न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०. सू० ] न्यायोत्तराङ्गप्रकरणम् ५५ स्विन्नेत्थमिति । विमृश्यमानयोर्धर्मयोरेकं कारणोपपत्त्या अनुजानाति—सम्भ- वत्यस्मिन् कारणं प्रमाणं हेतुरिति, कारणोपपत्त्या स्यात्-एवमेतन्नेतरदिति । तत्र निदर्शनम्-योऽयं ज्ञाता ज्ञातव्यमर्थं जानीते तं 'तत्त्वतो भो जानीयं' इति जिज्ञासते । 'स किमुत्पत्तिधर्मकः ? अनुत्पत्तिधर्मकः ?' इति विमर्शः । विमृश्य- मानेऽविज्ञाततत्त्वेऽर्थे यस्य धर्मस्याभ्यनुज्ञाकारणमुपपद्यते तमनुजानाति-‘यद्य- यमनुत्पत्तिधर्मकः, ततः स्वकृतस्य कर्मणः फलमनुभवति ज्ञाता । दुःखजन्मप्रवृत्ति- दोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरमुत्तरं पूर्वस्य पूर्वस्य कारणमुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरा- भावादपवर्ग इति स्यातां संसारापवर्गौ । उत्पत्तिधर्मके ज्ञातारि पुनर्न स्याताम् । उत्पन्नः खलु ज्ञाता देहेन्द्रियबुद्धिवेदनाभिः सम्बध्यत इति नास्येदं स्वकृतस्य कर्मणः फलम्, उत्पन्नश्च भूत्वा न भवतीति तस्याविद्यमानस्य निरुद्धस्य वा स्वकृतकर्मणः फलोपभोगो नास्ति । तदेवमेकस्यानकशरीरयोगः शरीर- वियोगश्चात्यन्तं न स्यात्' इति । यत्र कारणमनुपपद्यमानं पश्यति तन्नानुजानाति । सोऽयमेवंलक्षण ऊहस्तर्क इत्युच्यते । ऐसी हैं' या 'क्या यह ऐसी नहीं हैं' । दोनों धर्मों पर विचार करता हुआ वह किसी एक धर्म के बारे में कारणोपपादन से अनुमान करता है कि 'इसमें यह कारण, यह हेतु, यह प्रमाण स्पष्ट है । कारणोपपादन से यह ऐसा ही है या ऐसा नहीं हैं' । उदाहरण—कोई प्रमाता ज्ञातव्य अर्थ को साधारणतः जानता है, तब उसे 'अरे, इसे सम्यक्तया ( भली भाँति ) जान लूँ'—ऐसी जिज्ञासा होती है । 'यह ज्ञातव्य अर्थ उत्पत्तिधर्मक है या अनुत्पत्तिधर्मक ?'—यह 'विमर्श' कहलाता है । उस अविज्ञाततत्त्व वाले अर्थ का विमर्श करने पर जिस धर्म की स्वीकृति का कारण उपपन्न हो जाये, उसका वह अनुमान करता है । जैसे—"यदि यह ज्ञाता अनुत्पत्तिधर्मक है तो स्वकृत कर्मफल का अनुभव करता है । दुःख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष, मिथ्याज्ञान—ये उत्तरोत्तर अपने से पूर्व पूर्व के कारण हैं, उत्तरोत्तर के अपाय से बाद में कुछ शेष नहीं रह जाता, तब मोक्ष हो जाता है । अतः उस ज्ञाता के—संसार तथा अपवर्ग, दोनों हो सकते हैं । उस ज्ञाता के उत्पत्तिधर्मा होने पर ये—संसार तथा अपवर्ग, उसको नहीं नहीं बनेंगे; क्योंकि उत्पन्न ज्ञाता देह, इन्द्रिय, बुद्धि, वेदना से सम्बद्ध रहता है इसलिये यह स्वकृत कर्म का फल नहीं बन सकता ( क्योंकि वह ज्ञाता अनित्य होने से कालान्तरभावी फल का अधिकरण नहीं बन सकता ) । उत्पन्न होकर वह पुनः न उत्पन्न हो—यों अपना विनाश या निरोध होने पर स्वकृतकर्म-फल वह कैसे भोगेगा ! इस तरह एक का अनेक शरीरों के साथ सम्बन्ध, तथा वियोग भी नहीं बनेगा ।" जहाँ कारण उत्पन्न नहीं होता वहाँ वह कोई अनुमान भी नहीं कर पाता । इस तरह के लक्षणों वाली यह जिज्ञासा तर्क कहलाती है । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri