भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१६२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० सति द्रव्यभावे विकारवैषम्ये नाऽनडुहोऽश्वो विकारः, विकारधर्मानुपपत्तेः; एव- मिवर्णस्य न यकारो विकारः, विकारधर्मानुपपत्तेरिति !॥ ४६ ॥ ३. इतश्च न सन्ति वर्णविकाराः— विकारप्राप्तानामपुनरापत्तेः ॥ ४७ ॥ अनुपपन्ना पुनरापत्तिः । कथम् ? पुनरापत्तेरननुमानादिति । इकारो यकार- त्वमापन्नः पुनरिकारो भवति, न पुनरिकारस्य स्थाने यकारस्य प्रयोगोऽप्रयोग- श्चेत्यत्रानुमानं नास्ति ॥ ४७ ॥ सुवर्णादीनां पुनरापत्तेरहेतुः ? ॥ ४८ ॥ अननुमानादिति न । इदं ह्यनुमानम्— सुवर्णं कुण्डलत्वं हित्वा रुचकत्वमापद्यते, रुचकत्वं हित्वा पुनः कुण्डलत्व- मापद्यते, एवमिकारोऽपि यकारत्वमापन्नः पुनरिकारो भवतीति ? ॥ ४८ ॥ व्यभिचारादननुमानम्, यथा—पयो दधिभावमापन्नं न पुनः पयो भवति, किमेवं वर्णानां न पुनरापत्तिः ? अथ सुवर्णवत् पुनरापत्तिरिति ? सुवर्णोदाहरणोपपत्तिश्च— न; तद्विकाराणां सुवर्णभावाव्यतिरेकात् ॥ ४९ ॥ क्योंकि वहां विकारधर्म की उत्पत्ति नहीं है; इसी तरह इवर्ण भी यकार का विकार नहीं है, क्योंकि यहाँ विकारधर्म की उपपत्ति नहीं है ॥ ४६ ॥ ३. इसलिये भी वर्ण विकार नहीं हैं, क्योंकि— विकारापन्नों की पुनरापत्ति नहीं हुआ करती ॥ ४७ ॥ यहाँ पुनःप्राप्ति अनुपपन्न है; कैसे ? पुनरापत्ति से विकार का अनुमान नहीं होता । यहाँ तो इकार यकार बनकर फिर इकार बन जाता है । यकार के स्थान में इकार का प्रयोग है, या अप्रयोग, अतः इस विषय में विकार का अनुमान नहीं होता ॥ ४७ ॥ सुवर्णादिकों के पुनरापादन से उक्त हेतु नहीं बनता ? ॥ ४८ ॥ अनुमान नहीं होता—यह आपका कथन उचित नहीं; क्योंकि यह अनुमान है— ‘सुवर्ण कुण्डलत्व को छोड़कर रुचकत्व-आकृति प्राप्त कर लेता है, रुचकत्व को छोड़कर पुनः कुण्डलत्वाकृति धारण कर लेता है । इसी तरह इकार भी यकार बन कर पुनः इकार बन जाता है’ ? ॥ ४८ ॥ हेतु के व्यभिचरित होने से अनुमान नहीं है; जैसे दूध के दही बन जाने पर पुनः वह दूध नहीं बन सकता । क्या इस दूध की तरह वर्णों का पुनरापादन नहीं होता, या सुवर्ण की तरह पुनरापादन हो जाता है ? सुवर्ण की तरह आपादन तो— नहीं होता; क्योंकि उस सुवर्ण के विकार उससे अतिरिक्त नहीं हैं ॥ ४९ ॥