न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
१३. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४३
१३. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४३ अतः संशयः—किमत्र तत्त्वमिति ? अनित्यः शब्द इत्युत्तरम् । कथम् ? 'आदिमत्त्वादैन्द्रियकत्वात् कृतकवदुपचाराच्च ॥ १३ ॥ आदिः = योनिः, कारणम्, आदीयते अस्मादिति । कारणवदनित्यं दृष्टम् । संयोगविभागजश्च शब्दः कारणवत्त्वादनित्य इति । का पुनरियमर्थदेशना—कारण- वत्त्वादिति ? उत्पत्तिधर्मकत्त्वादनित्यः शब्द इति, भूत्वा न भवति विनाशधर्मक इति । सांशयिकमेतत्—किमुत्पत्तिकारणं संयोगविभागौ शब्दस्य, आहोस्विदभि- व्यक्तिकारणम् ? इत्यत आह—ऐन्द्रियकत्वात् । इन्द्रियप्रत्यासत्तिग्राह्य ऐन्द्रियकः । किमयं व्यञ्जकेन समानदेशोऽभिव्यज्यते रूपा दिवत् ? अथ संयोगजाच्छब्दा- सन्ताने सति श्रोत्रप्रत्यासन्नो गृह्यत इति ? संयोगनिवृत्तौ शब्दग्रहणान्न व्यञ्जकेन समानदेशस्य ग्रहणम् । दारुव्रश्चने दारुपरशुसंयोगनिवृत्तौ दूरस्थेन शब्दो गृह्यते । न च व्यञ्जकाभावे व्यङ्ग्यग्रहणं अतः सन्देह होता है कि इनके कौन मत समीचीन हैं ? 'शब्द अनित्य हैं'—यह (नैयायिकों का) उत्तर है । कैसे ?— आदिमान् होने से, ऐन्द्रियक होने से, अनित्य की तरह उपचार होने से ॥ १३ ॥ आदि से तात्पर्य है योनि, अर्थात् कारण—जिससे आदान (उत्पादन) किया जाये । जो कारणवान् है वह अनित्य देखा गया है । शब्द भी संयोगविभागज होने से कारणवान् है, अतः अनित्य है । यह क्या अर्थदेशना (अर्थप्राप्ति) हुई कि 'कारण होने से' ? हमारा मतलव है उत्पत्तिधर्मवान् होने से शब्द अनित्य है, तथा वह होकर नहीं होता है (विनष्ट हो जाता है), अतः विनाशधर्मक है ! तब तो संशय उठ खड़ा होगा कि क्या ये संयोगविभाग शब्द के उत्पत्तिकारण हैं ? या अभिव्यक्तिकारण ? इसलिये कहते हैं—ऐन्द्रियक होने से । इन्द्रिय के सन्निकर्ष से गृहीत होनेवाला 'ऐन्द्रियक' कहलाता है । क्या यह शब्द व्यञ्जक (इन्द्रिय संयोग) से समानदेशस्थ एकाधिकरणवृत्ति होता हुआ रूप की तरह अभिव्यक्त होता है ? या संयोगज शब्द से शब्दसन्तान होने पर श्रोत्रेन्द्रिय से प्रत्यासन्न (सम्बद्ध) होता हुआ गृहीत होता हैं ? संयोगनिवृत्ति होने पर भी शब्द का ग्रहण होता है, अतः व्यञ्जक से समानाधिकरण हो कर उस समान देश का ग्रहण नहीं हो सकता । काष्ठछेदनकाल में परशुदारुसंयोग की निवृत्ति होनेपर भी दूरस्थ व्यक्ति को जैसे शब्द गृहीत होता है । व्यञ्जक के विना व्यङ्ग्य का ग्रहण नहीं हुआ करता । इसलिये यहाँ संयोग व्यञ्जक नहीं है । १. वेदानां नित्यत्वे शब्दप्रामाण्यप्रयोजकगुणविरहप्रयुक्ताप्रामाण्यसम्भवनिरासाय शब्दानित्यत्वप्रकरणमारभते सूत्रकारः ।
१४४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० भवति, तस्मान्न व्यञ्जकः संयोगः, उत्पादके तु संयोगे संयोगजाच्छब्दाच्छब्द- सन्ताने सति श्रोत्रप्रत्यासन्नस्य ग्रहणम्-इति युक्तं संयोगनिवृत्तौ शब्दस्य ग्रहणमिति । इतश्च शब्द उत्पद्यते, नाभिव्यज्यते; कृतकवदुपचारात् । तीव्रं मन्दमिति कृतकमुपचर्यते = तीव्रं सुखं मन्दं सुखम्, तीव्रं दुःखं मन्दं दुःखमिति; उपचर्यते च तीव्रः शब्दः, मन्दः शब्द इति । व्यञ्जकस्य तथाभावाद् ग्रहणस्य तीव्रमन्दता रूपवदिति चेद् ? न; अभि- भवोपपत्तेः । संयोगस्य व्यञ्जकस्य तीव्रमन्दतया, शब्दग्रहणस्य तीव्रमन्दता भवति, न तु शब्दो भिद्यते; यथा—प्रकाशस्य तीव्रमन्दतया रूपग्रहणस्येति ? तच्च नैवम्; अभिभवोपपत्तेः । तीव्रो भेरीशब्दो मन्दं तन्त्रीशब्दमभिभवति, न मन्दः । न च शब्दग्रहणमभिभावकम्, शब्दश्च न भिद्यते । शब्दे तु भिद्यमाने युक्तोऽभिभवः । तस्मादुत्पद्यते शब्दो नाभिव्यज्यत इति । अभिभवानुपपत्तिश्च, व्यञ्जकसमानदेशस्याभिव्यक्तौ प्राप्त्यभावात् । 'व्यञ्जकेन समानदेशोऽभिव्यज्यते शब्दः' इत्येतस्मिन् पक्षे नोपपद्यतेऽभिभवः; न संयोग को उत्पादक मानने पर संयोगज शब्द से शब्दधारा सन्तान के उत्पत्ति-क्रम से श्रोत्रप्रत्यासन्न शब्द का ग्रहण होता है, अतः संयोग की निवृत्ति होने पर शब्द का ग्रहण उपपन्न ही है । इस कारण भी शब्द अनित्य है कि वह उत्पन्न होता है, अभिव्यक्त नहीं होता । यतः अनित्य में तीव्रता या मन्दता का आरोप किया जाता है । जैसे सुख में तीव्रतादि का आरोप करके 'सुख तीव्र है, मन्द है', 'दुःख तीव्र है, मन्द है' कहा जाता है, उसी प्रकार 'शब्द तीव्र है, मन्द है'—ऐसा उपचार होता है । यदि कहें कि व्यञ्जक के वैसा होने से तीव्रतादि का ग्रहण होता है, रूप की तरह ? यह नहीं कह सकते; क्योंकि शब्द स्वाभिर्भाव से दूसरे आविर्भूत शब्द को दबाता है । तात्पर्य यह है—यदि कहो कि व्यञ्जक संयोग की तीव्रता-मन्दता से शब्द का ग्रहण होने से उसमें तीव्रता-मन्दता होती है, शब्द भिन्न नहीं होता; जैसे—प्रकाश की तीव्रता- मन्दता से रूप का ग्रहण होता है ? यह नहीं कह सकते; क्योंकि तीव्र भेरीशब्द मन्द वीणाशब्द को दवा देता है, न कि मन्द तीव्र को । शब्दज्ञान यहाँ अभिभावक नहीं है; और शब्द आपके मत में भिन्न नहीं होता । हाँ ! शब्द यदि भिन्न हो तब तो वैसा अभि- भव युक्त है। इसलिये यह स्थिर हुआ कि शब्द उत्पन्न होता है, अभिव्यक्त नहीं होता । अभिभव अनुपपन्न भी होने लगेगा; क्योंकि व्यञ्जक समानदेशवाले शब्द की प्राप्ति अन्यदीय शब्द की अभिव्यक्ति के समय उपपन्न नहीं है । तात्पर्य यह है कि 'व्यञ्जक से समानदेशस्थ शब्द अभिव्यक्त होता है'—इस मत में अभिभव उपपन्न नहीं होता; क्योंकि भेरीशब्द से तन्त्रीशब्द का संयोग तो हुआ नहीं । अर्थात् भेरीसंयोग तन्त्री से नहीं है ।
१४. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४५
१४. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४५ हि भेरीशब्देन तन्त्रीस्वनः प्राप्त इति । अप्राप्तेऽभिभव इति चेत् ? शब्दमात्राभिभवप्रसङ्गः । अथ मन्येत-असत्यां प्राप्तावभिभवो भवतीति ? एवं सति यथा भेरीशब्दः कञ्चित्तन्त्रीस्वनमभिभवति, एवमन्तिकस्थोपादानमिव दवीयःस्थोपादानानपि तन्त्रीस्वनानभिभवेद्; अप्राप्ते- रविशेषात् । तत्र क्वचिदेव भेर्यां प्रणादितायां सर्वलोकेषु समानकालास्तन्त्रीस्वना न श्रूयेरन्निति । नानाभूतेषु शब्दसन्तानेषु सत्सु श्रोत्रप्रत्यासत्तिभावेन कस्यचिच्छ- ब्दस्य तीव्रेण मन्दस्याभिभवो युक्त इति । कः पुनरयमभिभवो नाम ? ग्राह्य- समानजातीयग्रहणकृतमग्रहणम् = अभिभवः । यथा-उल्काप्रकाशस्य ग्रहणार्ह- स्यादित्यप्रकाशेनेति ॥ १३ ॥ न; घटाभावसामान्यनित्यत्वान्नित्येष्वप्यनित्यवदुपचाराच्च ? ॥ १४ ॥ न खलु आदिमत्त्वादनित्यः शब्दः । कस्माद् ? व्यभिचारात् । आदिमतः खलु घटाभावस्य दृष्टं नित्यत्वम् । कथमादिमान् ? कारणविभागेभ्यो हि घटो न भवति । कथमस्य नित्यत्वम् ? योऽसौ कारणविभागेभ्यो न भवति, न तस्याभावो भावेन कदाचिन्निवर्त्यत इति । यदि संयोग न होने पर भी अभिभव मानोगे तो शब्दमात्र का अभिभव होने लगेगा । मतलब यह है कि 'संयोग न होने पर अभिभव होता है'—ऐसा मानोगे तो ऐसी स्थिति में जैसे भेरीशब्द समीपस्थ वीणा शब्द को अभिभूत कर देता है, वैसे ही समीपस्थ अभिभव की तरह बहुत दूर के वीणाशब्द को अभिभूत करने लगेगा; क्योंकि संयोग की अप्राप्ति दोनों जगह समान है । तब कहीं एक भेरी के बजते ही उस समय संसार में सभी जगह के वीणाशब्द अभिभूत होने लगेंगे ! उचित तो यह है कि नाना प्रकार के शब्दसन्तानों के रहते श्रोत्र के सन्निकर्ष में किसी शब्द के तीव्र होने पर मन्द शब्द अभिभूत हो जाता है । यह 'अभिभव' क्या चीज है ? ग्रहण करने योग्य वस्तु के सजातीय ग्रहण से कृत अग्रहण ही 'अभिभव' कहलाता है । जैसे ग्रहणयोग्य उल्काप्रकाश का सूर्य के प्रकाश से अभिभव (अग्रहण) हो जाता है ॥ १३ ॥ [ गत सूत्र में दिखाये गये हेतुओं में व्यभिचार दिखाते हैं—] घटाभावसामान्य के नित्य होने से तथा नित्य में अनित्यवद् आरोप से (वे तीनों हेतु शब्द का अनित्यत्व सिद्ध नहीं कर सकते ?) ॥ १४ ॥ आदि(कारण)मान् होने से शब्द अनित्य है—ऐसा नहीं है; क्योंकि वह हेतु व्यभिचरित है । आदिमान् घटाभाव का नित्यत्व देखा गया है । आदिमान् कैसे है ? क्योंकि कारणों का विभाग हो जाने पर घट नहीं रहता । नित्य कैसे है ? कारणों के विभक्त होने पर जो नहीं होता, उसका अभाव किसी भी सत्ता से कभी निवृत्त नहीं हो सकता । न्या० द०
१४६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० यदप्यैन्द्रियकत्वादिति ? तदपि व्यभिचरति—ऐन्द्रियकं च सामान्यं नित्यं चेति । यदपि कृतकवदुपचारादिति ? एतदपि व्यभिचरति—नित्येष्वनित्यवदुपचारो दृष्टः। यथा हि—भवति वृक्षस्य प्रदेशः, कम्बलस्य प्रदेशः, एवमाकाशस्य प्रदेशः, आत्मनः प्रदेश इति भवतीति ? ॥ १४ ॥ तत्त्वभाक्तयोर्नानात्वविभागादव्यभिचारः ॥ १५ ॥ नित्यमित्यत्र किं तावत्तत्त्वम् ? अर्थान्तरस्यानुत्पत्तिधर्मकस्याऽऽत्महाना- नुपपत्तिर्नित्यत्वम् । तच्चाभावे नोपपद्यते, भाक्तं तु भवति यत्तत्रात्मानमहासीद्यद् भूत्वा न भवति, न जातु तत्पुनर्भवति; तत्र नित्य इव नित्यो घटाभाव इत्ययं पदार्थ इति । तत्र यथाजातीयकः शब्दः न तथाजातीयकं कार्यं किञ्चिन्नित्यं दृश्यत इत्यव्यभिचारः ॥ १५ ॥ यदपि सामान्यनित्यत्वादिति ? इन्द्रियप्रत्यासत्तिग्राह्यमैन्द्रियकमिति— सन्तानानुमानविशेषात् ॥ १६ ॥ नित्येष्वव्यभिचार इति प्रकृतम् । नेन्द्रियग्रहणसामर्थ्याच्छब्दस्यानित्यत्वम्, ऐन्द्रियकत्व हेतु भी व्यभिचारी है; क्योंकि वह ऐन्द्रियक सामान्य है, वह नित्य देखा गया है, अतः आदिमत्त्व हेतु की तरह व्यभिचारी है । कृतकवदुपचार हेतु भी अनित्य है; क्योंकि नित्यों में भी अनित्यत्व का उपचार देखा गया है, जैसे—'कम्बल का प्रदेश' (प्रान्त भाग), 'वृक्ष का प्रदेश'—ऐसा बोलते हैं; वैसे ही 'आकाश का प्रदेश' (प्रान्त भाग) 'आत्मा का प्रदेश'—यह भी बोला जाता है । अतः यह हेतु भी अनित्य है ? ॥ १४ ॥ तत्त्व तथा भाक्त में नानात्वरूप विभाग है, अतः उन हेतुओं में व्यभिचार नहीं है ॥ १५ ॥ नित्य से आपका क्या मतलब है ? जिस अनुत्पत्तिधर्मा अर्थान्तर की आत्महानि न हो उसे हम 'नित्य' कहते हैं । नित्यत्व घटाद्यभाव में नहीं बनता, हाँ, भाक्तप्रयोग बन सकता है । जिसने अपने को ध्वस्त कर दिया है, जो होकर नहीं होता, वह कभी नहीं हो सकता—इसलिये यों 'नित्य' की तरह होने से नित्य घटाभाव का प्रयोग होता है । परन्तु जैसी जाति का शब्द है वैसी जाति का कार्य कहीं नित्य नहीं देखा जाता, अतः कृतकवदुपचार हेतु भी व्यभिचारी नहीं है ॥ १५ ॥ तथा वह जो 'ऐन्द्रियकत्व' हेतु सामान्य में नित्यत्व का व्यभिचार बताया था ? वह भी नहीं बनता; क्योंकि ऐन्द्रियक हेतु के— सन्तानानुमान का विशेषण होने से ॥ १६ ॥ नित्यत्व में अव्यभिचार है । हम यह नहीं कहते कि इन्द्रियग्रहणसामर्थ्य से शब्द में
१७. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४७
१७. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४७ किं तर्हि ? इन्द्रियप्रत्यासत्तिग्राह्यत्वात् सन्तानानुमानं तेनानित्यत्वमिति ॥ १६ ॥ यदपि नित्येष्वप्यनित्यवदुपचारादिति ? न; कारणद्रव्यस्य प्रदेशशब्देनाभिधानात् ॥ १७ ॥ नित्येष्वप्यव्यभिचार इति । एवमाकाशप्रदेशः, आत्मप्रदेश इति नात्राकाशात्मनोः कारणद्रव्यमभिधीयते, यथा कृतकस्य । कथं ह्यविद्यमानमभिधीयते, अविद्यमानता च ? प्रमाणतोऽनु- पलब्धेः । किं तर्हि तत्राभिधीयते ? संयोगस्याव्याप्यवृत्तित्वम् । परिच्छिन्नेन द्रव्येणाकाशस्य संयोगो नाकाशं व्याप्नोति अव्याप्य वर्त्तत इति, तदस्य कृतकेन द्रव्येण सामान्यम् । न ह्यामलकयोः संयोग आश्रयं व्याप्नोति । सामान्यकृता च भक्तिः-आकाशस्य प्रदेश इति । अनेनात्मप्रदेशो व्याख्यातः । संयोगवच्च शब्दबुद्ध्यादीनामव्याप्यवृत्तित्वमिति । परीक्षिता च तीव्र- मन्दता शब्दतत्त्वं न भक्तिकृतेति । कस्मात् पुनः सूत्रकारस्यास्मिन्नर्थे सूत्रं न श्रूयते इति ? शीलमिदं भगवतः सूत्रकारस्य—बहुष्वधिकरणेषु द्वौ पक्षौ न व्यवस्थापयति, तत्र शास्त्रसिद्धान्तातत्त्वावधारणं प्रतिपत्तुमर्हतीति मन्यते । अनित्यत्व है, अपितु इन्द्रियसामीप्य होने पर ग्राह्य होने के कारण शब्द का सन्ताना- नुमान है, अतः उसमें अनित्यत्व है ॥ १६ ॥ पूर्वपक्षी ने जो नित्यों में अनित्यवदुपचार बताया था ? वह भी नहीं बनता; क्योंकि— कारणद्रव्य का प्रदेशशब्द द्वारा अभिधान होने से ॥ १७ ॥ नित्यों में व्यभिचार नहीं बनता । आकाशप्रदेश, आत्मप्रदेश—आदि में आत्मा या आकाश का कारणद्रव्य नहीं कहा जाता, जैसे अनित्य वृक्षादि में पदार्थों का कहा जाता है । वहाँ अविद्यमान का क्या अभिधान करते हो, अविद्यमान की तो प्रमाण से उपलब्धि नहीं हो पाती ? वहाँ केवल संयोग का अव्याप्यवृत्तित्व अभिहित है । परिच्छिन्न द्रव्य से आकाश का संयोग है, वह आकाश को व्याप्त करके नहीं रहता, अपितु अव्याप्त होकर रहता है । यह बात अनित्य द्रव्य के समान है, जैसे—दो आमलकों का संयोग अपने आश्रय को व्याप्त करके नहीं रहता, अतः यह—'आकाश का प्रदेश' यह सामान्य सामान्यप्रयुक्त भाक्त प्रयोग है । इससे 'आत्मप्रदेश' शब्द का व्याख्यान भी समझ लें । शब्द, बुद्धि, सुख-आदि की तरह संयोगवत्त्व अव्याप्यवृत्ति है । यो, शब्द की तीव्रता- मन्दता के बारे में निर्णय कर दिया गया, उसे पूर्वपक्षी 'आकाशप्रदेश' की तरह भाक्त नहीं कह सकता । फिर सूत्रकार ने इस अर्थ को स्पष्ट करने के लिए कोई सूत्र क्यों न बनाया ? यह भगवान् सूत्रकार का बडप्पन है कि वे कई विषयों में जानबूझ कर दो पक्ष का उत्थान नहीं करते । वहाँ वे समझते हैं कि जिज्ञासु शिष्य शास्त्र-सिद्धान्तों के सहारे
१४८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अं० २. आ० शास्त्रसिद्धान्तस्तु न्यायसमाख्यातमनुमतं बहुशाखमनुमानमिति ॥ १७ ॥ अथापि खलु 'इदमस्ति इदं नास्ति' इति कुत एतत्प्रतिपत्तव्यमिति ? प्रमाणत उपलब्धेः, अनुपलब्धेश्चेति । अविद्यमानस्तर्हि शब्दः— प्रागुच्चारणादनुपलब्धेरावरणाद्यनुपलब्धेश्च ॥ १८ ॥ प्रागुच्चारणान्नास्ति शब्दः, कस्मात् ? अनुपलब्धेः । सतोऽनुपलब्धिरावणा- दिभ्यः ? एतन्नोपपद्यते, कस्माद् ? आवरणादीनामनुपलब्धिकारणानामग्रहणात् । अनेनावृत्तः शब्दो नोपलभ्यते, असन्निकृष्टश्चेन्द्रियव्यवधानाद्वा—इत्येवमादि अनुपलब्धिकारणं न गृह्यत इति । सोऽयमनुच्चारितो नास्तीति । उच्चारणमस्य व्यञ्जकम्, तदभावात्प्रागुच्चारणादनुपलब्धिरिति ? कमि- दमुच्चारणं नामेति ? विवक्षाजनितेन प्रयत्नेन कोष्ठ्यस्य वायोः प्रेरितस्य कण्ठताल्वादिप्रतिघातः, यथास्थानं प्रतिघाताद्वर्णाभिव्यक्तिरिति । संयोगविशेषो वै प्रतिघातः प्रतिषिद्धं च संयोगस्य व्यञ्जकत्वम्, तस्मान्न व्यञ्जकाभावाद- ग्रहणम्, अपि त्वभावादेवेति । से अन्यतर पक्ष में तत्त्वनिर्णय जान सकता है । शास्त्र-सिद्धान्त से उनका तात्पर्य है— न्यायशास्त्र में कथित, उन के (सूत्रकार) द्वारा अनुमोदित अनेक प्रकार के अनुमान ॥ १७ ॥ तो भी 'यह है, यह नहीं है' इसके जानने का क्या उपाय है ? प्रमाणों द्वारा उप- लब्धि या अनुपलब्धि न होने से उक्त उभय कोटियाँ जानी जा सकती हैं । अतः शब्द अविद्यमान हैं ? उच्चारण से पूर्व अनुपलब्धि होने से, तथा आवरणादिकों की अनुपलब्धि माने जाने से (वह शब्द अनित्य है) ॥ १८ ॥ उच्चारण से पूर्व शब्द नहीं होता; क्योंकि उस समय उसकी उपलब्धि दिखायी नहीं देती । यदि यह कहें कि आवरणादि के कारण, होता हुआ शब्द भी अनुपलब्ध रहता है ? तो यह नहीं बनता; क्योंकि उस समय आवरणादि को अनुपलब्धि के कारणरूप में नहीं देखते ! जैसे 'शब्द इस आवरण से आवृत है, अतः उसकी उपलब्धि नहीं हो रही है, या तो वह सन्निकृष्ट नहीं है'—ऐसा अनुपलब्धिकारण भी प्रमाण से गृहीत नहीं होता । अतः अनुच्चारित अवस्था में शब्द नहीं है—यही मानना चाहिये । 'उच्चारण शब्द का व्यञ्जक है, उसके न होने से उस समय उपलब्धि नहीं हो पाती' ऐसा मान लें ? तो हम पूछते हैं यह 'उच्चारण' क्या है ? विवक्षाजनित प्रयत्न से उदरस्थ वायु का कण्ठ ताल्वादि में आकर टकराना । यह टक्कर एक प्रकार का संयोग ही है, और संयोग के व्यञ्जकत्व का हम पीछे खण्डन कर चुके । इसलिये 'व्यञ्जक न होने से उस समय शब्द की उपलब्धि नहीं होती'—ऐसा नहीं, अपितु 'उस शब्द के अभाव से उस समय. उसकी उपलब्धि नहीं होती'—यही मानना चाहिये । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१९ सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४९
१९ सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४९ सोऽयमुच्चार्यमाणः श्रूयते, श्रूयमाणश्चाभूत्वा भवतीति अनुमीयते । ऊर्ध्वं चोच्चारणान्न श्रूयते-स भूत्वा न भवति, अभावान्न श्रूयत इति । कथम् ? आवर- णाद्यनुपलब्धेरित्युक्तम् । तस्मादुत्पत्तितिरोभावधर्मकः शब्द इति ॥ १८ ॥ एवं च सति तत्त्वं पांशुभिरिवावाकिरन्निदमाह— तदनुपलब्धेरनुपलम्भादावरणोपपत्तिः ? ॥ १९ ॥ यद्यनुपलम्भादावरणं नास्ति, आवरणानुपलब्धिरपि तर्ह्यनुपलम्भान्नास्तीति तस्या अभावादप्रतिषिद्धमावरणमिति ? कथं पुनर्जानीते भवान्-नावरणानुप- लब्धिरुपलभ्यत इति ? किमत्र ज्ञेयं प्रत्यात्मवेदनीयत्वात् समानम् ! अयं खल्वा- वरणमनुपलभमानः प्रत्यात्ममेव संवेदयते—'नावरणमुपलभे' इति, यथा कुड्ये- नावृतस्यावरणमुपलभमानः प्रत्यात्ममेव संवेदयते, सेयमावरणोपलब्धिवदावरणा- नुपलब्धिरपि संवेद्यैवेति । एवं च सत्यपह्नुतविषयमुत्तरवाक्यमस्तीति ॥ १९ ॥ अभ्यनुज्ञावादेन तूच्यते जातिवादिना— 'यह शब्द उच्चरित होता हुआ सुनायी देता है, सुनायी देता हुआ पहले न होकर होता है'—ऐसा उसके विषय में अनुमान होता है । इसी प्रकार उच्चारण के बाद वह सुनायी नहीं देता, अतः 'वह हो कर नहीं होता है—यों, अभाव होने से नहीं सुनायी देता'—ऐसा अनुमान होता है । वह कैसे ? आवरणादि की वहाँ (अनुच्चारणकाल में) उपलब्धि न होने से, यह बात अभी हम पीछे कह चुके हैं । अतः शब्द उत्पत्ति-विनाश- धर्मा है—यह सिद्धान्त स्थिर हुआ ॥ १८ ॥ सच्चाई पर धूल डाल कर बात कुछ उलझाता हुआ-सा पूर्वपक्षी फिर शंका करता है— उसकी अनुपलब्धि का ग्रहण न होने से आवरण की उपपत्ति हो सकती है ? ॥ १९ ॥ यदि आवरणकारणों के अनुपलब्भ से आवरण न होना मानते हो, तो अनुपलब्भ से आवरणानुपलब्धि भी नहीं माननी पड़ेगी, उसके अभाव में आवरण का प्रतिषेध कैसे होगा ? भाष्यकार पूछते हैं—आप कैसे जानते हैं कि आवरणानुपलब्धि उपलब्ध नहीं होती ? इसमें जानना क्या है, दोनों के ही प्रत्यात्मवेदनीय होने से बात बराबर है ! यह आवरण को उपलब्ध न करता हुआ मन से यह समझ लेता है कि 'आवरण को नहीं प्राप्त कर पा रहा हूँ', जैसे दीवाल से व्यवहित आवरण के उपलब्ध होते हुए के बारे में मन से जान लेता है । उसी तरह आवरणानुपलब्धि का भी संवेदन स्वीकार करते ही हो, ऐसी स्थिति में आपका (जातिवादी का) उत्तर निःसार हो गया ? ॥ १९ ॥ जातिवादी अभ्यनुज्ञावाद (हठात् स्वीकृत पक्ष) से फिर कहता है—
