भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 410 में से

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पृष्ठ 78

६० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० जल्पे निग्रहस्थानविनियोगाद् वादे तत्प्रतिषेधः । प्रतिषेधे कस्यचिदभ्यनुज्ञा- नार्थम् ‘सिद्धान्ताविरुद्धः’ इति वचनम् । ‘सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः’ ( १. २. ६ ) इति हेत्वाभासस्य निग्रहस्थानस्याभ्यनुज्ञा वादे । ‘पञ्चावयवोपपन्नः’ इति—‘हीनमन्यतमेनाप्यवयवेन न्यूनम्’ (५. २. १२), ‘हेतूदाहरणाधिकमधिकम्’ (५. २. १३) इति च—एतयोरभ्यनुज्ञानार्थामिति । अवयवेषु प्रमाणतर्कान्तर्भावे, पृथक् प्रमाणतर्कग्रहणं साधनोपालम्भव्यति- षङ्गज्ञापनार्थम् । अन्यथोभावपि पक्षौ स्थापनाहेतुना प्रवृत्तौ वाद इति स्यात् । अन्तरेणापि चावयवसम्बन्धं प्रमाणान्यर्थं साधयन्तीति दृष्टम्, तेनापि कल्पेन ‘साधनोपालम्भौ वादे भवतः’ इति ज्ञापयति । ‘छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपा- लम्भो जल्पः’ इति वचनाद् विनिग्रहो जल्प इति मा विज्ञायि, छलजातिनिग्रह- स्थानसाधनोपालम्भ एव जल्पः, प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भो वाद एव—इति मा क्योंकि निग्रहस्थान को जल्प में स्वीकार किया गया है, अतः उसका वाद में प्रयोग नहीं होता । निग्रहस्थान के निषिद्ध होने पर भी किसी एक की अभ्यनुज्ञा ( स्वीकृति ) के लिये लक्षण में सिद्धान्ताविरुद्ध पद दिया गया है । ‘अभ्युपेतसिद्धान्त के विरोध में जो अर्थ है वह विरुद्ध होता हैं’ ( १. २. ६ )—इस ‘विरुद्ध’ हेत्वाभासरूप निग्रहस्थान की वाद में स्वीकृति है । पञ्चावयवोपपन्न पद ‘“पञ्चावयवों में किसी एक अवयव से हीन वाक्य का प्रयोग ‘हीन’ निग्रहस्थान होता है” (५. २. १. १२) तथा “एक से कार्य सिद्ध होनेपर भी वाक्य में अधिक हेतु या उदाहरणों का प्रयोग ‘अधिक’ निग्रहस्थान कहलाता है” (५. २. १३) इन दोनों निग्रहस्थानों की स्वीकृति के लिये है । अवयवों में प्रमाण तथा तर्क का अन्तर्भाव हो सकने पर भी उनका लक्षण में पृथक् ग्रहण स्थापना तथा निषेध का व्यतिषङ्ग ( अनुबन्ध ) बतलाने के लिये किया है । अन्यथा वाद में प्रवृत्त दोनों ही पक्ष अपने-अपने अर्थ की स्थापनामात्र करेंगे, तब पक्ष- स्थापनामात्र ‘वाद’ कहलाने लगेगा । तथा अवयव-सम्बन्ध के विना भी प्रमाण अर्थ की साधना कर देते हैं—ऐसा लोक में देखा जाता है । इस कल्प में प्रमाण से ‘स्थापना’ और ‘प्रतिषेध’ वाद में हो सकते हैं—यह ज्ञापित करते हैं । उक्त दोनों पदों के ग्रहण का यह भी प्रयोजन है कि अनुपद वक्ष्यमाण ‘छल जाति-निग्र- हस्थान-साधनोपालम्भयुक्त पक्ष-प्रतिपक्षपरिग्रह जल्प कहलाता है’ ( १. २. २ )—इस वचन से ‘जल्प वादगत निग्रहरहित होता है’—ऐसा न समझ ले । अथ च, यह भी न समझ बैठे कि ‘छल-जाति-निग्रहस्थान साधनोपालम्भ ही जल्प है’ या ‘प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भ ही वाद CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

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