भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 410 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 76

५८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० ‘क्रियावद् द्रव्यम्’ इति लक्षणवचने यस्य द्रव्यस्य क्रियायोगो हेतुतः सम्भवति तत् क्रियावत्, यस्य न सम्भवति तदक्रियमिति । एकधर्मिस्थयोश्च विरुद्धयोर्धर्म- योरयुगपद्भाविनोः कालविकल्पः, यथा—तदेव द्रव्यं क्रियायुक्तं क्रियावत्, अनु- त्पन्नोपरतक्रियं पुनरक्रियमिति । न चायं निर्णये नियमः—विमृश्यैव पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णय इति; किन्त्विन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नप्रत्यक्षेऽर्थावधारणं निर्णय इति । परीक्षा- विषये तु विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः, शास्त्रे वादे च विमर्शवर्जम् ॥ ४१ ॥ इति वात्स्यायनीये न्यायभाष्ये प्रथमाध्यायस्य प्रथममाह्निकम् । धर्म धर्मसामान्य में ही युक्ति द्वारा व्यवस्थित हैं, वह 'समुच्चय' (सामान्य मेलन) कहलाता है; क्योंकि हेतु से विरुद्ध-धर्मद्वयोपपत्ति होती है, जैसे—'द्रव्य क्रियावान् है' इस लक्षणवाक्य में जिस द्रव्य का क्रियायोग हेतु से संभव है वह 'क्रियावान्' है, जिसका क्रियायोग संभव नहीं है, वह 'अक्रिय' है । तथा ऐसे धर्म जो विरुद्ध हों, तथा एकधर्मी में रहते हों, परन्तु एक कालावच्छिन्न न (अयुगपद्भावी) हों, वह 'कालविकल्प' कहलाता है । जैसे—वही द्रव्य जब क्रियायुक्त रहता है तब 'क्रियावान्' कहलाता है, जब वह अनुत्पन्नोपरतक्रिय (उसमें क्रिया न रहे) हो तो 'अक्रिय' कहलाता है । निर्णय में यह नियम नहीं है कि वह सन्देह करके पक्ष-प्रतिपक्ष से अर्थावधारण करे तभी निर्णय कहलाये; अपितु इन्द्रियार्थ-सन्निकर्ष से उत्पन्न प्रत्यक्षविषयक अर्थ का अव- धारण भी निर्णय कहलाता है । परीक्षास्थलों में ही विमर्श करके पक्षप्रतिपक्ष से अर्था- वधारण निर्णय कहलाता है, शास्त्र और वाद के स्थलों में इस निर्णय-लक्षण में 'विमृश्य' पद की आवश्यकता नहीं है ॥ ४१ ॥ वात्स्यायनकृत न्यायभाष्य (सहित न्यायदर्शन) में प्रथमाध्याय के प्रथमाह्निक का व्याख्यान समाप्त ॥