न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२. सू० ] शब्दानित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १५३ इति; द्विरनृत्यत्, त्रिरनृत्यद्; द्विरग्निहोत्रं जुहोति, द्विर्भुङ्क्ते ॥ ३० ॥ एवं व्यभिचारात्, प्रतिषिद्धहेतावन्यशब्दस्य प्रयोगः प्रतिषिध्यते— अन्यदन्यस्मादनन्यत्वादनन्यदित्यन्यताऽभावः ? ॥ ३१ ॥ यदिदमन्यदिति मन्यसे, तत् स्वार्थेनानन्यत्वाद् अन्यन्न भवति, एवमन्यताया अभावः। तत्र यदुक्तम्-‘अन्यत्वेऽप्यभ्यासोपचारात्' इति, एतदयुक्तमिति? ॥३१॥ शब्दप्रयोगं प्रतिषेधतः शब्दान्तरप्रयोगः प्रतिषिध्यते— तदभावे नास्त्यनन्यता, तयोरितरेतरापेक्षासिद्धेः ॥ ३२ ॥ अन्यस्यानन्यतामुपपादयति भवान्, उपपाद्य चान्यत् प्रत्याचष्टे, अनन्यदिति च शब्दमनुजानाति, प्रयुंक्ते चानन्यदिति। एतत् समासपदम्, अन्यशब्दोऽयं प्रतिषेधेन सह समस्यते । यदि चात्रोत्तरं पदं नास्ति कस्यायं प्रतिषेधेन सह समासः ? तस्मात्तयोरनन्यान्यशब्दयोरितरोऽनन्यशब्द इतरमन्यशब्दमपेक्षमाणः दो वार नृत्य कीजिये, तीन वार नृत्य कीजिये !' 'वह दो वार नाचा' 'तीन वार नाचा', ‘दो वार अग्निहोत्र करता है’ ‘दो वार खाता है’ । ( इस प्रकार अस्थिर में भी अभ्यास देखा जाता है ) ॥ ३० ॥ शङ्का—इस प्रकार व्यभिचार दोष दिखाकर हेतु ( सम्प्रदान तथा अभ्यास ) का प्रतिषेध कर देने पर, ‘अन्य’ शब्द का भी प्रतिषेध किया जा सकता है— यह ‘अन्य’ दूसरे से अनन्य होने से अनन्य ही है, अतः अन्यता नहीं बन सकती ? ॥ ३१ ॥ जिसको 'अन्य' कह रहे हैं वह स्वार्थ से अनन्य हैं, अतः वह अन्य नहीं हो सकता; यों ( अन्य' न सिद्ध होने पर भी ) ‘अन्य में भी औपचारिक अभ्यास बन सकता है’ आप का यह कथन अयुक्तियुक्त है ? ॥ ३१ ॥ [ भाष्यकार कहते हैं कि वाक्छल से ] शब्द-प्रयोग का प्रतिषेध करने वाले पूर्व- पक्षी का यह शब्दान्तरप्रयोग के प्रतिषेध से उत्तर है— उस ‘अन्य’ के अभाव में अनन्यता भी कहां रहेगी ? क्योंकि उन दोनों की सिद्धि परस्परापेक्ष है ॥ ३२ ॥ आप अन्य की अनन्यता सिद्ध करना चाहते हैं, उसे सिद्ध करके ‘अन्य’ का प्रत्या- ख्यान करते हैं । ‘अनन्यत्’ शब्द को आप स्वीकार करते हैं, और उसका प्रयोग करते हैं । क्या आप नहीं जानते कि ‘अनन्यत्’ यह समस्त पद है ! यहाँ ‘अन्य’ शब्द प्रतिषेध ( नञ् ) के साथ समस्त है । यदि आपके मत में यहाँ उत्तरपद ( अन्य ) नहीं है तो