भारतकोश
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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

कथालक्षणप्रकरणम् [ १-३ ]

[ अथ द्वितीयमाह्निकम् ] कथालक्षणप्रकरणम् [ १-३ ] वादलक्षणम् तिस्रः कथा' भवन्ति—वादः, जल्पः, वितण्डा चेति । तासाम्— प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चावयवोपपन्न पक्षप्रतिपक्ष- परिग्रहो वादः ॥ १ ॥ एकाधिकरणस्थौ विरुद्धौ धर्मो पक्षप्रतिपक्षौ, प्रत्यनीकभावाद्-अस्त्यात्मा, नास्त्यात्मेति । नानाधिकरणस्थौ विरुद्धौ न पक्षप्रतिपक्षौ, यथा—नित्य आत्मा, अनित्या बुद्धिरिति । परिग्रहः = अभ्युपगमव्यवस्था । सोऽयं पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः । तस्य विशेषणं प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः—प्रमाणतर्कसाधनः, प्रमाण- तर्कोपालम्भः । प्रमाणैस्तर्केण च साधनमुपालम्भश्चास्मिन् क्रियत इति। साधनम् = स्थापना । उपालम्भः = प्रतिषेधः । तौ साधनोपालम्भौ उभयोरपि पक्षयोर्व्य- तिषक्तावनुबद्धौ च यावदेको निवृत्त एकतरो व्यवस्थित इति निवृत्तस्योपालम्भः, व्यवस्थितस्य साधनमिति । वाद, जल्प, वितण्डा भेद से कथा तीन प्रकार की होती हैं, उनमें— प्रमाण तथा तर्क द्वारा स्वपक्षस्थापन-परपक्षनिषेध से युक्त, सिद्धान्त के अनुकूल, प्रतिज्ञादि पञ्चावयव सम्पन्न, पक्ष-प्रतिपक्षसहित वाक्यसमूह को 'वाद' कहते हैं ॥ १ ॥ एक अधिकरण में रहनेवाले, परस्पर विरोधी होने से विरोधी धर्म एक दूसरे के पक्ष-प्रतिपक्ष कहलाते हैं। जैसे—'आत्मा हैं' और 'आत्मा नहीं हैं', ये दोनों वाक्य एक दूसरे के पक्ष-प्रतिपक्ष हैं, क्योंकि एक ही अधिकरण की सत्ता का स्थापन या निषेध किया जा रहा है । अनेक अधिकरणवाले विरोधी धर्म आपस में पक्ष-प्रतिपक्ष नहीं बन पाते । जैसे 'आत्मा नित्य हैं' और 'बुद्धि अनित्य हैं', ये दोनों वाक्य परस्पर में पक्ष-प्रतिपक्ष नहीं बन सकते; क्योंकि यहाँ नित्यता-अनित्यता की स्थापना या निषेध पृथक् अधिकरण में किया जा रहा है। परिग्रह = स्वीकृति की व्यवस्था । ऐसा यह पक्ष-प्रतिपक्षपरिग्रह 'वाद' कहलाता है । 'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भ' वाद का विशेषण है । अर्थात् इस वाद में प्रमाण तर्क ( स्वपक्ष में ) उपस्थित किये जाते हैं तथा ( परपक्ष के ) प्रमाण तर्क का खण्डन होता है । 'साधन' का अर्थ है 'स्थापना', उपालम्भ का अर्थ है 'प्रतिषेध' । ये साधन और उपालम्भ दोनों ही पक्षों में लगे हुए हैं, उनमें अनुबद्ध है । जहाँ एक निवृत्त हुआ दूसरा स्थित हो ही जायगा । संक्षेप में निवृत्त का निषेध तथा व्यवस्थित की स्थापना ही वाद का लक्ष्य है। १. नानाप्रवक्तृकविचारविषया वाक्यसन्दृब्धिः कथा'—इति तात्पर्यटीकासम्मतं कथालक्षणम् । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

६० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० जल्पे निग्रहस्थानविनियोगाद् वादे तत्प्रतिषेधः । प्रतिषेधे कस्यचिदभ्यनुज्ञा- नार्थम् ‘सिद्धान्ताविरुद्धः’ इति वचनम् । ‘सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः’ ( १. २. ६ ) इति हेत्वाभासस्य निग्रहस्थानस्याभ्यनुज्ञा वादे । ‘पञ्चावयवोपपन्नः’ इति—‘हीनमन्यतमेनाप्यवयवेन न्यूनम्’ (५. २. १२), ‘हेतूदाहरणाधिकमधिकम्’ (५. २. १३) इति च—एतयोरभ्यनुज्ञानार्थामिति । अवयवेषु प्रमाणतर्कान्तर्भावे, पृथक् प्रमाणतर्कग्रहणं साधनोपालम्भव्यति- षङ्गज्ञापनार्थम् । अन्यथोभावपि पक्षौ स्थापनाहेतुना प्रवृत्तौ वाद इति स्यात् । अन्तरेणापि चावयवसम्बन्धं प्रमाणान्यर्थं साधयन्तीति दृष्टम्, तेनापि कल्पेन ‘साधनोपालम्भौ वादे भवतः’ इति ज्ञापयति । ‘छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपा- लम्भो जल्पः’ इति वचनाद् विनिग्रहो जल्प इति मा विज्ञायि, छलजातिनिग्रह- स्थानसाधनोपालम्भ एव जल्पः, प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भो वाद एव—इति मा क्योंकि निग्रहस्थान को जल्प में स्वीकार किया गया है, अतः उसका वाद में प्रयोग नहीं होता । निग्रहस्थान के निषिद्ध होने पर भी किसी एक की अभ्यनुज्ञा ( स्वीकृति ) के लिये लक्षण में सिद्धान्ताविरुद्ध पद दिया गया है । ‘अभ्युपेतसिद्धान्त के विरोध में जो अर्थ है वह विरुद्ध होता हैं’ ( १. २. ६ )—इस ‘विरुद्ध’ हेत्वाभासरूप निग्रहस्थान की वाद में स्वीकृति है । पञ्चावयवोपपन्न पद ‘“पञ्चावयवों में किसी एक अवयव से हीन वाक्य का प्रयोग ‘हीन’ निग्रहस्थान होता है” (५. २. १. १२) तथा “एक से कार्य सिद्ध होनेपर भी वाक्य में अधिक हेतु या उदाहरणों का प्रयोग ‘अधिक’ निग्रहस्थान कहलाता है” (५. २. १३) इन दोनों निग्रहस्थानों की स्वीकृति के लिये है । अवयवों में प्रमाण तथा तर्क का अन्तर्भाव हो सकने पर भी उनका लक्षण में पृथक् ग्रहण स्थापना तथा निषेध का व्यतिषङ्ग ( अनुबन्ध ) बतलाने के लिये किया है । अन्यथा वाद में प्रवृत्त दोनों ही पक्ष अपने-अपने अर्थ की स्थापनामात्र करेंगे, तब पक्ष- स्थापनामात्र ‘वाद’ कहलाने लगेगा । तथा अवयव-सम्बन्ध के विना भी प्रमाण अर्थ की साधना कर देते हैं—ऐसा लोक में देखा जाता है । इस कल्प में प्रमाण से ‘स्थापना’ और ‘प्रतिषेध’ वाद में हो सकते हैं—यह ज्ञापित करते हैं । उक्त दोनों पदों के ग्रहण का यह भी प्रयोजन है कि अनुपद वक्ष्यमाण ‘छल जाति-निग्र- हस्थान-साधनोपालम्भयुक्त पक्ष-प्रतिपक्षपरिग्रह जल्प कहलाता है’ ( १. २. २ )—इस वचन से ‘जल्प वादगत निग्रहरहित होता है’—ऐसा न समझ ले । अथ च, यह भी न समझ बैठे कि ‘छल-जाति-निग्रहस्थान साधनोपालम्भ ही जल्प है’ या ‘प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भ ही वाद CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