१५० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० अनुपलब्भादप्यनुपलब्धिसद्भावान्नावरणानुपपत्तिरनुपलम्भात् ? ॥ २० ॥ यथाऽनुपलभ्यमानाप्यावरणानुपलब्धिरस्ति, एवमनुपलभ्यमानमप्यावरण- मस्तीति । यद्यभ्यनुजानाति भवान्—अनुपलभ्यमानावराणानुपलब्धिरस्तीति, अभ्यनुज्ञाय च वदति—नास्त्यावरणमनुपलम्भादित्येतद् । एतस्मिन्नप्यभ्यनुज्ञावादे प्रतिपत्तिनियमो नोपपद्यत इति ? ॥ २० ॥ अनुपलब्भात्मकत्वादनुपलब्धेरहेतुः ॥ २१ ॥ यदुपलभ्यते तदस्ति, यन्नोपलभ्यते तन्नास्ति, इति अनुपलब्भात्मकमस- दिति व्यवस्थितम् । उपलब्ध्याभावश्च—अनुपलब्धिरिति । सेयमभावत्वान्नोप- लभ्यते । सच्च खल्वावरणम् तस्योपलब्ध्या भवितव्यम्, न चोपलभ्यते, तस्मान्ना- स्तीति । तत्र यदुक्तम्—‘नावरणानुपपत्तिरनुपलम्भात्’ इति अयुक्तमिति ॥ २१ ॥ अथ शब्दस्य नित्यत्वं प्रतिजानानः कस्माद्धेतोः प्रतिजानीते ? अस्पर्शत्वात् ? ॥ २२ ॥ अस्पर्शमाकाशं नित्यं दृष्टमिति, तथा च शब्द इति ? ॥ २२ ॥ सोऽयमुभयतः सव्यभिचारः—स्पर्शवांश्चाणुर्नित्यः, अस्पर्शं च कर्मानित्यं अनुपलब्भ से अनुपलब्धि होने के कारण आवरणानुपलब्धि अनुपलब्भ से नहीं मान सकते ? ॥ २० ॥ जैसे आवरणानुपलब्धि अनुपलभ्यमान होते हुए भी है, वैसे ही आवरण होते हुए भी वह अनुपलभ्यमान भी है ? हमारा मतलब है कि यदि आप यह स्वीकार करते हैं कि अनुपलम्यमान भी आवरणत्वानुपलब्धि हैं, तो यह स्वीकार करके ही आप यह भी कहते हैं कि—अनुपलम्भ से आवरण नहीं है, तो इस अभ्यनुज्ञावाद का प्रतिपादन ठीक नहीं हुआ ? ॥ २० ॥ अनुपलब्भात्मक होने से अनुपलब्धि का वह अहेतु है ॥ २१ ॥ जो उपलब्ध है वह है, जो उपलब्ध नहीं है वह नहीं है, तो अनुपलब्भात्मक द्रव्य असत् है—यह निश्चित हो गया । उपलब्ध्याभाव को अनुपलब्धि कहते हैं । यह अभाव के कारण उपलब्ध नहीं होता । सत् आवरण है । वह होता तो उसकी उपलब्धि होती; वह उपलब्ध नहीं हैं, अतः वह नहीं है । ऐसी स्थिति में, तुम्हारा ‘अनुपलम्भ से आवरण की अनुपपत्ति नहीं होती’—यह कथन ही अयुक्त है, हमारा पक्ष नहीं ॥ २१ ॥ शब्द की नित्यता किस हेतु से प्रतिज्ञात करते हो ? क्या अस्पर्शवत्त्व होने से ? ॥ २२ ॥ अस्पर्शवान् आकाश नित्य देखा गया है, उसी तरह का यह शब्द है ? ॥ २२ ॥ अन्वय-व्यतिरेक से शब्द के नित्यत्व में अस्पर्शवत्त्व हेतु व्यभिचारी है; क्योंकि
२७. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् '१५१
२७. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् '१५१ दृष्टम् । अस्पर्शत्वादित्येतस्य साध्यसाधर्म्येणोदाहरणम् ?— न; कर्मानित्यत्वात् ॥ २३ ॥ अयं तर्हि हेतुः साध्यवैधर्म्येणोदाहरणम् ? न; अणुनित्यत्वात् ॥ २४ ॥ उभयस्मिन्नुदाहरणे व्यभिचारान्न हेतुः ॥ २४ ॥ अयं तर्हि हेतुः— सम्प्रदानात् ? ॥ २५ ॥ सम्प्रदीयमानमवस्थितं दृष्टम्, सम्प्रदीयते च शब्द आचार्येणान्तेवा , तस्मादवस्थित इति ? ॥ २५ ॥ तदन्तरालानुपलब्धेरहेतुः ॥ २६ ॥ येन सम्प्रदीयते तस्मै च, तयोरन्तरालेऽवस्थानमस्य केन लिङ्गेनो- पलभ्यते ? सम्प्रदीयमानो ह्यवस्थितः सम्प्रदातुरपैति, सम्प्रदानं च प्राप्नोति- इत्यवर्जनीयमेतत् ॥ २६ ॥ अध्यापनादप्रतिषेधः ? ॥ २७ ॥ स्पर्शवान् अणु नित्य तथा अस्पर्शवान् कर्म अनित्य देखा गया है। अस्पर्शवत्त्व इस हेतु का साध्यसाधर्म्य से उदाहरण है ? नहीं; कर्म का अनित्यत्व देखा जाने से ॥ २३ ॥ तो यह साध्यवैधर्म्य से उदाहरण हेतु है ? नहीं; अणु का नित्यत्व देखा जाने से ॥ २४ ॥ दोनों ही उदाहरणों में व्यभिचार देखा जाने से 'अस्पर्शत्व' नित्यत्व में हेतु नहीं है ॥ २४ ॥ तो यह हेतु मान लें— सम्प्रदान से ? ॥ २५ ॥ सम्प्रदीयमान स्थिर देखा गया है, शब्द का भी आचार्य द्वारा छात्र को सम्प्रदान होता है, अतः यह स्थिर ( नित्य ) है ? ॥ २५ ॥ यह सम्प्रदान हेतु नहीं बन सकता; क्योंकि तदन्तराल की उपलब्धि नहीं होती ॥ २६ ॥ जिसके द्वारा जिसके लिये सम्प्रदान किया जाता है, उन दोनों के मध्य में इसका अवस्थान किस ज्ञापक हेतु से सिद्ध करोगे ? क्योंकि सम्प्रदीयमान पूर्वसिद्ध वस्तु दाता से दूर होकर सम्प्रदान को प्राप्त करती है। यह अपरिहार्य है। शिष्य सम्प्रदान नहीं है। ॥ २६ ॥ अध्यापन हेतु से सम्प्रदानत्व ज्ञापित हो सकता है ? ॥ २७ ॥
१५२ · वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [२. अ० २. आ० अध्यापनं लिङ्गम्; असति सम्प्रदानेऽध्यापनं न स्यादिति ॥ २७ ॥ उभयोः पक्षयोरन्यतरस्याध्यापनादप्रतिषेधः ? ॥ २८ ॥ समानमध्यापनमुभयोः पक्षयोः, संशयानिवृत्तेः—किमाचार्यस्थः शब्दोऽन्तेवा- सिनमापद्यते तदध्यापनम् ? आहोस्विन्नृत्योपदेशवद् गृहीतस्यानुकरणमध्याप- नमिति ? एवमध्यापनमलिङ्गं सम्प्रदानस्येति ॥ २८ ॥ अयं तर्हि हेतुः— अभ्यासात् ? ॥ २९ ॥ अभ्यस्यमानमवस्थितं दृष्टम् । 'पञ्चकृत्वः पश्यति' इति रूपमवस्थितं पुनः पुनर्द्दश्यते । भवति च शब्देऽभ्यासः—दशकृत्वोऽधीतोऽनुवाकः, विंशतिकृत्वोऽधीत इति । तस्मादवस्थितस्य पुनः पुनरुच्चारणमभ्यास इति ॥ २९ ॥ नान्यत्वेऽप्यभ्यासस्योपचारात् ॥ ३० ॥ अनवस्थानेऽप्यभ्यासस्याभिधानं भवति-द्विर्नृत्यतु भवान्, त्रिर्नृत्यतु भवान् शिष्य के सम्प्रदानत्व में अध्यापन ही लिंग है; क्योंकि सम्प्रदान के न होने पर अध्यापन कैसा बनेगा ? ॥ २७ ॥ दोनों ही पक्षों में अध्यापन से, सम्प्रदान में हेतुत्व सिद्ध नहीं किया जा सकता ॥ २८ ॥ अध्यापन में दोनों ( गुरु तथा छात्र ) ही पक्षों के तुल्य होने से इस हेतु की संशय- ग्रस्तता के कारण सम्प्रदानत्व सिद्ध नहीं किया जा सकता । आप अध्यापन किसे मानते हैं—क्या आचार्यस्थ शब्द शिष्य के पास जाता है, वह अध्यापन है ? या नृत्योपदेश में गृहीत के अनुकरण की तरह अध्यापन है ? (दोनों ही अवस्थाओं में स्थिरत्व नहीं बना, ) अतः अध्यापन से सम्प्रदानत्व सिद्ध नहीं किया जा सकता । ( उसके सिद्ध न होने पर शब्द की नित्यता फिर अहेतुक रह गयी । ) ॥ २८ ॥ तो फिर, इसे हेतु मान लें— अभ्यास से ? ॥ २९ ॥ अभ्यस्यमान ( आवृत्तियोग्य ) पदार्थ स्थिर देखा गया है, जैसे—'पांच बार देखता हैं' । जो रूप स्थिर है वही बार बार दिखायी दे सकता है । शब्द में भी अभ्यास देखा गया है, जैसे—'अनुवाक दस बार पढ़ा गया, बीस बार पढ़ा गया' । यहाँ स्थित ( नित्य ) शब्द के बार-बार उच्चारण को ही अभ्यास कहते हैं ? ॥ २९ ॥ नहीं; अस्थिरत्व मनाने पर भी उसमें औपचारिक अभ्यास बन सकता है ॥ ३० ॥ अन्य = अनवस्थित (अस्थिर = अनित्य) में भी अभ्यास हो सकता है, जैसे—'आप १. अस्य भाष्यत्वमेव केचिद् वदन्ति ।
३२. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १५३
