भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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[ अथ द्वितीयमाह्निकम् ] कथालक्षणप्रकरणम् [ १-३ ] वादलक्षणम् तिस्रः कथा' भवन्ति—वादः, जल्पः, वितण्डा चेति । तासाम्— प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चावयवोपपन्न पक्षप्रतिपक्ष- परिग्रहो वादः ॥ १ ॥ एकाधिकरणस्थौ विरुद्धौ धर्मो पक्षप्रतिपक्षौ, प्रत्यनीकभावाद्-अस्त्यात्मा, नास्त्यात्मेति । नानाधिकरणस्थौ विरुद्धौ न पक्षप्रतिपक्षौ, यथा—नित्य आत्मा, अनित्या बुद्धिरिति । परिग्रहः = अभ्युपगमव्यवस्था । सोऽयं पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः । तस्य विशेषणं प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः—प्रमाणतर्कसाधनः, प्रमाण- तर्कोपालम्भः । प्रमाणैस्तर्केण च साधनमुपालम्भश्चास्मिन् क्रियत इति। साधनम् = स्थापना । उपालम्भः = प्रतिषेधः । तौ साधनोपालम्भौ उभयोरपि पक्षयोर्व्य- तिषक्तावनुबद्धौ च यावदेको निवृत्त एकतरो व्यवस्थित इति निवृत्तस्योपालम्भः, व्यवस्थितस्य साधनमिति । वाद, जल्प, वितण्डा भेद से कथा तीन प्रकार की होती हैं, उनमें— प्रमाण तथा तर्क द्वारा स्वपक्षस्थापन-परपक्षनिषेध से युक्त, सिद्धान्त के अनुकूल, प्रतिज्ञादि पञ्चावयव सम्पन्न, पक्ष-प्रतिपक्षसहित वाक्यसमूह को 'वाद' कहते हैं ॥ १ ॥ एक अधिकरण में रहनेवाले, परस्पर विरोधी होने से विरोधी धर्म एक दूसरे के पक्ष-प्रतिपक्ष कहलाते हैं। जैसे—'आत्मा हैं' और 'आत्मा नहीं हैं', ये दोनों वाक्य एक दूसरे के पक्ष-प्रतिपक्ष हैं, क्योंकि एक ही अधिकरण की सत्ता का स्थापन या निषेध किया जा रहा है । अनेक अधिकरणवाले विरोधी धर्म आपस में पक्ष-प्रतिपक्ष नहीं बन पाते । जैसे 'आत्मा नित्य हैं' और 'बुद्धि अनित्य हैं', ये दोनों वाक्य परस्पर में पक्ष-प्रतिपक्ष नहीं बन सकते; क्योंकि यहाँ नित्यता-अनित्यता की स्थापना या निषेध पृथक् अधिकरण में किया जा रहा है। परिग्रह = स्वीकृति की व्यवस्था । ऐसा यह पक्ष-प्रतिपक्षपरिग्रह 'वाद' कहलाता है । 'प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भ' वाद का विशेषण है । अर्थात् इस वाद में प्रमाण तर्क ( स्वपक्ष में ) उपस्थित किये जाते हैं तथा ( परपक्ष के ) प्रमाण तर्क का खण्डन होता है । 'साधन' का अर्थ है 'स्थापना', उपालम्भ का अर्थ है 'प्रतिषेध' । ये साधन और उपालम्भ दोनों ही पक्षों में लगे हुए हैं, उनमें अनुबद्ध है । जहाँ एक निवृत्त हुआ दूसरा स्थित हो ही जायगा । संक्षेप में निवृत्त का निषेध तथा व्यवस्थित की स्थापना ही वाद का लक्ष्य है। १. नानाप्रवक्तृकविचारविषया वाक्यसन्दृब्धिः कथा'—इति तात्पर्यटीकासम्मतं कथालक्षणम् । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri