न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 150, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें१३२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० धीयते । विहितानन्तरार्थोऽपि चानुवादो भवति । एवमन्यदप्युत्प्रेक्षणीयम् । लोकेऽपि च विधिः, अर्थवादः, अनुवाद इति च त्रिविधं वाक्यम् । 'ओदनं पचेत्' इति विधिवाक्यम् । अर्थवादवाक्यम्-'आयुर्वर्चो बलं सुखं प्रतिभानं चान्ने प्रतिष्ठितम्' । अनुवादः-पचतु पचतु भवानित्यभ्यासः, क्षिप्रं पच्यतामिति वा, अङ्ग पच्यतामित्यध्येषणार्थम्, पच्यतामेवेति चावधारणार्थम् । यथा लौकिके वाक्ये विभागेनार्थग्रहणात् प्रमाणत्वम्, एवं वेदवाक्यानामपि विभागेनार्थग्रहणात् प्रमाणत्वं भवितुमर्हतीति ॥ ६६ ॥ नानुवादपुनरुक्तयोर्विशेषः, शब्दाभ्यासोपपत्तेः ? ॥ ६७ ॥ पुनरुक्तमसाधु, साधुरनुवादः-इत्ययं विशेषो नोपपद्यते, कस्मात् ? उभयत्र हि प्रतीतार्थः शब्दोऽभ्यस्यते, चरितार्थस्य शब्दस्याभ्यासादुभयम- साध्विति ? ॥ ६७ ॥ शीघ्रतरगमनोपदेशवदभ्यासाज्ञाविशेषः ॥ ६८ ॥ नानुवादपुनरुक्तयोरविशेषः । कस्मात् ? अर्थवतोऽभ्यासस्यानुवादभावात् । समानेऽभ्यासे पुनरुक्तमनर्थकम् । अर्थवानभ्यासोऽनुवादः, शीघ्रतरगमनोपदेशवत् । निन्दा या विधिशेष बतलाया जाये । विहितानन्तर-कर्त्तव्यबोधन के लिये भी अनुवाद होता है । इसी तरह अन्य उत्प्रेक्षा भी कर लेनी चाहिये । लोक में भी, विधि, अर्थवाद तथा अनुवाद यों तीन प्रकार का वाक्य होता है । 'ओदन पकाओ' यह विधिवाक्य है । अर्थवाद वाक्य है—'आयु, तेज, बल, सुख, प्रतिभा सब कुछ अन्न में प्रतिष्ठित हैं' । अनुवाद वाक्य है—'आप पकाइये, पकाइये'—यह आवृत्ति, या 'जल्दी पकाइये' । 'अरे, पकाओ' यह अध्येषणार्थक अनुवाद है, तथा 'पका- इये ही'—यह अवधारणार्थक अनुवादवाक्य है । जैसे लौकिक वाक्य में विभाग द्वारा अर्थग्रहण होने से वह प्रमाण है, उसी तरह वेद- वाक्यों का भी विभाग से अर्थग्रहण होने से उसमें प्रामाण्य मानना उचित ही है ॥ ६६ ॥ शब्दाभ्यासोपपादनमात्र होने से अनुवाद और पुनरुक्त में कोई अन्तर नहीं ? ॥ ६७ ॥ 'पुनरुक्त दोष है, तथा अनुवाद सार्थक होने से समीचीन है'—यह विभाजन ठीक नहीं; क्योंकि दोनों में जिसका अर्थ पहले से जान लिया गया है, ऐसा शब्द ही दुहराया जाता है । चरितार्थ शब्द के दुहराये जाने से दोनों ही निरर्थक हैं ? ॥ ६७ ॥ अधिक जल्दी चलने के आदेश की तरह अनुवाद से पुनरुक्त की समानता नहीं है ॥ ६८ ॥ अनुवाद और पुनरुक्त में समानता नहीं; क्योंकि सार्थक आवृत्ति ही अनुवाद कह- लाती है । निष्प्रयोजन आवृत्ति में पुनरुक्त निरर्थक होता है, पर सार्थक अभ्यास तो