३२. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १५३ इति; द्विरनृत्यत्, त्रिरनृत्यद्; द्विरग्निहोत्रं जुहोति, द्विर्भुङ्क्ते ॥ ३० ॥ एवं व्यभिचारात्, प्रतिषिद्धहेतावन्यशब्दस्य प्रयोगः प्रतिषिध्यते— अन्यदन्यस्मादनन्यत्वादनन्यदित्यन्यताऽभावः ? ॥ ३१ ॥ यदिदमन्यदिति मन्यसे, तत् स्वार्थेनानन्यत्वाद् अन्यन्न भवति, एवमन्यताया अभावः। तत्र यदुक्तम्-‘अन्यत्वेऽप्यभ्यासोपचारात्' इति, एतदयुक्तमिति? ॥३१॥ शब्दप्रयोगं प्रतिषेधतः शब्दान्तरप्रयोगः प्रतिषिध्यते— तदभावे नास्त्यनन्यता, तयोरितरेतरापेक्षासिद्धेः ॥ ३२ ॥ अन्यस्यानन्यतामुपपादयति भवान्, उपपाद्य चान्यत् प्रत्याचष्टे, अनन्यदिति च शब्दमनुजानाति, प्रयुंक्ते चानन्यदिति। एतत् समासपदम्, अन्यशब्दोऽयं प्रतिषेधेन सह समस्यते । यदि चात्रोत्तरं पदं नास्ति कस्यायं प्रतिषेधेन सह समासः ? तस्मात्तयोरनन्यान्यशब्दयोरितरोऽनन्यशब्द इतरमन्यशब्दमपेक्षमाणः दो वार नृत्य कीजिये, तीन वार नृत्य कीजिये !' 'वह दो वार नाचा' 'तीन वार नाचा', ‘दो वार अग्निहोत्र करता है’ ‘दो वार खाता है’ । ( इस प्रकार अस्थिर में भी अभ्यास देखा जाता है ) ॥ ३० ॥ शङ्का—इस प्रकार व्यभिचार दोष दिखाकर हेतु ( सम्प्रदान तथा अभ्यास ) का प्रतिषेध कर देने पर, ‘अन्य’ शब्द का भी प्रतिषेध किया जा सकता है— यह ‘अन्य’ दूसरे से अनन्य होने से अनन्य ही है, अतः अन्यता नहीं बन सकती ? ॥ ३१ ॥ जिसको 'अन्य' कह रहे हैं वह स्वार्थ से अनन्य हैं, अतः वह अन्य नहीं हो सकता; यों ( अन्य' न सिद्ध होने पर भी ) ‘अन्य में भी औपचारिक अभ्यास बन सकता है’ आप का यह कथन अयुक्तियुक्त है ? ॥ ३१ ॥ [ भाष्यकार कहते हैं कि वाक्छल से ] शब्द-प्रयोग का प्रतिषेध करने वाले पूर्व- पक्षी का यह शब्दान्तरप्रयोग के प्रतिषेध से उत्तर है— उस ‘अन्य’ के अभाव में अनन्यता भी कहां रहेगी ? क्योंकि उन दोनों की सिद्धि परस्परापेक्ष है ॥ ३२ ॥ आप अन्य की अनन्यता सिद्ध करना चाहते हैं, उसे सिद्ध करके ‘अन्य’ का प्रत्या- ख्यान करते हैं । ‘अनन्यत्’ शब्द को आप स्वीकार करते हैं, और उसका प्रयोग करते हैं । क्या आप नहीं जानते कि ‘अनन्यत्’ यह समस्त पद है ! यहाँ ‘अन्य’ शब्द प्रतिषेध ( नञ् ) के साथ समस्त है । यदि आपके मत में यहाँ उत्तरपद ( अन्य ) नहीं है तो
१५४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० सिद्धयतीति । तत्र यदुक्तम्-‘अन्यताया अभाव:’ इति, एतदयुक्तमिति ॥ ३२ ॥ अस्तु तर्हीदानीं शब्दस्य नित्यत्वम् ? विनाशकारणानुपलब्धेः ? ॥ ३३ ॥ यदनित्यं तस्य विनाशः कारणाद्भवति, यथा—लोष्टस्य कारणद्रव्यविभा- गात् । शब्दश्चेदनित्यः, तस्य विनाशो यस्मात् कारणाद्भवति तदुपलभ्येत, न चोपलभ्यते, तस्मान्नित्य इति ? ॥ ३३ ॥ अश्रवणकारणानुपलब्धेः सततश्रवणप्रसङ्गः ॥ ३४ ॥ यथा विनाशकारणानुपलब्धेरविनाशप्रसङ्गः, एवमश्रवणकारणानुपलब्धेः सततं श्रवणप्रसङ्गः । व्यञ्जकाभावादश्रवणमिति चेत् ? प्रतिषिद्धं व्यञ्जकम् । अथ विद्यमानस्य निर्निमित्तमश्रवणमिति विद्यमानस्य निर्निमित्तो विनाश इति । समानश्च दृष्टविरोधो निमित्तमन्तरेण विनाशे च, अश्रवणे चेति ॥ ३४ ॥ उपलभ्यमाने चानुपलब्धेरसत्त्वादनपदेशः ॥ ३५ ॥ अनुमानाच्चोपलभ्यमाने शब्दस्य विनाशकारणे विनाशकारणानुपलब्धेर- सत्त्वादित्यनपदेशः, यथा—यस्माद्विषाणी तस्मादश्व इति । किमनुमानमिति चेत् ? इस नञ् के साथ किसका समास होगा ? अतः उन दोनों 'अन्य' तथा 'अनन्य' शब्दों में से एक 'अनन्य' शब्द दूसरे 'अन्य' शब्द की अपेक्षा रखता हुआ सिद्ध हो जाता है। तब आपने जो 'अनन्यता' का अभाव बताया, वह अयुक्त है ॥ ३२ ॥ शङ्का—तो क्या अब शब्द का नित्यत्व मान लें— विनाशकारण की उपलब्धि न होने से ? ॥ ३३ ॥ जो अनित्य है, कारण से उसका विनाश होता है। जैसे—ढेले का विनाश उसके कारणद्रव्य के विभाग से । शब्द यदि अनित्य होता तो उसका विनाश जिस कारण से होता हो वह मिलता ! मिलता है नहीं, अतः शब्द नित्य है ? ॥ ३३ ॥ तब अश्रवणकारण की अनुपलब्धि से श्रवणनैरन्तर्य प्रसक्त होने लगेगा ! ॥ ३४ ॥ जैसे विनाशकारण की उपलब्धि न होने से शब्द का नित्यत्व मान रहे हो तब तो उसके अश्रवण कारण की उपलब्धि न होने से निरन्तर श्रवणप्रसक्ति होने लगेगी ! यदि 'व्यञ्जक न होने से श्रवण नहीं होता'—ऐसा कहोगे ? तो हम व्यञ्जक का पीछे निषेध कर आये । यदि विद्यमान का अकारण अश्रवण मानोगे ? तो विद्यमान का अकारण विनाश होने लगेगा । निमित्त के बिना विनाश तथा अश्रवण में दृष्टविरोध की समा- नता ही है ॥ ३४ ॥ उपलभ्यमान होने पर अनुपलब्धि न होने से वह अहेतु है ॥ ३५ ॥ शब्द का विनाशकारण अनुमान से उपलभ्यमान होने से उसकी अनुपलब्धि से नित्यत्व नहीं माना जा सकता । जैसे—'जिस कारण से विषाणी है उसी कारण से अश्व हैं'। अनुमान क्या है ? सन्तान (शब्दधारा) का उपपादन । शब्दसन्तान उपपादित है, जैसे
३५. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १५५
३५. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १५५ सन्तानोपपत्तिः । उपपादितः शब्दसन्तानः संयोगविभागजाच्छब्दाच्छब्दान्तरं ततोऽप्यन्यत्, ततोऽप्यन्यदिति । तत्र कार्यः शब्दः कारणशब्दमभिरुणद्धि¹ । ²प्रतिघातिद्रव्यसंयोगस्त्वन्त्यस्य शब्दस्य निरोधकः । दृष्टं हि तिरःप्रतिकुड्य- मन्तिकस्थेनाप्यश्रवणं शब्दस्य, श्रवणं दूरस्थेनाप्यसति व्यवधान इति । घण्टायामभिहन्यमानायां तारस्तारतरो मन्दो मन्दतर इति श्रुतिभेदान्नाना- शब्दसन्तानोऽविच्छेदेन श्रूयते, तत्र नित्ये शब्दे घण्टास्थमन्यगतं वाऽवस्थितं सन्तानवृत्ति वाऽभिव्यक्तिकारणं वाच्यम्, येन श्रुतिसन्तानो भवतीति । शब्दभेदे चासति श्रुतिभेद उपपादयितव्य इति । अनित्ये तु शब्दे घण्टास्थं सन्तानवृत्ति संयोगसहकारि निमित्तान्तरं संस्कारभूतं पटु मन्दमनुवर्तते, तस्यानुवृत्त्या शब्दसन्तानानुवृत्तिः, पटुमन्दभावाच्च तीव्रमन्दता शब्दस्य, तत्कृतश्च श्रुतिभेद इति ॥ ३५ ॥ न वै निमित्तान्तरं संस्कार उपलभ्यते, अनुपलब्धेर्नास्तीति ? संयोग-विभागज शब्द से शब्दान्तर, उससे अन्य तथा उससे अन्य—यों अनवस्था होने लगेगी ! (जव कि वास्तविकता यह है कि) कार्य (उत्तरोत्तर) शब्द कारण (पूर्व पूर्व) शब्द को रोक देता है । प्रतिघाती द्रव्य का संयोग अन्त्य शब्द का निरोधक है । लोक में यह देखा जाता है कि व्यवधानकारक दीवाल आदि से व्यवहित होने से समीप का शब्द भी सुनायी नहीं देता, तथा व्यवधान न हो तो दूर का शब्द भी सुनायी दे जाता है । घण्टा वजने पर, तीव्र से तीव्रतर तथा मन्द से मन्दतर—यों श्रवण-भेद से उसकी नाना शब्दसन्तति अविच्छिन्नतया (निरन्तर) सुनने में आती है । नित्य शब्द माने जाने पर, घण्टास्थित अन्यगत या अवस्थित सन्तानवृत्ति को अभिव्यक्ति कारण बताना पड़ेगा, जिससे वह श्रुति-सन्तान सिद्ध हो सके । शब्दभेद न मानने पर श्रुति-भेद का उपपादन करना पड़ेगा । शब्द को अनित्य मानने पर, घण्टास्थित निमित्तान्तर ही सन्तानवृत्ति संयोग के साथ रहने वाले हो कर संस्कार के रूप में तीव्र, मन्द का अनुवर्तन करते हैं । इस अनुवर्तन से शब्द की सन्तानानुवृत्ति, तथा तीव्रता या मन्दता से शब्द की तीव्रता मन्दता सिद्ध हो जायेंगी और श्रुतिभेद भी उपपन्न हो जायेंगे ॥ ३५ ॥ निमित्तान्तर संस्कार उपलब्ध नहीं होता तो साधक प्रमाण के अभाव में वह नहीं है—ऐसा मान लें ? १. निरुणद्धि-इति पाठ० । २. 'प्रतिघाति द्रव्यं कुडचादि तत्संयोगो नभसः । एतदुक्तं भवति—घनतरद्रव्यसंयुक्तं नभो न शब्दसमवायिकारणतां प्रतिपद्यते; ततश्च सन्नप्यसमवायिकारणं शब्दो न शब्दान्तरमारभते'—इति वाचस्पतिमिश्राः । न्यायकन्दलीकारास्तु—'प्रतिघातिद्रव्यमत्र शब्दकारणीभूतो वायुरेव' इति वदन्ति ।
१५६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० पाणिनिमित्तप्रश्लेषाच्छब्दाभावे नानुपलब्धिः ॥ ३६ ॥ पाणिकर्मणा पाणिघण्टाप्रश्लेषो भवति, तस्मिंश्च सति शब्दसन्तानो नोत्पद्यते१, अतः श्रवणानुपपत्तिः । तत्र प्रतिघातिद्रव्यसंयोगः शब्दस्य निमि- त्तान्तरं संस्कारभूतं निरुणद्धीत्यनुमीयते, तस्य च निरोधाच्छब्दसन्तानो नोत्पद्यते । अनुत्पत्तौ श्रुतिविच्छेदो यथा-प्रतिघातिद्रव्यसंयोगादिषोः क्रियाहेतौ संस्कारे निरुद्धे गमनाभाव इति । कम्पसन्तानस्य स्पर्शनैन्द्रियग्राह्यस्य चोपरमः । कांस्यपात्रादिषु पाणिसंश्लेषो लिङ्गं संस्कारसन्तानस्येति । तस्मान्निमित्तान्तर- स्य संस्कारभूतस्य नानुपलब्धिरिति ॥ ३६ ॥ विनाशकारणानुपलब्धेश्चावस्थाने तन्नित्यत्वप्रसङ्गः२ ॥ ३७ ॥ यदि यस्य विनाशकारणं नोपलभ्यते तदवतिष्ठते । अवस्थानाच्च तस्य नित्यत्वं प्रसज्यते । एवं यानि खल्विमानि शब्दश्रवणानि शब्दाभिव्यक्तय इति मतम्, न तेषां विनाशकारणं भवतोपपाद्यते, अनुपपादनादवस्थानम्, अव- स्थानात् तेषां नित्यत्वं प्रसज्यत इति । अथ नैवम्, न तर्हि विनाशकारणानुप- हाथ के कारण कम्पवारक संयोग द्वारा शब्द न होने से उपलब्धि नहीं होती ॥ ३६ ॥ पाणिक्रिया से पाणि-घण्टा संयोग होता है, उसके होने पर शब्दसन्तान उत्पन्न नहीं हो पाते, अतः श्रवण अनुपपन्न है । वहाँ 'प्रतिघाती द्रव्यसंयोग शब्द के निमित्तान्तर संस्कार को रोक देता हैं'—ऐसा अनुमान होता है; उसके निरोध से शब्दसन्तति उत्पन्न नहीं होती । उसके अनुत्पन्न होने पर श्रवण विच्छिन्न हो जायेगा; जैसे—प्रतिघाती द्रव्यसंयोग से बाण के क्रियाकारण संस्कार (वेग) के निरुद्ध होने पर वह आगे नहीं बढ़ता, स्पर्शनैन्द्रियग्राह्य कम्पसन्तान का उपरम हो जाता है । अतः कांस्यपात्रादि में पाणि का संयोग संस्कारसन्तान का साधक हेतु है । इसलिये कारणान्तर संस्कारभूत की उपलब्धि नहीं होती ॥ ३६ ॥ विनाशकारण की उपलब्धि न होने से उसे स्थिर मानना पड़ेगा, और उसमें नित्यत्व प्रसक्त होने लगेगा ॥ ३७ ॥ यदि किसी का विनाशकारण उपलब्ध नहीं होता है, वह स्थिर माना जाता है । स्थिर होने पर उसमें नित्यता माननी पड़ेगी । इस प्रकार 'यह शब्दश्रुति शब्दाभिव्यक्ति हैं', यह मानोगे तो आपने उनके विनाशकारण का उपपादन नहीं किया, उसके अनुप- पादन से उनमें स्थिरता (सत्ता) मानी जायेगी, स्थिरता से उनमें नित्यता प्रसक्त होगी । १. 'नोपलभ्यते' इति पाठ० । २. वृत्तिकृता न व्याख्यातमेतत्, अतो न सूत्रमिति केचित् ।
३९. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १५७
३९. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १५७ लब्धेः शब्दस्यावस्थानान्नित्यत्वमिति ॥ ३७ ॥ कम्पसमानाश्रयस्य चानुनादस्य पाणिप्रश्लेषात् कम्पवत् कारणोपरमा- दभावः; वैयधिकरण्ये हि प्रतिघातिद्रव्यप्रश्लेषात् समानाधिकरणस्यैवोपरमः स्यादिति ? अस्पर्शत्वादप्रतिषेधः ॥ ३८ ॥ यदिदं नाकाशगुणः शब्द इति प्रतिषिद्ध्यते, अयमनुपपन्नः प्रतिषेधः; अस्पर्शत्वाच्छब्दाश्रयस्य । रूपा दिसमानदेशस्याग्रहणे शब्दसन्तानोपपत्तेरस्पर्श- व्यापिद्रव्याश्रयः शब्द इति ज्ञायते, न च कम्पसमानाश्रय इति ॥ ३८ ॥ प्रतिद्रव्यं रूपादिभिः सह सन्निविष्टः शब्दः समानदेशो व्यज्यत इति नोपपद्यते, कथम् ? विभक्त्यन्तरोपपत्तेश्च समासे ॥ ३९ ॥ सन्तानोपपत्तेश्चेति चार्थः, तद् व्याख्यातम् । यदि रूपादयः शब्दश्च प्रति- द्रव्यं समस्ताः समुदिताः तस्मिन् समासे समुदाये यो यथाजातीयकः सन्निविष्ट- स्तस्य तथाजातीयस्यैव ग्रहणेन भवितव्यम् शब्दे, रूपादिवत् । तत्र योऽयं विभागः—एकद्रव्ये नानारूपा भिन्नश्रुतयो विधर्माणः शब्दा अभिव्यज्यमानाः श्रूयन्ते; यच्च विभागान्तरम्—सरूपाः समानश्रुतयः सधर्माणः शब्दास्तीव्रमन्द- ऐसा नहीं है, उसके विनाशकारण की उपलब्धि से न तो स्थिरता बनेगी, न नित्यत्व ही सिद्ध होगा ! ॥ ३७ ॥ कम्प के साथी (समानाधिकरण) होकर अनुनाद (अनुवृत्तशब्द) का पाणि के कम्प- वारक संयोग से, कम्प के नाश की तरह, कारणनाश से अभाव माना जाता है । शब्द- वैयधिकरण्य मानने पर प्रतिघातिद्रव्यसंयोग से समानाधिकरण का ही उपरम सम्भव है ? अस्पर्शत्व हेतु से प्रतिषेध नहीं बनता ॥ ३८ ॥ 'शब्द आकाशगुण नहीं हैं' यह प्रतिषेध तो शब्दाश्रय में अस्पर्शत्व होने से नहीं बनेगा । रूपा दिसमानदेश का अग्रहण होते हुए शब्दसन्तानोपपादन से 'अस्पर्शव्यापि द्रव्याधिकरणक शब्द है'—यह ज्ञान होता है, न कि 'कम्पसमानाधिकरण' ॥ ३८ ॥ समास में विभक्त्यन्तरोपपादन से भी प्रतिषेध नहीं बनता ॥ ३९ ॥ सन्तानोपपादन से भी प्रतिषेध नहीं बनता—यह सूत्रस्थ 'च' का अर्थ है । इसका व्याख्यान किया जा चुका । यदि रूपादि और शब्द प्रत्येक द्रव्य में समस्त तथा समुदित रहेंगे तो उस समस्त समुदाय में जो जैसी जाति का सन्निवेश होगा उसका वैसा ही ग्रहण शब्द में होना चाहिये, रूपादि की तरह । वहाँ यह जो विभाग किया गया गया है— 'एक द्रव्य में नाना स्वरूपवाले भिन्न श्रुतिवाले विधर्मी शब्द अभिव्यक्त होते हुए सुने जाते हैं'; तथा यह जो दूसरा विभाग किया गया है—'सरूप ( एक समान ) समानश्रुति
शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् [ ४०-५६ ]
१५८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० धर्मतया भिन्नाः श्रूयन्ते-तदुभयं नोपपद्यते, नानाभूतानामुत्पद्यमानानामयं धर्मः, नैकस्य व्यज्यमानस्येति । अस्ति चायं विभागो विभागान्तरं च, तेन विभागोप- पत्तेर्मन्यामहे-न प्रतिद्रव्यं रूपादिभिः सह शब्दः संन्निविष्टो व्यज्यत इति ॥३९॥ शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् [ ४०-५६ ] द्विविधश्चायं शब्दः-वर्णात्मकः, ध्वनिमात्रश्च । तत्र वर्णात्मनि तावत्- विकारादेशोपदेशात् संशयः ॥ ४० ॥ दध्यत्रेति केचिद् इकार इत्वं हित्वा यत्वमापद्यत इति विकारं मन्यन्ते । केचिदिकारस्य प्रयोगे विषयकृते यदिकारः स्थानं जहाति तत्र यकारस्य प्रयोगं ब्रुवते । संहितायां विषये इकारो न प्रयुज्यते तस्य स्थाने यकारः प्रयुज्यते स आदेश इति, उभयमिदमुपदिश्यते । तत्र न ज्ञायते-किं तत्त्वमिति ? आदेशोपदेशस्तत्त्वम्- विकारोपदेशे ह्यन्वयस्याग्रहणाद्विकारानुमानम् । सत्यन्वये किञ्चिन्निवर्तते किञ्चिदुपजायत इति शक्यते विकारोऽनुमातुम् । न चान्वयो गृह्यते, तस्माद् विकारो नास्तीति । सधर्मी शब्द तीव्र, मन्द भेद से भिन्न होते हुए सुने जाते हैं'-ये दोनों विभाग नहीं बनेंगे; क्योंकि ये अनेक धर्म नाना प्रकार के उत्पद्यमान शब्दों में सम्भावित हैं, न कि एक व्यज्यमान में अथवा अन्य विभाग भी क्लृप्त ही धर्म हैं। इस विभागोपपादन से हम मानते हैं कि शब्द प्रत्येक शब्द में रूपादिकों के साथ सन्निविष्ट होता हुआ व्यक्त नहीं होता ॥ ३९ ॥ यह शब्द दो -प्रकार का होता है-१. वर्णात्मक, तथा २. ध्वनिमात्र । वहाँ वर्णात्मक में- विकारात्मक आदेश कहने से संशय होता है ॥ ४० ॥ जैसे 'दध्यत्र' यहाँ कुछ विद्वान् ( कालापमतानुसारी वैयाकरण ) इकार में इत्व को हटाकर यत्व होता है, इसे विकार मानते हैं। कुछ ( सारस्वतव्याकरणवाले ) विद्वान् इकार के कार्यत्वेन दृष्ट प्रयोग में जो इकार स्थान छोड़ता है वहाँ यकार का प्रयोग कहते हैं । संहिताविषय ( सन्धि ) में इकार नहीं बोला जाता, वहाँ इकार के स्थान में यकार का प्रयोग होता है, यह प्रयोग 'आदेश' कहलाता है। यहाँ इकार, यकार-दोनों का उपदेश किया गया है। इस प्रसंग में, सचाई ( तत्त्व ) क्या है, पता नहीं लगता ? वैयाकरणमूर्धन्य पाणिनि के मत से आदेशोपदेश ही वहाँ सचाई है। विकारोपदेश मानने पर, अन्वयज्ञान न होने से विकार का अनुमान नहीं बनेगा। अन्वय होने पर, सुवर्ण में कुछ 'पिण्डाद्याकार' वहाँ निवृत्त होता है, कुछ 'कुण्डलाद्याकार' पैदा होता है, अतः अनुमान बन सकता है। चूँकि यहाँ कुण्डल, रुचकादि की सुवर्णविषयानुवृत्ति की तरह अन्वय नहीं हो पाता, अतः विकार नहीं है।
४०. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १५९
४०. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १५९ भिन्नकरणयोश्च वर्णयोरप्रयोगे प्रयोगोपपत्तिः। विवृतकरण इकारः, ईषत्स्पृष्टकरणो यकारः, ताविमौ पृथक्करणाख्येन प्रयत्नेनोच्चारणीयौ। तयो- रेकस्याप्रयोगेऽन्यतरस्य प्रयोग उपपन्न इति । अविकारे चाविशेषः। यत्रेमाविकारयकारौ न विकारभूतौ-यतते, यच्छति, प्रायंस्त इति, इकारः, इदमिति च; यत्र च विकारभूतौ-इष्ट्वा, दध्याहरेति; उभयत्र प्रयोक्तुरविशेषो यत्नः श्रोतुश्च श्रुतिरित्यादेशोपपत्तिः। प्रयुज्यमानाग्रहणाच्च। न खलु इकारः प्रयुज्यमानो यकारतामापद्यमानो गृह्यते, किं तर्हि ? इकारस्य प्रयोगे यकारः प्रयुज्यते, तस्मादविकार इति। अविकारे च न शब्दान्वाख्यानलोपः। 'न विक्रियन्ते वर्णाः' इति। न चैतस्मिन् पक्षे शब्दान्वाख्यानस्यासम्भवः, येन वर्णविकारं प्रतिपद्येमहीति। न खलु वर्णस्य वर्णान्तरं कार्यम्-न हि इकाराद्यकार उत्पद्यते, यकाराद्वा इकारः। पृथक्स्थानप्रयत्नोत्पाद्या हीमे वर्णाः, तेषामन्योऽन्यस्य स्थाने प्रयुज्यत इति युक्तम्। एतावच्चैतत्परिणामो विकारः स्यात् कार्यकारणभावो वा; उभयं च नास्ति। तस्मान्न सन्ति वर्णविकाराः। भिन्न प्रयत्नजन्य वर्णों में एक के अप्रयोग में दूसरे का प्रयोग उत्पन्न होने लगेगा; क्योंकि इकार का विवृत प्रयत्न है, तथा यकार का ईषत्स्पृष्ट प्रयत्न। ये दोनों पृथग्व्यापार वाले प्रयत्न से उच्चारणीय हैं, इनमें एक' के अप्रयोग पर दूसरे का प्रयोग उत्पन्न होता है। अविकार मानने पर कोई विशेषता नहीं आयेगी; क्योंकि इनके उच्चारणों में वक्ता या श्रोता को प्रयत्नान्तर नहीं करना पड़ता। जैसे- 'यतते, यच्छति, आयंस्त'-यहाँ 'य'; तथा 'इकार' 'इदम्' यहाँ 'इ' अविकार हैं; तथा 'इष्ट्वा' 'दध्यत्र' यहाँ ये दोनों विकार हैं। दोनों ही जगह प्रयोक्ता का समान प्रयत्न है, श्रोता को श्रवण भी वैसा ही होता है। प्रयुज्यमान अक्षर में स्थानी अक्षर का ग्रहण न होने से जैसे इकार प्रयुज्यमान होते हुए वह यकारता के रूप में होता हुआ नहीं होता, बल्कि इस प्रकार के प्रयोग में यकार का प्रयोग होता है, अतः वह अविकार है। अविकार मानने से शब्दान्वाख्यानपरम्परा का लोप भी नहीं होगा। 'वर्ण विकृत नहीं होते' इस पक्ष में शब्दान्वाख्यान असम्भव नहीं है किहमें आपका वर्णविकारपक्ष मानना पड़े। वर्ण से वर्णान्तर भी नहीं बनता, ऐसा नहीं होता कि इकार से यकार उत्पन्न हो या यकार से इकार उत्पन्न हो; क्योंकि वर्ण अपने-अपने अलग स्थान तथा प्रयत्न से उत्पन्न होनेवाले हैं। उनमें दूसरा दूसरे के स्थान में प्रयुक्त होता है-यही मानना उचित है। इतना इसका यह परिणाम है-ऐसा विकार हो सकता है। अथवा कार्य- कारण भाव हो सकता है। ये दोनों नहीं हैं, अतः वर्णविकार नहीं है। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१६० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० वर्णसमुदायविकारानुपपत्तिवच्च वर्णविकारानुपपत्तिः। 'अस्तेर्भूः' (पा० सू० २. ४. ५२) 'ब्रुवो वचिः' (२. ४. ५३) इति यथा वर्णसमुदायस्य धातुलक्षणस्य क्वचिद्विषये वर्णान्तरसमुदायो न परिणामो न कार्यम्, शब्दान्तरस्य स्थाने शब्दान्तरं प्रयुज्यते। तथा वर्णस्य वर्णान्तरमिति ॥ ४० ॥ २. इतश्च न सन्ति विकाराः— प्रकृतिविवृद्धौ विकारविवृद्धेः ॥ ४१ ॥ प्रकृत्यनुविधानं विकारेषु दृष्टम्, यकारे ह्रस्वदीर्घानुविधानं नास्ति, येन विकारत्वमनुमीयत इति ॥ ४१ ॥ न्यूनसमाधिकोपलब्धेर्विकाराणामहेतुः ? ॥ ४२ ॥ द्रव्यविकारा न्यूनाः समा अधिकाश्च गृह्यन्ते। तद्द्वयं विकारो न्यूनः स्यादिति ? ॥ ४२ ॥ द्विविधस्यापि हेतोरभावादसाधनं दृष्टान्तः ॥ ४३ ॥ अत्र नोदाहरणसाधर्म्याद्धेतुरस्ति; न वैधर्म्यात्। अनुपसंहृतश्च हेतुना दृष्टान्तो न साधक इति। वर्णसमुदायविकारानुपपत्ति की तरह यह वर्णविकारानुपपत्ति भी मान लेनी चाहिये। जैसे—'अस्तेर्भूः' (पा० सू० २. ४. ५२), 'ब्रुवो वचिः' (पा० सू० २. ४. ५३) यह धातुलक्षण वर्णसमुदाय का किसी विषय में होने वाला वर्णसमुदाय (वचि) न परिणाम है, न विकार; बस, दूसरे शब्द के स्थान में दूसरा शब्द प्रयुक्त हो जाता है— इतना ही सिद्धान्त है। इस नय से दूसरे वर्ण के स्थान में दूसरा वर्ण प्रयुक्त होता है— यही सिद्धान्त है ॥ ४० ॥ २. वर्ण इसलिये भी विकार नहीं है— प्रकृति की विवृद्धि होने से विकार की विवृद्धि होने के कारण ॥ ४१ ॥ विकारों में प्रकृत्यनुविधान देखा जाता है; परन्तु यहाँ यकार में दीर्घादि की अनु- वृत्ति नहीं देखी जाती, जिससे यकार में विकारत्व का अनुमान न हो सके ॥ ४१ ॥ न्यून, सम तथा अधिक उपलब्धि से यहाँ विकारों का हेतुत्व नहीं बनता ? ॥४२॥ लोक में जैसे द्रव्यविकार में न्यूनता समता या अधिकता देखी जाती हैं वैसे इन वर्णों में विकार न्यून हो सकता है। अतः विकार का साधक कोई हेतु नहीं हैं ॥ ४२ ॥ दोनों प्रकार के हेतुओं के अभाव से दृष्टान्त असाधक है ॥ ४३ ॥ यहाँ न तो उदाहरणसादृश्य से हेतु है और न उदाहरणवैसादृश्य से। अतः हेतु से अनुपसंहृत दृष्टान्त साधक नहीं होता। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
४६. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १६१
४६. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १६१ प्रतिदृष्टान्ते चानियमः प्रसज्येत, यथा-अनडुहः स्थानेऽश्वो वोढुं -नियुक्तो न तद्विकारो भवति, एवमिवर्णस्य स्थाने यकारः प्रयुक्तो न विकार इति । न चात्र नियमहेतुरस्ति दृष्टान्तः साधको न प्रतिदृष्टान्त इति ॥ ४३ ॥ द्रव्यविकारोदाहरणं च— न; अतुल्यप्रकृतीनां विकारविकल्पात् ॥ ४४ ॥ अतुल्यानां द्रव्याणां प्रकृतिभावोऽवकल्पते, विकाराश्च प्रकृतीरनुविधीयन्ते । न त्विवर्णमनुविधीयते यकारः । तस्मादनुदाहरणं द्रव्यविकार इति ॥ ४४ ॥ द्रव्यविकारवैषम्यवद् वर्णविकारविकल्पः ? ॥ ४५ ॥ यथा द्रव्यभावेन तुल्यायाः प्रकृतेर्विकारवैषम्यम्, एवं वर्णभावेन तुल्यायाः प्रकृतेर्विकारविकल्प इति ? ॥ ४५ ॥ न; विकारधर्मानुपपत्तेः ॥ ४६ ॥ अयं विकारधर्मो द्रव्यसामान्ये-यदात्मकं द्रव्यं मृद्वा सुवर्णं वा, तस्यात्म- नोऽन्वये पूर्वो व्यूहो निवर्त्तते व्यूहान्तरं चोपजायते, तं विकारमाचक्ष्महे । न वर्णसामान्ये कश्चिच्छब्दात्माऽन्वयी-य इत्वं जहाति यत्वं चापद्यते । तत्र यथा प्रतिदृष्टान्त में अनियम-प्रसक्ति भी होने लगेगी, जैसे गाड़ी में बैल के स्थान पर घोड़ा जोत दिया जाये तो वह उसका विकार थोड़े हो जायेगा ! इसी तरह इवर्ण के स्थान में यकार का प्रयोग हो तो वह विकार कैसे हुआ ! अतः यहाँ न तो नियमसाधन का दृष्टान्त ही साधक है, न प्रतिदृष्टान्त ॥ ४३ ॥ यहाँ द्रव्यविकार का उदाहरण भी— नहीं; असमान द्रव्यों के विकारविकल्प से ॥ ४४ ॥ अपने से असमान जातीय द्रव्यों में प्रकृतिभाव क्लृप्त है, परन्तु वहाँ विकार प्रकृति का अनुविधान ( अनुवृत्ति ) करते हैं; यहाँ तो इवर्ण का यकार अनुविधान नहीं करता, अतः यहाँ द्रव्यविकार उदाहरण नहीं बन सकता ॥ ४४ ॥ द्रव्यविकार के वैषम्य की तरह वर्णविकारविकल्प मान लिया जाये ? ॥ ४५ ॥ जैसे द्रव्यत्वेन समान प्रकृति में विकार-विषमता देखी जाती है; इसी तरह यहाँ वर्णभाव से समान प्रकृति का विकारविकल्प क्यों न मान लिया जाये ? ॥ ४५ ॥ विकारधर्मानुपपत्ति के कारण नहीं मान सकते ॥ ४६ ॥ द्रव्यसामान्य में विकारधर्म यह है कि जैसा द्रव्य हो—मिट्टी हो या सुवर्ण हो, तदात्मक में अन्वय होने पर पूर्व पिण्डाद्याकृति निवृत्त हो जाती है, तथा कुण्डलाद्याकृति उत्पन्न हो जाती है—इसे विकार कहते हैं । वर्णसामान्य में कोई शब्दात्मा सुवर्ण व्यक्ति की तरह अन्वयी नहीं, जो इत्व को छोड़ दे और यत्व को ग्रहण कर ले ! वहाँ जैसे द्रव्यत्वेन समान होने पर भी विकारवैषम्य होने पर घोड़ा जैसे बैल नहीं हो पाता, न्या० द० २१
१६२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० सति द्रव्यभावे विकारवैषम्ये नाऽनडुहोऽश्वो विकारः, विकारधर्मानुपपत्तेः; एव- मिवर्णस्य न यकारो विकारः, विकारधर्मानुपपत्तेरिति !॥ ४६ ॥ ३. इतश्च न सन्ति वर्णविकाराः— विकारप्राप्तानामपुनरापत्तेः ॥ ४७ ॥ अनुपपन्ना पुनरापत्तिः । कथम् ? पुनरापत्तेरननुमानादिति । इकारो यकार- त्वमापन्नः पुनरिकारो भवति, न पुनरिकारस्य स्थाने यकारस्य प्रयोगोऽप्रयोग- श्चेत्यत्रानुमानं नास्ति ॥ ४७ ॥ सुवर्णादीनां पुनरापत्तेरहेतुः ? ॥ ४८ ॥ अननुमानादिति न । इदं ह्यनुमानम्— सुवर्णं कुण्डलत्वं हित्वा रुचकत्वमापद्यते, रुचकत्वं हित्वा पुनः कुण्डलत्व- मापद्यते, एवमिकारोऽपि यकारत्वमापन्नः पुनरिकारो भवतीति ? ॥ ४८ ॥ व्यभिचारादननुमानम्, यथा—पयो दधिभावमापन्नं न पुनः पयो भवति, किमेवं वर्णानां न पुनरापत्तिः ? अथ सुवर्णवत् पुनरापत्तिरिति ? सुवर्णोदाहरणोपपत्तिश्च— न; तद्विकाराणां सुवर्णभावाव्यतिरेकात् ॥ ४९ ॥ क्योंकि वहां विकारधर्म की उत्पत्ति नहीं है; इसी तरह इवर्ण भी यकार का विकार नहीं है, क्योंकि यहाँ विकारधर्म की उपपत्ति नहीं है ॥ ४६ ॥ ३. इसलिये भी वर्ण विकार नहीं हैं, क्योंकि— विकारापन्नों की पुनरापत्ति नहीं हुआ करती ॥ ४७ ॥ यहाँ पुनःप्राप्ति अनुपपन्न है; कैसे ? पुनरापत्ति से विकार का अनुमान नहीं होता । यहाँ तो इकार यकार बनकर फिर इकार बन जाता है । यकार के स्थान में इकार का प्रयोग है, या अप्रयोग, अतः इस विषय में विकार का अनुमान नहीं होता ॥ ४७ ॥ सुवर्णादिकों के पुनरापादन से उक्त हेतु नहीं बनता ? ॥ ४८ ॥ अनुमान नहीं होता—यह आपका कथन उचित नहीं; क्योंकि यह अनुमान है— ‘सुवर्ण कुण्डलत्व को छोड़कर रुचकत्व-आकृति प्राप्त कर लेता है, रुचकत्व को छोड़कर पुनः कुण्डलत्वाकृति धारण कर लेता है । इसी तरह इकार भी यकार बन कर पुनः इकार बन जाता है’ ? ॥ ४८ ॥ हेतु के व्यभिचरित होने से अनुमान नहीं है; जैसे दूध के दही बन जाने पर पुनः वह दूध नहीं बन सकता । क्या इस दूध की तरह वर्णों का पुनरापादन नहीं होता, या सुवर्ण की तरह पुनरापादन हो जाता है ? सुवर्ण की तरह आपादन तो— नहीं होता; क्योंकि उस सुवर्ण के विकार उससे अतिरिक्त नहीं हैं ॥ ४९ ॥