भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१५६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० पाणिनिमित्तप्रश्लेषाच्छब्दाभावे नानुपलब्धिः ॥ ३६ ॥ पाणिकर्मणा पाणिघण्टाप्रश्लेषो भवति, तस्मिंश्च सति शब्दसन्तानो नोत्पद्यते१, अतः श्रवणानुपपत्तिः । तत्र प्रतिघातिद्रव्यसंयोगः शब्दस्य निमि- त्तान्तरं संस्कारभूतं निरुणद्धीत्यनुमीयते, तस्य च निरोधाच्छब्दसन्तानो नोत्पद्यते । अनुत्पत्तौ श्रुतिविच्छेदो यथा-प्रतिघातिद्रव्यसंयोगादिषोः क्रियाहेतौ संस्कारे निरुद्धे गमनाभाव इति । कम्पसन्तानस्य स्पर्शनैन्द्रियग्राह्यस्य चोपरमः । कांस्यपात्रादिषु पाणिसंश्लेषो लिङ्गं संस्कारसन्तानस्येति । तस्मान्निमित्तान्तर- स्य संस्कारभूतस्य नानुपलब्धिरिति ॥ ३६ ॥ विनाशकारणानुपलब्धेश्चावस्थाने तन्नित्यत्वप्रसङ्गः२ ॥ ३७ ॥ यदि यस्य विनाशकारणं नोपलभ्यते तदवतिष्ठते । अवस्थानाच्च तस्य नित्यत्वं प्रसज्यते । एवं यानि खल्विमानि शब्दश्रवणानि शब्दाभिव्यक्तय इति मतम्, न तेषां विनाशकारणं भवतोपपाद्यते, अनुपपादनादवस्थानम्, अव- स्थानात् तेषां नित्यत्वं प्रसज्यत इति । अथ नैवम्, न तर्हि विनाशकारणानुप- हाथ के कारण कम्पवारक संयोग द्वारा शब्द न होने से उपलब्धि नहीं होती ॥ ३६ ॥ पाणिक्रिया से पाणि-घण्टा संयोग होता है, उसके होने पर शब्दसन्तान उत्पन्न नहीं हो पाते, अतः श्रवण अनुपपन्न है । वहाँ 'प्रतिघाती द्रव्यसंयोग शब्द के निमित्तान्तर संस्कार को रोक देता हैं'—ऐसा अनुमान होता है; उसके निरोध से शब्दसन्तति उत्पन्न नहीं होती । उसके अनुत्पन्न होने पर श्रवण विच्छिन्न हो जायेगा; जैसे—प्रतिघाती द्रव्यसंयोग से बाण के क्रियाकारण संस्कार (वेग) के निरुद्ध होने पर वह आगे नहीं बढ़ता, स्पर्शनैन्द्रियग्राह्य कम्पसन्तान का उपरम हो जाता है । अतः कांस्यपात्रादि में पाणि का संयोग संस्कारसन्तान का साधक हेतु है । इसलिये कारणान्तर संस्कारभूत की उपलब्धि नहीं होती ॥ ३६ ॥ विनाशकारण की उपलब्धि न होने से उसे स्थिर मानना पड़ेगा, और उसमें नित्यत्व प्रसक्त होने लगेगा ॥ ३७ ॥ यदि किसी का विनाशकारण उपलब्ध नहीं होता है, वह स्थिर माना जाता है । स्थिर होने पर उसमें नित्यता माननी पड़ेगी । इस प्रकार 'यह शब्दश्रुति शब्दाभिव्यक्ति हैं', यह मानोगे तो आपने उनके विनाशकारण का उपपादन नहीं किया, उसके अनुप- पादन से उनमें स्थिरता (सत्ता) मानी जायेगी, स्थिरता से उनमें नित्यता प्रसक्त होगी । १. 'नोपलभ्यते' इति पाठ० । २. वृत्तिकृता न व्याख्यातमेतत्, अतो न सूत्रमिति केचित् ।