भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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३०० · वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० प्रागुत्पत्तेरुत्पत्तिधर्मकमसदित्यद्धा । कस्मात् ? उत्पादव्ययदर्शनात् ॥ ४९ ॥ यत्पुनरुक्तम्-प्रागुत्पत्तेः कार्यं नासदुपादाननियमादिति ? बुद्धिसिद्धं तु तदसत् ॥ ५० ॥ इदमस्योत्पत्तये समर्थं न सर्वमिति प्रागुत्पत्तेर्नियतकारणं कार्यं बुद्ध्या सिद्धम्; उत्पत्तिनियमदर्शनात् । तस्मादुपादाननियमस्योपपत्तिः । सति तु कार्ये प्रागुत्पत्तेरुत्पत्तिरेव नास्तीति ॥ ५० ॥ आश्रयव्यतिरेकाद् वृक्षफलोत्पत्तिवदित्यहेतुः ? ॥ ५१ ॥ मूलसेकादि परिकर्म फलं चोभयं वृक्षाश्रयम्, कर्म चेह शरीरे, फलं चामु- त्रेत्याश्रयव्यतिरेकादहेतुरिति ? ॥ ५१ ॥ प्रीतेरात्माश्रयत्वादप्रतिषेधः ॥ ५२ ॥ प्रीतिरात्मप्रत्यक्षत्वादात्माश्रया, तदाश्रयमेव कर्म धर्मसंज्ञितम्, धर्मस्यात्म- गुणत्वात् । तस्मादाश्रयव्यतिरेकानुपपत्तिरिति ॥ ५२ ॥ 'उत्पत्ति से पूर्व, यह उत्पत्तिधर्मा असत् ही हैं'—यही पक्ष ठीक है । क्योंकि उसका उत्पाद-विनाश देखा जाता है ॥ ४९ ॥ यह जो कहा था कि—उपादाननियम होने से उत्पत्ति से पूर्व कार्य असत् नहीं है ? वह असत् बुद्धिविषयक है ॥ ५० ॥ 'यही इसकी उत्पत्ति में समर्थ है, अन्य सब नहीं'—इस अनुमान से यह उत्पत्ति से पूर्व नियत कारणवाला है ऐसा कार्य बुद्धि से सिद्ध होता है । इस तरह बुद्धिसिद्धि होने से उपादाननियम की बात सिद्ध हो जाती हैं । उत्पत्ति से पूर्व कार्य को सत् मानने पर उस की उत्पत्ति ही क्या होगी ! ॥ ५० ॥ 'वृक्षफलोत्पत्ति की तरह' यह दृष्टान्त परलोकभाविफल का असाधक हैं; ( क्योंकि उभयलोकानुगत सुखदुःखादिरूप फल का ) आश्रय कोई नहीं है ? ॥ ५१ ॥ दृष्टान्त में, मूलमें जलसिञ्चन तथा फलोत्पत्ति—दोनों का एक ही वृक्ष आश्रय है, जबकि यहाँ कर्म इस शरीर में तथा फल दूसरे शरीर में । तब बताइये—वृक्षफलोत्पत्ति वाला दृष्टान्त यहाँ कैसे घटेगा ? ॥ ५१ ॥ प्रीति के आत्माश्रय होने से आश्रयविरोध नहीं है ॥ ५२ ॥ 'प्रीति' कहते हैं सुख को, स्वर्ग भी सुखविशेष ही है । यह 'प्रीति' आत्मा द्वारा प्रत्यक्ष की जाने से आत्माश्रय है, धर्मसंज्ञक कर्म भी आत्माश्रय ही है; क्योंकि वह धर्म आत्मगुण है । यों आश्रय का अस्तित्व न रहने की साधक युक्ति खण्डित हो गयी ॥ ५२ ॥