भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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४५. सू०] उपमानपरीक्षाप्रकरणम् ११९ कृतताकर्त्तव्यतोपपत्तेस्तूभयथा ग्रहणम् ॥ ४४ ॥ क्रियासन्तानोऽनारब्धश्चिकीर्षितोऽनागतः कालः—पक्ष्यतीति । प्रयोजना- वसानः क्रियासन्तानोपरमः अतीत: काल:—अपाक्षीदिति । आरब्धक्रियासन्तानो वर्त्तमानः कालः—पचतीति । तत्र या उपरता सा 'कृतता', या चिकीर्षिता सा 'कर्त्तव्यता', या विद्यमाना सा 'क्रियमाणता' । तदेवं क्रियासन्तानस्थस्त्रैकाल्य- समाहारः—'पचति', 'पच्यते' इति वर्त्तमानग्रहणेन गृह्यते । क्रियासन्तानस्य ह्यत्रा- विच्छेदो विधीयते; नारम्भः, नोपरम इति । सोऽयमुभयथा वर्त्तमानो गृह्यते— अपवृक्तः, व्यपवृक्तश्च अतीतानागताभ्याम् । स्थितिव्यङ्ग्यः—विद्यते द्रव्यमिति । क्रियासन्तानाविच्छेदाभिधायी च त्रैकाल्यान्वितः—पचति, छिनत्तीति । अन्यश्च प्रत्यासत्तिप्रभृतेरर्थस्य विवक्षायां तदभिधायी बहुप्रकारो लोकेषु उत्प्रेक्षितव्यः । तस्मादस्ति वर्त्तमानः काल इति ॥ ४४ ॥ उपमानपरीक्षाप्रकरणम् [ ४५-४९ ] अत्यन्तप्रायैकदेशसाधर्म्यादुपमानासिद्धिः ? ॥ ४५ ॥ कृतता (भूत व्यापार) तथा कर्त्तव्यता (भविष्यत्)—दोनों की उपपत्ति होने से दोनों ही तरह से शाब्दबोध बन जाता है ॥ ४४ ॥ जब क्रियासन्तान आरम्भ नहीं किया परन्तु आरम्भ करने की इच्छा है, वह अनागत काल है—'पकायेगा' ऐसा । जहाँ पाकप्रयोजन निवृत्त हो जाये, क्रियासन्तान का उपरम हो जाये वह काल अतीत काल है—'पका चुका' ऐसा । जब क्रियासन्तान आरम्भ किया जा चुका हो, वह वर्तमान काल है—'पकाता है' ऐसा । इसमें जो क्रिया समाप्त हो चुकी उसे 'कृतता' कहते हैं, जो अभी प्रारम्भ नहीं हुई परन्तु करने की इच्छा है, वह कहलायी 'कर्त्तव्यता', और जो क्रिया विद्यमान है उसे कहेंगे 'क्रियमाणता' । इस प्रकार क्रियासन्तानस्थ यह त्रैकाल्यव्यवहार 'पकाता है' या 'पकाया जाता है'—यों वर्तमान के ग्रहण से गृहीत होता है । इस वर्तमान काल में क्रियासन्तान का केवल नैरन्तर्यविधान है, न कि आरम्भ या उपरम । यों यह वर्तमान, अतीत एवं अनागत उभय रीति में उभयथा गृहीत होता है— अतीत में अन्वपवृक्त (पश्चात्) तथा अनागत में व्यपवृक्त (पूर्व) । वर्तमान में सत्ता- क्रिया का उदाहरण है—'द्रव्य है' । क्रियासन्तान के नैरन्तर्य का बोधक तथा त्रैकाल्यान्वित (त्रिकाल में होनेवाला क्रियासमूह) का उदाहरण है—'पकाता है' या 'काटता है' । सामीप्य आदि की अर्थविवक्षा में तद्बोधक अन्य उदाहरणों की लोकव्यवहार को देखकर कल्पना कर लेना चाहिये । अस्तु ! निष्कर्ष यह निकाला कि वर्तमान काल भी है, अतः अनुमान प्रमाण में त्रैकाल्यविषयों का ग्रहण हो सकता है ॥ ४४ ॥ अत्यन्तसादृश्य, प्रायसादृश्य तथा एकदेशसादृश्य के कारण उपमान की सिद्धि नहीं हो सकती ? ॥ ४५ ॥