न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 155, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें२. सू० ] प्रमाणचतुष्ट्वपरीक्षाप्रकरणम् १३७ अर्थादापत्तिरर्थापत्तिः । आपत्तिः = प्राप्तिः, प्रसङ्गः । यत्राभिधीयमानेऽर्थे योज्योऽर्थः प्रसज्यते सोऽर्थापत्तिः, यथा–मेघेष्वसत्सु वृष्टिर्न भवतीति । किमत्र प्रसज्यते ? सत्सु भवतीति । सम्भवो नामाविनाभाविनोऽर्थस्य सत्ताग्रहणदन्यस्य सत्ताग्रहणम्, यथा– द्रोणस्य सत्ताग्रहणादाढकस्य सत्ताग्रहणम्, आढकस्य सत्ताग्रहणात् प्रस्थस्येति । अभावः = विरोधी, अभूतं भूतस्य, अविद्यमानं वर्षकर्म विद्यमानस्य वाय्वभ्र- संयोगस्य प्रतिपादकम्, विधारके हि वाय्वभ्रसंयोगे गुरुत्वादपां पतनकर्म न भवतीति ? ॥ १ ॥ सत्यम् एतानि प्रमाणानि, न तु प्रमाणान्तराणि । प्रमाणान्तरं च मन्य- मानेन प्रतिषेध उच्यते । सोऽयम्— शब्द ऐतिह्यानर्थान्तरभावादनुमानेऽर्थापत्तिसम्भवाभावा- नर्थान्तरभावाच्चाप्रतिषेधः ॥ २ ॥ अनुपपन्नः प्रतिषेधः । कथम् ? 'आप्तोपदेशः शब्दः' इति, न च शब्दलक्षण- मैतिह्याद्व्यावर्तते । सोऽयं भेदः सामान्यात् सङ्गृहीत इति । प्रत्यक्षेणाप्रत्यक्षस्य फल से आपादन (प्रत्ययविशेषप्रसक्ति) को 'अर्थापत्ति' कहते हैं । आपत्ति = प्राप्ति, अर्थात् प्रसङ्ग । जहाँ अभिधीयमान अर्थ में अन्य अर्थ प्रसक्त हो उसे 'अर्थापत्ति' कहते हैं । जैसे—'मेघों के न होने पर वृष्टि नहीं होती' । यहाँ अन्य अर्थ प्रसक्त हुआ—'मेघों के होने पर वृष्टि होती हैं' । सम्भव से तात्पर्य हैं; 'अविनाभावी अर्थ की सत्ता के ग्रहण से अन्य की सत्ता का भी ग्रहण' । जैसे—द्रोण (परिमाणविशेष) की सत्ता के ग्रहण से आढक की सत्ता का ग्रहण, आढक की सत्ता के ग्रहण से प्रस्थ की सत्ता का ग्रहण । अभाव कहते हैं विरोधी को, यथा-भूत का विरोधी अभूत । जैसे—वर्षा का अविद्यमान होना विद्यमान वायु-मेघ के संयोग का प्रतिपादक है अर्थात् मेघ होने पर वृष्टि का अभाव बतलाता है कि धारणाविरोधी वायु-मेघ संयोग के गुरु होने से जल का पतन नहीं होगा ? ॥ १ ॥ समाधान—अवश्य ये प्रमाण हैं; परन्तु प्रमाणान्तर नहीं हैं । प्रमाणान्तर मानकर हमारे पूर्वोक्त परिगणन का निषेध किया जा रहा है, यह उचित नहीं; क्योंकि— शब्द में ऐतिह्य का तथा अनुमान में अर्थापत्ति का अन्तर्भाव हो जाने से, और सम्भव या अभाव के प्रमाणान्तर न होने से (प्रमाणचतुष्ट्व का निषेध कैसे होगा !) ॥२॥ यह परिगणन का निषेध नहीं बनता; क्योंकि हमने पीछे कहा है—'आप्तोपदेश शब्द प्रमाण होता है' (१. १. ७) । यह शब्द प्रमाण ऐतिह्य से व्यावृत्त नहीं होता । अतः यह ऐतिह्यरूप शब्द का भेद समानतया शब्द में ही अन्तर्भूत (संगृहीत) हो सकता CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri