भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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६८. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३१५ यथानादिरणुश्यामता अथ चाग्निसंयोगादनित्या, तथा क्लेशसन्ततिरपीति । सतः खलु धर्मो नित्यत्वमनित्यत्वं च । तत्त्वं भावेऽभावे भाक्तमिति । 'अनादि- रणुश्यामता' इति हेत्वभावादयुक्तम् । अनुत्पत्तिधर्मकमनित्यमिति नात्र हेतु- रस्तीति ॥ ६७ ॥ अयं तु समाधिः— न; सङ्कल्पनिमित्तत्वाच्च रागादीनाम् ॥ ६८ ॥ कर्मनिमित्तत्वादितरेतरनिमित्तत्वाच्चेति समुच्चयः । मिथ्यासङ्कल्पेभ्यो रञ्जनीयकोपनीयमोहनीयेभ्यो रागद्वेषमोहा उत्पद्यन्ते, कर्म च सत्त्वनिकायनिर्व- र्तकं नैयमिकान् रागद्वेषमोहान्निर्वर्त्तयति; नियमदर्शनात् । दृश्यते हि कश्चित् सत्त्वनिकायो रागबहुलः, कश्चिद् द्वेषबहुलः, कश्चिन्मोहबहुल इति । इतरेतर- निमित्ता च रागादीनामुत्पत्तिः । मूढो रज्यति, मूढः कुप्यति, रक्तो मुह्यति, कुपितो मुह्यति । सर्वमिथ्यासङ्कल्पानां तत्त्वज्ञानादनुत्पत्तिः । कारणानुत्पत्तौ च कार्यानुत्पत्तेरिति—रागादीनामत्यन्तमनुत्पत्तिरिति । जैसे यद्यपि अणु का श्यामरूप अनादि है, परन्तु वही अग्निसंयोग होने पर निवृत्त हो जाता है, उसी तरह क्लेशसन्तति अनादि होते हुए भी निवृत्त हो सकती है । अब सिद्धान्ती पहले दोनों एकदेशिमंतों का खण्डन करता है— १. नित्यत्वानित्यत्वादि धर्म भावरूप पदार्थ में ही सम्भव हो सकते हैं, अभाव में नहीं । यदि कहीं ये अभाव में उपलब्ध होते हों तो वे उपचारात् ही समझने चाहिये । अतः अभाव का दृष्टान्त देना उचित नहीं । २. 'अणुश्यामता अनादि है' इसमें हेतु न होने से यह अयुक्त है । और उसको अनित्य कहना भी नहीं बनेगा; क्योंकि जो कुछ भी अनुत्पत्तिधर्मा हो वह अनित्य हो हो—यह किसी हेतु से सिद्ध नहीं किया जा सकता ! ॥ ६७ ॥ सिद्धान्ती का समाधान यह है— रागादि के सङ्कल्पनिमित्त होने से ( क्लेशसन्तति स्वाभाविक ) नहीं ॥ ६८ ॥ कर्मनिमित्त होने से तथा इतरेतरनिमित्त होने से भी वह स्वाभाविक नहीं । १. रञ्जनीय, कोपनीय तथा मोहनीय मिथ्या सङ्कल्पों से राग द्वेष तथा मोह उत्पन्न होते हैं । तथा पुरुष में वैसी व्यवस्था देखी जाने से सत्त्वनिकाय ( प्राणिशरीर ) को उत्पन्न करने वाला कर्म भी नियमतः राग द्वेष मोह को उत्पन्न करता है—यह नियम ज्ञात होता है । उदाहरणार्थ, इस संसार में कोई प्राणी रागातिशयी, कोई द्वेषातिशयी तथा कोई मोहातिशयी होता है । २. रागादि की उत्पत्ति परस्परनिमित्तक भी है, जैसे—मोहसम्पन्न को राग होता है, वही कुपित भी होता है; रागातिशयी मुग्ध भी होता है, और कुपित भी । सभी मिथ्यासङ्कल्प तत्त्वज्ञान होने पर उत्पन्न नहीं हो पाते । यों कारणानुत्पत्ति से कार्यानुत्पत्ति हो जाने पर रागादि की अत्यन्तानुपपत्ति सम्भव है ।