२. सू० ] कथालक्षणप्रकरणम् ६१

२. सू० ] कथालक्षणप्रकरणम् ६१ विज्ञायि-इत्येवमर्थं पृथक् प्रमाणतर्कग्रहणमिति ॥ १ ॥ जल्पलक्षणम् यथोक्तोपपन्नश्छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भो जल्पः ॥ २ ॥ यथोक्तोपपन्न इति—प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चाव- यवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहः१। छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भ इति— छलजातिनिग्रहस्थानैः साधनम्, उपालम्भश्चास्मिन् क्रियत इति एवंविशेषणो जल्पः। न खलु वै छलजातिनिग्रहस्थानैः साधनं कस्यचिदर्थस्य सम्भवति, प्रतिषे- धार्थतैवँषां सामान्यलक्षणे विशेषलक्षणे च श्रूयते—'वचनविघातोऽर्थविकल्पो- पपत्त्या छलम्' (१. २. १०) इति, 'साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं जातिः' ( १. २. १८), 'विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम्' ( १. २. १९ ) इति । विशेषलक्षणेष्वपि यथास्वमिति । न चैतद्विजानीयात्-प्रतिषेधार्थतयैवार्थं साध- होता है। इस सब को हृदय में रखकर सूत्रकार ने 'वाद' के लक्षण में प्रमाण तथा तर्क का ग्रहण किया है ।। १ ।। उक्त वाद के लक्षणों से युक्त तथा छल, जाति, निग्रहस्थानों से स्थापना और प्रतिषेध वाले पक्ष-प्रतिपक्षों का परिग्रहक वाक्यसमूह 'जल्प' कहलाता है ॥ २ ॥ यथोक्तोपपन्न पद से वादलक्षणोक्त प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भ सिद्धान्ताविरुद्ध पञ्चावयवोपपन्न पक्ष-प्रतिपक्षपरिग्रह समझना चाहिये। छलजाति-निग्रहस्थानसाधनोपालम्भ पद से सूत्रकार कहना चाहते हैं कि छल, जाति, निग्रहस्थानों से जिस कथा में स्थापना तथा प्रतिषेध किया जाये वह 'जल्प' है। शङ्का—छल, जाति, निग्रहस्थानों से किसी अर्थ की सिद्धि नहीं होती, उलटे इनके सामान्य लक्षणों या विशेष लक्षणों में प्रतिषेधार्थता ही सुनने में आती है। जैसे—'अर्थ- विकल्पोपपादन द्वारा वचनविघात 'छल' कहलाता हैं' (१. २. १०.), 'साधर्म्य-वैधर्म्य द्वारा अर्थ का प्रतिषेध करना 'जाति' कहलाती हैं' (१. २. १८), 'अर्थ की विप्रतिपत्ति या अप्रतिपत्ति 'निग्रहस्थान' कहलाता हैं' (१. २. १९)—ये इनके सामान्य लक्षण हैं, विशेष लक्षणों में भी इसी तरह समझें। यदि यह कहें कि प्रयोक्ता को यह ज्ञात कराने के लिये कि 'प्रतिषेधार्थता से ही ये तीनों अर्थ की सिद्धि करते हैं' ये लक्षण किये हैं तो १. एतस्मिन्नर्थे वार्त्तिककारस्यारुचिः । स तु 'सिद्धान्ताविरुद्धः', 'पञ्चावयवोपपन्नः' इति वादलक्षणस्थे पदे नियमार्थे एवेत्याह ।

६२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० यन्तीति, छलजातिनिग्रहस्थानोपालम्भो जल्प इत्येवमप्युच्यमाने विज्ञायत एतदिति ? प्रमाणैः साधनोपालम्भयोश्छलजातिनिग्रहस्थानानामङ्गभावः, स्वपक्ष- रक्षणार्थत्वात्, न स्वतन्त्राणां साधनभावः। यत्तत्प्रमाणैरर्थस्य साधनं तत्र छलजातिनिग्रहस्थानानामङ्गभावः, स्वपक्षरक्षणार्थत्वात् । तानि हि प्रयुज्य- मानानि परपक्षविघातेन स्वपक्षं रक्षन्ति । तथा चोक्तम्—'तत्त्वाध्यवसायसंरक्ष- णार्थं जल्पवितण्डे, बीजप्ररोहसंरक्षणार्थं कण्टकशाखावरणवत्' (४. २. ५० ) इति । यश्चासौ प्रमाणैः प्रतिपक्षस्योपालम्भस्तस्य चैतानि प्रयुज्यमानानि प्रति- षेधविघातात् सहकारिणि भवन्ति । तदेवमङ्गीभूतानां छलादीनामुपादानं जल्पे, न स्वतन्त्राणां साधनभावः । उपालम्भे तु स्वातन्त्र्यमप्यस्तीति ॥ २ ॥ वितण्डलक्षणम् स प्रतिपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा ॥ ३ ॥ स जल्पो वितण्डा भवति । किंविशेषणः ? प्रतिपक्षस्थापनाया हीनः । यौ तौ समानाधिकरणौ विरुद्धौ धर्मौ पक्षप्रतिपक्षावित्युक्तम्, तयोरेकतरं वैतण्डिको न स्थापयतीति, परपक्षप्रतिषेधेनैव प्रवर्त्तत इति । 'छलजातिनिग्रहस्थानोपालम्भ ही जल्प होता है' इतना लक्षण करने से भी यह बात ज्ञात हो जाती ? उ० प्रमाणों द्वारा स्वपक्षस्थापन तथा परपक्षप्रतिषेध में ये तीनों सहायक हैं; क्योंकि ये तीनों ही स्वपक्षरक्षण करते हैं। हाँ, ये स्वातन्त्र्येण कोई अर्थसिद्धि नहीं करते, अपितु प्रमाणों द्वारा की जा रही अर्थसिद्धि में स्वपक्षरक्षण-कार्य द्वारा सहायक होते हैं । इनका प्रयोग किया जाये तो परपक्ष-खण्डन द्वारा भी स्वपक्षरक्षण करते हैं। इसीलिये आगे कहा है—'जल्प, वितण्डा का प्रयोग तत्त्वाध्यवसाय-संरक्षण के लिये होता है, जैसे छोटे- छोटे पौधों की रक्षा के लिये उनके चारों ओर कांटेदार झाड़ी लगा दी जाती है' (४. २. ५०)। प्रमाणों द्वारा प्रतिपक्ष के निषेध में वादी द्वारा प्रयुक्त हुए ये तीनों अपने प्रतिषेधविघातक कार्य द्वारा सहायक होते हैं । अतः निष्कर्ष यह निकला कि जल्प में स्वपक्षस्थापना के लिये छलादि का ग्रहण 'अर्थसाधन के सहायक' रूप में होता है, न कि स्वतन्त्रतया । हाँ, परपक्षप्रतिषेध में ये स्वतन्त्र रूप से भी प्रयुक्त हो सकते हैं ॥ २ ॥ उपर्युक्त जल्प जब प्रतिपक्षस्थापनाहीन होता है तो 'वितण्डा' कहलाता है ॥ ३ ॥ वह जल्प 'वितण्डा' भी हो सकता है। कब ? जब वह प्रतिपक्ष-स्थापना से रहित हो । हम अनुपद में ही एकाधिकरणक दो विरुद्ध धर्मों को 'पक्ष-प्रतिपक्ष' कह आये हैं (१. २. १), यह वितण्डावादी उनमें से एक की भी स्थापना करने में कोई दिलचस्पी नहीं लेता, केवल परपक्षखण्डन में ही लगा रहता है। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

हेत्वाभासप्रकरणम् [ ४-९ ]

५. सू० ] हेत्वाभासप्रकरणम् ६३ अस्तु तर्हि स प्रतिपक्षहीनो वितण्डा ? यद्वै खलु तत्परप्रतिषेधलक्षणं वाक्यं स वैतण्डिकस्य पक्षः, न त्वसौ साध्यं कञ्चिदर्थं प्रतिज्ञाय स्थापयतीति । तस्माद्यथान्यासमेवास्त्विति ॥ ३ ॥ हेत्वाभासप्रकरणम् [ ४-९ ] हेतुलक्षणाभावादहेतवो हेतुसामान्याद्धेतुवदाभासमानाः । त इमे— सव्यभिचारविरुद्धप्रकरणसमसाध्यसमकालातीता हेत्वाभासाः ॥ ४ ॥ (क) सव्यभिचारलक्षणम् तेषाम्— अनैकान्तिकः सव्यभिचारः ॥ ५ ॥ व्यभिचारः = एकत्राव्यवस्थितिः¹ । सह व्यभिचारेण वर्त्तते इति सव्य- भिचारः । निदर्शनम्—'नित्यः शब्दोऽस्पर्शत्वात्, स्पर्शवान् कुम्भोऽनित्यो दृष्टः, न च तथा स्पर्शवान् शब्दः, तस्मादस्पर्शत्वान्नित्यः शब्दः' इति । दृष्टान्ते—स्पर्शवत्त्वमनित्यत्वं च धर्मौ न साध्यसाधनभूतौ दृश्येते, स्पर्शवाँ- क्यों न तब 'प्रतिपक्षहीन जल्प वितण्डा है'—इतना ही लक्षणसूत्र रखा जाये ? वितण्डावादी के परपक्षखण्डनपरक वाक्य ही औपचारिक रूप से उसका 'पक्ष' है ! हाँ, यद्यपि वह स्पष्टरूप से किसी साध्य अर्थ की प्रतिज्ञा करके अपना कोई पक्ष नहीं रखता; फिर भी किसी न किसी रूप में उसका भी प्रतिपक्ष बन ही सकता है, अतः सूत्रकारोक्त लक्षण ही उचित है ॥ ३ ॥ हेतुलक्षण न घटने से वस्तुतः जो अहेतु हों, परन्तु हेतु-सादृश्य से जिनका हेतु की तरह आभास (प्रतीति) होता हो, वे 'हेत्वाभास' कहलाते हैं। वे ये हैं— १. सव्यभिचार, २. विरुद्ध, ३. प्रकरणसम, ४. साध्यसम तथा ५. कालातीत— ये पांच 'हेत्वाभास' कहलाते हैं ॥ ४ ॥ उनमें— जो ( हेतु ) एक ही (साध्य तथा साध्याभाव) के अन्त (अधिकरण) में न रहे उसे 'सव्यभिचार' हेत्वाभास कहते हैं ॥ ५ ॥ 'व्यभिचार' से तात्पर्य है—एक जगह न रहना। व्यभिचार के साथ जो प्रवृत्त हो वह 'सव्यभिचार' कहलाता है। इसका उदाहरण—'शब्द नित्य है, अस्पर्श होने से; लोक में स्पर्शवान् घट अनित्य देखा गया है, शब्द स्पर्शवान् नहीं है अतः अस्पर्शत्वहेतु से वह नित्य है'। यहाँ दृष्टान्तस्थ स्पर्शवत्त्व अनित्यत्व हेतुओं में साध्यसाधनभाव नहीं देखा १. व्यवस्था—इति पाठ० ।

