भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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३९. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १५७ लब्धेः शब्दस्यावस्थानान्नित्यत्वमिति ॥ ३७ ॥ कम्पसमानाश्रयस्य चानुनादस्य पाणिप्रश्लेषात् कम्पवत् कारणोपरमा- दभावः; वैयधिकरण्ये हि प्रतिघातिद्रव्यप्रश्लेषात् समानाधिकरणस्यैवोपरमः स्यादिति ? अस्पर्शत्वादप्रतिषेधः ॥ ३८ ॥ यदिदं नाकाशगुणः शब्द इति प्रतिषिद्ध्यते, अयमनुपपन्नः प्रतिषेधः; अस्पर्शत्वाच्छब्दाश्रयस्य । रूपा दिसमानदेशस्याग्रहणे शब्दसन्तानोपपत्तेरस्पर्श- व्यापिद्रव्याश्रयः शब्द इति ज्ञायते, न च कम्पसमानाश्रय इति ॥ ३८ ॥ प्रतिद्रव्यं रूपादिभिः सह सन्निविष्टः शब्दः समानदेशो व्यज्यत इति नोपपद्यते, कथम् ? विभक्त्यन्तरोपपत्तेश्च समासे ॥ ३९ ॥ सन्तानोपपत्तेश्चेति चार्थः, तद् व्याख्यातम् । यदि रूपादयः शब्दश्च प्रति- द्रव्यं समस्ताः समुदिताः तस्मिन् समासे समुदाये यो यथाजातीयकः सन्निविष्ट- स्तस्य तथाजातीयस्यैव ग्रहणेन भवितव्यम् शब्दे, रूपादिवत् । तत्र योऽयं विभागः—एकद्रव्ये नानारूपा भिन्नश्रुतयो विधर्माणः शब्दा अभिव्यज्यमानाः श्रूयन्ते; यच्च विभागान्तरम्—सरूपाः समानश्रुतयः सधर्माणः शब्दास्तीव्रमन्द- ऐसा नहीं है, उसके विनाशकारण की उपलब्धि से न तो स्थिरता बनेगी, न नित्यत्व ही सिद्ध होगा ! ॥ ३७ ॥ कम्प के साथी (समानाधिकरण) होकर अनुनाद (अनुवृत्तशब्द) का पाणि के कम्प- वारक संयोग से, कम्प के नाश की तरह, कारणनाश से अभाव माना जाता है । शब्द- वैयधिकरण्य मानने पर प्रतिघातिद्रव्यसंयोग से समानाधिकरण का ही उपरम सम्भव है ? अस्पर्शत्व हेतु से प्रतिषेध नहीं बनता ॥ ३८ ॥ 'शब्द आकाशगुण नहीं हैं' यह प्रतिषेध तो शब्दाश्रय में अस्पर्शत्व होने से नहीं बनेगा । रूपा दिसमानदेश का अग्रहण होते हुए शब्दसन्तानोपपादन से 'अस्पर्शव्यापि द्रव्याधिकरणक शब्द है'—यह ज्ञान होता है, न कि 'कम्पसमानाधिकरण' ॥ ३८ ॥ समास में विभक्त्यन्तरोपपादन से भी प्रतिषेध नहीं बनता ॥ ३९ ॥ सन्तानोपपादन से भी प्रतिषेध नहीं बनता—यह सूत्रस्थ 'च' का अर्थ है । इसका व्याख्यान किया जा चुका । यदि रूपादि और शब्द प्रत्येक द्रव्य में समस्त तथा समुदित रहेंगे तो उस समस्त समुदाय में जो जैसी जाति का सन्निवेश होगा उसका वैसा ही ग्रहण शब्द में होना चाहिये, रूपादि की तरह । वहाँ यह जो विभाग किया गया गया है— 'एक द्रव्य में नाना स्वरूपवाले भिन्न श्रुतिवाले विधर्मी शब्द अभिव्यक्त होते हुए सुने जाते हैं'; तथा यह जो दूसरा विभाग किया गया है—'सरूप ( एक समान ) समानश्रुति