भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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४१. सू०] न्यायोत्तराङ्गप्रकरणम् ५७ पक्षाश्रयौ व्यतिषक्तावनुबन्धेन प्रवर्त्तमानो पक्षप्रतिपक्षावित्युच्येते। तयोरन्यतरस्य निवृत्तिः, एकतरस्यावस्थानमवश्यम्भावि। यस्यावस्थानं तस्यावधारणं निर्णयः। नेदं पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं सम्भवतीति, एको हि प्रतिज्ञातमर्थं हेतुतः स्थापयति, प्रतिषिद्धं१ चोद्धरति द्वितीयस्य। द्वितीयेन स्थापनाहेतुः प्रतिषिद्ध्यते, तस्यैव प्रतिषेधहेतुश्चोद्ध्रियते स निवर्त्तते, तस्य निवृत्तौ योऽवतिष्ठते तेनार्थाव- धारणं निर्णय इति ? उभाभ्यामेवार्थविधारणमित्याह। कया युक्त्या? एकस्य सम्भवो द्वितीय- स्यासम्भवः, तावेतौ सम्भवासम्भवौ विमर्शं सह निवर्त्तयत उभयसम्भवे। उभयासम्भवे त्वनिवृत्तो विमर्श इति। विमृश्येति विमर्शं कृत्वा। सोऽयं विमर्शः पक्षप्रतिपक्षाववद्योत्य२ न्यायं प्रवर्त्तयतीत्युपादीय्त इति। एतच्च विरुद्धयोरेकधर्मिस्थयोर्बोद्धव्यम्। यत्र तु धर्मिसामान्यगतौ विरुद्धौ धर्मौ हेतुतः सम्भवतः तत्र समुच्चयः; हेतुतोऽर्थस्य तथाभावोपपत्तेः। यथा तथा एक की स्थापना अवश्यम्भावी है। जिसकी स्थापना हो उसका निश्चय करना ही ‘निर्णय’ कहलाता है। शङ्का—यह पक्ष-प्रतिपक्ष द्वारा अर्थावधारण नहीं बन पायेगा; क्योंकि इसमें वादी पक्ष प्रतिज्ञात अर्थ की स्थापना हेतु से उपस्थित करता है, तब प्रतिवादी = प्रतिपक्ष उस स्थापनाहेतु का खण्डन करता है। पुनः वादी प्रतिवादी के मत का निराकरण कर स्वस्थापनाहेतु का मण्डन करता है। यों अन्त में एक के ही विजयी होने पर दूसरे के हट जाने से पक्ष या प्रतिपक्ष में से किसी एक के ही निर्णय की स्थिति बनेगी, अतः सूत्र में ‘पक्ष-प्रतिपक्ष द्वारा’—यह पद निरर्थक है ? दोनों से अर्थावधारण होता है—ऐसा ही मानते हैं। किस युक्ति से ? एक (वादी) का स्थापनापक्ष ‘संभव’ तथा दूसरे (प्रतिवादी) का खण्डनपक्ष ‘असम्भव’ कहलाता है, ये दोनों (सम्भव और असम्भव) मिलकर ही विमर्श (संशय) की निवृत्ति करते हैं। दोनों (वादी-प्रतिवादी) के होने पर तो वह (वाद) निवृत्त नहीं होगा, अतः विमर्श ही कहलायेगा, ‘निर्णय’, नहीं। सूत्र में ‘विमृश्य’ का अर्थ है विमर्श करके। यह विमर्श पक्ष-प्रतिपक्ष को नियम से स्वविषय बनाकर न्याय को प्रवृत्त करता है, अतः वाद में इसका ग्रहण करना आव- श्यक है। तथा विरुद्ध होते हुए एकधर्म में रहने वाले सम्भव असम्भव का ही यह विमर्श समझना चाहिये। यह विरोध व्यक्तिभेद और कालभेद से द्विविध है। जहाँ दोनों विरुद्ध १. प्रतिषेधमित्यर्थः। वाद्युक्तहेतोर्दूषणमिति भावः। २. नियमेन विषयीकृत्य।