६४ . वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १ . अ० २ . आ० श्चाणुर्नित्यश्चेति । आत्मादौ च दृष्टान्ते-'उदाहरणसाधर्म्यात्साध्यसाधनं हेतुः' ( १. १. ३४ ) इति अस्पर्शत्वादिति हेतुर्नित्यत्वं व्यभिचरति—'अस्पर्शा बुद्धिर- नित्या च' इति । एवं द्विविधेऽपि दृष्टान्ते व्यभिचारात्साध्यसाधनभावो नास्तीति लक्षणाभावादहेतुरिति । नित्यत्वमप्येकोऽन्तः, अनित्यत्वमप्येकोऽन्तः, एकस्मिन्नन्ते विद्यत इति ऐकान्तिकः, विपर्ययादनैकान्तिकः, १उभयान्तव्यापकत्वादिति ॥ ५ ॥ (ख) विरुद्धलक्षणम् सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः ॥ ६ ॥ तं विरुणद्धीति तद्विरोधी, अभ्युपेतं सिद्धान्तं व्याहन्तीति । यथा—'सोऽयं विकारो व्यक्तेरपैति नित्यत्वप्रतिषेधात्', न नित्यो विकार उपपद्यते । 'अपैतोऽपि विकारोऽस्ति, विनाशप्रतिषेधात्' । सोऽयं नित्यत्वप्रतिषेधादिति हेतुर्व्यक्तेर- पैतोऽपि विकारोऽस्तीत्यनेन स्वसिद्धान्तेन विरुध्यते । कथम् ? व्यक्तिः = आत्म- लाभः, अपायः = प्रच्युतिः; यद्यात्मलाभात् प्रच्युतो विकारोऽस्ति ? नित्यत्वप्रति- षेधो नोपपद्यते । यद्व्यक्तेरपेतस्यापि विकारस्यास्तित्वं तत् खलु नित्यत्वमिति । जाता; क्योंकि स्पर्शवान् भी अणु और नित्य हो सकता है। आत्मा-आदि दृष्टान्तस्थ “उदाहरणसादृश्य से साध्य का साधक 'हेतु' है” ( १ . १ . ३४ )—इस हेतुलक्षण से 'अस्पर्शत्व' हेतु नित्यत्व से व्यभिचरित होगा; क्योंकि बुद्धि अस्पर्शवती होती हुई भी अनित्य है। इस प्रकार दोनों ही तरह के दृष्टान्तों में साध्यसाधनभाव न होने से हेतु- लक्षण नहीं घट पायेगा, अतः वह हेतु नहीं बन सकता । यहाँ नित्यत्व एक अन्त है, अनित्यत्व भी एक अन्त है। एक अन्त (अधिकरण) में साध्यसाधनभाव रहे अतः 'ऐकान्तिक' हेतु कहते हैं। इसके विपरीत 'अनैकान्तिक' कह- लाता है; क्योंकि वह दोनों अन्तों में व्याप्त रहता है ॥ ५ ॥ जो हेतु अभ्युपगतार्थ का विरोधी हो वह 'विरुद्ध' हेत्वाभास कहलाता है ॥ ६ ॥ उसका जो विरोध करे वह हुआ 'तद्विरोधी' अर्थात् जो प्रतिज्ञा तथा हेतु से प्रकाशित सिद्धान्त का विरोध करे। जैसे साङ्ख्यकार का मत है—'परिणामाख्य कार्य अभिव्यक्त स्वरूप से विश्लिष्ट हो जाता है, अनित्य होने से', 'अभिव्यक्तिरहित वह परिणामाख्य कार्य रहता भी है, स्वरूपहानि न होने से'; यहाँ 'विकार नित्य उपपन्न नहीं होता' यह हेतु 'व्यक्ति से असंश्लिष्ट होकर भी विकार रहता है, स्वरूप-हानि न हो ने से' इस स्वसिद्धान्त से विरुद्ध पड़ता है। कैसे? 'व्यक्ति' कहते हैं आत्मलाभ को, 'प्रच्युति' कहते हैं असंश्लेष को। उसमें नित्यत्वप्रतिषेध उपपन्न नहीं है, क्योंकि आत्मसत्ता से अलग होकर भी विकार १. 'उभयत्र'—इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

७. सू० ] हेत्वाभासप्रकरणम् ६५

७. सू० ] हेत्वाभासप्रकरणम् ६५ नित्यत्वप्रतिषेधो नाम विकारस्यात्मलाभात्प्रच्युतेरुपपत्तिः । यदात्मलाभात्प्रच्यवते तदनित्यं दृष्टम्, यदस्ति न तदात्मलाभात् प्रच्यवते । अस्तित्वं चात्म- लाभात् प्रच्युतिरिति च-विरुद्धावेतौ धर्मौ न सह सम्भवत इति । सोऽयं हेतुर्यं सिद्धान्तमाश्रित्य प्रवर्त्तते तमेव व्याहन्तीति । (ग) प्रकरणसमलक्षणम् यस्मात् प्रकरणचिन्ता स निर्णयार्थमपदिष्टः प्रकरणसमः ॥ ७ ॥ विमर्शाधिष्ठानौ पक्षप्रतिपक्षावुभावनवसितौ प्रकरणम् । तस्य चिन्ता = विमर्शात्प्रभृति प्राङ्निर्णयाद्यत्समीक्षणम् । सा जिज्ञासा यत्कृता स निर्णयार्थं प्रयुक्त उभयपक्षसाम्यात् प्रकरणमनतिवर्तमानः प्रकरणसमो निर्णयाय न प्रकल्पते । प्रज्ञापनं तु—‘अनित्यः शब्दो नित्यधर्मानुपलब्धेः’ इति । अनुपलभ्यमान- नित्यधर्मकमनित्यं दृष्टं स्थाल्यादि । ‘नित्यः१ शब्दोऽनित्यधर्मानुपलब्धेः’ अनुपलभ्यमानानित्यधर्मकं नित्यं दृष्टमाकाशादि१ । रहे—यही उसका नित्यत्व हैं; क्योंकि नित्यत्वप्रतिषेध का मतलब है—विकार का आत्मसत्ता से प्रच्युति का उपपादन अर्थात् जो आत्मलाभ से प्रच्युत नहीं होता । अस्तित्व तथा आत्मलाभ से प्रच्युति—ये दोनों विरुद्ध धर्म एकत्र नहीं रह सकते । इस प्रकार यह नित्यत्वप्रतिषेध हेतु जिस सिद्धान्त को लेकर प्रवृत्त हुआ था, उसी का व्याघात कर रहा है ॥ ६ ॥ जिसको लेकर प्रकरण पर विचार किया जा रहा हो और वही निर्णय के लिये प्रयुक्त हो वह हेतु ‘प्रकरणसम’ हेत्वाभास कहलाता है ॥ ७ ॥ संशयाधिष्ठान अनिर्णीत पक्ष-प्रतिपक्ष ही ‘प्रकरण’ कहलाते हैं । प्रकरण की चिन्ता अर्थात् विमर्श से लेकर निर्णय तक का समीक्षण । वह जिज्ञासा जिसकी वजह से हो वही निर्णय के लिये प्रयुक्त कर दिया जाए—ऐसा हेतु प्रकरण की परिधि में रहता हुआ ‘प्रकरणसम’ कहलाता है । ऐसा हेतु साधक या बाधक न रहने से निर्णय करने में असमर्थ है । उदाहरण—‘शब्द अनित्य है, नित्यधर्म की उपलब्धि न होने से’ यह अनुमान । यहाँ अनुपलब्ध्यमान नित्यधर्मक अनित्य भी देखा गया है, जैसे—स्थाल्यादि । ‘शब्द नित्य है, अनित्यधर्म की उपलब्धि न होने से’—यहाँ भी अनुपलब्ध्यमान अनित्यधर्मक नित्य देखा गया है, जैसे—आकाशादि । १-१. अयं पाठो नास्ति क्वचित् पुस्तके । न्या० द० : ५

६६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० यत्र समानो धर्मः संशयकारणं हेतुत्वेनोपादीयते स संशयसमः सव्यभिचार एव। या तु विमर्शस्य विशेषापेक्षिता उभयपक्षविशेषानुपलब्धिश्च सा प्रकरणं प्रवर्तयति। यथा-- शब्दे नित्यधर्मो नोपलभ्यते, एवमनित्यधर्मोऽपि; सेयमुभय- पक्षविशेषानुपलब्धिः प्रकरणचिन्तां प्रवर्तयति। कथम् ? विपर्यये हि प्रकरण- निवृत्तेः। यदि नित्यधर्मः शब्दे गृह्येत, न स्यात्प्रकरणम् । यदि वा अनित्य- धर्मो गृह्येत, एवमपि निवर्तेत प्रकरणम् । सोऽयं हेतुरुभौ पक्षौ प्रवर्तयन्नन्य- तरस्य निर्णयाय न प्रकल्पते ॥ ७ ॥ (घ) साध्यसमलक्षणम् साध्याविशिष्टः साध्यत्वात् साध्यसमः ॥ ८ ॥ द्रव्यं छायेति साध्यम्, गतिमत्त्वादिति हेतुः साध्येनाविशिष्टः साधनीयत्वात् साध्यसमः । अयमप्यसिद्धत्वात्साध्यवत्प्रज्ञापयितव्यः । साध्यं तावदेतत्—किं पुरुषवच्छायापि गच्छति, आहोस्विदावरकद्रव्ये संसर्पति, आवरणसन्ताना- दसन्निधिसन्तानोऽयं तेजसो गृह्यत इति ? सर्पता खलु द्रव्येण यो यस्तेजो- जहां संशयकारण समानधर्म हेतुरूप से दिया गया हो वह 'संशयसम' हेत्वाभास कहलाता है, जो कि सव्यभिचार हेत्वाभास में अन्तर्भूत है । विमर्श की विशेषापेक्षित उभयपक्ष-चिन्ताओं में विशेषानुपलब्धि है वही प्रकरण को प्रवृत्त करती है । जैसे शब्द में नित्यधर्म नहीं मिलता; वैसे ही अनित्यधर्म भी नहीं मिलता—यह उभयपक्ष की विशेषा- नुपलब्धि ही प्रकरण पर समीक्षण का प्रारम्भ करती है; क्योंकि विपरीत स्थिति होने पर प्रकरण की निवृत्ति ही हो जाती है। यदि शब्द में नित्य धर्म मानोगे तो प्रकरण उठेगा नहीं, यदि केवल अनित्य धर्म मानोगे तो भी प्रकरण की निवृत्ति ही होगी। इस प्रकार, ऐसा हेतु जो दोनों पक्षों में प्रवृत्त हो सकता हो वह किसी एक तरफ का निर्णय करने में समर्थ नहीं होता ॥ ७ ॥ साध्य से अविशिष्ट ( साधनीय ) हेतु स्वयं साध्य होने से 'साध्यसम' हेत्वाभास होता है ॥ ८ ॥ 'छाया द्रव्य है, गतिमान् होने से'–इस अनुमान में 'द्रव्य छाया' साध्य है, 'गतिमत्त्व' यह हेतु साध्य से अविशिष्ट ही है; क्योंकि इसकी भी साध्य की तरह सिद्धि करनी पड़ेगी, इसलिए यह 'साध्यसम' है। अर्थात् यह हेतु भी असिद्ध है, अतः साध्य की तरह इसे भी सिद्ध करना पड़ेगा ! इस अनुमान में साध्य है—क्या पुरुष की छाया वस्तुतः चलती है, या आवश्यक द्रव्य में छिपजाती है, या यह आवरणसन्तान से तेज की असन्निधिसन्तान रूप ही तो नहीं CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

९. सू० ] हेत्वाभासप्रकरणम् ६७

९. सू० ] हेत्वाभासप्रकरणम् ६७ भाग आवृयते तस्य तस्यासन्निधिरेवाविच्छिन्नो गृह्यत इति । आवरणं तु प्राप्तिप्रतिषेधः ॥ ८ ॥ (ङ) कालातीतलक्षणम् कालात्ययापदिष्टः कालातीतः ॥ ९ ॥ कालात्ययेन युक्तो यस्यार्थैकदेशोऽपदिश्यमानस्य स कालात्ययापदिष्टः 'कालातीतः' इत्युच्यते । निदर्शनम्—'नित्यः शब्दः संयोगव्यंग्यत्वाद् रूपवत्' । प्रागूर्ध्वं च व्यक्तेरवस्थितं रूपं प्रदीपघटसंयोगेन व्यज्यते । तथा च शब्दोऽप्यव- स्थितो भेरीदण्डसंयोगेन व्यज्यते, दारुपरशुसंयोगेन वा । तस्मात्संयोगव्यंग्यत्वात् 'नित्यः शब्दः' इत्ययमहेतुः, कालात्ययापदेशात् । व्यञ्जकस्य संयोगस्य कालं न व्यङ्ग्यस्य रूपस्य व्यक्तिरत्येति । सति प्रदीपघटसंयोगे रूपस्य ग्रहणं भवति, न निवृत्ते संयोगे रूपं गृह्यते । निवृत्ते दारुपरशुसंयोगे दूरस्थेन शब्दः श्रूयते विभागकाले, सेयं शब्दस्य व्यक्तिः संयोगकालमत्येतीति न संयोगनिमित्ता भवति । कस्मात् ? कारणाभावाद्धि कार्याभाव इति । एवमुदाहरणसाधर्म्य- स्याभावादसाधनमयं हेतुर्हेत्वाभास इति । है ! चलते हुए द्रव्य से तेज का जो जो भाग ढक जाता है उससे उस तेज की अविच्छिन्न असन्निधि ही तो 'छाया' कहलाती है । आवरण से तात्पर्य है प्राप्ति-प्रतिषेध ॥ ८ ॥ जिस प्रयुज्यमान हेतु का एकदेश कालात्यय से युक्त हो वह 'कालातीत' हेत्वा- भास कहलाता है ॥ ९ ॥ जिस अर्थानुमान में प्रयुज्यमान हेतु का एकदेश कालात्यय से युक्त हो वह काला- त्ययापदिष्ट 'कालातीत' कहलाता है । उदाहरण—'शब्द नित्य है, संयोगव्यङ्ग्य होने से, रूप की तरह' । जैसे पहले या पीछे घट व्यक्ति में रहा हुआ रूप प्रदीपघट-संयोग से व्यक्त हो जाता है, इसी तरह निहित (अव्यक्त) शब्द भेरीदण्डसंयोग से या कुठार और काष्ठ के संयोग से व्यक्त हो जाता है; अतः 'संयोगव्यङ्ग्य होने से शब्द नित्य हैं' में 'संयोगव्यङ्ग्य' यह हेतु नहीं बनेगा; क्योंकि यहाँ कालात्ययापदेश है । व्यङ्ग्य रूप की अभिव्यक्ति व्यञ्जक संयोग के काल को अतिक्रान्त नहीं करती । घटप्रदीपसंयोग होने पर ही रूप की अभिव्यक्ति होती है, संयोग के निवृत्त होने पर नहीं हो पाती; परन्तु (हेतुवाक्यावयव में) भेरीदण्ड-संयोग के निवृत्त होने पर दूरस्थ शब्द संयोगाभाव काल में सुनायी देता है, यों यह शब्द की अभिव्यक्ति संयोगकाल को अतिक्रान्त कर जाती है । अतः यह संयोगोत्पन्न नहीं कही जा सकती; सिद्धान्त यह है—कारणाभाव से कार्याभाव होता है । इस नय से यह हेतु उदाहरणसादृश्य न मिलने से साध्य का साधक नही बन सकता, अतः यह हेत्वाभास है । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

अवयवविपर्यासवचनं न सूत्रार्थः१। कस्मात् ?

६८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० अवयवविपर्यासवचनं न सूत्रार्थः१। कस्मात् ? "यस्य येनार्थसम्बन्धो दूरस्थस्यापि तस्य सः। अर्थतो ह्यसमर्थानामानन्तर्यमकारणम्” ॥ इत्येतद्वचनाद्विपर्यसिनोक्तो हेतुरुदाहरणसाधर्म्यात्तथा वैधर्म्यात् साध्यसाधनं हेतुलक्षणं न जहाति। अजहद्धेतुलक्षणं न हेत्वाभासो भवतीति । 'अवयवविपर्यासवचनमप्राप्तकालम्' ( ५. २. ११) इति निग्रहस्थानमुक्तम्, तदेवेदं पुनरुच्यत इति, अतस्तन्न सूत्रार्थः ॥ ९ ॥ छलप्रकरणम् [ १०-१७ ] छललक्षणम् अथ छलम्। वचनविघातोऽर्थविकल्पोपपत्त्या छलम् ॥ १० ॥ न सामान्यलक्षणे छलं शक्यमुदाहर्तुम्, विभागे तूदाहरणानि ॥ १० ॥ [बौद्ध नैयायिक इस सूत्र का अन्यथा व्याख्यान करते हैं-'प्रतिज्ञा' के बाद उदाहर- णादि का पूर्वकाल हेतुवचन के उस काल को अतिक्रान्त कर जाता है, अतः यह हेतुवचन 'कालात्ययापदिष्ट' है। इसका खण्डन करते हुए भाष्यकार कहते हैं-] प्रतिज्ञादि अवयवों में विपर्यास बताना सूत्र का अर्थ नहीं है; क्योंकि- 'जिसका जिसके साथ अर्थसम्बन्ध होता है, वह अर्थसम्बन्ध उसके दूरस्थ होने पर भी हो ही जाएगा, असमर्थ का अर्थ से आनन्तर्य विरोधी नहीं हुआ करता' । इस वचनप्रमाण द्वारा विपर्यास से कहा हुआ हेतु भी उदाहरण के सादृश्य या वैसादृश्य से अपने हेतुत्व को नहीं छोड़ेगा । यतः उसने अपना हेतुलक्षण नहीं छोड़ा, तब वह हेतु हेत्वाभास क्यों कर हो सकेगा ! दूसरी बात यह भी है-आगे निग्रहस्थानवर्णनप्रसङ्ग (५. २. ११) में भी 'अवयव- विपर्यासबोधक अप्राप्तकाल' नामक निग्रहस्थान बताया जायेगा, इस सूत्र का उपर्युक्त अर्थ करने पर वहाँ पुनरुक्ति दोष होगा, अतः यह सूत्रार्थ नहीं है ॥९ ॥ प्रतिवादी के अभिमत अर्थ से विरुद्ध कल्पनोपपादन वचनविघात 'छल' कहलाता है ॥ १० ॥ [वादी, प्रमादी या प्रतिवादी द्वारा समीचीन उत्तर न देने की हालत में विजय- कामना से तदाभास उत्तर भी दे डालता है, सूत्रकार उसी का अब विवेचन कर रहे हैं। इनमें 'जात्युत्तर' स्वपक्ष में भी हानि पहुँचा डालता है, अतः उससे पहले छल का बोध कराना ही उचित है ।] इस छल के सामान्य लक्षण का उदाहरण मिलना असम्भव हैं । हाँ, इसका विभाग करने पर उन विभागों के उदाहरण दिये जा सकते हैं ॥ १० ॥ १. बौद्धाभिमतसूत्रार्थखण्डने प्रक्रमते भाष्यकारः । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१२. सू० ] छलप्रकरणम् ६९

१२. सू० ] छलप्रकरणम् ६९ विभागश्च— तत्त्रिविधम्—वाक्छलम्, सामान्यच्छलम्, उपचारच्छलं चेति ॥ ११ ॥ वाक्छललक्षणम् तेषाम्— अविशेषाभिहितेऽर्थे वक्तुरभिप्रायादर्थान्तरकल्पना वाक्छलम् ॥ १२ ॥ 'नवकम्बलोऽयं माणवकः' इति प्रयोगः। अत्र 'नवः कम्बलोऽस्य' इति वक्तु- रभिप्रायः। विग्रहे तु विशेषः, न समासे। तत्रायं छलवादी वक्तुरभिप्रायादवि- वक्षितमन्यमर्थम्—'नव कम्बला अस्येति तावदभिहितं भवता' इति कल्पयति, कल्पयित्वा चासम्भवेन प्रतिषेधति—'एकोऽस्य कम्बलः कुतो नव कम्बलाः' इति। तदिदं सामान्यशब्दे वाचि छलं वाक्छलमिति। अस्य प्रत्यवस्थानम्—सामान्यशब्दस्यानेकार्थत्वेऽन्यतराभिधानकल्पनायां विशेषवचनम्। 'नवकम्बलः' इत्यनेकार्थाभिधानम्—'नवः कम्बलोऽस्य' इति, 'नव कम्बला अस्य' इति। एतस्मिन् प्रयुक्ते येयं कल्पना 'नव कम्बला अस्य' इत्येतद्भवताऽभिहितं तच्च न सम्भवति' इति, एतस्यामन्यतराभिधानकल्पनायां

अतः अब उसका विभाग किया जा रहा है— १. वाक्छल, २. सामान्यछल, तथा ३. उपचारछल—यों वह तीन प्रकार का होता है ॥ ११ ॥ उनमें समासादिवृत्तिविषयक वाक्छल का व्याख्यान करते हैं— सामान्येन कथित अर्थ में वक्ता के अभिप्राय से विरुद्ध अर्थ की कल्पना 'वाक्छल' कहलाता है ॥ १२ ॥ जैसे 'नवकम्बल वाला यह माणवक है' इस वाक्य में 'नवकम्बल' शब्द से वक्ता का अभिप्राय बहुव्रीहि समास द्वारा 'नवीन कम्बल वाला' में है। इस शब्द के विग्रह में विशेषता है, समास में नहीं। वहाँ यह छलवादी, वक्ता के अभिप्राय से विरुद्ध अन्य अर्थ—'नौ हैं कम्बल जिसके' की कल्पना कर असम्भव अर्थ से उसका खण्डन करता है—'अरे इसके पास तो एक ही कम्बल है, नौ कहाँ से आये !' यह सामान्येन कथित अर्थबोधक वाक् (वाणी) में छल 'वाक्छल' कहलाता है। इसका प्रतीकार यों है—सामान्य शब्द के अनेकार्थक होनेपर किसी एक की कल्पना के लिये विशेषतया कथन करना पड़ता है। 'नवकम्बल' यह शब्द अनेकार्थाभिधायी है— 'नया है कम्बल जिसके' या 'नौ हैं कम्बल जिसके'। इस शब्दप्रयोग में आपकी 'नौ हैं कम्बल जिसके' यह कल्पना सम्भव नहीं है; क्योंकि अनेकों में किसी विशिष्ट एक की

७० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० विशेषो वक्तव्यः । यस्माद्विशेषोऽर्थविशेषु विज्ञायते—अयमर्थोऽनेनाभिहित इति, स च विशेषो नास्ति । तस्मान्मिथ्याभियोगमात्रमेतदिति । प्रसिद्धश्च लोके शब्दार्थसम्बन्धोऽभिधानाभिधेयनियमनियोगः । 'अस्याभि- धानस्यायमर्थोऽभिधेयः' इति समानः सामान्यशब्दस्य, विशेषो विशिष्टशब्दस्य । प्रयुक्तपूर्वाश्चेमे शब्दा अर्थे प्रयुज्यन्ते, नाप्रयुक्तपूर्वाः । प्रयोगश्चार्थसम्प्रत्ययार्थः, अर्थप्रत्ययाच्च व्यवहार इति । तत्रैवमर्थगत्यर्थे शब्दप्रयोगे सामर्थ्यात् सामान्य- शब्दस्य प्रयोगनियमः । 'अजां ग्रामं नय', 'सर्पिराहर', 'ब्राह्मणं भोजय' इति सामान्यशब्दाः सन्तोऽर्थावयवेषु प्रयुज्यन्ते । सामर्थ्याद्यत्रार्थक्रियादेशना सम्भवति तत्र प्रवर्तन्ते, नार्थसामान्ये; क्रियादेशनाऽसम्भवात् । एवमयं सामान्यशब्दः 'नव- कम्बलः' इति योऽर्थः सम्भवति-'नवः कम्बलोऽस्य' इति, तत्र प्रवर्तते; यस्तु न सम्भवति-'नव कम्बला अस्य' इति, तत्र न प्रवर्तते । सोऽयमनुपपद्यमानार्थ- कल्पनया परवाक्योपालम्भस्ते न कल्पत इति ॥ १२ ॥ सामान्यच्छललक्षणम् सम्भवतोऽर्थस्यातिसामान्ययोगादसम्भूतार्थकल्पना सामान्यच्छलम् ॥ १३ ॥ कल्पना करने से पूर्व तद्बोधक कोई विशिष्ट वचन करना चाहिए, जिससे वह विशेष अर्थ जाना जा सके कि इस शब्द द्वारा यहाँ यही अर्थ बोधित है । वैसा विशेष यहाँ कुछ नहीं कहा गया, अतः आपका यह अभियोग मिथ्या है । लोक में समग्र शब्दार्थ-सम्बन्ध अभिधानाभिधेय-नियम से जुड़ा हुआ है—इस शब्द का यही अर्थ अभिधेय है । सामान्य के बोधक शब्द के साधारण तथा विशेष शब्द के विशिष्ट अर्थ होंगे । पहले कभी उस अर्थ के लिये प्रयुक्त हुए शब्द ही आज उस अर्थ में प्रयुक्त किए जा सकते हैं, अपूर्व नहीं; क्योंकि शब्दों का प्रयोग अर्थज्ञान के लिए होता है, अर्थज्ञान से व्यवहार चलता है । इस प्रकार, अर्थज्ञान के लिए शब्द-प्रयोग मानने पर प्रकाशक होने से उस अर्थ में सामान्यशब्द का प्रयोग-नियम भी मानना उचित है । 'अजा को गाँव ले जाओ', 'घी लाओ', ब्राह्मण को खिलाओ' आदि शब्द सामान्य होते हुए अपने अपने किसी एक अर्थ में ही प्रयुक्त होते हैं। जैसे ये अपनी सामर्थ्य से, जहाँ विशेष अर्थक्रियादेशना सम्भव हो, वहीं प्रवृत्त होते हैं। अर्थसामान्य में क्रियादेशना सम्भव नहीं होती । इस रीति से 'नवकम्बल' यह सामान्यशब्द 'नये कम्बल वाला' इस अर्थ में ही प्रयुक्त होता है, 'नौ कम्बल वाला' यह अर्थ वक्ता के अभिप्राय में अन्वित नहीं, अतः उस अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता । इसलिए प्रकृत में उपपन्न न होनेवाली अर्थकल्पना से परवादी के वाक्य का उपालम्भ उचित नहीं है ॥ १२ ॥ अतिसामान्य योग से सम्भव अर्थ की असम्भव अर्थकल्पना करना 'सामान्यच्छल' कहलाता है ॥ १३ ॥

