भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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६२. सू०] शब्दशक्तिपरीक्षाप्रकरणम् १६९ याशब्दसमूहत्यागपरिग्रहसङ्ख्यावृद्ध्यपचयवर्णसमासानुबन्धाना व्यक्तावुपचाराद् व्यक्तिः ? ॥ ६२ ॥ व्यक्तिः पदार्थः, कस्मात् ? याशब्दप्रभृतीनां व्यक्तावुपचारात् । उपचारः = प्रयोगः । या गौस्तिष्ठति, या गौर्निषण्णेति नेदं वाक्यं जातेरभिधायकम्; अभेदात् । भेदात्तु द्रव्याभिधायकम् । गवां समूह इति भेदाद् द्रव्याभिधानम्, न जातेः; अभेदात् । चैत्राय गां ददातीति द्रव्यस्य त्यागः, न जातेः; अमूर्त्तत्वात्, प्रति- क्रमानुक्रमानुपपत्तेश्च । परिग्रहः—स्वत्वेनाभिसम्बन्धः, कौण्डिन्यस्य गौर्ब्राह्मण- स्य गौरिति, द्रव्याभिधाने द्रव्यभेदात् सम्बन्धभेद इति उपपन्नम्, अभिन्ना तु जातिरिति । सङ्ख्या—दश गावो विंशतिर्गाव इति भिन्नं द्रव्यं सङ्ख्यायते, न जातिः, अभेदादिति । वृद्धिः—कारणवतो द्रव्यस्यावयवोपचयः, अवर्द्धत गौरिति । निरवयवा तु जातिरिति । एतेनापचयो व्याख्यातः । वर्णः—शुक्ला गौः, कपिला गौरिति द्रव्यस्य गुणयोगः, न सामान्यस्य । समासः—गोहितम्, 'या' शब्द, समूह, त्याग, परिग्रह, सङ्ख्या, वृद्धि, अपचय, वर्ण, समास तथा अनु- बन्ध—इनका व्यक्ति में ही प्रयोग होने से व्यक्ति को 'गो' पदार्थ मानलें ? ॥ ६२ ॥ व्यक्ति ही पदार्थ है; क्योंकि 'या' (यत्) शब्द आदि का व्यक्ति में ही प्रयोग होता है । सूत्रस्थ 'उपचार' का अर्थ है—प्रयोग । 'जो गौ बैठी है,' 'जो गौ खड़ी है' यह वाक्य अभेद सम्बन्ध से जाति का अभि- धायक नहीं हो सकता, अपितु भेद-वाक्य द्रव्याभिधायक होता है, जैसे—'गौओं का समूह' । यह भेद से अनेक व्यक्तिरूप द्रव्य समूह का अभिधायक हैं, जाति का नहीं; क्योंकि जाति का अभेद है । 'चैद्य को गौ देता हैं' यहां द्रव्य का त्याग है, न कि जाति का; क्योंकि जाति तो अमूर्त होती है, उसका त्याग कैसे बनेगा ! अथ च, प्रतिक्रम (विश्लेष) अनुक्रम (संश्लेष) अर्थात् विभाग-संयोग भी जाति में नहीं रहते. अतः उक्त वाक्य में द्रव्य का ही त्याग मानना उचित है । परिग्रह कहते हैं—स्वत्व द्वारा अभि- सम्बन्ध (स्वामिभाव) को । जैसे—'कौण्डिन्य की गौ' 'ब्राह्मण की गौ' । द्रव्याभिधान में ही द्रव्यभेद से यह सम्बन्धभेद बन सकता है; क्योंकि जाति तो अभिन्न होती है, वह सम्बन्धभेदक कैसे होगी ! सङ्ख्या—'दस गौ' 'बीस गौ'—यह संख्याभिधान भी द्रव्या- भिधान में बन सकता है, क्योंकि भिन्न द्रव्य ही गिना जा सकता है; जाति तो अभिन्न होने से गिनी नहीं जा सकती । वृद्धि—कारणवान् द्रव्य का अवयवोपचय हो सकता है, जैसे—गौ बढ़ गयी । जाति निरवयव होने से कैसे बढ़ेगी ! इसी तरह अपचय (ह्रास) का भी व्याख्यान समझ लेना चाहिए । वर्ण—'शुक्ला गौ' 'कपिला गौ' यह वर्णाभिधान भी वाक्य को द्रव्यपरक मानने पर ही बनता है; क्योंकि शुक्लत्वादि गुण