भारतकोश
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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

४०. सू० ] सर्वशून्यतानिराकरणप्रकरणम् २९५

४०. सू० ] सर्वशून्यतानिराकरणप्रकरणम् २९५ न स्वभावसिद्धिः, आपेक्षिकत्वात् ? ॥ ३९ ॥ अपेक्षाकृतमापेक्षिकम् । ह्रस्वापेक्षाकृतं दीर्घम्, दीर्घापेक्षाकृतं ह्रस्वम्; न स्वेनात्मनावस्थितं किञ्चित् । कस्मात् ? अपेक्षासामर्थ्यात् । तस्मान्न स्वभाव- सिद्धिर्भावानामिति ॥ ३९ ॥ व्याहतत्वादयुक्तम् ॥ ४० ॥ यदि ह्रस्वापेक्षाकृतं दीर्घम्, ह्रस्वमनापेक्षिकम्; किमिदानीमपेक्ष्य ह्रस्वमिति गृह्यते ? अथ दीर्घापेक्षाकृतं ह्रस्वम्, दीर्घमनापेक्षिकम्; किमिदानीमपेक्ष्य दीर्घ- मिति गृह्यते ? एवमितरेतराश्रययोरेकाभावेऽन्यतराभावादुभयाभाव इति दीर्घा- पेक्षाव्यवस्थाऽनुपपन्ना । स्वभावसिद्धावसत्यां समयोः परिमण्डलयोर्वा द्रव्ययोरा- पेक्षिके दीर्घत्वह्रस्वत्वे कस्मान्न भवतः ? 'अपेक्षायामनपेक्षायां च द्रव्ययोरभेदः । यावती द्रव्ये अपेक्षमाणे तावती एवानपेक्षमाणे, नान्यतरत्र भेदः । आपेक्षिकत्वे तु सत्यन्यतरत्र विशेषोपजनः स्यादिति । किमपेक्षासामर्थ्यमिति चेत् ? द्वयोर्ग्रहणेऽतिशयग्रहणोपपत्तिः । द्वे द्रव्ये पश्यन्नेकत्र विद्यमानमतिशयं गृह्णाति तद् दीर्घमिति व्यवस्यति, यच्च हीनं शून्यवादी फिर आक्षेप करते हैं— सभी भावों के आपेक्षिकत्व होने से स्वभावसिद्धि नहीं बनती ॥ ३९ ॥ 'आपेक्षिक' अर्थात् अपेक्षा कृत । दीर्घ में दीर्घत्व ह्रस्वापेक्षा है, तथा ह्रस्व में ह्रस्वत्व दीर्घापेक्षया । वस्तुतः दोनों में स्वयं दीर्घह्रस्व-भाव नहीं हैं; क्योंकि दोनों ही एक दूसरे की अपेक्षासामर्थ्य रखते हैं । अतः यह मानना चाहिए कि सभी भावों की सत्ता आपेक्षिकी है, वास्तव में वे अभाव ही हैं ? ॥ ३९ ॥ व्याघात दोष से आपेक्षिकत्व हेतु नहीं बनता ? ॥ ४० ॥ यदि ह्रस्वापेक्षया दीर्घ है तो 'ह्रस्व अनापेक्षिक हो गया, यह ह्रस्व अब किसकी अपेक्षा से 'ह्रस्व' कहलायेगा ! एवमेव दीर्घापेक्षया ह्रस्व है तो दीर्घ अनापेक्षिक हो गया, यह दीर्घ अब किसकी अपेक्षा से 'दीर्घ' कहलायेगा ! इस तरह, अन्योन्याश्रय दोष से एक का अभाव होने पर दूसरे के न होने से दोनों का ही अभाव होने लगेगा—यों आपकी यह अपेक्षाव्यवस्था अनुपपन्न ही रहेगी । अथ च, स्वभावसिद्धि न मानोगे तो बताइये कि समान आकार वाले दो द्रव्यों में आपेक्षिक ह्रस्वस्व-दीर्घत्व क्यों नहीं बनते ? अपितु अपेक्षा होने या न होने से भी द्रव्यों में अभेद होना चाहिए । जितनी मात्रा में दोनों द्रव्य अपेक्षा रखते हैं उतनी ही मात्रा में दोनों अपेक्षा नहीं रखते । उन्हें आपेक्षिक मानने पर उनमें से भी किसी एक की विशेषता माननी ही होगी, जब कि वस्तुतः होती नहीं । आपके मत में यह अपेक्षासामर्थ्य क्या है ? दो के ग्रहण में किसी एक में अतिशय

संख्येकान्तवादप्रकरणम् [ ४१-४३ ]

२९६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० गृह्णाति तद् ह्रस्वमिति व्यवस्यतीति । एतच्चापेक्षासामर्थ्यं मिति ॥ ४० ॥ संख्येकान्तवादप्रकरणम् [ ४१-४३ ] अथेमे संख्येकान्ताः— सर्वमेकम्-सदविशेषात् । सर्वं द्वेधा-नित्यानित्यभेदात् । सर्वं त्रेधा-ज्ञाता, ज्ञानम्, ज्ञेयमिति । सर्वं चतुर्द्धा-प्रमाता, प्रमाणम्, प्रमेयम्, प्रमितिरिति । एवं यथासम्भवमन्येऽपीति । तत्र परीक्षा— संख्येकान्तासिद्धिः, कारणानुपपत्त्युपपत्तिभ्याम् ॥ ४१ ॥ यदि साध्यसाधनयोर्नानात्वम् ? एकान्तो न सिद्ध्यति; व्यतिरेकात् । अथ साध्यसाधनयोरभेदः ? एवमप्येकान्तो न सिद्ध्यति; साधनाभावात्, न हि तमन्तरेण कस्यचित्सिद्धिरिति ॥ ४१ ॥ ग्रहण (ज्ञान) होता है, जैसे दो द्रव्यों को देखता हुआ किसी एक में अतिशय ग्रहण करता है तो उसे 'दीर्घ' तथा जिसमें कुछ न्यूनता पाता है उसे 'ह्रस्व' कह देता है—यही अपेक्षासामर्थ्य है ॥ ४० ॥ अब सङ्ख्यैकान्तवाद पर विचार करने के लिये उनमें से कुछ का परिगणन किया जा रहा है । [ कुछ दार्शनिक एक ही तत्त्व मानते है, कुछ दो; कुछ तीन, कुछ चार और कुछ पांच ही तत्त्व हैं—ऐसा मानते हैं । यों इन वादों में संख्या नियमित की गयी है । ये सभी वाद इस न्यायशास्त्र के विरुद्ध है, अतः इनमें से कुछ का परिगणन कर निरस्त किया जा रहा है । ] ब्रह्माद्वैतवादी कहते हैं—एक ही तत्त्व है; क्योंकि सब कुछ उसी सत् से अनुगत हैं । दूसरे 'सब कुछ दो में विभक्त हैं' ऐसा माननेवाले द्वैतवादी दार्शनिक कहते हैं— नित्य-अनित्य भेद से दो ही तत्त्व हैं; क्योंकि इन के अतिरिक्त कोई ऐसा वर्ग नहीं, जिसमें सभी द्रव्य वर्गीकृत हो सकें । त्रित्ववादी दार्शनिक कहते हैं कि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय—ये तीन ही तत्त्व हैं । ( तात्पर्यकार यहां 'ज्ञान' पद को ज्ञानकारणपरक मानते हैं ।) तत्त्वचतुष्टयवादी दार्शनिक कहते हैं-प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय, प्रमिति—ये चार ही तत्त्व हैं । इस तरह अन्य दार्शनिकों के भी मत संगृहीत कर लेने चाहिये । (जैसे—कुछ अन्य द्वैतवादी 'प्रकृति तथा पुरुष दो ही तत्त्व हैं'—ऐसा मानते हैं । बौद्ध दार्शनिक— 'रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार तथा विज्ञान-ये पाँच स्कन्ध ही तत्त्व हैं'—ऐसा मानते हैं ।) अब इन पर सामान्यरूप से विचार किया जा रहा है— कारणोपपत्ति होने न होने से संख्येकान्त की सिद्धि नहीं बन सकती ॥ ४१ ॥ यदि साध्य ( संख्येकान्तरूप ज्ञेय ) तथा साधन ( प्रमाण ) का नानात्व ( भेद ) मानते हो तो संख्या का एकान्त (नियम) सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि वे दो हैं ! यदि साध्य तथा साधन में अभेद मानते हो तो भी एकान्त सिद्ध नहीं होगा; क्योंकि तब उस एकान्त की सिद्धि में कोई प्रमाण नहीं है । प्रमाण 'हेतु' के बिना किसी की सिद्धि प्रेक्षा- वान् मानते नहीं ॥ ४१ ॥

४४. सू० ] फलपरीक्षाप्रकरणम् २९७

४४. सू० ] फलपरीक्षाप्रकरणम् २९७ न; कारणावयवभावात् ? ॥ ४२ ॥ न संख्येकान्तानामसिद्धिः; कस्मात् ? कारणस्यावयवभावात् । अवयवः कश्चित् साधनभूत इत्यन्वयतिरेकः । एवं द्वैतादीनामपीति ॥ ४२ ॥ निरवयवत्वादहेतुः ॥ ४३ ॥ कारणस्यावयवभावादित्यहेतुः । कस्मात् ? सर्वमेकमित्यनपवर्गेण प्रतिज्ञाय कस्यचिदेकत्वमुच्यते, तत्र व्यपवृक्तोऽवयवः साधनभूतो नोपपद्यते । एवं द्वैता- द्विष्वपीति । ते खल्विमे संख्येकान्ताः यदि विशेषकारितस्यार्थभेदविस्तारस्य प्रत्याख्यानेन वर्त्तन्ते ? प्रत्यक्षानुमानागमविरोधान्मिथ्यावादा भवन्ति । अथाभ्यनुज्ञानेन वर्त्तन्ते ? समानधर्मकारितोऽर्थसङ्ग्रहो विशेषकारितश्चार्थभेद इति एवमेकान्तत्वं जहतोति । ते खल्वेते तत्त्वज्ञानप्रविवेकार्थमेकान्ताः परीक्षिता इति ॥ ४३ ॥ फलपरीक्षाप्रकरणम् [ ४४-५४ ] प्रेत्यभावान्तरं फलम् । तस्मिन्— कारण के अवयवभाव से संख्येकान्तसिद्धि बन जायेगी ? ॥ ४२ ॥ संख्येकान्तों की असिद्धि नहीं है; क्योंकि वहाँ कारण का अवयवभाव अर्थात् कार्यावयवरूपत्व है। साध्य का अवयव किसी का साधन होगा ही, अतः साध्यसाधन का अभेद बन जायेगा । इसी रीति से द्वैतादि संख्येकान्तों में भी समाधान कर लेना चाहिये ? ॥ ४२ ॥ निरवयव होने से उक्त हेतु नहीं बनेगा ॥ ४३ ॥ ‘कारण के अवयवभाव से’—यह हेतु नहीं बन सकता; क्योंकि ‘सब कुछ एक हैं’ यों सभी की अव्यावृत्तरूप प्रतिज्ञा कर के किसी का एकत्व कहा जा रहा है। इस प्रतिज्ञा- वाक्य में अव्यावृत्त अवयव प्रमाणरूप में उपस्थित नहीं हो सकता; क्योंकि आपने ‘सब कुछ एक हैं’ कह कर किसी को छोड़ा ही नहीं, जो पृथक् रह कर उक्त प्रतिज्ञा-साधन- वाक्य में प्रमाण रूप से उपस्थित हो सके । इसी तरह द्वैतादि के विषय में भी प्रतिषेध समझ लें । ये संख्येकान्तवाद यदि विशेष धर्म द्वारा कराये गये अर्थविस्तार को न स्वीकार कर स्थापित किये जाते हैं तो प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम प्रमाणों का विरोध होने से ‘मिथ्या वाद’ ही कहलायेंगे । यदि स्वीकार करके स्थापित किये जाते हैं तो प्रतिज्ञाहानि होगी; क्योंकि अर्थसंग्रह समानधर्म द्वारा कराया जाता है, तथा अर्थभेद विशेषधर्म द्वारा; यों भेद के अनन्त होने से वे धर्म-एकान्त को छोड़ बैठते हैं। इन एकान्तवादों की परीक्षा तत्त्वज्ञान में प्रविवेक के लिये की गयी है । ( यह परीक्षा अनुपद परीक्षित ‘प्रेत्यभाव’ में भी सहायक होगी ॥ ४३ ॥ उद्देशसूत्र ( १.१.९ ) में कथित क्रमानुसार अब प्रेत्यभाव के बाद फल पर विचार किया जा रहा है । उसमें

२९८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० सद्यः कालान्तरे च फलनिष्पत्तेः संशयः ॥ ४४ ॥ पचति, दोग्धीति सद्यः फलमोदनपयसी । कर्षति, वपतीति कालान्तरे फलं शस्याधिगम इति । अस्ति चेयं क्रिया 'अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामः' इति, एतस्याः फले संशयः१ ॥ ४४ ॥ न सद्यः; कालान्तरोपभोग्यत्वात्२ ॥ ४५ ॥ स्वर्गः फलं श्रूयते, तच्च भिन्नेऽस्मिन्देहे भेदादुत्पद्यते इति न सद्यः ग्रामादि- कामानामारम्भफलमिति ॥ ४५ ॥ कालान्तरेणानिष्पत्तिर्हेतुविनाशात् ? ॥ ४६ ॥ ध्वस्तायां प्रवृत्तौ प्रवृत्तेः फलं न कारणमन्तरेणोत्पत्तुमर्हति, न खलु वै विनष्टात् कारणात्किञ्चिदुत्पद्यते इति ॥ ४६ ॥ प्राङ् निष्पत्तेर्वृक्षफलवत् तत्स्यात् ॥ ४७ ॥ यथा फलार्थिना वृक्षमूले सेकादि परिकर्म क्रियते, तस्मिंश्च प्रध्वस्ते पृथिवी- तत्काल तथा कालान्तर में फलनिष्पत्ति से संशय होता है ॥ ४४ ॥ 'पकाता है' 'दुहता है' इन क्रियाओं के भोजन तथा दूध सद्यः फल हैं । 'जोतता है' 'बोता है' इन क्रियाओं का धान्यप्राप्तिरूप फल कालान्तर में मिलता है । एक यह भी क्रिया है—'स्वर्गेच्छु पुरुष अग्निहोत्र करे', इस क्रिया में संशय होता है कि यह सद्यःफल- प्रद है या कालान्तर में फलप्रद है ॥ ४४ ॥ स्वर्ग के कालान्तरोपभोग्य होने से उक्त क्रिया सद्यःफलप्रद नहीं है ॥ ४५ ॥ उस अग्निहोत्र क्रिया का आप्त पुरुषों द्वारा स्वर्गफल सुना जाता है । वह फल इस शरीर के नष्ट होने पर दूसरे शरीर में बन सकता है, अतः यह क्रिया सद्यःफलप्रद नहीं है, जैसे—ग्रामाद्युपार्जनरूप फल राजा की सेवा के तत्काल बाद इस शरीर में ही मिल जाता है ॥ ४५ ॥ हेतु के विनष्ट हो जाने से कालान्तर में भी उक्त फलनिष्पत्ति नहीं होगी ? ॥४६॥ कर्मसमाप्ति के बाद कर्म के विनष्ट हो जाने पर तत्कार्यभूत फल कारण के विना उत्पन्न नहीं हो सकता; क्योंकि कारण के विना कुछ भी नहीं हुआ करता ? ॥ ४६ ॥ वृक्षफल की तरह स्वर्गादिनिष्पत्ति से पूर्व वह क्रिया फल का साधन तो होगी ही ॥ ४७ ॥ जैसे फल चाहनेवाला पुरुष वृक्ष की जड़ में जलसिञ्चन-आदि क्रिया करता १. अत्रोद्यनाचार्येण भाष्याक्तावस्वरसः प्रदर्शित इति परिशुद्धौ द्रष्टव्यः । २. न्यायसूचीनिबन्धेष्वेतत्सूत्रमपीदं सूत्रं वार्त्तिकस्वारस्येन स्वीकृतम् ।

४८. सू० ] फलपरीक्षाप्रकरणम् २९९

४८. सू० ] फलपरीक्षाप्रकरणम् २९९ धातुरब्धातुना सङ्गृहीत आन्तरेण तेजसा पच्यमानो रसद्रव्यं निर्वर्तयति, स द्रव्यभूतो रसो वृक्षानुगतः पाकविशिष्टो व्यूहविशेषेण संन्निविशमानः पर्णादि फलं निर्वर्तयति, एवं परिषेकादि कर्म चार्थवत् । न च विनष्टात् फलनिष्पत्तिः । तथा प्रवृत्त्या संस्कारो धर्माधर्मलक्षणो जन्यते, स जातो निमित्तान्तरानुगृहीतः कालान्तरे फलं निष्पादयतीति । उक्तञ्चैतत् 'पूर्वकृतफलानुबन्धात्तदुत्पत्तिः' ( ३. २. ६० ) इति ॥ ४७ ॥ तदिदं प्राङ् निष्पत्तेर्निष्पद्यमानम्- नासन्न सन्न सदसत्; सदसतोर्वैधर्म्यात् ? ॥ ४८ ॥ प्राङ् निष्पत्तेर्निष्पत्तिधर्मकं नासत्; उपादाननियमात् । कस्यचिदुत्पत्तये किञ्चिदुपादेयम्, न सर्वं सर्वस्येत्यसद्भावे नियमो नोपपद्यते इति । न सत्, प्रागु- त्पत्तेर्विद्यमानस्योत्पत्तिरनुपपन्नेति । सदसत् न; सदसतोर्वैधर्म्यात् । सदित्यर्था- भ्यनुज्ञा, असदिति अर्थप्रतिषेधः; एतयोर्व्याघातो वैधर्म्यम् । व्याघाताद्व्यतिरे- कानुपपत्तिरिति ॥ ४८ ॥ रहता है, उन क्रियाओं के नष्ट होने पर भी पृथ्वीधातु अब्धातु से संगृहीत होकर अपने आन्तरिक तेज से पकाये गये रस द्रव्य को बनाती है, वह द्रव्यभूत वृक्षानुगत रस पाक- सम्पन्न होता हुआ आकारविशेष में सन्निविष्ट होता हुआ पर्णादि फल को उत्पन्न करता है, इस तरह वे जलसिञ्चन-आदि क्रियायें सार्थक हो गयीं, उन क्रियाओं के विनष्ट होने से यह फलनिष्पत्ति नहीं हुई। इसी प्रकार कर्म के निष्पन्न होने पर, उसकी निष्पत्ति तथा तत्फलोत्पत्ति के बीच में अवान्तर कारणान्तर सहकृत फलनिष्पत्तिसाधनभूत तत्कर्मगत धर्माधर्मरूप जो संस्कार उत्पन्न होता है और वह कालान्तर में फलनिष्पत्ति करा देता है। यह बात हम पीछे भी कह आये हैं-'पूर्वकृतफलानुबन्ध से उस (शरीर) की उत्पत्ति होती है' ( ३.२.६० ) ॥ ४७ ॥ अब विचार किया जा रहा है कि यह निष्पन्न होनेवाला निष्पन्न होने से पूर्व क्या है ? सत् है, या असत् है, या सदसत् हैं, या दोनों ही नहीं हैं ? यह निष्पन्न होने वाला निष्पत्ति से पूर्व न सत् है, न असत् है, न सवसत् है, क्योंकि सत् तथा असत् दोनों एक दूसरे के विपक्षी हैं ॥ ४८ ॥ यह निष्पत्तिधर्मा निष्पत्ति से पूर्व असत् नहीं है; क्योंकि इसमें यह उपादाननियम है-किसी ( घटादि ) की उत्पत्ति के लिए कोई एक ( मृदादि ) ही उपादेय हो सकता है, न कि सब के लिये सब उपादेय हो सकते हैं। जब कि असद्भाव मानने पर ऐसा कोई नियम मानना आवश्यक नहीं। इसे सत् भी नहीं कह सकते; क्योंकि विद्यमान की उत्पत्ति क्या होगी ! सदसत् भी नहीं है; क्योंकि सदसत् परस्पर अत्यन्त विरुद्ध होते हैं। जैसे-'सत्' यह उस द्रव्य ( घटादि ) की स्वीकृति है, 'असत्' यह उस द्रव्य का प्रतिषेध है; इन दोनों का विरोधी वैधर्म्य है; यों विरोध होने से इनका एकाधिकरण्य नहीं बनेगा ?

उत्पादव्ययदर्शनात् ॥ ४९ ॥

३०० · वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० प्रागुत्पत्तेरुत्पत्तिधर्मकमसदित्यद्धा । कस्मात् ? उत्पादव्ययदर्शनात् ॥ ४९ ॥ यत्पुनरुक्तम्-प्रागुत्पत्तेः कार्यं नासदुपादाननियमादिति ? बुद्धिसिद्धं तु तदसत् ॥ ५० ॥ इदमस्योत्पत्तये समर्थं न सर्वमिति प्रागुत्पत्तेर्नियतकारणं कार्यं बुद्ध्या सिद्धम्; उत्पत्तिनियमदर्शनात् । तस्मादुपादाननियमस्योपपत्तिः । सति तु कार्ये प्रागुत्पत्तेरुत्पत्तिरेव नास्तीति ॥ ५० ॥ आश्रयव्यतिरेकाद् वृक्षफलोत्पत्तिवदित्यहेतुः ? ॥ ५१ ॥ मूलसेकादि परिकर्म फलं चोभयं वृक्षाश्रयम्, कर्म चेह शरीरे, फलं चामु- त्रेत्याश्रयव्यतिरेकादहेतुरिति ? ॥ ५१ ॥ प्रीतेरात्माश्रयत्वादप्रतिषेधः ॥ ५२ ॥ प्रीतिरात्मप्रत्यक्षत्वादात्माश्रया, तदाश्रयमेव कर्म धर्मसंज्ञितम्, धर्मस्यात्म- गुणत्वात् । तस्मादाश्रयव्यतिरेकानुपपत्तिरिति ॥ ५२ ॥ 'उत्पत्ति से पूर्व, यह उत्पत्तिधर्मा असत् ही हैं'—यही पक्ष ठीक है । क्योंकि उसका उत्पाद-विनाश देखा जाता है ॥ ४९ ॥ यह जो कहा था कि—उपादाननियम होने से उत्पत्ति से पूर्व कार्य असत् नहीं है ? वह असत् बुद्धिविषयक है ॥ ५० ॥ 'यही इसकी उत्पत्ति में समर्थ है, अन्य सब नहीं'—इस अनुमान से यह उत्पत्ति से पूर्व नियत कारणवाला है ऐसा कार्य बुद्धि से सिद्ध होता है । इस तरह बुद्धिसिद्धि होने से उपादाननियम की बात सिद्ध हो जाती हैं । उत्पत्ति से पूर्व कार्य को सत् मानने पर उस की उत्पत्ति ही क्या होगी ! ॥ ५० ॥ 'वृक्षफलोत्पत्ति की तरह' यह दृष्टान्त परलोकभाविफल का असाधक हैं; ( क्योंकि उभयलोकानुगत सुखदुःखादिरूप फल का ) आश्रय कोई नहीं है ? ॥ ५१ ॥ दृष्टान्त में, मूलमें जलसिञ्चन तथा फलोत्पत्ति—दोनों का एक ही वृक्ष आश्रय है, जबकि यहाँ कर्म इस शरीर में तथा फल दूसरे शरीर में । तब बताइये—वृक्षफलोत्पत्ति वाला दृष्टान्त यहाँ कैसे घटेगा ? ॥ ५१ ॥ प्रीति के आत्माश्रय होने से आश्रयविरोध नहीं है ॥ ५२ ॥ 'प्रीति' कहते हैं सुख को, स्वर्ग भी सुखविशेष ही है । यह 'प्रीति' आत्मा द्वारा प्रत्यक्ष की जाने से आत्माश्रय है, धर्मसंज्ञक कर्म भी आत्माश्रय ही है; क्योंकि वह धर्म आत्मगुण है । यों आश्रय का अस्तित्व न रहने की साधक युक्ति खण्डित हो गयी ॥ ५२ ॥

५५. सू० ] दुःखपरीक्षाप्रकरणम् ३०१

५५. सू० ] दुःखपरीक्षाप्रकरणम् ३०१ न पुत्रपशुस्त्रीपरिच्छदहिरण्यान्नादिफलनिर्देशात् ? ॥ ५३ ॥ पुत्रादि फलं निर्दिश्यते, न प्रीतिः—'ग्रामकामो यजेत', 'पुत्रकामो यजेतेति' । तत्र यदुक्तम्-'प्रीतिः फलम्' इति, एतदयुक्तमिति ? ॥ ५३ ॥ तत्सम्बन्धात् फलनिष्पत्तेस्तेषु फलवदुपचारः ॥ ५४ ॥ पुत्रादिसम्बन्धात् फलं प्रीतिलक्षणमुत्पद्यते इति पुत्रादिषु फलवदुपचारः । यथान्ने प्राणशब्दः—'अन्नं वै प्राणाः' इति ॥ ५४ ॥ दुःखपरीक्षाप्रकरणम् [ ५५-५८ ] फलानन्तरं दुःखमुद्दिष्टम्, उक्तं च-'बाधनालक्षणं दुःखम्' (१.१.२१) इति । तत्किमिदं प्रत्यात्मवेदनीयस्य सर्वजन्तुप्रत्यक्षस्य सुखस्य प्रत्याख्यानम् ? आहोस्विदन्यः कल्प इति ? अन्य इत्याह । कथम् ? न वै सर्वलोकसाक्षिकं सुखं शक्यं प्रत्याख्यातुम् । अयं तु जन्ममरणप्रबन्धानुभवनििमित्ताद् दुःखान्निर्विण्णस्य दुखं जिहासतो दुःखसंज्ञाभावनोपदेशो दुःखहानार्थ इति । कया युक्त्या ? सर्वे खलु सत्त्वनि- कायाः सर्वाण्युत्पत्तिस्थानानि सर्वः पुनर्भवो बाधनानुषक्तो दुःखसाहचर्याद् समानाश्रय नहीं बनेगा. क्योंकि ( उस ग्रामकामक अग्निहोत्र का ) पुत्र-स्त्री-पशु- सुवर्ण-अन्न आदि फल भी निर्दिष्ट किया गया है, न कि प्रीति ही ? ॥ ५३ ॥ 'ग्राम की इच्छा वाला यज्ञ करे', 'पुत्र की इच्छा वाला यज्ञ करे' इत्यादि श्रुतियों से पुत्रादिप्राप्तिफल भी उपवर्णित है। अतः आपने उसका प्रीति ही फल बतलाया—वह अयुक्त है ? ॥ ५३ ॥ उसके सम्बन्ध से फलनिष्पत्ति होने के कारण पुत्रादि में फल की तरह उपचार कर लिया जाता है ॥ ५४ ॥ वस्तुतः पुत्रादिसम्बन्ध से प्रीतिधर्म फल उत्पन्न होता है, अतः पुत्रादि में फल का आरोप कर लिया है। जैसे अन्न के प्राणरक्षक होने से श्रुति में अन्न को ही प्राण कह दिया गया है—'अन्न ही प्राण हैं' ॥ ५४ ॥ उद्देशसूत्र में फल के बाद 'दुःख' का नामनिर्देश किया है, तथा आगे चलकर इसका लक्षण किया है—'बाधना ( पीड़ा ) को दुःख कहते हैं' ( १.१.२१ ) तो क्या यह दुःख सभी प्राणियों को प्रत्यक्ष होने वाले सर्वजनानुभवसिद्ध 'सुख' का प्रतिषेध है, या कोई दूसरा है ? प्रतिषेध से दूसरा है। कैसे ? सर्वजनानुभवसिद्ध सुख का यह प्रतिषेध नहीं कहा जा सकता; अर्थात् सुख नहीं हटाया जा सकता। वह तो जन्ममरण-प्रवाहा- नुभवनििमित्तक दुःख से से दुःखी पुरुष, जो कि उससे छुटकारा पाना चाहता है, को उक्त दुःख में दुःखसंज्ञा की भावना करने के लिये यह उपदेश प्रयुक्त है कि इस भावना से तुम्हारा दुःख निवृत्त हो जायेगा तथा सुख मिलेगा। इसमें युक्ति क्या है? 'सभी प्राणिसमूह, सभी उत्पत्तिस्थान, सभी जन्म दुःख में लिपटे हुए हैं, दुःख के साहचर्य से ये CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

अत्र च हेतुरुपादीयते—

३०२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० 'बाधनालक्षणं दुःखम्' (१.१.२१) इत्युक्तम्, ऋषिभिर्दुःखसंज्ञाभावनमुपदिश्यते । अत्र च हेतुरुपादीयते— विविधबाधनायोगाद् दुःखमेव जन्मोत्पत्तिः ॥ ५५ ॥ जन्म = जायते इति, शरीरेन्द्रियबुद्धयः, शरीरादीनां च संस्थानविशिष्टानां प्रादुर्भाव उत्पत्तिः। विविधा च बाधना-हीना, मध्यमा, उत्कृष्टा चेति। उत्कृष्टा नारकिणाम्, तिरश्चां तु मध्यमा, मनुष्याणां तु हीना, देवानां हीनतरा वीत- रागाणां च। एवं सर्वमुत्पत्तिस्थानं विवधबाधनानुषक्तं पश्यतः सुखे तत्साधनेषु च शरीरेन्द्रियबुद्धिषु दुःखसंज्ञा व्यवतिष्ठते । दुःखसंज्ञाव्यवस्थानात् सर्वलोकेष्वन- भिरतिसंज्ञा भवति। अनभिरतिसंज्ञामुपासीनस्य सर्वलोकविषया तृष्णा विच्छि- द्यते, तृष्णाप्रहाणात् सर्वदुःखाद्विमुच्यते इति । यथा विषयोगात् पयो विषमिति बुध्यमानो नोपादत्ते, अनुपाददानो मरणदुःखं नाप्नोति ॥ ५५ ॥ दुःखोद्देशस्तु न सुखस्य प्रत्याख्यानम्, कस्मात् ? न; सुखस्याप्यन्तरालनिष्पत्तेः ॥ ५६ ॥ न खल्वयं दुःखोद्देशः सुखस्य प्रत्याख्यानम् । कस्मात् ? सुखस्याप्यन्तराल- सभी को पीड़ा देते हैं, अतः दुःख हैं'—यों यह ऋषियों द्वारा दुःखसंज्ञाभावना के रूप में उपदिष्ट किया है। यहाँ हेतु देते हैं— विविध बाधायुक्त होने से शरीरादि की उत्पत्ति दुःख है ॥ ५५ ॥ जन्म अर्थात् जो उत्पन्न हो, जैसे—शरीर, इन्द्रिय तथा बुद्धि । संस्थानविशिष्ट शरीरादि का प्रादुर्भाव 'उत्पत्ति' कहलाता है। हीन, मध्यम तथा उत्कृष्ट भेद से दुःख अनेक प्रकार का है। इनमें उत्कृष्ट दुःख नरकवासकाल में मिलता है, मध्यम दुःख पशु योनि में तथा हीन ( अल्प ) दुःख मनुष्य योनि में मिलता है। देवयोनि में तथा वीतराग ज्ञानियों में यह दुःखमात्रा अल्पतर होती है। इस प्रकार सभी उत्पत्तिस्थान ( योनियों ) को दुःखानुपक्त समझते हुए जिज्ञासु की सुख के साधन तथा जायमान शरीर, इन्द्रिय तथा बुद्धि में दुःखबुद्धि बन जाती है। इनमें दुःखबुद्धि बन जाने से समग्र चराचर जगत् को दुःख रूप समझ कर जिज्ञासु उससे विरक्त हो जाता है। इस विराग-भावना का अभ्यास करने से उसकी सार्वत्रिकी तृष्णा विच्छिन्न हो जाती है। तृष्णानाश से वह सभी दुःखों से छुटकारा पा जाता है। वह समझता है कि जैसे विषसम्पृक्त दुग्ध विषवत् कार्य करता है उसी तरह यह दुःखसम्पृक्त सुख भी दुःख ही है, अतः उसकी प्राप्ति के लिये प्रयास नहीं करता; उक्त प्रयास न करने से वह मरणदुःख नहीं पाता ॥ ५५ ॥ उद्देशसूत्र (१.१.९) में दुःख की गणना सुखप्रत्याख्यान के रूप में नहीं की गयी है— बीच-बीच में सुख की भी उत्पत्ति होने से यह सुख का प्रत्याख्यान नहीं है ॥५६॥ यह दुःखपरिगणन सुख का निषेध नहीं हैं; क्योंकि इस दुःखप्रवाह में बीच-बीच में

५७. सू० ] दुःखपरीक्षाप्रकरणम् ३०३

५७. सू० ] दुःखपरीक्षाप्रकरणम् ३०३ निष्पत्तेः । निष्पद्यते खलु बाधनान्तरालेषु सुखं प्रत्यात्मवेदनीयं शरीरिणाम्, तदशक्यं प्रत्याख्यातुमिति ॥ ५६ ॥ अथापि— बाधनानिवृत्तेर्वेदयनः पर्येषणदोषादप्रतिषेधः ॥ ५७ ॥ सुखस्य दुःखोद्देशेनेति प्रकरणात्, पर्येषणम् = प्रार्थना विषयार्जनतृष्णा, पर्येषणस्य दोषो यदयं वेदयमानः प्रार्थयते, तच्चास्य प्रार्थितं न सम्पद्यते, सम्पद्य वा विपद्यते, न्यूनं वा सम्पद्यते, बहुप्रत्यनीकं वा सम्पद्यते—इत्येतस्मात् पर्येषण- दोषान्नानाविधो मानसः सन्तापो भवति । एवं वेदयतः पर्येषणदोषाद् बाधनाया अनिवृत्तिः । बाधनानिवृत्तेर्दुःखसंज्ञाभावनमुपदिश्यते । अनेन कारणेन दुःखं जन्म, न तु सुखस्याभावादिति । अथाप्येतदनूक्तम्— 'कामं कामयमानस्य यदा कामः समृध्यते । अथैनमपरः कामः क्षिप्रमेव प्रबाधते' ॥ "अपि चेदुदनेमिं समन्ताद् भूमिमिमां लभते१ सगवाश्वां न स तेन धनेन सुख की उत्पत्ति होती रहती है। दुःखों के बीच में सुख भी प्रत्येक प्राणी को अनुभूत होता रहता है । इस प्रत्यक्षगम्य सुखानुभव का कोई कैसे प्रत्याख्यान कर सकता है ! एक बात और— सुखानुभव करते हुए को तृष्णानुवर्तन होने के कारण दुःखनिवृत्ति न होने से प्रतिषेध नहीं बनेगा ॥ ५७ ॥ दुःखों का कीर्तन प्रकरण रहने से यहाँ पर्येषण सुखसम्बन्धी समझना चाहिये । पर्येषण से तात्पर्य है प्रार्थना, अर्थात् विषय को पाने की तृष्णा । इस तृष्णा में दोष यह है कि जब पुरुष किसी सुख का अनुभव करके उसे ( पुनः ) चाहता है, चाहने पर कभी वह सुख उसे मिल जाता है, कभी नहीं मिलता, या कभी मिलकर पुनः नष्ट हो जाता है, या यथेच्छ नहीं मिलता, या उसे बहुत से विघ्न आगे-पीछे घेर लेते हैं। इस तृष्णादोष से उस पुरुष को नाना प्रकार का मानसिक क्लेश होता है। इस रीति से, सुखानुभव करते हुए भी वह सुख तृष्णा से लिपटा रहता है । यतः दुःख एकान्ततः निवृत्त नहीं होता, अतः बाधा के रहने से दुःख पृथक् पदार्थ माना गया है, सुखाभाव नहीं । जैसा कि वृद्धजनों ने कहा भी है— विषय को जब यह चाहने लगता है तो इसकी यह चाह ( तृष्णा ) धीरे-धीरे बढ़ती जाती है, अतः यह एक चाह के पूरा होते ही दूसरी चाह को लेकर परेशान हो उठता है । उदाहरण के रूप में इस बात को ले सकते हैं—'गौ, अश्व-आदि साधनों सहित १. 'भूमिमालभते'—इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

३०४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० धनैषी तृप्यति किन्नु सुखं धनकामे" इति ! ॥ ५७ ॥ दुःखविकल्पे सुखाभिमानाच्च ॥ ५८ ॥ दुःखसंज्ञाभावनोपदेशः क्रियते । अयं खलु सुखसंवेदने व्यवस्थितः सुखं परम- पुरुषार्थं मन्यते—न सुखादन्यन्निःश्रेयसमस्ति, सुखे प्राप्ते चरितार्थः कृतकरणीयो भवति । मिथ्यासंकल्पात्सुखे तत्साधनेषु च विषयेषु संरज्यते, संरक्तः सुखाय घटते, घटमानस्यास्य जन्मजराव्याधिप्रयाणानिष्टसंयोगेष्टवियोगप्रार्थितानुपपत्तिनिमित्त- मनेकविधं यावद् दुःखमुत्पद्यते, तं दुःखविकल्पं सुखमित्यभिमन्यते । सुखाङ्गभूतं दुःखम्, न दुःखमनासाद्य शक्यं सुखमवाप्तुम् । तादर्थ्यात्सुखमेवेदमिति सुखसंज्ञोपह- तप्रज्ञो जायस्व म्रियस्व सन्धावेति संसारंनातिवर्तते । तदस्याः सुखसंज्ञायाः प्रतिपक्षो दुःखसंज्ञाभावनमुपदिश्यते—दुःखानुषङ्गाद् दुःखं जन्मेति, न सुखस्याभावात् । यद्येवम्, कस्माद् दुःखं जन्मेति नोच्यते सोऽयमेवं वाच्ये यदेवमाह-दुःखमेव जन्मेति, तेन सुखाभावं ज्ञापयतीति ? जन्मविनिग्रहार्थीयो१ वै खल्वयमेवशब्दः, समुद्रपर्यन्त समग्र पृथिवी को पा ले तो भी यह धनलोलुप सन्तुष्ट नहीं हो सकता; अतः ऐसी धनकामना में क्या सुख है !' ॥ ५७ ॥ दुःख के विविध कल्पों में सुखाभिमान होने से ॥ ५८ ॥ दुःखसंज्ञाभावना का उपदेश किया जाता है । साधारणतया पुरुष विषयों में वार- बार सुखानुभव करता हुआ सुख को परम पुरुषार्थ मानता है कि सुख के अतिरिक्त कोई कल्याण नहीं है । अतः सुख प्राप्त होने पर सन्तुष्ट होता हुआ कृतकृत्य हो जाता है । इस प्रकार मिथ्या सङ्कल्प से सुख तथा तत्साधनभूत विषयों में संरक्त हो जाता है, संरक्त हो सुखाप्ति के लिए चेष्टा करता है । चेष्टा करते हुए इसको जन्म, वार्द्धक्य, व्याधि, मृत्यु, इष्टवियोग, अनिष्टसंयोग तथा काम्यानुपलब्धि आदि के कारण अनेक प्रकार के दुःख उत्पन्न होते हैं, क्योंकि इन्हीं को वह सुख मान बैठता है । सुख का अङ्ग है दुःख, दुःख विना पाये सुख नहीं मिल सकता—इस तदर्थता से उस दुःख में 'यह सुख ही है'—ऐसी मिथ्या संज्ञाभावना करके अविवेक से 'जीऊँ, मरूँ, भटकता फिरूँ' इस वासना के कारण वह संसार (जन्म-मरणरूपी प्रवाह) को कभी अतिक्रान्त नहीं कर पाता । अतः आचार्यजन इस सुखसंज्ञा की प्रतिपक्षभूत दुःखसंज्ञा की भावना का उपदेश करते हैं । यों, दुःखानुषङ्ग होने से जन्म को दुःख माना गया है, न कि सुख के अभाव से । यदि ऐसी बात है, तो 'दुःख जन्म हैं'—इतना ही कह दें, आपके कहने का मतलब 'दुःख ही जन्म है'—ऐसा है तो आप सुख का सर्वथा प्रत्याख्यान करना चाह रहे हैं ? यह ठीक नहीं, क्योंकि इस 'एव' शब्द का जन्मनिवृत्ति बतलाना ही प्रयोजन है; कैसे ? १. 'विनिग्रहः = विनिवृत्तिः, स एव अर्थः प्रवर्त्तते इति जन्मविनिग्रहार्थीयः । यथा च-मत्वर्थीय इति । एतदुक्तं भवति-जन्म दुःखमेवेति भावयितव्यम्, नात्र मनागपि सुख- बुद्धिः कर्तव्या; अनेकानर्थपरम्परायामपवर्गप्रत्यूहप्रसङ्गात्—इति श्रीवाचस्पतिमिश्राः ।

५९. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०५

५९. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०५ कथम् ? न दुःखं जन्म स्वरूपतः, किन्तु दुःखोपचाराद् । एवं सुखमपीति एतद- नेनैव निर्वर्त्त्यते, न तु दुःखमेव जन्मेति ॥ ५८ ॥ अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् [ ५९-६८ ] दुःखोपदेशानन्तरमपवर्गः, स प्रत्याख्यायते— ऋणक्लेशप्रवृत्त्यनुबन्धादपवर्गाभावः ? ॥ ५९ ॥ ऋणानुबन्धान्नास्त्यपवर्गः । “जायमानो ह वै ब्राह्मणस्त्रिभिर्ऋणैर्ऋणवान् जायते ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः, प्रजया पितृभ्यः” इति ऋणानि, तेषामनुबन्धः१ स्वकर्मभिः सम्बन्धः । कर्मसम्बन्धवचनात् “जरामयं वा एतत्सत्रं यदग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासौ चेति; जरया ह एष तस्मात् सत्राद्विमुच्यते, मृत्युना ह ”वा इति । ऋणानुबन्धादपवर्गानुष्ठानकालो नास्तीत्यपवर्गाभावः ? क्लेशानुबन्धान्नास्त्यपवर्गः । क्लेशानुबन्ध एवायं म्रियते, क्लेशानुबद्धश्च जायते । नास्य क्लेशानुबन्धविच्छेदो गृह्यते ? स्वयं जन्म दुःख नहीं, किन्तु उसमें दुःख की भावना (आरोप) की जाती है अर्थात् दुःख का जन्म में उपचार है। इसी तरह सुख के विषय में भी समझ लें। जन्म से सुख होता है न कि दुःख ही जन्म है। यहाँ जन्मनिवृत्ति ही इस उपदेश से समझायी जा रही है, सुख का अभाव नहीं सिद्ध किया जा रहा है ॥ ५८ ॥ उद्देशसूत्रानुसार अब क्रमप्राप्त 'अपवर्ग' पर विचार किया जाये । अपवर्ग, जिसका कि हम पीछे (१. १. २०) लक्षण कर आये हैं, का कुछ लोग प्रत्याख्यान करते हैं। (वे कहते हैं—) ऋणानुबन्ध, क्लेशानुबन्ध तथा प्रवृत्त्यनुबन्ध हेतुओं से अपवर्ग नहीं है ? ॥ ५९ ॥ ऋणानुबन्ध से 'अपवर्ग नहीं है'—ऐसा मानना चाहिए। जैसा कि शतपथब्राह्मण में कहा है—'उत्पन्न होता हुआ यह ब्राह्मण तीन ऋणों से ऋणवान् रहता है, उसमें वह ऋषियों के ऋण (वेदाध्ययनाध्यापन) से ब्रह्मचर्य द्वारा छूटता है, देव-ऋण से यज्ञ द्वारा तथा पितृ-ऋण से सन्तानोत्पत्ति द्वारा छूट पाता है।' यों ऋण बता दिये गये। इन ऋणों का अनुबन्ध अर्थात् स्वकर्तव्यों से सम्बन्ध। इस प्रकार हमारा सम्बन्ध इनसे सदा बना है। निष्कर्ष यह है कि इन ऋणों का अपाकरण कर्त्तव्य कोटि में आता है। इस कर्म- सम्बन्धवचन से—'यह अग्निहोत्र तथा दर्श, पूर्णमास आदि यज्ञ वार्धक्य तक करने आव- श्यक हैं, इन यज्ञों से बुढ़ापा या मृत्यु आने पर ही छुटकारा मिल सकता है' यह श्रुति- वाक्य से प्रमाणित होता है। उक्त ऋणापाकरण में ही समग्र जीवन व्यतीत हो जायेगा तो उसे अपवर्गानुष्ठान का समय ही न मिलेगा, अतः मान लें कि अपवर्ग नहीं है ? क्लेशानुबन्ध से भी अपवर्ग नहीं है। यह प्राणी क्लेशानुबद्ध ही पैदा होता है, क्लेशों से संघर्ष करता-करता मर जाता है। उसका यह क्लेशानुबन्ध कभी विच्छिन्न होता नहीं दिखायी देता ? १. 'अनुबन्धः = सर्वदाकरणीयता' इति वार्त्तिककृतः । न्या० द० : २०

३०६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० प्रवृत्त्यनुबन्धान्नास्त्यपवर्गः। जन्मप्रभृत्ययं यावत्प्रायणं वाग्बुद्धिशरीरा- रम्भेणाविमुक्तो गृह्यते, तत्र यदुक्तम्-‘दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरो- त्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः’ इति (१.१.२) तदनुपपन्नमिति ? ॥ ५९ ॥ अत्राभिधीयते— १. यत्तावदृणानुबन्धादिति, ऋणैरिव ऋणैरिति— प्रधानशब्दानुपपत्तेर्गुणशब्देनानुवादो निन्दाप्रशंसोपपत्तेः ॥ ६० ॥ ‘ऋणैः’ इति नायं प्रधानशब्दः। यत्र खल्वेकः प्रत्यादेयं ददाति द्वितीयश्च प्रतिदेयं गृह्णाति तत्रास्य दृष्टत्वात् प्रधानमृणशब्दः! न चैतदिहोपपद्यते; प्रधानशब्दानुपपत्तेः। गुणशब्देनायमनुवादः—ऋणैरिव ऋणैरिति। प्रयुक्तोपमं चैतद्, यथाऽग्निर्मांणवक इति। अन्यत्र दृष्टश्चायमृणशब्द इह प्रयुज्यते, यथाग्नि- शब्दो मागवके। कथं गुणशब्देनानुवादः ? निन्दाप्रशंसोपपत्तेः। कर्मलोपे ऋणीव ऋणादानान्निन्द्यते, कर्मानुष्ठाने च ऋणीव ऋणदानात्प्रशस्यते; स एवोपमार्थ इति।

प्रवृत्त्यनुबन्ध से भी अपवर्ग नहीं है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त यह प्राणी वाचिक, बौद्धिक तथा शारीरिक क्रियाओं में लगा रहता है, उनसे इसे कभी छुटकारा नहीं मिल पाता। अतः आपका यह पूर्व कथन (१. १. २) कि—'दुःख जन्म, प्रवृत्ति, दोष, मिथ्या- ज्ञानों के उत्तरोत्तर के अपाय द्वारा उसके बाद वाले के नाश से अपवर्ग हो जाता है' ? सर्वथा अयुक्त है ॥ ५९ ॥ यहाँ सिद्धान्ती (नैयायिक) कहता है—इस ‘ऋणानुवन्ध’ शब्द में ‘ऋणों की तरह ऋणों से’ ऐसा औपचारिक अर्थ करना चाहिए। क्योंकि जहाँ शब्द का मुख्यार्थ अनुपपन्न हो वहाँ गुण शब्द से, निन्दा-प्रशंसोपपादन होने से अनुवाद कर लिया जाता है ॥ ६० ॥ ‘ऋणों से’ यह प्रधान (मुख्यार्थबोधक) शब्द नहीं है। जहाँ एक उधार ली हुई चीज को देता है तथा दूसरा लेता है—वहीं ‘ऋण’ शब्द का मुख्यार्थ रूप में प्रयोग होता है। यहाँ ऐसी बात है नहीं, अतः इस शब्द का प्रधान अर्थ गृहीत नहीं होता। इसलिये ऋणशब्द लाक्षणिक अर्थ में प्रयुक्त किया है कि ‘ऋणों की तरह के ऋणों से’। जैसे तेजस्वी आदमी को लोक में कह देते हैं—‘यह माणवक तो अग्निरूप है’। इसी तरह अन्यत्र देखा गया ऋण शब्द यहाँ प्रयुक्त हुआ है, जैसे अग्नि शब्द माणवक में। गुण- शब्द से अनुवाद कैसे है ? उसके निन्दा-प्रशंसात्मक होने से। जैसे ऋणी ऋण न चुका पाने के कारण निन्दापात्र होता है उसी तरह यह पुरुष भी उक्त तीनों में से कोई एक या सब कर्मों के विलोप से निन्दापात्र बनता है। और जैसे ऋणी ऋण चुका देने से प्रशंसित होता है उसी तरह यह पुरुष कर्मानुष्ठान से प्रशंसा प्राप्त करता है।

६०. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०७

६०. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०७ जायमान इति गुणशब्दः; विपर्ययेऽनधिकारात् । 'जायमानो ह वै ब्राह्मणः' इति च शब्दः-गृहस्थः सम्पद्यमानो जायमान इति । यदायं गृहस्थो जायते तदा कर्मभिरधिक्रियते; मातृतो जायमानस्यानधिकारात् । यदा तु मातृतो जायते कुमारः, न तदा कर्मभिरधिक्रियते; अर्थिनः शक्तस्य चाधिकारात् । अर्थिनः कर्मभिरधिकारः; कर्मविधौ कामसंयोगस्मृतेः 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्ग- कामः' इत्येवमादि । शक्तस्य च प्रवृत्तिसम्भवात्-शक्तस्य कर्मभिरधिकारः; प्रवृत्तिसम्भवात् । शक्तः खलु विहिते कर्मणि प्रवर्त्तते, नेतर इति । उभया- भावस्तु प्रधानशब्दार्थे । मातृतो जायमाने कुमारे उभयम्-अर्थिता, शक्तिश्च न भवतीति । न भिद्यते च लौकिकाद् वाक्याद्वैदिकं वाक्यं प्रेक्षापूर्वककारिपुरुषप्रणीतत्वेन । तत्र लौकिकस्तावदपरीक्षकोऽपि न जातमात्रं कुमारकमेवं ब्रूयात्-अधीष्व, यजस्व, ब्रह्मचर्यं चरेति, कुत एष ऋषिरुपपन्नानवद्यवादी उपदेशार्थेन प्रयुक्त उप- दिशति ! न खलु वै नर्त्तकोऽन्धेषु प्रवर्त्तते, न गायको बधिरेष्विति । उपदिष्टार्था- इसी तरह 'जायमानो ह वै ब्राह्मणः' इस श्रुति में 'जायमान' भी गुणशब्द है; क्योंकि इस शब्द के प्रधान अर्थ 'जातमात्र' को यागाद्यनुष्ठान का अधिकार ही प्राप्त नहीं है । मन्त्र में 'जायमान' शब्द का अर्थ है गृहस्थ होता हुआ, गृहस्थ बनता हुआ । अर्थात् जब यह ब्राह्मण गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होता है तब उसको यज्ञादि कर्मों में अधिकार प्राप्त होता है । माता से उत्पन्न होते ही ब्राह्मण-शिशु को उन कर्मों में अधिकार प्राप्त नहीं है । जब यह शिशु माता से उत्पन्न होता है तभी से इसका अधिकार इसलिए नहीं होता कि उस यज्ञ कर्म में .अर्थी तथा तत्कर्मानुष्ठानसमर्थ ही अधिकारी होता है । अर्थी को अधिकारी मानने का कारण यह है कि यज्ञों द्वारा अपने लिए कुछ चाहने वाला ही यज्ञ करे-ऐसा विधिरूप श्रुतिवाक्य में कामसंयुक्त वचन है, जैसे-'स्वर्गकाम अग्निहोत्र हवन करे'। सामर्थ्यवान् पुरुष ही उन कर्मों का अधिकारी है, क्योंकि समर्थ ही पूर्ण यज्ञों को कर पाता है । समर्थ ही विहित कर्म में प्रवृत्त हो सकता है, असमर्थ नहीं । 'जातमात्र' इस प्रधान शब्द के अर्थ में 'अर्थित्व' तथा 'शक्तत्व' दोनों का ही अभाव है । अर्थात् माता से उत्पन्न होते हुए शिशु में न अर्थित्व ( किसी पुत्रादि वस्तु की चाह) रहती है, न शक्ति (यज्ञ करने की सामर्थ्य) ही । बुद्धिमान् पुरुष द्वारा प्रणीत लौकिक वाक्य से वैदिक वाक्य भी भिन्न (निरर्थक) नहीं है । जैसे लोक में उत्पन्न होते हुए बालक को कोई बुद्धिमान् यह उपदेश नहीं दे सकता कि, 'पढ़ो, यज्ञ करो, ब्रह्मचर्य पालन करो', तो ये हित-मित-सत्यवादी ऋषि उपदेशानर्ह शिशु को ऐसा उपदेश कैसे कर सकते हैं ! क्या नर्तक अन्धों की अपना नाच दिखायेगा, या कोई गायक बहरों को अपना गाना सुनायेगा ! उपदेश उसी को किया जाता

३०८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० विज्ञाता नोपदेशविषयः । यश्चोपदिष्टमर्थं विजानाति तं प्रत्युपदेशः क्रियते, न चैतदस्ति जायमानकुमारक इति । गार्हस्थ्यलिङ्गं च मन्त्रब्राह्मणं कर्माभिवदति । यच्च मन्त्रब्राह्मणं कर्माभिवदति तत्पत्नीसम्बन्धादिना गार्हस्थ्यलिङ्गेनोपपन्नम् । तस्माद् गृहस्थोऽयं जायमानोऽभिधीयते इति । अर्थित्वस्य चाविपरिणामे जरामर्यवादोपपत्तिः । यावच्चास्य फलेनार्थित्वं न विपरिणमते न निवर्तते, तावदनेन कर्मानुष्ठेयमित्युपपद्यते जरामर्यवादस्तं प्रतीति । 'जरया ह वा' इत्यायुषस्तुरीयस्य चतुर्थस्य प्रव्रज्यायुक्तस्य वचनम्—'जरया ह वा एष एतस्माद्विमुच्यते' इति । आयुषस्तुरीयं चतुर्थं प्रव्रज्यायुक्तं 'जरा' इत्युच्यते । तत्र हि प्रव्रज्या विधीयते, अत्यन्तजरासंयोगे 'जरया ह वा' इत्यनर्थकम् । 'अशक्तो विमुच्यते' इत्येतदपि नोपपद्यते; स्वयमशक्तस्य बाह्यां शक्तिमाह- 'अन्तेवासी वा जुहुयाद् ब्रह्मणा स परिक्रीतः, क्षीरहोता वा जुहुयाद्धनेन स परिक्रीतः' इति । अथापि विहितं वानूद्येत ? कामाद्वार्थः परिकल्प्येत ? विहितानूवचनं न्याय्य- मिति । ऋणवानिवास्वतन्त्रो गृहस्थः कर्मसु प्रवर्तते इत्युपपन्नं वाक्यस्य साम- र्थ्यम् । फलस्य हि साधनानि प्रयत्नविषयः, न फलम् । तानि सम्पन्नानि फलाय हैं जो उपदेश के अर्थ को समझे । उत्पन्न होता हुआ शिशु उस अज्ञातोपदेश-को क्या समझेगा ! अपि च—यह कर्म का प्रकाशक मन्त्रब्राह्मण गृहस्थचिह्नयुक्त जिस कर्म का अभिवदन कर रहा है, वह मन्त्रब्राह्मणोक्त कर्म गृहस्थ के चिह्न पत्नीसम्बन्ध आदि से युक्त हैं, अतः यही मानना पड़ेगा कि उक्त मन्त्रब्राह्मण में 'जायमान' का अर्थ 'गृहस्थ' ही अभिप्रेत हैं । अर्थित्व की अनिवृत्ति होने पर जरामर्यवाद (वार्धक्य सीमा) भी उपपन्न हो जायगा । 'जब तक इस की फल से संयुक्त होने की कामना निवृत्त नहीं होती तब तक यह कर्म करना चाहिये' इस में जरामर्यवाद की मर्यादा रखी गयी है । यह उचित ही है । 'जरा' से तात्पर्य है आयु का प्रव्रज्यायुक्त चतुर्थ भाग। अर्थात् आयु के प्रव्रज्यायुक्त चतुर्थ भाग में वह इस कर्म से छुटकारा पा जाता है। क्योंकि आयु के चतुर्थ भाग को ही 'जरा' कहना उचित है; अन्यथा मरणासन्न अत्यन्त वार्धक्य आने पर प्रव्रज्या लेना निरर्थक ही है। अशक्त पुरुष हवनकर्म से मुक्त है—यह बात उचित नहीं बैठती; क्यों ? वही मन्त्र- ब्राह्मण अशक्त की वाह्यशक्ति को लेकर उपदेश करता है । जैसे—या तो इस (अशक्त) का शिष्य उसके बदले में हवन करे; क्योंकि वह विद्या देकर खरीदा जा चुका है, फलतः अन्तेवासी के किये कर्म का फल गुरु को ही मिलेगा । या ( अशक्त ) का क्षीरहोता हवन करे; क्योंकि यह क्षीरहोता धन से परिक्रीत है । प्रश्न है—गृहस्थादि अर्थ विहित का अनुवाद है, या किसी कामना से यह अर्थपरि- कल्पन है ? विहित का अनुवाद मानना ही उचित है । ऋणी की तरह इच्छाधीन गृहस्थ ही अस्वतन्त्र है, अतः यहाँ उसी को अधिकारी माना गया है । इसलिये गृहस्थ कर्मों में प्रवृत्त होता है—यह वाक्य, सामर्थ्य क्लृप्त होने से उपपन्न हो गया । प्रयत्न के विषय

६०. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०९

६०. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०९ कल्पन्ते । विहितं च जायमानम्, विधीयते च जायमानम् । तेन यः सम्बद्ध्यते सोऽयं जायमान इति । प्रत्यक्षविधानाभावादिति चेद् ? न; प्रतिषेधस्यापि प्रत्यक्षविधानाभावादिति । प्रत्यक्षतो विधीयते गार्हस्थ्यं ब्राह्मणेन, यदि चाश्रमान्तरमभविष्यत् तदपि व्यधास्यत् प्रत्यक्षतः, प्रत्यक्षविधानाभावान्नास्त्याश्रमान्तरमिति ? न; प्रतिषेध- स्यापि प्रत्यक्षतो विधानाभावात् । न प्रतिषेधोऽपि वै ब्राह्मणेन प्रत्यक्षतो विधीयते, 'न सन्त्याश्रमान्तराणि एक एव गृहस्थाश्रमः' इति प्रतिषेधस्य प्रत्यक्ष- तोऽश्रवणादयुक्तमेतदिति । अधिकाराच्च विधानं विद्यान्तरवत् । यथा शास्त्रान्तराणि स्वे स्वेऽधिकारे प्रत्यक्षतो विधायकानि, नार्थान्तराभावात्; एवमिदं ब्राह्मणं गृहस्थशास्त्रं स्वेऽधिकारे प्रत्यक्षतो विधायकम्, नाश्रमन्तराणामभावादिति । ऋग्ब्राह्मणं चापवर्गाभिधाय्यभिधीयते । ऋचश्च ब्राह्मणानि चापवर्गा- भिवादीनि भवन्ति । ऋचश्च तावत्— 'कर्मभिर्मृत्युमृषयो निषेदुः प्रजावन्तो द्रविण॒च्छमानाः । अथापरे ऋषयो मनीषिणः परं कर्मभ्योऽमृतत्वमानशुः ॥ फलसाधन हैं न कि फल; वे सम्पन्न होते हुए फल को कल्पित करते हैं। यहाँ 'जायमान' विहित है; इससे जो यहाँ सम्बद्ध होता है वही (गृहस्थ) जायमान है । इस ब्राह्मण में जरा का संकेत है, प्रव्रज्या का प्रत्यक्षविधान तो है नहीं ? ऐसा न कहें; क्योंकि उस प्रव्रज्यानिषेध का भी तो प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है । पूर्वपक्षी शंका करता है कि उक्त ब्राह्मण में गार्हस्थ्यविधान तो प्रत्यक्ष है, यदि आश्रमान्तर उसके लिये विहित होता तो उसका भी प्रत्यक्ष विधान होता, अतः ज्ञात होता है गार्हस्थ्यातिरिक्त आश्र- मान्तर नहीं है ? सिद्धान्ती उत्तर देता है—उक्त ब्राह्मण में प्रव्रज्याप्रतिषेध का भी तो प्रत्यक्षविधान नहीं है, अतः यह हम कैसे मान लें कि आश्रमान्तर होता ही नहीं ! एक बात और, इस ब्राह्मणवाक्य की बात छोड़ भी दें, तो भी अन्यत्र हमें यह नहीं मिलता कि एक गृहस्थाश्रम ही है, अन्य आश्रम नहीं हैं । अतः आपका कहना अयुक्त ही है । बल्कि यह समझिये कि यह ब्राह्मणवाक्य अपने अधिकार का विधान करता है । जैसे विद्यान्तर का विधान अन्य शास्त्र में नहीं प्राप्त होता । क्योंकि वे शास्त्र अपने-अपने अधिकार में प्रत्यक्ष विधायक हैं, अर्थान्तर न होने से; उसी तरह यह ब्राह्मण भी गृहस्थ- शास्त्र का प्रत्यक्ष विधायक है आश्रमान्तर का यहाँ विधान न होने से । उधर ऋग्वेद का ब्राह्मण भी अपवर्ग का बोधक है । कुछ ऋचाएँ तथा उनके ब्राह्मण अपवर्ग के बोधक हैं । पहले ऋचाओं को लें । जैसे वाजसनेयिसंहिता (३१.१८) में कहा है—कुछ ऋषि पुत्रपौत्रादि युक्त धन को चाहते हुए कर्मों से बन्ध कर मृत्यु को

३१० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः । परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद् यतयो विशन्ति' ॥ 'वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' ॥ अथ ब्राह्मणानि— 'त्रयो धर्मस्कन्धाः—यज्ञोऽध्ययनं दानमिति, प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचा- र्याचार्यकुलवासीति तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् । सर्वे एवैते पुण्यलोका भवन्ति । ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' । 'एतमेव प्रव्राजिनो लोकमभीप्सन्तः प्रव्रजन्ति' इति । 'अथो खल्वाहुः—काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति तथाक्रतु- र्भवति, यथाक्रतुर्भवति तथा तत्कर्म कुरुते, यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते' । इति कर्मभिः संसरणमुक्त्वा प्रकृतमन्यदुपदिगन्ति— 'इति नु कामयमानोऽथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आत्मकाम आप्त- प्राप्त हुए; तथा दूसरे बुद्धिमान् धर्मज्ञ ऋषि उन कर्मों से दूर रहकर अमृतत्व ( अपवर्ग ) पा गये । उन्हें न कर्म से, न पुत्रपौत्रादिक से, न धन से यह अमृतत्व मिल पाया अपितु केवल त्याग से मिल पाया । यह अमृतत्व अविद्या से दूर गुह्यतम होते हुये भी देदी- प्यमान तेजःपुंज है, जिसे जितेन्द्रिय पुरुष ही पा सकते हैं । तैत्तिरीयारण्यक (३. १२. ७) में लिखा है—'मैं इस आदित्यवर्ण ( तेजोमय ) तम (अविद्या) से दूर महान् पुरुष (आत्मा) को जानता हूँ । इसी को जानकर मनुष्य मृत्यु (जन्म-मरण) को पार कर सकता है । मोक्ष का अन्य कोई मार्ग नहीं है।' अब ब्राह्मण के कुछ उदाहरण सुनिये— छान्दोग्योपनिषद् (२. २३. १) का ब्राह्मणवाक्य है—'ये तीन धर्मस्कन्ध हैं । यज्ञ, अध्ययन तथा दान यह प्रथमस्कन्ध (गृहस्थ), तथा तप द्वितीयस्कन्ध (वानप्रस्थ) है । तीसरा है—आचार्य कुल में रहकर ब्रह्मचर्यव्रतपूर्वक आचार्य की आज्ञा में अपना समय बिताना (ब्रह्मचर्य) । ये सभी पुण्यफलप्रद हैं । परन्तु ब्रह्मज्ञानी (संन्यासी) अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है, अतः वह श्रेष्ठ हैं'। बृहदारण्यक के ब्राह्मण (४. ४. २२) में लिखा है—'इसी संन्यासियों के लोक को चाहते हुए बुद्धिमान् लोग प्रव्रज्या लेते हैं।' दूसरे स्थान (४. ४. ५) पर यही कहता है—'ज्ञानी लोग कहते हैं यह प्राणी वासनामय है, जैसी वासना करेगा वैसे इसके संकल्प होंगे, संकल्पों के अनुसार यह कर्म करेगा; जैसा कर्म करेगा वैसा फल मिलेगा।' इस तरह संसार को कर्ममय बताकर प्रसङ्गोपात्त दूसरी बात का भी उपदेश देते हैं—'यह तो हुई वासना की बात; परन्तु जिसको वासना नहीं है वह अकाम पुरुष CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

६१. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३११

६१. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३११ कामो भवति न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति, इहैव समवलीयन्ते । ब्रह्मौव सन् ब्रह्माप्येति' इति । तत्र यदुक्तम्—'ऋणानुबन्धादपवर्गाभावः' इत्येतदयुक्तमिति । 'ये चत्वारः पथयो देवयानाः' इति च चातुराश्रम्यश्रुतेरेकाश्रम्यानुपपत्तिः ॥ ६० ॥ फलार्थिनश्चेदं ब्राह्मणम्—'जरामर्य्यं वा एतत्सत्रं यदग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासौ च' इति । कथम् ? समारोपणादात्मन्यप्रतिषेधः ॥ ६१ ॥ 'प्राजापत्यामिष्टिं निरूप्य तस्यां सार्ववेदसं हुत्वा आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेत्' इति श्रूयते, तेन विजानीमः—प्रजावित्तलोकैषणाभ्यो व्युत्थि- तस्य निवृत्ते फलार्थित्वे समारोपणं विधीयते इति । एवं च ब्राह्मणानि—"सोऽन्यद् व्रतमुपाकरिष्यमाणो याज्ञवल्क्यो मैत्रेयीमिति होवाच—प्रव्रजिष्यन् वा अरे अहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्या सहान्तं करवाणीति । अथाप्युक्तानुशासनासि मैत्रेयि एतावदरे खल्वमृतत्वमिति होक्त्वा याज्ञवल्क्यः प्रवव्राजेति" ॥ ६१ ॥ वासनारहित हो आत्मज्ञान चाहता हुआ पूर्णसङ्कल्प हो जाता है, उसके प्राण फिर इधर- उधर नहीं भटकते । वह शाश्वत हो जाता है, ब्रह्मरूप हो ब्रह्म में लीन हो जाता है ।' इतनी ऋचाओं तथा ब्राह्मणों का प्रमाण मिलने के बाद भी आपका 'ऋणानुबन्ध से अपवर्ग नहीं होता'— यह कहना अयुक्तियुक्त ही है । अपि च—तैत्तिरीयसंहिता (५. ७. २. ३) में तो 'ये चार आश्रम देवलोक में जाने के मार्ग हैं'—यह कह कर स्पष्ट ही चार आश्रम स्वीकार कर लिए गये हैं ॥ ६० ॥ उक्त 'वार्धक्यपर्यन्त यह अग्निहोत्र तथा दर्श, पूर्णमास यज्ञ हैं'—यह शतपथब्राह्मण- वाक्य फलार्थी को लेकर कहा गया है, न कि यह प्रव्रज्या की मर्यादा का बोधक है । कैसे ? (आगे चल कर) अग्नियों का आत्मा में समारोपण बताने से प्रव्रज्या का प्रतिषेध नहीं बनता ॥ ६१ ॥ 'प्राजापत्य इष्टि का निरूपण करके उसमें अपना सर्वस्व दानकर उन अग्नियों को आत्मा में रखकर ब्राह्मण प्रव्रज्या ग्रहण कर लें'—ऐसा श्रुतिवाक्य हैं। इससे हम अनु- मान करते हैं कि यह वाक्य पुत्रैषणा, धनैषणा, तथा लोकैषणाओं को त्यागकर गार्हस्थ्य से व्युत्थितचित्त पुरुष की फल-कामनायें निवृत्त हो जाने पर उनमें अग्नि का समारोपण विहित करता है । गार्हस्थ्य से व्युत्थितचित्त की प्रव्रज्या विहित है, तभी यह (बृहदारण्यक का) ब्राह्मणवाक्य भी उपपन्न हो पाता है—"वे याज्ञवल्क्य दूसरा व्रत करना चाहते हुए मैत्रेयी से बोले—'या प्रव्रज्या लेकर मैं इस स्थान (जन्ममरणरूपी संसार) से कात्यायनी के साथ अपना छुटकारा कर लूंगा । मैत्रेयि ! तुम यह अच्छी तरह समझ चुकी हो कि वही पद (अपवर्ग) अमृतत्वयुक्त है'—ऐसा कहकर याज्ञवल्क्य प्रव्रजित हो गये" ॥६१॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

३१२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. अ० पात्रचयान्तानुपपत्तेश्च फलाभावः ॥ ६२ ॥ जरामर्यं च कर्मण्यविशेषेण कल्प्यमाने सर्वस्य पात्रचयान्तानि कर्माणीति प्रसज्यते, तत्रैषणाव्युत्थानं न श्रूयेत—'एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे ब्राह्मणा अनूचाना विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोक इति ! ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्तीति' । एषणाभ्यश्च व्युत्थितस्य पात्रचयान्तानि कर्माणि नोपपद्यन्ते इति । नाविशेषेण कर्तुः प्रयोजकं फलं भवतीति । चातुराश्रम्यविधानाच्चेतिहासपुराणधर्मशास्त्रेष्वैकाश्रम्यानुपपत्तिः । तद- प्रमाणमिति चेद् ? न; प्रमाणेन प्रामाण्याभ्यनुज्ञानात् । प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेनेति- हासपुराणस्य प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते—'ते वा खल्वेते अथर्वाङ्गिरस एतदिति- हासपुराणमभ्यवदन्नितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेद इति' । तस्मादयुक्तमेत- दप्रामाण्यमिति । अप्रामाण्ये च धर्मशास्त्रस्य प्राणभृतां व्यवहारलोपाल्लोको- 'उक्त वाक्य फलार्थी के लिए ही विहित है तथा चतुर्थ आश्रम भी है'—इसमें एक और युक्ति देते हैं— पात्रचयान्तानुपपत्ति से भी फलाभाव सिद्ध होता है ॥ ६२ ॥ यदि पुरुष प्रव्रज्या न लेकर गृहस्थाचरण करता हुआ ही मर जाता है तो उसके अग्निहोत्र के पात्र भी उसी के साथ जला दिये जाते हैं—यह विधि यदि साधारणतः सब पुरुषों में कल्पित की जायेगी तो सभी में उक्त पात्रचयदाह कल्पित करना पड़ेगा । तब पीछे कही एषणात्रय से व्युत्थानवाली बात कैसे बनेगी ! जैसे कि बृहदारण्यक में कहा है—"पहले के विद्वान् बुद्धिमान् ब्राह्मण पुत्र की कामना नहीं करते थे, उनका कहना था कि इन पुत्रपौत्रादिकों का हम क्या करेंगे जिनसे न यह लोक सुधरता है न परलोक ! वे ब्राह्मण तीनों ही एषणाओं से अपने चित्त को हटाकर प्रव्रज्या ले भिक्षाचरण करते थे ।" यों इन प्रमाणों से जब ऐषणाओं से व्युत्थान होने पर परिव्राट् को पात्रचयनान्त कर्म उपपन्न ही नहीं होते तो उनका परिव्राट् के साथ दाह कैसे बनेगा ! कर्त्ता को सामान्यतया लेने के लिए प्रयोजक फल नहीं हो सकता । इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र में भी चार आश्रमों का ही विधान होने से एकाश्रम की बात कहीं उपपन्न नहीं होती । वे तो सब अप्रमाण हैं ? यह नहीं कह सकते; क्योंकि प्रमाण ( श्रुति ) से उन ( इतिहासादि ) का प्रामाण्य सिद्ध होता है । ब्राह्मण-प्रमाण से इतिहास-प्रामाण्य यों सिद्ध होता है—'उन अथर्वा, आङ्गिरस आदि ऋषियों ने इस इति- हास-पुराण का आख्यान किया है अतः यों मानना चाहिए कि इतिहास पुराण भी वेदों में एक ( पञ्चम ) वेद है ।' अतः इतिहास पुराणादि को अप्रामाणिक कहना अयुक्त है । धर्मशास्त्र को अप्रामाणिक मानने पर प्राणियों के व्यवहार का कोई आधार न होने से समग्र लोकों का उच्छेद-प्रसंग उपस्थित हो जायेगा । दूसरे, जो ऋषि उन श्रुतियों के CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

६४. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३१३

६४. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३१३ च्छेदप्रसङ्गः । द्रष्टृप्रवक्तृसामान्याच्चाप्रामाण्यानुपपत्तिः । य एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ते खल्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य चेति । विषयव्यवस्थानाच्च यथाविषयं प्रामाण्यम् । अन्यो मन्त्रब्राह्मणस्य विषयः, अन्यच्चेतिहासपुराणधर्मशास्त्राणामिति । यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य, लोकवृत्तमितिहास- पुराणस्य, लोकव्यवहारव्यवस्थानं धर्मशास्त्रस्य विषयः । तत्रैकेन न सर्वं व्यव- स्थाप्यत इति यथाविषयमेतानि प्रमाणानीन्द्रियादिवदिति ॥ ६२ ॥ २. यत्पुनरेतत् 'क्लेशानूबन्धस्याविच्छेदात्' इति ? सुषुप्तस्य स्वप्नादर्शने क्लेशाभावादपवर्गः ॥ ६३ ॥ यथा सुषुप्तस्य खलु स्वप्नादर्शने रागानुबन्धः सुखदुःखानुबन्धश्च विच्छिद्यते, तथापवर्गेऽपीति । एतच्च ब्रह्मविदो मुक्तस्यात्मनो रूपमुदाहरन्तीति ॥ ६३ ॥ ३. यदपि 'प्रवृत्त्यनुबन्धात्' इति ? न प्रवृत्तिः प्रतिसन्धानाय हीनक्लेशस्य ॥ ६४ ॥ प्रक्षीणेषु रागद्वेषमोहेषु प्रवृत्तिर्न प्रतिसन्धानाय । प्रतिसन्धिरस्तु पूर्वजन्म- द्रष्टा या प्रवक्ता हैं वे ही इन इतिहास-पुराणों के भी द्रष्टा प्रवक्ता हैं, अतः इस समा- नता से भी इतिहास-पुराणादि में प्रामाण्य ही मानना चाहिए । वास्तविकता भी यही है कि जो ऋषि मन्त्र ब्राह्मणों के द्रष्टा या प्रवक्ता हैं वे ही लोग इतिहास, पुराण तथा धर्म शास्त्रों के द्रष्टा, प्रवक्ता हैं। एक बात और, दोनों का पृथक्-पृथक् विषय होने से भी दोनों में प्रामाण्य है । मन्त्र ब्राह्मणों का दूसरा विषय है, इतिहास-पुराण-धर्मशास्त्रों का दूसरा विषय है। जैसे यज्ञ मन्त्रब्राह्मण का विषय है, इतिहास पुराण का लोकवृत्त तथा धर्मशास्त्र का लोकव्यवहार व्यवस्थित रखना विषय है ! इनमें से एक ही ने सब यज्ञेतिवृत्तादि की व्यवस्थाएं नहीं की हैं, अतः इनके पृथग्विषयं होने से इन्द्रियों की तरह इनकी प्रामाणिकता भी स्वीकार करना चाहिये ॥ ६२ ॥ २. यह जो कहा था कि क्लेशानूबन्ध के अविच्छेद से अपवर्गाभाव है ? · सुषुप्त को स्वप्नावस्था न रहने पर क्लेशाभाव दिखायी देने से अपवर्ग में क्लेशानू- बन्ध-विच्छेद सम्भव है ॥ ६३ ॥ जैसे सोते हुए पुरुष को घोर निद्रावस्था में राग तथा सुख-दुःखानुबन्ध विच्छिन्न होता है, उसी तरह अपवर्ग में भी यह अनुबन्धविच्छेद सम्भव है। यह मुक्त ब्रह्मज्ञानी अवस्था है ॥ ६३ ॥ ३. यह जो कहा था कि प्रवृत्त्यनुबन्ध से अपवर्गाभाव है ? क्षीणक्लेश ज्ञानी की प्रवृत्ति पुनर्जन्म के लिये प्रतिसन्धान नहीं कर पाती ॥ ६४ ॥ राग-द्वेष-मोह के क्षीण हो जाने पर प्राणी के दैनिक कर्म प्रतिसन्धान करने योग्य नहीं होते । एक जन्म निवृत्त होने पर पुनर्जन्म होना 'प्रतिसन्धि' कहलाता है। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

३१४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० निवृत्तौ पुनर्जन्म, तच्च तृष्णाकारितम्१, तस्यां प्रहीणायां पूर्वजन्मभावे जन्मान्त- राभावोऽप्रतिसन्धानमपवर्गः । कर्मवैफल्यप्रसङ्ग इति चेद् ? न; कर्मविपाकप्रति- संवेदनस्याप्रत्याख्यानात् । पूर्वजन्मनिवृत्तौ पुनर्जन्म न भवतीत्युच्यते, न तु कर्म- विपाकप्रतिसंवेदनं प्रत्याख्यायते । सर्वाणि पूर्वकर्माणि ह्यन्ते जन्मनि विपच्यन्त इति ॥ ६४ ॥ न; क्लेशसन्ततेः स्वाभाविकत्वात् ? ॥ ६५ ॥ नोपपद्यते क्लेशानुबन्धविच्छेदः, कस्मात् ? क्लेशसन्ततेः स्वाभाविकत्वात् । अनादिरियं क्लेशसन्ततिः, न चानादिः शक्य उच्छेत्तुमिति ? ॥ ६५ ॥ अत्र कश्चित् परिहारमाह— प्रागुत्पत्तेरभावानित्यत्ववत् स्वाभाविकेऽप्यनित्यत्वम् ॥ ६६ ॥ यथाऽनादिः प्रागुत्पत्तेरभाव उत्पन्नेन भावेन निवर्त्यते, एवं स्वाभाविकी क्लेशसन्ततिरनित्येति ॥ ६६ ॥ अपर आह— अणुश्यामतानित्यत्ववद् वा ॥ ६७ ॥ यह पुनर्जन्म विषयजन्य तृष्णा के कारण होता है । तृष्णा के क्षीण होने पर पूर्व-जन्म के नाश के बाद दूसरा जन्म नहीं होगा, यह अप्रतिसन्धान ही ‘अपवर्ग’ है । तब तो कर्मवैफल्य होने लगेगा ? हम कर्मविपाकप्रतिसंवेदन का खण्डन नहीं कर रहे हैं, किन्तु हम इतना ही कहते हैं कि पूर्व जन्म निवृत्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता । सभी पूर्व कर्म अन्तिम जन्म में विपाक को प्राप्त हो जाते हैं ॥ ६४ ॥ क्लेशप्रवाह के स्वाभाविक होने से क्लेशानूबन्ध विच्छिन्न नहीं होता ? ॥ ६५ ॥ क्लेशानूबन्धविच्छेद उपपन्न नहीं होता; क्योंकि यह सांसारिक क्लेशप्रवाह स्वाभा- विक है ! यह क्लेशप्रवाह अनादि है, इसका उच्छेद सम्भव नहीं ? ! ६५ ॥ यहां कोई एकदेशी समाधान करता है— उत्पत्ति से पूर्व अभावानित्यत्व की तरह स्वाभाविक में भी अनित्यत्व बन सकता है ॥ ६६ ॥ जैसे क्षीरादि में उत्पत्ति से पूर्व का दध्यभाव ( प्रागभाव ) उत्पन्न दधिभाव से निवृत्त हो जाता है, इसी तरह स्वाभाविक क्लेशप्रवाह की अनित्यता सिद्ध होने से क्लेश- विच्छेद सम्भव है ॥ ६६ ॥ दूसरा एकदेशी कहता है— अणुश्यामता के अनित्यत्व की तरह क्लेशसन्तति का अनित्यत्व बन सकता है ॥ ६७ ॥ १. अदृष्ट०-पाठ० ।