१३. सू० ] छलप्रकरणम् ७१

१३. सू० ] छलप्रकरणम् ७१ 'अहो खल्वसौ ब्राह्मणो विद्याऽऽचरणसम्पन्नः' इत्युक्ते कश्चिदाह—'सम्भ- वति ब्राह्मणे विद्याऽऽचरणसम्पत्' इति । अस्य वचनस्य विघातोऽर्थविकल्पो- पपत्त्याऽसम्भूतार्थकल्पनया क्रियते—यदि ब्राह्मणे विद्याचरणसम्पत्सम्भवति व्रात्येऽपि सम्भवेत्, व्रात्योऽपि ब्राह्मणः, सोऽप्यस्तु विद्याचरणसम्पन्नः । यद्वि- वक्षितमर्थमाप्नोति चात्येति च तदतिसामान्यम् । यथा—ब्राह्मणत्वं विद्याचरण- सम्पदं क्वचिदाप्नोति, क्वचिदत्येति । सामान्यनिमित्तं छलं सामान्यच्छलमिति । अस्य च प्रत्यवस्थानम्—अविवक्षितहेतुकस्य विषयानुवादः, प्रशंसार्थत्वाद् वाक्यस्य । तदत्रासंभूतार्थकल्पनानुपपत्तिः । यथा—सम्भवन्त्यस्मिन् क्षेत्रे शालय इति । अनिराकृतमविवक्षितं च बीजजन्म, प्रवृत्तिविषयस्तु क्षेत्रं प्रशस्यते । सोऽयं क्षेत्रानुवादः, नास्मिन् शालयो विधीयन्त इति । बीजात्तु शालिनिर्वृत्तिः सती न विवक्षिता । एवं सम्भवति ब्राह्मणे विद्याचरणसम्पदिति सम्पद्विषयो ब्राह्मणत्वम्, न सम्पद्धेतुः, न चात्र हेतुर्विवक्षितः । विषयानुवादस्त्वयं प्रशंसार्थत्वाद् वाक्यस्य, सति ब्राह्मणत्वे सम्पद्धेतुः समर्थ इति । विषयं च प्रशंसता वाक्येन यथा हेतुतः किसी के 'अहो, यह ब्राह्मण विद्याशीलसम्पन्न हैं'—ऐसा कहने पर, कोई कहे— 'ब्राह्मण में विद्याशीलसम्पन्नता सम्भव हैं' । इस वचन का विघात अर्थ-विकल्पोपपत्ति द्वारा असम्भूत अर्थकल्पना से करता है—यदि ब्राह्मण में विद्याचरणशीलता सम्भव है तो व्रात्य ( संस्काररहित ) में भी वह सम्भव क्यों नहीं ! क्योंकि व्रात्य भी जाति से तो ब्राह्मण ही है, वह भी विद्याचरणसम्पन्न हो सकता है । जो धर्म विवक्षित अर्थविशेष को ग्रहण भी कर ले तथा अतिरिक्त में भी रहे वह 'अतिसामान्य' है । जैसे—'ब्राह्मणत्व' विद्याचरणरूप सम्पत्ति को कहीं ग्रहण भी कर सकता है, कहीं छोड़ कर अतिरिक्त में भी रह सकता है । ऐसा सामान्याश्रित छल 'सामान्यच्छल' कहलाता है । इसका प्रतीकार यह है—यहाँ अविवक्षितहेतुत्व रहने से पुरुष का विषया-( संपद्वि- षया-)नुवाद हुआ है; क्योंकि वाक्य स्तुतिपरक है । अतः यहाँ असंभूतार्थकल्पना नहीं बनेगी । जैसे—'इस खेत में धान पैदा होता हैं' इस वाक्य में बीजजन्म न तो निराकृत ही है, न विवक्षित है; अपितु खेत ही प्रवृत्तिविषय है, उसी की प्रशंसा की गयी है । इस वाक्यप्रयोग में उस प्रशस्त क्षेत्र का अनुवादमात्र है; यहाँ धान का विधान नहीं है, न तो बीज से चावल की उत्पत्ति करना है । इसी प्रकार ब्राह्मण में विद्याचरण-संपद्वि- षय का अनुवादमात्र किया जाता है, कोई नयी विद्या या शालीनता उसमें अब प्रतिष्ठित नहीं की जाती कि उसे उस संपद् का हेतु मानें । वाक्य के प्रशंसार्थक होने से यह विष- यानुवादमात्र है—ब्राह्मणत्व के रहते उक्त संपद्धेतु होता हुआ वह समर्थ है । (विषय की CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

७२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० फलनिर्वृत्तिर्न प्रत्याख्यायते । तदेवं सति वचनविघातोऽसम्भूतार्थकल्पनया नोपपद्यत इति ॥ १३ ॥ उपचारच्छललक्षणम् धर्मविकल्पनिर्देशेऽर्थसद्भावप्रतिषेध उपचारच्छलम् ॥ १४ ॥ अभिधानस्य धर्मो यथार्थप्रयोगः । धर्मविकल्पः = अन्यत्र दृष्टस्यान्यत्र प्रयोगः । तस्य निर्देशे धर्मविकल्पनिर्देशे¹ । यथा—मञ्चाः क्रोशन्तीति अर्थ- सद्भावेन प्रतिषेधः—'मञ्चस्थाः पुरुषा क्रोशन्ति, न तु मञ्चाः क्रोशन्ति' । का पुनरत्रार्थविकल्पोपपत्तिः ? अन्यथा प्रयुक्तस्यान्यार्थकल्पनम्, भक्त्या प्रयोगे प्राधान्येन कल्पनमुपचारविषयं छलमुपचारच्छलम् । उपचारो नीतार्थः सहचरणादिनिमित्तेन, अतद्भावे तद्वदभिधानम् = उपचार इति । अत्र समाधिः—प्रसिद्धे प्रयोगे वक्तुर्यथाभिप्रायं शब्दार्थयोरभ्यनुज्ञा प्रतिषेधो वा, न च्छन्दतः । प्रधानभूतस्य शब्दस्य भाक्तस्य च गुणभूतस्य प्रयोग उभयोर्लोक- सिद्धः । सिद्धे प्रयोगे यथा वक्तुरभिप्रायः, तथा शब्दार्थावनुज्ञेयौ प्रतिषेध्यौ वा, न प्रशंसा करता हुआ उक्त वाक्य हेतु से फलसंपन्नता का प्रत्याख्यान नहीं करता । इस रीति से असंभूतार्थकल्पना द्वारा वचनविघात वाद में उचित नहीं है ॥ १३ ॥ स्वभावविकल्पनिर्देशक वाक्य में अर्थ की सत्ता का निषेध करना 'उपचारच्छल' कहलाता है ॥ १४ ॥ यथार्थप्रयोग ही शब्द का स्वभाव है, स्वभाव ( धर्म ) विकल्प से तात्पर्य है—अन्यत्र दृष्ट का अन्यत्र प्रयोग । उस स्वभावविकल्प के निर्देशक पदप्रयोग ( वाक्य ) में ( अर्थ की सत्ता का निषेध 'उपचारछल' कहलाता है ) । जैसे—'मञ्चाः क्रोशन्ति' इस वाक्य में अभिप्रेतार्थ की सत्ता का निषेध करके 'मञ्चस्थ पुरुष चिल्ला रहे हैं,' 'न कि मञ्च चिल्ला रहे हैं'—ऐसा कहना । यहाँ अर्थविकल्पोपपादन क्या है ? अन्य अर्थ में प्रयुक्त की अन्य अर्थकल्पना । गौणार्थ से प्रयुक्त वाक्य में मुख्य अर्थ की कल्पना ही उपचारविषयक छल है, अतः यह 'उपचारच्छल' है । 'उपचार' से तात्पर्य है सहचारादि निमित्त द्वारा अर्थ को अन्यत्र ले जाया जाये । संक्षेप में, 'अतत्त्व में तत्त्वकथन' उपचार कहलाता है । इस ( उपचारछल ) का प्रतीकार यह है—शक्य या भाक्त अर्थ में प्रसिद्ध प्रयोग का शब्दार्थ की अभ्यनुज्ञा या उनका निषेध वक्ता के अभिप्रायाधीन होता हैं, न कि स्वेच्छया । प्रधानभूत ( मुख्य ) शब्द का गौण या भाक्त उभयविध अर्थ में प्रयोग लोक में देखा जाता है । सिद्ध प्रयोग में जैसा वक्ता का अभिप्राय हो वैसे ही शब्द, अर्थ की स्वीकृति या अस्वीकृति देना चाहिये, स्वेच्छा नहीं । जब वक्ता का प्रधानभूत अर्थ में १. वार्त्तिककृत्तु 'धर्मविकल्पेन निर्देशे वाक्ये' इत्येवं व्याचष्टे । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

१७. सू० ] छलप्रकरणम् ७३

१७. सू० ] छलप्रकरणम् ७३ च्छन्दतः। यदि वक्ता प्रधानशब्दं प्रयुङ्क्ते ? यथाभूतस्याभ्यनुज्ञा, प्रतिषेधो वा, न च्छन्दतः। अथ गुणभूतम् ? तदा गुणभूतस्य। यत्र तु वक्ता गुणभूतं शब्दं प्रयुङ्क्ते, प्रधानभूतमभिप्रेत्य परः प्रतिषेधति, स्वमनीषया प्रतिषेधोऽसौ भवति, न परोपालम्भ इति ॥ १४ ॥ वाक्छलमेवोपचारच्छलम्, तदविशेषात् ? ॥ १५ ॥ न वाक्छलादुपचारच्छलं भिद्यते; तस्याप्यर्थान्तरकल्पनाया अविशेषात्। इहापि 'स्थान्यर्थो गुणशब्दः, प्रधानशब्दः स्थानार्थः'—इति कल्पयित्वा प्रति- षिध्यत इति ? ॥ १५ ॥ न; तदर्थान्तरभावात् ॥ १६ ॥ न वाक्छलमेवोपचारच्छलम्; तस्यार्थसद्भावप्रतिषेधस्यार्थान्तरभावात्। कुतः ? अर्थान्तरकल्पनातः। अन्या ह्यर्थान्तरकल्पना, अन्योऽर्थसद्भावप्रतिषेध इति ॥ १६ ॥ अविशेषे वा किञ्चित्साधर्म्यादेकच्छलप्रसङ्गः ॥ १७ ॥ तात्पर्य हो तो मुख्य अर्थ की स्वीकृति या अस्वीकृति देना चाहिये, जब गौण अर्थ अभि- प्रेत हो तो गौण की। परन्तु जब वक्ता गौण अर्थ के अभिप्राय से प्रयोग करे और प्रतिवादी प्रधानभूत अर्थ मानकर उसको वाद में रोके तो यह प्रतिवादी का स्वेच्छया ( मनमाना ) प्रयोग है। इससे वादी का प्रतिषेध करना उचित नहीं है ॥ १४ ॥ वाक्छल से उपचारच्छल में कोई भेद न होने से उसे वाक्छल ही क्यों न मान लिया जाये ? ॥ १५ ॥ वाक्छल से उपचारच्छल में कोई भेद नहीं होता; क्योंकि वाक्छल में भी 'नव' शब्द का 'संख्यार्थक नव' अर्थ कल्पित किया जाता है, इसी प्रकार उपचारच्छल में भी मञ्च- स्थपुरुषबोधक 'मञ्च' शब्द को मञ्च अर्थ से कल्पित करके वादी का प्रतिषेध किया जाता है तो उपचारच्छल को भी वाक्छल ही क्यों न मान लें ? ॥ १५ ॥ अर्थभेद होने से उपचारच्छल को वाक्छल नहीं कहा जा सकता ॥ १६ ॥ वाक्छल ही उपचारच्छल नहीं हो सकता; क्योंकि उस उपचारच्छल में अर्थसद्भाव- प्रतिषेध यह अर्थान्तर (भेद) है। किससे ? अर्थान्तरकल्पना से। अर्थान्तरकल्पना दूसरी बात है; तथा जो अर्थ है उसका निषेध करना दूसरी बात। अतः अर्थान्तरकल्पनारूप वाक्छल में अर्थसद्भावप्रतिषेधरूप उपचारच्छल का समावेश नहीं हो सकता ॥ १६ ॥ कुछ सादृश्य से यदि अविशेष मानेंगे तो एक सामान्यछल ही रह जायेगा ॥१७॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

लिङ्गदोषसामान्यप्रकरणम् [ १८-२० ]

७४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [१. अ० २. आ० छलस्य द्वित्वमभ्यनुज्ञाय त्रित्वं प्रतिषिध्यते; किञ्चित्साधर्म्यात् । यथा चायं हेतुस्त्रित्वं प्रतिषेधति, तथा द्वित्वमप्यभ्यनुज्ञातं प्रतिषेधति; विद्यते हि किञ्चित्साधर्म्यं द्वयोरपीति । अथ द्वित्वं किञ्चित्साधर्म्यान्न निवर्तते, त्रित्वमपि न निवर्त्स्यति ॥ १७ ॥ लिङ्गदोषसामान्यप्रकरणम् [ १८-२० ] जातिलक्षणम् अत ऊर्ध्वम्— साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं जातिः ॥ १८ ॥ प्रयुक्ते हि हेतौ यः प्रसङ्गो जायते स जातिः । स च प्रसङ्गः साधर्म्य- वैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानम् = उपालम्भः, प्रतिषेध इति । 'उदाहरणसाधर्म्यात्साध्य- साधनं हेतुः' इत्यस्योदाहरणवैधर्म्येण प्रत्यवस्थानम् । उदाहरणवैधर्म्यात्साध्य- साधनं हेतुः' इत्यस्योदाहरणसाधर्म्येण प्रत्यवस्थानम् । प्रत्यनीकभावाज्जाय- मानोऽर्थो जातिरिति ॥ १८ ॥ निग्रहस्थानलक्षणम् विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम् ॥ १९ ॥ कुछ सादृश्य होने के कारण छल का द्वित्व स्वीकार करके यदि उसके त्रित्व (तीन प्रकार) का निषेध करते हैं तो जैसे यह सादृश्यहेतु उसके त्रित्व का प्रतिषेध करेगा, उसी तरह उसके द्वित्व का भी निषेध कर सकता है; क्योंकि बाकी दो (वाक्छल तथा सामान्य छल) में भी तो किञ्चित् सादृश्य है ही । किञ्चित् सादृश्य से यदि द्वित्व निवृत्त नहीं हो पाता तो उस हेतु से त्रित्व भी कैसे निवृत्त होगा ! अतः छल को तीन प्रकार का ही मानना चाहिये ॥ १७ ॥ इसके बाद— सादृश्य या वैसादृश्य द्वारा हेतुप्रतिषेध 'जाति' कहलाता है ॥ १८ ॥ (छल में साधर्म्य-वैधर्म्य नहीं होते, साधर्म्य या वैधर्म्यमात्र से सम्यक् प्रतिषेध किया भी नहीं जा सकता, बल्कि प्रयोग से किया जा सकता है । इसलिये) हेतु का साधर्म्य वैधर्म्य से जो प्रसङ्ग होता है वह 'जाति' कहलाता है । वह प्रसङ्ग साधर्म्य या वैधर्म्य से प्रत्यवस्थान = उपालम्भ अर्थात् प्रतिषेध कहलाता है । उदाहरण-साधर्म्य से साध्य- साधक हेतु का उदाहरण-वैधर्म्य से प्रतिषेध करना अथवा उदाहरण-वैधर्म्य से साध्य- साधक हेतु का उदाहरण-साधर्म्य से प्रतिषेध करना संक्षेप में विरोधी रूप से उत्पन्न अर्थ 'जाति' है ॥ १८ ॥ विप्रतिपत्ति या अप्रतिपत्ति 'निग्रहस्थान' कहलाता है ॥ १९ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

२०. सू० ] लिङ्गदोषसामान्यप्रकरणम् . ७५

२०. सू० ] लिङ्गदोषसामान्यप्रकरणम् . ७५ विपरीता कुत्सिता वा प्रतिपत्तिर्विप्रतिपत्तिः । विप्रतिपद्यमानः पराजयं प्राप्नोति । निग्रहस्थानं खलु पराजयप्राप्तिः । अप्रतिपत्तिस्त्वारम्भविषयेऽप्यारम्भः = परेण स्थापितं वा न प्रतिषेधति, प्रतिषेधं वा नोद्धरति । असमासाच्च नैते एव निग्रहस्थाने इति ॥ १९ ॥ किं पुनर्दृष्टान्तवज्जातिनिग्रहस्थानयोरभेदः ? अथ सिद्धान्तवद्द्भेदः ? इत्यत आह- तद्विकल्पाज्जातिनिग्रहस्थानबहुत्वम् ॥ २० ॥ तस्य साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानस्य विकल्पाज्जातिबहुत्वम्, तयोश्च विप्रतिपत्त्यप्रतिपत्त्योर्विकल्पान्निग्रहस्थानबहुत्वम् । नानाकल्पः = विकल्पः । विविधो वा कल्पः = विकल्पः । तत्राननुभाषणम्, अज्ञानम्, अप्रतिभा, विक्षेपः मतानुज्ञा, पर्यनुयोज्योपेक्षणम्-इत्यप्रतिपत्तिर्निग्रहस्थाम् । शेषस्तु विप्रतिपत्तिरिति॥ इमे प्रमाणादयः पदार्था उद्दिष्टा लक्षिता यथालक्षणं परीक्षिस्यन्त इति त्रिविधा चास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिर्वेदितव्येति ॥ २० ॥ इति वात्स्यानीये न्यायभाष्ये प्रथमाध्यायस्य द्वितीयमाह्निकम् ।

  • समाप्तश्चायं प्रथमोऽध्यायः * विपरीत या निन्दित प्रतिपादन 'विप्रतिपत्ति' होता है, इस तरह विप्रतिपद्यमान पुरुष वाद में पराजय प्राप्त करता है । पराजय-प्राप्ति ही 'निग्रहस्थान' है । 'अप्रतिपत्ति' उसे कहते हैं कि वादी आवश्यक विषय में भी आरम्भ न करे अथवा प्रतिवादी द्वारा स्थापित पक्ष का खण्डन या मण्डन न करे । यहाँ द्वन्द्व समास न करने में अभिप्राय यह है कि ये ही दो निग्रहस्थान नहीं हैं, अपितु अन्य भी हैं ॥ १९ ॥ क्या पूर्वोक्त 'दृष्टान्त' की तरह जाति और निग्रहस्थान में अभेद है या 'सिद्धान्त' की तरह उनमें भेद है ? इसपर सूत्रकार कहते हैं— उनके अनेक विकल्पों के कारण जाति और निग्रहस्थान बहुत से हैं ॥ २० ॥ उस 'साधर्म्य वैधर्म्य से प्रतिषेध' रूप जाति के बहुत से विकल्प होने के कारण जाति अनेक प्रकार की है । इसी तरह विप्रतिपत्ति या अप्रतिपत्तिरूप निग्रहस्थान के भी अनेक विकल्प होने के कारण वह भी अनेक प्रकार का है । नाना या विविध कल्पनाएँ जिसमें हों, वह 'विकल्प' कहलाता है । उनमें अननुभाषण, अज्ञान, अप्रतिभा, विक्षेप, मतानुज्ञा, पर्यनुयोज्य की उपेक्षा—ये अप्रतिपत्तिरूप निग्रहस्थान हैं, शेष विप्रतिपत्तिरूप निग्रहस्थान हैं ॥ इन प्रमाणादि पदार्थों के उद्देश व लक्षण किये जा चुके; अब लक्षणानुसारी परीक्षा आगामी अध्याय में की जायेगी—शास्त्र की यही त्रिधा प्रवृत्ति समझनी चाहिये ॥२०॥ वात्स्यायनीयन्यायभाष्यसहित न्यायदर्शन के प्रथमाध्याय का द्वितीयाह्निक समाप्त ॥ ⁂ प्रथम अध्याय समाप्त ⁂ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

संशयपरीक्षाप्रकरणम् [ १-७ ]

