न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० 'अनादिश्च क्लेशसन्ततिः' इत्यप्युक्तम्, सर्वे इमे खल्वाध्यात्मिका भावा अनादिना प्रबन्धेन प्रवर्त्तन्ते शरीरादयः । न जात्वत्र कश्चिदनुत्पन्नपूर्वः प्रथमत उत्पद्यतेऽन्यत्र तत्त्वज्ञानात् । न चैवं सत्यनुत्पत्तिधर्मकं किञ्चिद्व्ययधर्मकं प्रतिज्ञा- यते इति । कर्म च सत्त्वनिकायनिर्वर्तकं तत्त्वज्ञानकृतान्मिथ्यासङ्कल्पविधातान्न रागाद्युत्पत्तिनिमित्तं भवति, सुखदुःखसंवित्तिफलं तु भवतीति ॥ ६८ ॥ इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये चतुर्थाध्यायस्याद्यमाह्निकम् । • [ द्वितीयमाह्निकम् ] तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् [ १-३ ] किं नु खलु भोः ! यावन्तो विषयास्तावत्सु प्रत्येकं तत्त्वज्ञानमुत्पद्यते ? अथ क्वचिदुत्पद्यत इति ? कश्चात्र विशेषः ? न तावदेकैकत्र यावद्विषयमुत्पद्यते; ज्ञेया- नामानन्त्यात् । नापि क्वचिदुत्पद्यते, यत्र नोत्पद्यते तत्रानिवृत्तो मोह इति मोह- शेषप्रसङ्गः । न चान्यविषयेण तत्त्वज्ञानेनान्यविषयो मोहः शक्यः प्रतिषेद्धुमिति ? मिथ्याज्ञानं वै खलु मोहो न तत्त्वज्ञानस्यानुत्पत्तिमात्रम् । तच्च मिथ्याज्ञानं 'क्लेशसन्तति अनादि हैं'—यह भी आपने कहा । इतना ही नहीं, सभी आध्यात्मिक शरीरादि भाव अनादिप्रवाह से प्रवर्त्तमान हैं। ऐसा इनमें आज कोई पहली बार उत्पन्न नहीं हुआ जो पहले कभी उत्पन्न न हुआ हो, केवल तत्त्वज्ञान को छोड़ कर । इसका यह अर्थ नहीं कि अनुत्पत्तिधर्मक भाव भी निवृत्त होता है । अपि तु प्राणिशरी- रोत्पादक कर्म तत्त्वज्ञानकृत मिथ्यासङ्कल्पनाश से रागादि की उत्पत्ति में कारण नहीं बनता । हाँ, तत्त्वज्ञान होने पर भी सुखदुःखसंवेदन फल तो होता ही रहता है ॥ ६८ ॥ वात्स्यायनीय न्यायभाष्य(सहित न्यायदर्शन) में चतुर्थाध्याय का प्रथमाह्निक समाप्त • क्यों जी, हम पूछते हैं कि जितने विषय हैं उनमें से व्यक्तिशः प्रत्येक का तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है या किसी एक व्यक्ति का तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता है ? इसमें अन्तर क्या आयेगा ? विषय के अनुसार एक-एक का ज्ञान सम्भव नहीं; क्योंकि ज्ञेय अनन्त हैं, कहाँ तक पार पाइयेगा । किसी एक व्यक्ति के तत्त्वज्ञानोत्पाद से कोई लाभ नहीं; क्योंकि जहाँ वह उत्पन्न नहीं हुआ वहां मोह रह ही जायेगा तो मोह फिर भी शेष रह गया । यह कैसे हो सकता है कि अन्यविषयक तत्त्वज्ञान से अन्यविषयक मोह निवृत्त हो जाये ! मिथ्याज्ञान को मोह कहते हैं, न कि तत्त्वज्ञान की अनुत्पत्तिमात्र को । मिथ्याज्ञान जिस