भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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६६. सू० ] शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् १३१ पतत्ययमेवैतज्जीर्यते वा प्रमीयते वा' इत्येवमादि । अन्यकर्तृकस्य व्याहतस्य विधेर्वादः परकृतिः । 'हुत्वा वपामेवाग्रेऽभिघार- यन्ति अथ पृषदाज्यम्१, तदुह चरकाध्वर्यवः पृषदाज्यमेवाग्रेऽभिधारयन्ति, अग्नेः प्राणाः पृषदाज्यमित्येवमभिदधति' इत्येवमादि । ऐतिहासमाचरितो विधिः पुराकल्प इति । 'तस्माद्वा एतेन पुरा ब्राह्मणा बहिष्पवमानं सामस्तोममस्तोममस्तौषन् योने यज्ञं प्रतनवामहे' इत्येवमादि । कथं परकृतिपुराकल्पावर्थवादाविति ? स्तुतिनिन्दावाक्येनाभिसम्बन्धाद् विध्याश्रयस्य द्योतनादर्थवादाविति ॥ ६५ ॥ विधिविहितस्यानुवचनमनुवादः ॥ ६६ ॥ विध्यनुवचनं चानुवादो विहितानुवचनं च । पूर्वः शब्दानुवादः, अपरोऽर्था- नुवादः । यथा पुनरुक्तं द्विविधम् एवमनुवादोऽपि । किमर्थं पुनर्विहितमनूद्यते ? अधिकारार्थम् । विहितमधिकृत्य स्तुतिर्बोध्यते, निन्दा वा, विधिशेषो वाऽभि- वह अन्य यज्ञ बिना फल दिये ही नष्ट हो जाता है या वह अन्यफलदृक् यष्टा असमय में मर जाता है' इत्यादि । अन्यकर्त्तृक विरोधक विधिवाक्य 'परकृति' अर्थवाद कहलाता है । जैसे—'पहले वपाहोम कर अभिधारण करे पश्चात् पृषदाज्य अभिधारण करें ? यहाँ चरकशाखा के याज्ञिक पृपदाज्य ( दधिसर्पि ) का पहले अभिधारण करते हैं, वे कहते हैं कि पृषदाज्य अग्नि के प्राण हैं' । इतिहासमिश्रित विधिवाक्य 'पुराकल्प' अर्थवाद कहलाता है। जैसे—'ब्राह्मणों ने प्राचीन काल में इस बहिष्पवमान सामस्तोममन्त्र की इसीलिए स्तुति की कि इससे वे अपने यज्ञों का विस्तार कर पावें'—यहाँ पुराकाल के ब्राह्मणों द्वारा बहिष्पवमान सामस्तोम मन्त्र की स्तुति द्वारा इसका विधान बतलाया गया है । परकृति, तथा पुराकल्प अर्थवाद कैसे हैं ? ये दोनों स्तुति या निन्दा वाक्य से अभिसम्बद्ध होकर विध्याश्रित किसी अर्थ का द्योतन कराने के कारण अर्थवाद हैं ॥६५॥ विधिविहित का अनुवचन अनुवाद वाक्य है ॥ ६६ ॥ विधि का अनुवचन, तथा विहित का अनुवचन 'अनुवाद' कहलाता है । इनमें प्रथम शब्दानुवाद, तथा द्वितीय अर्थानुवाद है । जैसे 'पुनरुक्त' दो प्रकार का होता है उसी प्रकार अनुवाद भी दो प्रकार का है । यहाँ विहित का अनुवाद किसलिये है ? अधिकार ( फलप्राप्ति के लिये साधनप्रवृत्ति ) के लिये । अर्थात् विहित को लेकर जिससे स्तुति, १. 'पृषदाज्यं सवघ्याज्ये'—इति अमरकोशः ( २. ७. २४ ) ।