न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० निवृत्तौ पुनर्जन्म, तच्च तृष्णाकारितम्१, तस्यां प्रहीणायां पूर्वजन्मभावे जन्मान्त- राभावोऽप्रतिसन्धानमपवर्गः । कर्मवैफल्यप्रसङ्ग इति चेद् ? न; कर्मविपाकप्रति- संवेदनस्याप्रत्याख्यानात् । पूर्वजन्मनिवृत्तौ पुनर्जन्म न भवतीत्युच्यते, न तु कर्म- विपाकप्रतिसंवेदनं प्रत्याख्यायते । सर्वाणि पूर्वकर्माणि ह्यन्ते जन्मनि विपच्यन्त इति ॥ ६४ ॥ न; क्लेशसन्ततेः स्वाभाविकत्वात् ? ॥ ६५ ॥ नोपपद्यते क्लेशानुबन्धविच्छेदः, कस्मात् ? क्लेशसन्ततेः स्वाभाविकत्वात् । अनादिरियं क्लेशसन्ततिः, न चानादिः शक्य उच्छेत्तुमिति ? ॥ ६५ ॥ अत्र कश्चित् परिहारमाह— प्रागुत्पत्तेरभावानित्यत्ववत् स्वाभाविकेऽप्यनित्यत्वम् ॥ ६६ ॥ यथाऽनादिः प्रागुत्पत्तेरभाव उत्पन्नेन भावेन निवर्त्यते, एवं स्वाभाविकी क्लेशसन्ततिरनित्येति ॥ ६६ ॥ अपर आह— अणुश्यामतानित्यत्ववद् वा ॥ ६७ ॥ यह पुनर्जन्म विषयजन्य तृष्णा के कारण होता है । तृष्णा के क्षीण होने पर पूर्व-जन्म के नाश के बाद दूसरा जन्म नहीं होगा, यह अप्रतिसन्धान ही ‘अपवर्ग’ है । तब तो कर्मवैफल्य होने लगेगा ? हम कर्मविपाकप्रतिसंवेदन का खण्डन नहीं कर रहे हैं, किन्तु हम इतना ही कहते हैं कि पूर्व जन्म निवृत्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता । सभी पूर्व कर्म अन्तिम जन्म में विपाक को प्राप्त हो जाते हैं ॥ ६४ ॥ क्लेशप्रवाह के स्वाभाविक होने से क्लेशानूबन्ध विच्छिन्न नहीं होता ? ॥ ६५ ॥ क्लेशानूबन्धविच्छेद उपपन्न नहीं होता; क्योंकि यह सांसारिक क्लेशप्रवाह स्वाभा- विक है ! यह क्लेशप्रवाह अनादि है, इसका उच्छेद सम्भव नहीं ? ! ६५ ॥ यहां कोई एकदेशी समाधान करता है— उत्पत्ति से पूर्व अभावानित्यत्व की तरह स्वाभाविक में भी अनित्यत्व बन सकता है ॥ ६६ ॥ जैसे क्षीरादि में उत्पत्ति से पूर्व का दध्यभाव ( प्रागभाव ) उत्पन्न दधिभाव से निवृत्त हो जाता है, इसी तरह स्वाभाविक क्लेशप्रवाह की अनित्यता सिद्ध होने से क्लेश- विच्छेद सम्भव है ॥ ६६ ॥ दूसरा एकदेशी कहता है— अणुश्यामता के अनित्यत्व की तरह क्लेशसन्तति का अनित्यत्व बन सकता है ॥ ६७ ॥ १. अदृष्ट०-पाठ० ।