भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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५६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० कथं पुनरयं तत्त्वज्ञानार्थः, न तत्त्वज्ञानमेवेति ? अनवधारणात् । अनुजा- नात्ययमेकतरं धर्मं कारणोपपत्त्या, न त्ववधारयति, न व्यवस्यति, न निश्चि- नोति—'एवमेवेदम्' इति । कथं तत्त्वज्ञानार्थ इति ? तत्त्वज्ञानविषयाभ्यनुज्ञालक्षणानुग्रहभावितात् १ प्रसन्नादनन्तरप्रमाणसामर्थ्यात्तत्त्वज्ञानमुत्पद्यत इत्येवं तत्त्वज्ञानार्थ इति । सोऽयं तर्कः प्रमाणानि प्रतिसन्दधानः प्रमाणाभ्यनुज्ञानात् प्रमाणसहितो वादेऽपदिष्ट२ इति अविज्ञाततत्त्वमनुजानाति–यथा सोऽर्थो भवति तस्य ३तथा- भावस्तत्त्वमविपर्ययो याथातथ्यम् ॥ ४० ॥ निर्णयलक्षणम् एतस्मिंश्च तर्कविषये— विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः ॥ ४१ ॥ स्थापना = साधनम्, प्रतिषेधः = उपालम्भः । तौ साधनोपालम्भौ पक्षप्रति- उक्त जिज्ञासु का वह तर्क 'तत्त्वज्ञान के लिये' क्यों कहा जाये, उसे तत्त्वज्ञान' ही क्यों न मान लिया जाये ? अवधारण ( निश्चय ) न होने से उसे तत्त्वज्ञान नहीं कहा जा सकता । वह कारणोपपत्ति से किसी एक धर्म को लेकर समझने से अनुमान ही कर पाता है, उनमें भेद नहीं कर पाता, न उनके भेद का प्रयास करता है । न 'यह ऐसा ही है'—यों निश्चयकर पाता है ! यह 'तत्त्वज्ञान के लिये' कैसे है ? तत्त्वज्ञानविषय अभ्यनुज्ञायुक्त जिज्ञासा से भली भांति भावित होने के बाद प्रमाण का समर्थन पाकर तत्त्वज्ञान होता है—इसलिये 'तत्त्व- ज्ञान के लिये' कहा । ऐसा यह तर्क प्रमाणों का समर्थन करता हुआ प्रमाणस्वीकृति से प्रमाणों के साथ हुआ वाद में व्यवहृत होता है । यों वह जिज्ञासु अविज्ञात तत्त्व का अनुज्ञान करता है—'जो अर्थ जैसा है उसका वैसा ही होना तत्त्व है' । इसे ही 'अविपर्यय' या 'याथा- तथ्य' कहते हैं ॥ ४० ॥ इस तर्क के विषय में— विचारकर पक्ष-प्रतिपक्ष द्वारा अर्थ का निश्चय करना 'निर्णय' कहलाता है ॥ ४१ ॥ वाद में स्वपक्षस्थापन साधन है, परपक्षप्रतिषेध उपालम्भ है, ये साधन-उपालम्भ क्रमशः पक्षप्रतिपक्षाश्रित हैं, एक दूसरे के विरुद्ध हैं, परन्तु साथ (एक वाद में) ही रहते हैं, इन्हें ही पक्ष-प्रतिपक्ष कह देते हैं । ( वाद में ) इन दोनों में से किसी एक की निवृत्ति १. '०णानूहाद्भा०' इति पाठ० । २. 'उपदिष्टः', कुत्रचिच्च 'प्रदिष्टः' इति पाठ० । ३. 'यथाभावः' इति पाठ० ।