भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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६९. सू० ] शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् १३३ शीघ्रं शीघ्रं गम्यताम्, शीघ्रतरं गम्यतामिति क्रियातिशयोऽभ्यासेनैवोच्यते । उदाहरणार्थं चेदम् । एवमन्योऽप्यभ्यासः । 'पचति पचति' इति क्रियानुपरमः । 'ग्रामो ग्रामो रमणीयः' इति व्याप्तिः । 'परि परि त्रिगर्त्तेभ्यो वृष्टो देवः' इति परिवर्जनम् । 'अध्यधिकुड्यं निषण्णम्' इति सामीप्यम् । 'तिक्तं तिक्तम्' इति प्रकारः। एवमनुवादस्य स्तुतिनिन्दाशेषविधिश्वधिकारार्थता, विहितानन्त- रार्थता चेति ॥ ६८ ॥ किं पुनः प्रतिषेधहेतूद्धारादेव शब्दस्य प्रमाणत्वं सिध्यति ? न; अतश्च— मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यम्, आप्तप्रामाण्यात् ॥ ६९ ॥ किं पुनरायुर्वेदस्य प्रामाण्यम् ? तत्तदायुर्वेदेनोपदिश्यते-इदं कृत्वेष्टमधि- गच्छति, इदं वर्जयित्वाऽनिष्टं जहाति, तस्यानुष्ठीयमानस्य तथाभावः सत्यार्थ- ताऽविपर्ययः । मन्त्रपदानां च विषभूताशनिप्रतिषेधार्थानां प्रयोगेऽर्थस्य तथाभाव एतत् प्रामाण्यम् । किं कृतमेतत् ? आप्तप्रामाण्यकृतम् । किं पुनराप्तानां प्रामाण्यम् ? अनुवाद ही होगा। जैसे- 'जल्दी-जल्दी चलिये, और जल्दी चलिये'—यहाँ गमनक्रिया- तिशय अभ्यास (आवृत्ति) से ही कहा जा सकता है। यह एक उदाहरण दे दिया, अन्य उदाहरणों की भी कल्पना कर लेना चाहिये । 'पकाता है, पकाता है' यह अभ्यास क्रिया- सातत्य, 'इस देश का ग्राम-ग्राम रमणीय हैं' यह व्याप्ति, 'त्रिगर्त देश से परे परे वर्षा हुईं' यह त्रिगर्त में वृष्टिपरिवर्जन, 'दीवाल दीवाल पर बैठा हुआ' यह अभ्यास सामीप्य का बोधक है। 'तिक्त-तिक्त' यह अभ्यास प्रकार ( भेद ) का बोधन कराता है। इस प्रकार अनुवाद स्तुति, निन्दा, विधिशेष में तथा विहितानन्तरकर्तव्यता के बोधन कराने में काम आता है, अतः सार्थक है। (परन्तु पुनरुक्त, अर्थवान् न होने से दोषरूप है। अतः दोनों में कोई समानता नहीं है ) ॥ ६८ ॥ क्या पूर्वपक्षी द्वारा उठायी गयी आशङ्काओं के निवारण से ही शब्द प्रमाण सिद्ध हो जाता है ? नहीं; इसलिये भी— मन्त्र, आयुर्वेद के प्रामाण्य की तरह उसमें भी प्रामाण्य है; क्योंकि वह भी आप्तो- देश है ॥ ६९ ॥ आयुर्वेद का प्रामाण्य क्या है ? यह आयुर्वेद उपदेश करता है—'यह करके इष्ट (स्वास्थ्य) को प्राप्त किया जा सकता है, या यह न करके अनिष्ट (रोग) से छुटकारा पाया जा सकता है' । इस उपदेश के अनुसार चलने से वैसा ही सत्यार्थ, (अनुकूल कार्य) होता देखा गया है। मन्त्रों से भी विष, भूत प्रेत, तथा टोना-टोटका का प्रतिषेध देखा जाने से, मन्त्रों की सत्यार्थता (यथार्थता) स्पष्ट है, अतः उनमें प्रामाण्य है। यह प्रामाण्य उनमें कैसे आता है ? आप्तोपदेश के प्रामाण्य से । आप्तोपदेश में क्या प्रामाण्य है ? उस विषय का साक्षा-