न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें५०. सू० ] शब्दसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् १२१ यदा ह्ययमुपयुक्तोपमानो गोदर्शी गवा समानमर्थं पश्यति, तदाऽयम् 'गवय' इत्यस्य संज्ञाशब्दस्य व्यवस्थां प्रतिपद्यते, न चेदमनुमानमिति । परार्थं चोपमानम्, यस्य ह्युपमेयमप्रसिद्धं तदर्थं प्रसिद्धोभयेन क्रियते इति । परार्थमुपमानमिति चेद् ? न; स्वयमध्यवसायात् । भवति च भोः ! स्वयम- ध्यवसायः-'यथा गौरेवं गवयः' इति ? नाध्यवसायः प्रतिषिध्यते, उपमानं तु तन्न भवति-'प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्' (१. १. ६)। न च यस्योभयं प्रसिद्धं तं प्रति साध्यसाधनभावो विद्यत इति ॥ ४८ ॥ तथेत्युपसंहारादुपमानसिद्धेर्नाविशेषः ॥ ४९ ॥ तथेति समानधर्मोपसंहारादुपमानं सिध्यति, नानुमानम्। अयं चानयोर्विशेष इति ॥ ४९ ॥ (क) शब्दसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् [ ५०-५७ ] [ पूर्वपक्षः ] शब्दोऽनुमानमर्थस्यानुपलब्धेरनुमेयत्वात् ? ॥ ५० ॥ वधारितसंज्ञक विषय को आँखों से देखता है तब (उद्बुद्धसंस्कार) 'यह गवय है' ऐसी उस संज्ञाशब्द की नियत शक्ति को प्रतिपन्न होता है—यह प्रक्रिया अनुमान कैसे हुई ! क्योंकि गवय के प्रत्यक्ष की तरह अनुमान में वह्नि का प्रत्यक्ष आवश्यक नहीं ! दूसरी बात यह है कि (अनुमान से स्वयं को ज्ञान होता है, जबकि) उपमान से दूसरे को संज्ञाशब्द की व्युत्पत्ति करायी जाती है । जिसको उपमेय (गवय) का ज्ञान न हों उसको उपमान द्वारा उपमेय की प्रसिद्धि दिखला कर ज्ञान कराया जाता है । तो परार्थोपमान ही क्यों न मान लिया जाय ? नहीं; इसमें स्वयम् को भी अध्यव- साय होने से इसे परार्थोपमान नहीं मान सकते । 'जैसी गौ वैसा यह गवय है' यह स्वयम् को अध्यवसाय होता है ? अध्यवसाय नहीं होता—यह हम नहीं कह रहे, हम तो कहते हैं—वैसा परार्थोपमान नहीं होता ! उपमान का लक्षण है—'प्रसिद्ध-सादृश्य से साध्य की सिद्धि' (१.१.६) । जिसको दोनों (उपमा, उपमेय) ही ज्ञात है उसके लिये साध्य- साधनभाव क्या बनेगा ? ॥ ४८ ॥ 'तथा'—इस उपसंहार से उपमान-सिद्धि होने से अनुमान तथा उपमान दोनों एक नहीं हो सकते ॥ ४९ ॥ उपमान में समानधर्म का 'वैसा यह'—इस प्रकार उपसंहार होने से उपमान प्रमाण सिद्ध होता है, ऐसा उपसंहार अनुमान में नहीं होता । अर्थात् अनुमान में—'जैसा धूम वैसी अग्नि'—यह उपसंहार नहीं हो पाता, परन्तु उपमान में 'जैसी गौ वैसा यह गवय'—यों उपसंहार होता है । यही अनुमान तथा उपमान में भेद है। अतः दोनों को पृथक् प्रमाण माना गया ॥ ४९ ॥ प्रत्यक्ष से अर्थोपलब्धि न होने पर अनुमेय होने से शब्दप्रमाण अनुमान है ? ॥ ५० ॥