न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६४. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३१३ च्छेदप्रसङ्गः । द्रष्टृप्रवक्तृसामान्याच्चाप्रामाण्यानुपपत्तिः । य एव मन्त्रब्राह्मणस्य द्रष्टारः प्रवक्तारश्च ते खल्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य चेति । विषयव्यवस्थानाच्च यथाविषयं प्रामाण्यम् । अन्यो मन्त्रब्राह्मणस्य विषयः, अन्यच्चेतिहासपुराणधर्मशास्त्राणामिति । यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य, लोकवृत्तमितिहास- पुराणस्य, लोकव्यवहारव्यवस्थानं धर्मशास्त्रस्य विषयः । तत्रैकेन न सर्वं व्यव- स्थाप्यत इति यथाविषयमेतानि प्रमाणानीन्द्रियादिवदिति ॥ ६२ ॥ २. यत्पुनरेतत् 'क्लेशानूबन्धस्याविच्छेदात्' इति ? सुषुप्तस्य स्वप्नादर्शने क्लेशाभावादपवर्गः ॥ ६३ ॥ यथा सुषुप्तस्य खलु स्वप्नादर्शने रागानुबन्धः सुखदुःखानुबन्धश्च विच्छिद्यते, तथापवर्गेऽपीति । एतच्च ब्रह्मविदो मुक्तस्यात्मनो रूपमुदाहरन्तीति ॥ ६३ ॥ ३. यदपि 'प्रवृत्त्यनुबन्धात्' इति ? न प्रवृत्तिः प्रतिसन्धानाय हीनक्लेशस्य ॥ ६४ ॥ प्रक्षीणेषु रागद्वेषमोहेषु प्रवृत्तिर्न प्रतिसन्धानाय । प्रतिसन्धिरस्तु पूर्वजन्म- द्रष्टा या प्रवक्ता हैं वे ही इन इतिहास-पुराणों के भी द्रष्टा प्रवक्ता हैं, अतः इस समा- नता से भी इतिहास-पुराणादि में प्रामाण्य ही मानना चाहिए । वास्तविकता भी यही है कि जो ऋषि मन्त्र ब्राह्मणों के द्रष्टा या प्रवक्ता हैं वे ही लोग इतिहास, पुराण तथा धर्म शास्त्रों के द्रष्टा, प्रवक्ता हैं। एक बात और, दोनों का पृथक्-पृथक् विषय होने से भी दोनों में प्रामाण्य है । मन्त्र ब्राह्मणों का दूसरा विषय है, इतिहास-पुराण-धर्मशास्त्रों का दूसरा विषय है। जैसे यज्ञ मन्त्रब्राह्मण का विषय है, इतिहास पुराण का लोकवृत्त तथा धर्मशास्त्र का लोकव्यवहार व्यवस्थित रखना विषय है ! इनमें से एक ही ने सब यज्ञेतिवृत्तादि की व्यवस्थाएं नहीं की हैं, अतः इनके पृथग्विषयं होने से इन्द्रियों की तरह इनकी प्रामाणिकता भी स्वीकार करना चाहिये ॥ ६२ ॥ २. यह जो कहा था कि क्लेशानूबन्ध के अविच्छेद से अपवर्गाभाव है ? · सुषुप्त को स्वप्नावस्था न रहने पर क्लेशाभाव दिखायी देने से अपवर्ग में क्लेशानू- बन्ध-विच्छेद सम्भव है ॥ ६३ ॥ जैसे सोते हुए पुरुष को घोर निद्रावस्था में राग तथा सुख-दुःखानुबन्ध विच्छिन्न होता है, उसी तरह अपवर्ग में भी यह अनुबन्धविच्छेद सम्भव है। यह मुक्त ब्रह्मज्ञानी अवस्था है ॥ ६३ ॥ ३. यह जो कहा था कि प्रवृत्त्यनुबन्ध से अपवर्गाभाव है ? क्षीणक्लेश ज्ञानी की प्रवृत्ति पुनर्जन्म के लिये प्रतिसन्धान नहीं कर पाती ॥ ६४ ॥ राग-द्वेष-मोह के क्षीण हो जाने पर प्राणी के दैनिक कर्म प्रतिसन्धान करने योग्य नहीं होते । एक जन्म निवृत्त होने पर पुनर्जन्म होना 'प्रतिसन्धि' कहलाता है। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri