भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१२० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० अत्यन्तसाधर्म्यादुपमानं न सिध्यति, न चैवं भवति—'यथा गौरेवं गौः' इति ? प्रायसाधर्म्यादुपमानं न सिध्यति, न हि भवति—'यथाऽनड्वानेवं महिषः' इति ? एकदेशसाधर्म्यादुपमानं न सिध्यति, न हि सर्वेण सर्वमुपमीयत इति ? ॥ ४५ ॥ प्रसिद्धसाधर्म्यादुपमानसिद्धेर्यथोक्तदोषानुपपत्तिः ॥ ४६ ॥ न साधर्म्यस्य कृत्स्नप्रायल्पभावमाश्रित्योपमानं प्रवर्त्तते, किं तर्हि ? प्रसिद्ध- साधर्म्यात् साध्यसाधनभावमाश्रित्योपमानं प्रवर्त्तते, यत्र चैतदस्ति, न तत्रोपमानं प्रतिषेद्धुं शक्यम् । तस्माद्यथोक्तदोषो नोपपद्यत इति ॥ ४६ ॥ अस्तु तर्ह्युपमानमनुमानम्— प्रत्यक्षेणाप्रत्यक्षसिद्धेः ? ॥ ४७ ॥ यथा धूमेन प्रत्यक्षेणाप्रत्यक्षस्य वह्नेर्ग्रहणमनुमानम्, एवं गवा प्रत्यक्षेणाऽप्रत्य- क्षस्य गवयस्य ग्रहणमिति नेदमनुमानाद्विशिष्यते ? ॥ ४७ ॥ विशिष्यत इत्याह । कया युक्त्या ? नाप्रत्यक्षे गवये प्रमाणार्थमुपमानस्य पश्यामः ॥ ४८ ॥ अत्यन्तसादृश्य से उपमान सिद्ध नहीं होता, क्योंकि ऐसा कभी नहीं होता कि जैसी गौ हो ठीक वैसा ही बैल हो (कुछ न कुछ तो अन्तर होगा ही) । बाहुल्येन सादृश्य से उपमान की सिद्धि नहीं होती; क्योंकि लोक में यह कब होता है कि जैसा बैल है वैसा ही भैंसा हो ! यद्यपि दोनों में प्रायसादृश्य है । एकदेशसाधर्म्य से भी उपमान सिद्ध नहीं होता; क्योंकि तब कुछ न कुछ सादृश्य से सब का सबके साथ उपमान बनने लगेगा ? ॥ ४५ ॥ प्रसिद्ध-साधर्म्य से उपमानसिद्धि होने के कारण उक्त दोष नहीं बनेंगे ॥ ४६ ॥ सादृश्य की समग्रता, प्रायता या अल्पता से नहीं; अपितु प्रसिद्धसादृश्य से साध्य- साधनभाव को लेकर उपमान प्रवृत्त होता है । ऐसा जहाँ है, वहाँ उपमान प्रतिषिद्ध नहीं हो सकता । अतः उक्त दोष नहीं बन पायेंगे ॥ ४६ ॥ तो उपमान को अनुमान ही मान लें— क्योंकि उपमान में भी प्रत्यक्ष के हेतु से अप्रत्यक्ष की सिद्धि होती है ? ॥ ४७ ॥ जैसे धूम के प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष वह्नि का ग्रहण अनुमान कहलाता है, इसी प्रकार उपमान में गौ के प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष-गवय या ग्रहण होता है । यह प्रमाण अनुमान से भिन्न नहीं हुआ, अतः क्यों न इसे अनुमान ही मान लें ? ॥ ४७ ॥ नहीं, यह अनुमान से भिन्न होता है; क्योंकि— गवय का प्रत्यक्ष न होने पर उपमान की उपपत्ति नहीं लगती ॥ ४८ ॥ जब उपमानवाक्यश्रोता गौ का प्रत्यक्ष कर चुका हो, तब वन में गोसदृश अन-