न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 173, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें३५. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १५५ सन्तानोपपत्तिः । उपपादितः शब्दसन्तानः संयोगविभागजाच्छब्दाच्छब्दान्तरं ततोऽप्यन्यत्, ततोऽप्यन्यदिति । तत्र कार्यः शब्दः कारणशब्दमभिरुणद्धि¹ । ²प्रतिघातिद्रव्यसंयोगस्त्वन्त्यस्य शब्दस्य निरोधकः । दृष्टं हि तिरःप्रतिकुड्य- मन्तिकस्थेनाप्यश्रवणं शब्दस्य, श्रवणं दूरस्थेनाप्यसति व्यवधान इति । घण्टायामभिहन्यमानायां तारस्तारतरो मन्दो मन्दतर इति श्रुतिभेदान्नाना- शब्दसन्तानोऽविच्छेदेन श्रूयते, तत्र नित्ये शब्दे घण्टास्थमन्यगतं वाऽवस्थितं सन्तानवृत्ति वाऽभिव्यक्तिकारणं वाच्यम्, येन श्रुतिसन्तानो भवतीति । शब्दभेदे चासति श्रुतिभेद उपपादयितव्य इति । अनित्ये तु शब्दे घण्टास्थं सन्तानवृत्ति संयोगसहकारि निमित्तान्तरं संस्कारभूतं पटु मन्दमनुवर्तते, तस्यानुवृत्त्या शब्दसन्तानानुवृत्तिः, पटुमन्दभावाच्च तीव्रमन्दता शब्दस्य, तत्कृतश्च श्रुतिभेद इति ॥ ३५ ॥ न वै निमित्तान्तरं संस्कार उपलभ्यते, अनुपलब्धेर्नास्तीति ? संयोग-विभागज शब्द से शब्दान्तर, उससे अन्य तथा उससे अन्य—यों अनवस्था होने लगेगी ! (जव कि वास्तविकता यह है कि) कार्य (उत्तरोत्तर) शब्द कारण (पूर्व पूर्व) शब्द को रोक देता है । प्रतिघाती द्रव्य का संयोग अन्त्य शब्द का निरोधक है । लोक में यह देखा जाता है कि व्यवधानकारक दीवाल आदि से व्यवहित होने से समीप का शब्द भी सुनायी नहीं देता, तथा व्यवधान न हो तो दूर का शब्द भी सुनायी दे जाता है । घण्टा वजने पर, तीव्र से तीव्रतर तथा मन्द से मन्दतर—यों श्रवण-भेद से उसकी नाना शब्दसन्तति अविच्छिन्नतया (निरन्तर) सुनने में आती है । नित्य शब्द माने जाने पर, घण्टास्थित अन्यगत या अवस्थित सन्तानवृत्ति को अभिव्यक्ति कारण बताना पड़ेगा, जिससे वह श्रुति-सन्तान सिद्ध हो सके । शब्दभेद न मानने पर श्रुति-भेद का उपपादन करना पड़ेगा । शब्द को अनित्य मानने पर, घण्टास्थित निमित्तान्तर ही सन्तानवृत्ति संयोग के साथ रहने वाले हो कर संस्कार के रूप में तीव्र, मन्द का अनुवर्तन करते हैं । इस अनुवर्तन से शब्द की सन्तानानुवृत्ति, तथा तीव्रता या मन्दता से शब्द की तीव्रता मन्दता सिद्ध हो जायेंगी और श्रुतिभेद भी उपपन्न हो जायेंगे ॥ ३५ ॥ निमित्तान्तर संस्कार उपलब्ध नहीं होता तो साधक प्रमाण के अभाव में वह नहीं है—ऐसा मान लें ? १. निरुणद्धि-इति पाठ० । २. 'प्रतिघाति द्रव्यं कुडचादि तत्संयोगो नभसः । एतदुक्तं भवति—घनतरद्रव्यसंयुक्तं नभो न शब्दसमवायिकारणतां प्रतिपद्यते; ततश्च सन्नप्यसमवायिकारणं शब्दो न शब्दान्तरमारभते'—इति वाचस्पतिमिश्राः । न्यायकन्दलीकारास्तु—'प्रतिघातिद्रव्यमत्र शब्दकारणीभूतो वायुरेव' इति वदन्ति ।