न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० सम्बद्धस्य प्रतिपत्तिरनुमानम् । तथा चार्थपत्तिसम्भवाभावाः । वाक्यार्थसम्प्रत्य- येनानभिहितस्यार्थस्य प्रत्यनीकभावाद् ग्रहणमर्थापत्तिरनुमानमेव । अविनाभाववृत्त्या च सम्बद्धयोः समुदायसमुदायिनोः समुदायेनेतरस्य ग्रहणं सम्भवः, तदप्यनुमानमेव । 'अस्मिन् सतीदं नोपपद्यते' इति विरोधित्वे प्रसिद्धे कार्यानुत्पत्त्या कारणस्य प्रतिबन्धकमनुमीयते । सोऽयं यथार्थ एव प्रमाणोद्देश इति ॥ २ ॥ अर्थापत्तिप्रामाण्यपरीक्षा 'सत्यमेतानि प्रमाणानि, न तु प्रमाणान्तराणि' इत्युक्तम्, अत्रार्थापत्तेः प्रमाण- भावाभ्यनुज्ञा नोपपद्यते । तथा हीयम्— अर्थापत्तिरप्रमाणमनैकान्तिकत्वात् ? ॥ ३ ॥ असत्सु मेघेषु वृष्टिनं भवतीति सत्सु भवतीत्येतदर्थादापद्यते, सत्स्वपि चैकदा न भवति—सेयमर्थापत्तिरप्रमाणमिति ? ॥ ३ ॥ नानैकान्तिकत्वमर्थापत्तेः, अनर्थापत्तावर्थापत्त्यभिमानात् ॥ ४ ॥ है । प्रत्यक्ष द्वारा सम्बद्ध व्याप्यव्यापकभावापन्न अप्रत्यक्ष अर्थ का प्रतिपादन करना अनुमान का कार्य है । आपके अर्थापत्ति, संभव, और अभाव भी यही कार्य करते हैं । वाक्यार्थज्ञान से अनभिहित अर्थ का विरोधी भाव से ज्ञान अर्थापत्ति कहलाता है, यह अनुमान ही तो है । अविनाभाववृत्ति से सम्बद्ध समुदाय-समुदायी के समुदाय से दूसरे अर्थ का ग्रहण होना 'सम्भव' कहलाता है, यह भी अनुमान ही है । 'इसके होने पर यह नहीं होता'—ऐसे विरोधी प्रतिबन्धक के प्रसिद्ध होने पर कार्य की अनुपपत्ति से प्रति- बन्धक कारण का अनुमान होता है, अतः 'अभाव' भी अनुमान ही है । इसलिए हमारा प्रमाणपरिगणन यथार्थ ही है ॥ २ ! शङ्का—आपने कहा-'सचमुच ये प्रमाण हैं, परन्तु प्रमाणान्तर नहीं हैं'; यहाँ अर्थापत्ति में प्रमाणत्वस्वीकृति हमें जची नहीं; क्योंकि यह— अर्थापत्ति अप्रमाण है, अनेकान्तिक (व्यभिचार) होने से ? ॥ ३ ॥ 'मेघों के न होने पर वृष्टि नहीं होती' इस वाक्य से अर्थापत्ति द्वारा आप यह गृहीत करते हैं कि 'मेघ होने पर वृष्टि होती है'; परन्तु सच्चाई यह है कि कभी-कभी मेघ होने पर वृष्टि नहीं भी होती । अतः यह अर्थापत्ति प्रमाण नहीं बनता ? ॥ ३ ॥ उत्तर—अर्थापत्ति में व्यभिचार नहीं है; क्योंकि— अनर्थापत्तिरूप उक्त उदाहरण में अर्थापत्त्यभिमान किया जाने से ॥ ४ ॥