भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 410 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 128

११० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० स्मिन् सति पुरुषसामान्यग्रहणात् स्थाणौ पुरुषोऽयमिति । एवं नानाभूतेष्वेक- मिति सामान्यग्रहणात् प्रधाने सति भवितुमर्हति । प्रधानं च सर्वस्याग्रहणादिति नोपपद्यते । तस्मादभिन्न एवायमभेदप्रत्यय एकमिति । इन्द्रियान्तरविषयेष्वभेदप्रत्ययः प्रधानमिति चेद्, न; विशेषहेत्वभावात् दृष्टान्ताव्यवस्था । श्रोत्रादिविषयेषु शब्दादिष्वभिन्नेष्वेकप्रत्ययः प्रधानमने- कस्मिन्नेकप्रत्ययस्येति । एवं च सति दृष्टान्तोपादानं न व्यवतिष्ठते; विशेषहेत्व- भावात् । अणुषु सञ्चितेष्वेकप्रत्ययः किमतस्मिंस्तदिति प्रत्ययः स्थाणौ पुरुष- प्रत्ययवत् ? अथाथंस्य तथाभावात्तस्मिंस्तदिति प्रत्ययः, यथा—शब्दस्यैकत्वादेकः शब्द इति ? विशेषहेतुपरिग्रहणमन्तरेण दृष्टान्तौ संशयमापादयत इति । कुम्भ- वत् सञ्चयमात्रं गन्धादयोऽपीत्यनुदाहरणं गन्धादय इति । एवं परिमाणसंयोगस्पन्दजातिविशेषप्रत्ययानप्यनुयोक्तव्यः, तेषु चैवं प्रसङ्ग इति । १. एकत्वबुद्धिस्तस्मिंस्तदिति इति विशेषहेतुर्महदिति प्रत्ययेन सामाना- हें । इसी प्रकार 'अनेकों में एक'—इस.सामान्यग्रहण से कोई प्रधान हो तो अनेक में एकत्व गृहीत हो सकता है, पर अणुओं के नाना होने से सब का ग्रहण न हो पाने के कारण उनमें प्रधानत्व उपपन्न नहीं हो पा रहा है। अतः अभिन्न में अभेद का प्रत्यय ही, 'एक' ऐसी बुद्धि हैं ! यदि यह कहो कि श्रवणादि इन्द्रियान्तर के विषयों (शब्दादि) में अभेदज्ञान को ही यहाँ प्रधान मान लिया जाये ? तो यह भी नहीं कह सकते; क्योंकि विशेष हेतु न होने से इस दृष्टान्त की अव्यवस्था बनेगी । तात्पर्य यह है कि श्रोत्रादि के प्रत्यक्षविषया'शब्दादि अभिन्न में एक प्रत्यय का यहाँ (चाक्षुषपरीक्षाप्रसङ्ग में) प्राधान्येन उपन्यास करना— युक्तियुक्त नहीं है; क्योंकि आपका यह दृष्टान्त विशेष हेतु न होने से स्वयं अव्यवस्थित है । इकट्ठे अणुओं में एकबुद्धि क्या 'अतत् में तत्ता' ज्ञान है, जैसे—स्थाणु में पुरुष का ज्ञान ? या अर्थ ही वैसा होने से स्वसत्ताज्ञान, जैसे एक शब्द होने से उसमें एकत्वबुद्धि ? यों दोनों ही तरह से, विशेष हेतु न मिलने के कारण आपके दृष्टान्त संशयग्रस्त हैं । जैसे—'घट की तरह गन्धादि भी अणुसञ्चय मात्र हैं' इसमें गन्धादि उदाहरण संशायापन्न है; क्योंकि उनकी सञ्चयता भी घटादि की तरह साध्य है । इस प्रसङ्ग में इस अणुसमूहवादी से—एकवृद्धि की तरह परिमाण, संयोग, चेष्टा, जाति-विशेष, आदि के ज्ञान को लेकर भी प्रश्न करना चाहिये । १. तत् में एकत्वप्रत्यय विशेष हेतु है तो इस साध्य में 'महत्' ज्ञान से सामानाधि- करण्य होने के कारण 'यह एक हैं' तथा 'महान् हैं'—ये दोनों ज्ञान एक ही विषय तथा