न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 319, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें५५. सू० ] दुःखपरीक्षाप्रकरणम् ३०१ न पुत्रपशुस्त्रीपरिच्छदहिरण्यान्नादिफलनिर्देशात् ? ॥ ५३ ॥ पुत्रादि फलं निर्दिश्यते, न प्रीतिः—'ग्रामकामो यजेत', 'पुत्रकामो यजेतेति' । तत्र यदुक्तम्-'प्रीतिः फलम्' इति, एतदयुक्तमिति ? ॥ ५३ ॥ तत्सम्बन्धात् फलनिष्पत्तेस्तेषु फलवदुपचारः ॥ ५४ ॥ पुत्रादिसम्बन्धात् फलं प्रीतिलक्षणमुत्पद्यते इति पुत्रादिषु फलवदुपचारः । यथान्ने प्राणशब्दः—'अन्नं वै प्राणाः' इति ॥ ५४ ॥ दुःखपरीक्षाप्रकरणम् [ ५५-५८ ] फलानन्तरं दुःखमुद्दिष्टम्, उक्तं च-'बाधनालक्षणं दुःखम्' (१.१.२१) इति । तत्किमिदं प्रत्यात्मवेदनीयस्य सर्वजन्तुप्रत्यक्षस्य सुखस्य प्रत्याख्यानम् ? आहोस्विदन्यः कल्प इति ? अन्य इत्याह । कथम् ? न वै सर्वलोकसाक्षिकं सुखं शक्यं प्रत्याख्यातुम् । अयं तु जन्ममरणप्रबन्धानुभवनििमित्ताद् दुःखान्निर्विण्णस्य दुखं जिहासतो दुःखसंज्ञाभावनोपदेशो दुःखहानार्थ इति । कया युक्त्या ? सर्वे खलु सत्त्वनि- कायाः सर्वाण्युत्पत्तिस्थानानि सर्वः पुनर्भवो बाधनानुषक्तो दुःखसाहचर्याद् समानाश्रय नहीं बनेगा. क्योंकि ( उस ग्रामकामक अग्निहोत्र का ) पुत्र-स्त्री-पशु- सुवर्ण-अन्न आदि फल भी निर्दिष्ट किया गया है, न कि प्रीति ही ? ॥ ५३ ॥ 'ग्राम की इच्छा वाला यज्ञ करे', 'पुत्र की इच्छा वाला यज्ञ करे' इत्यादि श्रुतियों से पुत्रादिप्राप्तिफल भी उपवर्णित है। अतः आपने उसका प्रीति ही फल बतलाया—वह अयुक्त है ? ॥ ५३ ॥ उसके सम्बन्ध से फलनिष्पत्ति होने के कारण पुत्रादि में फल की तरह उपचार कर लिया जाता है ॥ ५४ ॥ वस्तुतः पुत्रादिसम्बन्ध से प्रीतिधर्म फल उत्पन्न होता है, अतः पुत्रादि में फल का आरोप कर लिया है। जैसे अन्न के प्राणरक्षक होने से श्रुति में अन्न को ही प्राण कह दिया गया है—'अन्न ही प्राण हैं' ॥ ५४ ॥ उद्देशसूत्र में फल के बाद 'दुःख' का नामनिर्देश किया है, तथा आगे चलकर इसका लक्षण किया है—'बाधना ( पीड़ा ) को दुःख कहते हैं' ( १.१.२१ ) तो क्या यह दुःख सभी प्राणियों को प्रत्यक्ष होने वाले सर्वजनानुभवसिद्ध 'सुख' का प्रतिषेध है, या कोई दूसरा है ? प्रतिषेध से दूसरा है। कैसे ? सर्वजनानुभवसिद्ध सुख का यह प्रतिषेध नहीं कहा जा सकता; अर्थात् सुख नहीं हटाया जा सकता। वह तो जन्ममरण-प्रवाहा- नुभवनििमित्तक दुःख से से दुःखी पुरुष, जो कि उससे छुटकारा पाना चाहता है, को उक्त दुःख में दुःखसंज्ञा की भावना करने के लिये यह उपदेश प्रयुक्त है कि इस भावना से तुम्हारा दुःख निवृत्त हो जायेगा तथा सुख मिलेगा। इसमें युक्ति क्या है? 'सभी प्राणिसमूह, सभी उत्पत्तिस्थान, सभी जन्म दुःख में लिपटे हुए हैं, दुःख के साहचर्य से ये CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri