तानव्यङ्ग्यः, यथा-पचति, छिनत्तीति । नानाविधा चैकार्था क्रिया क्रियासन्तानः क्रियाभ्यासश्च । नानाविधा चैकार्था क्रिया पचतीति स्थाल्यधिश्रयणमुदकासेचनं तण्डुलावपनमेधोऽपसर्पणमग्न्यभिज्वालनं दर्वीघट्टनं मण्डस्रावणमधोऽवतारणमिति । छिनत्तीति क्रियाभ्यासः, उद्यम्योद्यम्य परशुं दारुणि निपातयन् छिनत्तीत्युच्यते । यच्चेदं पच्यमानं छिद्यमानं च तत्क्रिय- माणम् । तस्मिन् क्रियमाणे—


वर्तमान के अभाव में प्रत्यक्ष न होने से सभी का ग्रहण नहीं होगा ॥ ४३ ॥ प्रत्यक्ष इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य होता है, और अविद्यमान असत् इन्द्रिय से सन्निकृष्ट नहीं हो सकता । यह पूर्वपक्षी विद्यमान सत् को कुछ स्वीकार नहीं करता, तो उसके मतमें प्रत्यक्ष का कारण, प्रत्यक्ष का विषय तथा प्रत्यक्ष ज्ञान—यह सब उपपन्न नहीं हो सकेगा । अनुमान तथा शब्द प्रमाण के प्रत्यक्षपूर्वक होने से, प्रत्यक्ष के अभाव में वे दोनों भी अनुपपन्न ही रहेंगे । यों, सब प्रमाणों के विलुप्त हो जाने से सभी का ग्रहण न हो सकेगा ॥ ४३ ॥ वर्तमानकाल दो प्रकार से गृहीत होता है—कहीं वह अर्थ-सत्ता से व्यक्त होता है, जैसे—'यह द्रव्य है'; कहीं क्रियासन्तान से व्यक्त होता है, जैसे—'पकाता है', 'काटता है' आदि । एक अर्थ के लिये होने वाली नाना प्रकार की क्रियायें 'क्रियासन्तान' तथा 'क्रियाभ्यास' कहलाती हैं । 'क्रियासन्तान' का उदाहरण है—'पचति' । यहाँ एक अर्थ के लिये—बटलोई (पात्र) का चूल्हे पर चढ़ाना, उसमें जल भरना, चावल डालना, चूल्हे में अग्नि जलाना, अग्नि तेज करने के लिये लकड़ी सरकाना, करछी से चावल को हिलाना, मांड़ पसारना, अन्त में बटलोई को नीचे उतारना—आदि अनेक प्रकार की क्रियायें होती हैं । 'छिनत्ति'—यह 'क्रियाभ्यास' का उदाहरण है, यहाँ 'कुठार को ऊपर उठा उठाकर काष्ठ पर पटकता हुआ काटता है'—ऐसा अर्थ निकलता है । इन दोनों क्रियाओं में पकाया जा रहा तथा काटा जा रहा 'क्रियमाण' (वर्तमान क्रिया-कर्म) कहलाता है । उस क्रियमाण में—