भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१७. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १४७ किं तर्हि ? इन्द्रियप्रत्यासत्तिग्राह्यत्वात् सन्तानानुमानं तेनानित्यत्वमिति ॥ १६ ॥ यदपि नित्येष्वप्यनित्यवदुपचारादिति ? न; कारणद्रव्यस्य प्रदेशशब्देनाभिधानात् ॥ १७ ॥ नित्येष्वप्यव्यभिचार इति । एवमाकाशप्रदेशः, आत्मप्रदेश इति नात्राकाशात्मनोः कारणद्रव्यमभिधीयते, यथा कृतकस्य । कथं ह्यविद्यमानमभिधीयते, अविद्यमानता च ? प्रमाणतोऽनु- पलब्धेः । किं तर्हि तत्राभिधीयते ? संयोगस्याव्याप्यवृत्तित्वम् । परिच्छिन्नेन द्रव्येणाकाशस्य संयोगो नाकाशं व्याप्नोति अव्याप्य वर्त्तत इति, तदस्य कृतकेन द्रव्येण सामान्यम् । न ह्यामलकयोः संयोग आश्रयं व्याप्नोति । सामान्यकृता च भक्तिः-आकाशस्य प्रदेश इति । अनेनात्मप्रदेशो व्याख्यातः । संयोगवच्च शब्दबुद्ध्यादीनामव्याप्यवृत्तित्वमिति । परीक्षिता च तीव्र- मन्दता शब्दतत्त्वं न भक्तिकृतेति । कस्मात् पुनः सूत्रकारस्यास्मिन्नर्थे सूत्रं न श्रूयते इति ? शीलमिदं भगवतः सूत्रकारस्य—बहुष्वधिकरणेषु द्वौ पक्षौ न व्यवस्थापयति, तत्र शास्त्रसिद्धान्तातत्त्वावधारणं प्रतिपत्तुमर्हतीति मन्यते । अनित्यत्व है, अपितु इन्द्रियसामीप्य होने पर ग्राह्य होने के कारण शब्द का सन्ताना- नुमान है, अतः उसमें अनित्यत्व है ॥ १६ ॥ पूर्वपक्षी ने जो नित्यों में अनित्यवदुपचार बताया था ? वह भी नहीं बनता; क्योंकि— कारणद्रव्य का प्रदेशशब्द द्वारा अभिधान होने से ॥ १७ ॥ नित्यों में व्यभिचार नहीं बनता । आकाशप्रदेश, आत्मप्रदेश—आदि में आत्मा या आकाश का कारणद्रव्य नहीं कहा जाता, जैसे अनित्य वृक्षादि में पदार्थों का कहा जाता है । वहाँ अविद्यमान का क्या अभिधान करते हो, अविद्यमान की तो प्रमाण से उपलब्धि नहीं हो पाती ? वहाँ केवल संयोग का अव्याप्यवृत्तित्व अभिहित है । परिच्छिन्न द्रव्य से आकाश का संयोग है, वह आकाश को व्याप्त करके नहीं रहता, अपितु अव्याप्त होकर रहता है । यह बात अनित्य द्रव्य के समान है, जैसे—दो आमलकों का संयोग अपने आश्रय को व्याप्त करके नहीं रहता, अतः यह—'आकाश का प्रदेश' यह सामान्य सामान्यप्रयुक्त भाक्त प्रयोग है । इससे 'आत्मप्रदेश' शब्द का व्याख्यान भी समझ लें । शब्द, बुद्धि, सुख-आदि की तरह संयोगवत्त्व अव्याप्यवृत्ति है । यो, शब्द की तीव्रता- मन्दता के बारे में निर्णय कर दिया गया, उसे पूर्वपक्षी 'आकाशप्रदेश' की तरह भाक्त नहीं कह सकता । फिर सूत्रकार ने इस अर्थ को स्पष्ट करने के लिए कोई सूत्र क्यों न बनाया ? यह भगवान् सूत्रकार का बडप्पन है कि वे कई विषयों में जानबूझ कर दो पक्ष का उत्थान नहीं करते । वहाँ वे समझते हैं कि जिज्ञासु शिष्य शास्त्र-सिद्धान्तों के सहारे