भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१४८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अं० २. आ० शास्त्रसिद्धान्तस्तु न्यायसमाख्यातमनुमतं बहुशाखमनुमानमिति ॥ १७ ॥ अथापि खलु 'इदमस्ति इदं नास्ति' इति कुत एतत्प्रतिपत्तव्यमिति ? प्रमाणत उपलब्धेः, अनुपलब्धेश्चेति । अविद्यमानस्तर्हि शब्दः— प्रागुच्चारणादनुपलब्धेरावरणाद्यनुपलब्धेश्च ॥ १८ ॥ प्रागुच्चारणान्नास्ति शब्दः, कस्मात् ? अनुपलब्धेः । सतोऽनुपलब्धिरावणा- दिभ्यः ? एतन्नोपपद्यते, कस्माद् ? आवरणादीनामनुपलब्धिकारणानामग्रहणात् । अनेनावृत्तः शब्दो नोपलभ्यते, असन्निकृष्टश्चेन्द्रियव्यवधानाद्वा—इत्येवमादि अनुपलब्धिकारणं न गृह्यत इति । सोऽयमनुच्चारितो नास्तीति । उच्चारणमस्य व्यञ्जकम्, तदभावात्प्रागुच्चारणादनुपलब्धिरिति ? कमि- दमुच्चारणं नामेति ? विवक्षाजनितेन प्रयत्नेन कोष्ठ्यस्य वायोः प्रेरितस्य कण्ठताल्वादिप्रतिघातः, यथास्थानं प्रतिघाताद्वर्णाभिव्यक्तिरिति । संयोगविशेषो वै प्रतिघातः प्रतिषिद्धं च संयोगस्य व्यञ्जकत्वम्, तस्मान्न व्यञ्जकाभावाद- ग्रहणम्, अपि त्वभावादेवेति । से अन्यतर पक्ष में तत्त्वनिर्णय जान सकता है । शास्त्र-सिद्धान्त से उनका तात्पर्य है— न्यायशास्त्र में कथित, उन के (सूत्रकार) द्वारा अनुमोदित अनेक प्रकार के अनुमान ॥ १७ ॥ तो भी 'यह है, यह नहीं है' इसके जानने का क्या उपाय है ? प्रमाणों द्वारा उप- लब्धि या अनुपलब्धि न होने से उक्त उभय कोटियाँ जानी जा सकती हैं । अतः शब्द अविद्यमान हैं ? उच्चारण से पूर्व अनुपलब्धि होने से, तथा आवरणादिकों की अनुपलब्धि माने जाने से (वह शब्द अनित्य है) ॥ १८ ॥ उच्चारण से पूर्व शब्द नहीं होता; क्योंकि उस समय उसकी उपलब्धि दिखायी नहीं देती । यदि यह कहें कि आवरणादि के कारण, होता हुआ शब्द भी अनुपलब्ध रहता है ? तो यह नहीं बनता; क्योंकि उस समय आवरणादि को अनुपलब्धि के कारणरूप में नहीं देखते ! जैसे 'शब्द इस आवरण से आवृत है, अतः उसकी उपलब्धि नहीं हो रही है, या तो वह सन्निकृष्ट नहीं है'—ऐसा अनुपलब्धिकारण भी प्रमाण से गृहीत नहीं होता । अतः अनुच्चारित अवस्था में शब्द नहीं है—यही मानना चाहिये । 'उच्चारण शब्द का व्यञ्जक है, उसके न होने से उस समय उपलब्धि नहीं हो पाती' ऐसा मान लें ? तो हम पूछते हैं यह 'उच्चारण' क्या है ? विवक्षाजनित प्रयत्न से उदरस्थ वायु का कण्ठ ताल्वादि में आकर टकराना । यह टक्कर एक प्रकार का संयोग ही है, और संयोग के व्यञ्जकत्व का हम पीछे खण्डन कर चुके । इसलिये 'व्यञ्जक न होने से उस समय शब्द की उपलब्धि नहीं होती'—ऐसा नहीं, अपितु 'उस शब्द के अभाव से उस समय. उसकी उपलब्धि नहीं होती'—यही मानना चाहिये । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri