भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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५२. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १६३ अवस्थितं सुवर्णं हीयमानेन धर्मेण उपजायमानेन च धर्मि भवति, नैवं कश्चिच्छब्दात्मा हीयमानेनेत्वेन उपजायमानेन यत्वेन धर्मी गृह्यते, तस्मात् सुवर्णोदाहरणं नोपपद्यत इति ॥ ४९ ॥ वर्णत्वाव्यतिरेकाद्वर्णविकाराणामप्रतिषेधः१ ? ॥ ५० ॥ वर्णविकारा अपि वर्णत्वं न व्यभिचरन्ति, यथा-सुवर्णविकारः सुवर्णत्व- मिति ? ॥ ५० ॥ सामान्यवतो धर्मयोगो न सामान्यस्य१ ॥ ५१ ॥ कुण्डलरुचकौ सुवर्णस्य धर्मौ न सुवर्णत्वस्य, एवमिकारयकारौ कस्य वर्णा- त्मनो धर्मौ ? वर्णत्वं सामान्यम्, न तस्येमौ धर्मौ भवितुमर्हतः । न च निवर्त- मानो धर्म उपजायमानस्य प्रकृतिः, तत्र निवर्तमान इकारो न यकारस्योपजाय- मानस्य प्रकृतिरिति ॥ ५१ ॥ ४. इतश्च वर्णविकारानुपपत्तिः— नित्यत्वेऽविकारादनित्यत्वे चानवस्थानात् ॥ ५२ ॥ 'नित्या वर्णाः' इत्येतस्मिन् पक्षे इकारयकारौ वर्णौ—इत्युभयोर्नित्यत्वाद् वर्तमान सुवर्ण हीयमान, तथा उत्पद्यमान धर्म से धर्मी बन सकता है; परन्तु कोई शब्दात्मा हीयमान इकार से उत्पद्यमान यकार द्वारा धर्मी नहीं बनता । अतः यहाँ सुवर्णोदाहरण नहीं घटता ॥ ४९ ॥ वर्णत्व के सामान्य होने से, वर्णविकारों का प्रतिषेध युक्त नहीं ॥ ५० ॥ वर्णविकार भी वर्णत्व को व्यभिचरित नहीं कर पाते, जैसे-सुवर्णविकार सुवर्णत्व को; (अतः वर्णविकार से वर्णत्व स्थिर होने से वर्ण विकार है ?) ॥ ५० ॥ सामान्यवान् का विकारधर्म (कार्ययोग) सामान्य का नहीं बना करता ॥ ५१ ॥ कुण्डल या रुचक—सुवर्ण के धर्म हैं, सुवर्णत्व के नहीं, इस तरह इकार यकार किस वर्णात्मा के धर्म होंगे ? वर्णत्व सामान्य है, उसके इकार-यकार धर्म नहीं बन सकते । जो विनष्ट होता है वह (हीयमान) धर्म उपजायमान धर्म की प्रकृति कैसे बन सकता है ! अतः निवर्तमान इकार उपजायमान यकार की प्रकृति नहीं है ॥ ५१ ॥ ४. इसलिये भी वर्णविकार का अनुपपादन समझना चाहिये— ( क्योंकि ) नित्य होनेपर उनमें विकार न बनेगा, अनित्य मानने पर उनका अनवस्थान होगा ॥ ५२ ॥ 'वर्ण नित्य हैं' इस पक्ष में इकार-यकार दोनों ही वर्णों के नित्य होने से उनमें १. १. सूत्रद्वयं यद्यपि न्यायसूचीनिबन्धे नोपलभ्यते इति तात्पर्यटीकाऽसम्मतिः स्पष्टं प्रतिभाति, तथापि वार्त्तिककृता सूत्रद्वयस्यापि व्याख्यानादस्माभिरिदं स्वीकृतम् ।-स०