न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३७. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १११ धिकरणयात् । एकमिदं महच्चेति एकविषयौ प्रत्ययौ समानाधिकरणौ भवतः, तेन विज्ञायते—यन्महत्तदेकमिति । अणुसमूहातिशयग्रहणं महत्प्रत्यय इति चेत् ? सोऽयममहत्सु अणुषु महत्प्रत्ययोऽतस्मिंस्तदिति प्रत्ययो भवतीति । किं चातः ? अतस्मिंस्तदिति प्रत्ययस्य प्रधानापेक्षित्वात् प्रधानसिद्धिरिति भवितव्यं महत्येव महत्प्रत्ययेनेति । अणुः शब्दो महानिति च व्यवसायात् प्रधानसिद्धिरिति चेत् ? न; मन्द- तीव्रताग्रहणमियत्तानवधारणाद्, यथा द्रव्ये । अणुः शब्दोऽल्पो मन्द इत्येतस्य ग्रहणं महान् शब्दः पटुस्तीव्र इत्येतस्य ग्रहणम् । कस्मात् ? इयत्तानवधारणात् । न ह्ययम् 'महान् शब्दः' इति व्यवस्यन् 'इयानयम्' इत्यवधारयति, यथा बदरा- मलकबिल्वादिनी । २. संयुक्ते इमे इति च द्वित्वसमानाश्रयप्राप्तिग्रहणम् । द्वौ समुदायावाश्रयः संयोगस्येति चेत्—कोऽयं समुदायः ? प्राप्तिरनेकस्य, अनेका वा प्राप्तिरेकस्य समुदाय इति चेत् ? प्राप्तेरग्रहणं प्राप्त्याश्रितायाः । संयुक्ते इमे वस्तुनी इति नात्र द्वे प्राप्ती संयुक्ते गृह्येते । समान अधिकरण में हो रहे हैं। इससे ज्ञात होता है कि 'जो महान् है वही एक हैं' । यदि यह कहो कि अणुसमूह का अतिशय ( आधिक्य ) बोधन के लिए यहाँ मह- च्छब्द का प्रयोग है ? तो यह भी नहीं कह सकते; क्योंकि तब यह अमहान् ( लघु ) अणुओं में महत्त्व बतलाना 'अतत् में तत्ता' बोधन (आरोप) होगा, वास्तविक नहीं। इससे अनिष्ट यह होगा कि 'अतत् में तत्ता' ज्ञान के प्रधानापेक्षी होने से प्रधान की सिद्धि हुआ करती है, अतः 'महत्' का प्रत्यय 'महत्' में ही होगा, द्रव्यान्तर ( अणु ) में नहीं। 'शब्द अणु भी है हैं महान् भो हैं'—ऐसा व्यवसाय होने से शब्द में प्रधान की सिद्धि हो जायेगी ? शब्द में अणुता, तीव्रता, पटुता आदि परिमाणविशेष का ज्ञान 'इयत्ता' का निश्चय न होने से नहीं होता, जैसा द्रव्य में हो जाता है। इयत्तानिश्चय न होने से 'शब्द अणु है, अल्प है, मन्द हैं'—यह ज्ञान तथा 'शब्द महान् है, तीव्र हैं'—यह ज्ञान नहीं होता । प्रयोक्ता पुरुष 'यह महान् शब्द हैं'—ऐसा निश्चय करता हुआ 'यह इतना बड़ा हैं'— ऐसा अवधारण नहीं कर पाता, जैसा बेर आमला-आदि फलों के विषय में कर लेता है । २. 'ये दोनों संयुक्त हैं'—यह संयोग-ज्ञान भी तभी बन सकता है जब द्वित्व के समान आश्रय में वह हो । पूर्वपक्षी यदि यह कहे—दो समुदाय इस संयोग के आश्रय हैं, तो उनसे हम पूछते हैं कि यह समुदाय कौन है ? क्या अनेक का एक संयोग या एक में अनेक संयोग ? तो संयोगाश्रित संयोग का ग्रहण नहीं हुआ करता । 'ये दोनों वस्तु संयुक्त होकर हैं'—इन ज्ञान में दो संयोग संयुक्त में गृहीत नहीं होते ।