अथ द्वितीयोऽध्यायः [ प्रथमाह्निकम् ] अत ऊर्ध्वं प्रमाणादिपरीक्षा । सा च ‘विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः’ ( १. १. ४१ ) इत्यग्रे विमर्श एव परीक्ष्यते— संशयपरीक्षाप्रकरणम् [ १-७ ] [ पूर्वपक्षः ] समानानेकधर्माध्यवसायादन्यतरधर्माध्यवसायाद्वा न संशयः ॥ १ ॥ समानस्य धर्मस्याध्यवसात्संशयः, न धर्ममात्रात् । अथ वा—‘समानमनयोर्धर्ममुपलभे’ इति धर्मधर्मिग्रहणे संशयाभाव इति । अथ वा—समानधर्माध्यवसायादर्थान्तरभूते धर्मिणि संशयोऽनुपपन्नः, न जातु रूपस्यार्थान्तरभूतस्याध्यवसायादर्थान्तरभूते स्पर्शे संशय इति । अथ वा—नाध्यवसायादर्थावधारणादनवधारणज्ञानं संशय उपपद्यते, कार्य- कारणयोः सारूप्याभावादिति । एतेनानेकधर्माध्यवसायादिति व्याख्यातम् । अन्यतरधर्माध्यवसायाच्च संशयो न भवति, ततो ह्यन्यतरावधारणमेवेति ॥ १ ॥ अब आगे प्रमाणादि की लक्षणानुसारो परीक्षा की जायेगी । उस परीक्षा में “संशय करके पक्ष-प्रतिपक्ष द्वारा अर्थ का निश्चय ही ‘निर्णय’ कहलाता है” ( १. १. ४१ ) इस लक्षण से परीक्षा में संशय का प्रथम स्थान है, अतः सर्वप्रथम संशय पर ही विचार करते हैं— समान धर्म के अध्यवसाय से, अनेक धर्मों के अध्यवसाय से तथा अन्यतर धर्म के अध्यवसाय से संशय नहीं होता ॥ १ ॥ समान धर्म के अध्यवसाय से संशय होता है, धर्ममात्र के अज्ञायमान रहते संशय नहीं होता । अथवा धर्म-धर्मिग्रहण में—‘इस दोनों के समान धर्म उपलब्ध हैं’ इतने से भी संशय नहीं कहला सकता । अथवा—समान धर्माध्यवसाय से अर्थान्तरभूत धर्मी में संशय नहीं बन सकता; क्योंकि यह कभी नहीं होता कि अर्थान्तरभूत ‘रूप’ के अध्यवसाय से अर्थान्तरभूत ‘स्पर्श’ में संशय होने लगे । अथवा—अर्थावधारणात्मक अध्यवसाय से अनवधारणज्ञानरूप संशय नहीं हो सकता; क्योंकि कार्यकारण की सरूपता नहीं मिलती । जैसे अवधारण निश्चय है, संशय ज्ञान है । इसी तरह ‘अनेक धर्म के अध्यवसाय से’ इस वाक्य का व्याख्यान भी समझना चाहिये । अन्यतर धर्माध्यवसाय से भी संशय नहीं होता, बल्कि उससे अन्यतरावधारण ही होता है ॥ १ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

पादन नहीं कर सकते । और यदि यह अव्यवस्था अपने स्वरूप में व्यवस्थित नहीं है तो

. ४ . सू० ] संशयपरीक्षाप्रकरणम् ७७ विप्रतिपत्त्यव्यवस्थाध्यवसायाच्च ॥ २ ॥ न प्रतिपत्तिमात्रादव्यवस्थामात्राद्वा संशयः, किं तर्हि ? विप्रतिपत्तिमुपल- भमानस्य संशयः । एवमव्यवस्थायामपीति । अथ वा—अस्त्यात्मेत्येके, नास्त्या- त्मेत्यपरे मन्यन्ते—इत्युपलब्धेः कथं संशयः स्यादिति । तथोपलब्धिरव्यवस्थिता, अनुपलब्धिश्चाव्यवस्थितेति विभागेनाध्यवसिते संशयो नोपपद्यत इति ॥ २ ॥ विप्रतिपत्तौ च सम्प्रतिपत्तेः ॥ ३ ॥ यां च विप्रतिपत्तिं भवान् संशयहेतुं मन्यते, सा सम्प्रतिपत्तिः सा हि द्वयोः प्रत्यनीकधर्मविषया । तत्र यदि विप्रतिपत्तेः संशयः, सम्प्रतिपत्तेरेव संशय इति ॥ ३ ॥ अव्यवस्थात्मनि व्यवस्थितत्वाच्चाव्यवस्थायाः ॥ ४ ॥ न संशयः । यदि तावदियमव्यवस्था आत्मनि एव व्यवस्थिता ? व्यवस्थाना- दव्यवस्था न भवतीत्यनुपपन्नः संशयः । अथ अव्यवस्थाऽऽत्मनि न व्यवस्थिता ? विप्रतिपत्ति-अध्यवसाय या अव्यवस्था-अध्यवसाय से भी संशय नहीं होता ॥ २ ॥ अप्रतिपत्ति या अव्यवस्था के अध्यवसायमात्र से संशय नहीं होता, अपितु विप्रति- पत्ति समझने वाले को संशय होता है । इसी तरह अव्यवस्था में समझें । अथवा— 'आत्मा है' यह एक मानते हैं, 'आत्मा नहीं है' यह दूसरे; यह उपलब्धि है तो इतने से संशय कैसे होगी ? तथा जब उपलब्धि भी अव्यवस्थित है, अनुपलब्धि भी अव्यव- स्थित है तब इस विभाग से अध्यवसित विषय के बारे में संशय कैसे कहला सकता है ? ॥ २ ॥ विरुद्धकोटिद्वयज्ञान में भी सम्प्रतिपत्ति (निर्णय) के कारण संशय नहीं हो सकता ॥३॥ जिसको आप विप्रतिपत्ति ('आत्मा है, आत्मा नहीं है'—ऐसा विरुद्धकोटिद्वयज्ञान) कहते हैं वह तो वस्तुतः सम्प्रतिपत्ति ही है; क्योंकि वह दो सम्प्रतिपत्तिविरुद्ध धर्मों को विषय करती हुई अपने अपने विषय में निर्णय ही कराती है । वैसे स्थल में यदि आप विप्रतिपत्ति के कारण संशय बतला रहे हैं तो वह सम्प्रतिपत्ति ने ही संशय बतला रहे हैं ॥ ३ ॥ उपलब्धिव्यवस्था तथा अनुपलब्धिव्यवस्था से होनेवाला संशय भी उक्त अव्यवस्थाओं के व्यवस्थित (निश्चित) होने से ॥ ४ ॥ संशय नहीं कहला सकता । यदि यह अव्यवस्था (सत्ता या असत्ता) अपने में अव- स्थित है तो यह भी एक प्रकार की व्यवस्था ही है, इसे 'अव्यवस्था' कहकर संशयोप- पादन नहीं कर सकते । और यदि यह अव्यवस्था अपने स्वरूप में व्यवस्थित नहीं है तो CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

७८ वात्स्यायनभाष्यसहित न्यायदर्शने [२. अ० १. आ०

एवमतादाम्याद्व्यवस्था न भवतीति संशयाभाव इति ॥ ४ ॥ तथाऽत्यन्तसंशयस्तद्धर्मसातत्योपपत्तेः ॥ ५ ॥ येन कल्पेन भवान् समानधर्मोपपत्तेः संशय इति मन्यते, तेन खल्वत्यन्त- संशयः प्रसज्यते, समानधर्मोपपत्तेरनुच्छेदात् संशयानुच्छेदः । न ह्ययमतद्धर्मा धर्मी विमृश्यमाणो गृह्यते, सततं तु तद्धर्मा भवतीति ॥ ५ ॥ [ सिद्धान्तपक्षः ] अस्य प्रतिषेधप्रपञ्चस्य संक्षेपेणोद्धारः— यथोक्ताध्यवसायादेव तद्विशेषापेक्षात् संशये नासंशयो नात्यन्तसंशयो वा ॥ ६ ॥ संशयानुत्पत्तिः संशयानुच्छेदश्च न प्रसज्यते । कथम् ? यत्तावत् समान- धर्माध्यवसायः संशयहेतुः, न समानधर्ममात्रमिति । एवमेतत्, कस्मादेवं नोच्यते इति ? 'विशेषापेक्षः' इति वचनात् तत्सिद्धेः । विशेषस्यापेक्षा = उसका अपने साथ तादात्म्य न होने से उनमें वह अव्यवस्था घट नहीं सकेगी, तब भी अव्यवस्था के कारण संशय कहाँ होगा ? ॥ ५ ॥ यों तो फिर सदा सर्वत्र संशय होने लगेगा; क्योंकि समानधर्मोपपत्ति तो संशय का कारण सदैव हो सकती है ॥ ५ ॥ जिस नय से आप 'समानधर्मोपत्ति से संशय होता हैं'—ऐसा मानते हैं उस नय में सदा ही संशय होता रहेगा; क्योंकि समानधर्मोपपत्ति समाप्त नहीं होगी और संशय का नैरन्तर्य भी चालू रहेगा । यह निश्चित है कि तद्धर्माभाववान् धर्मी तो कभी विमर्श का विषय नहीं बन सकेगा; क्योंकि तद्धर्म तो उसमें निरन्तर रहेगा ही । [यों इन पाँच सूत्रों से पाँच प्रकार के संशय के लक्षणों पर पूर्वपक्षी ने आपत्ति की है ।] ॥ ५ ॥ इस विस्तृत आपत्ति ( प्रतिषेध ) का संक्षेप से उद्धार ( निराकरण ) किया जा रहा है— यथोक्त (१. १. २३) समानधर्मादि के अध्यवसाय (ज्ञान) से ही उन उन पदार्थों के भेदक धर्म के ज्ञान की अपेक्षा से संशयोत्पत्ति मानने पर पूर्वोक्त असंशय या सदैव संशय नहीं होगा ॥ ६ ॥ पूर्वपक्षी द्वारा कथित संशय के अभाव, तथा संशय का अनुच्छेद (संशयनैरन्तर्य)— दोनों का ही प्रसङ्ग नहीं है; क्योंकि हमने समानधर्माध्यवसाय को संशय का हेतु कहा था, न कि समानधर्ममात्र को । ठीक है, फिर लक्षण में भी ऐसा ही क्यों नहीं पढ़ देते ? विभे- दक धर्म की आवश्यकता के बोधक 'विशेषापेक्ष' शब्द से ही समानधर्माध्यवसाय का बोध