न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 188, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें१७० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [२. अ० २. आ० गोसुखमिति द्रव्यस्य सुखादियोगः, न जातेरिति । अनुबन्धः-सरूपप्रजननसन्तानः, गौर्गां जनयतीति तदुत्पत्तिधर्मत्वाद् द्रव्ये युक्तं न जातौ, विपर्ययादिति । द्रव्यं व्यक्तिरिति हि नार्थान्तरम् ? ॥ ६२ ॥ अस्य प्रतिषेधः- न; तदनवस्थानात् ॥ ६३ ॥ न व्यक्तिः पदार्थः । कस्मात् ? अनवस्थानात् । 'या' शब्दप्रभृतिभिर्यो विशेष्यते स गोशब्दार्थः । 'या गौस्तिष्ठति', 'या गौर्निषण्णा' इति, न द्रव्यमात्रमविशिष्टं जात्या विनाऽभिधीयते । किं तर्हि ? जातिविशिष्टम् । तस्मान्न व्यक्तिः पदार्थः । एवं समूहादिषु द्रष्टव्यम् ॥ ६३ ॥ यदि न व्यक्तिः पदार्थः, कथं तर्हि व्यक्तावुपचार इति ? निमित्तादतद्भावे- ऽपि तदुपचारः । दृश्यते खलु- सहचरणस्थानतादर्थ्यवृत्तमानधारणसामीप्ययोगसाधनाधिपत्येभ्यो ब्राह्मणमञ्च- कटराजसक्तुचन्दनगङ्गाशाटकान्नपुरुषेष्वतद्भावेऽपि तदुपचारः ॥ ६४ ॥ अतद्भावेऽपि तदुपचार इति-अतच्छब्दस्य तेन शब्देनाभिधानमिति । जाति का कैसे बनेगा ! समास भी व्यक्त्यभिधान में उपपन्न होता है । जैसे-'गौ का हित' 'गौ का सुख' । ये हित, सुख आदि में जाति में नहीं रहते । अनुबन्ध से तात्पर्य है-सरूपप्रजननसमूह । जैसे-'गौ गौ (बछड़ी) पैदा करती है, यहाँ द्रव्य में ही उत्पा- दन उचित ठहरता है; जाति में तो इसके विपरीत (अनुत्पाद) देखा जाता है । द्रव्य से हमारा तात्पर्य व्यक्ति से है। तो व्यक्ति को गोपदार्थ मान लें ? ॥ ६२ ॥ इसका खण्डन- व्यक्ति पदार्थ नहीं है; अनवस्था होने से ॥ ६३ ॥ व्यक्ति पदार्थ नहीं है; क्यों ? अनवस्थान होने से । 'या' शब्द आदि से जो यद्धर्म- विशिष्ट विशेषित किया जाता है, वह तद्धर्मविशिष्ट गो-शब्दार्थ है । 'जो गौ बैठी है', 'जो गौ खड़ी है'-इस वाक्य में बिना किसी विशेषण के, द्रव्य स्वरूपतः जातिरहित नहीं कहा जाता; अपितु जातिविशिष्ट द्रव्य कहा जाता है । इसलिए 'व्यक्ति' स्वरूपतः पदार्थ नहीं है । इसी नय से पूर्वसूत्रोक्त समूहादिक के भी व्यक्तिपरक व्याख्यान का खण्डन समझ लेना चाहिये ॥ ६३ ॥ यदि व्यक्ति पदार्थ नहीं है तो उसका उपचार (लक्षणा) प्रयोग कैसे देखा जाता है ? - प्रयोजनवशात् अतद्भाव में भी तत्प्रयोग देखा जाता है । जैसे- सहचरण, स्थान, तादर्थ्य, वृत्त, मान, धारण, सामीप्य, योग, साधन, आधिपत्य- इन कारणों से ब्राह्मण, मञ्च, कट, राज, सत्तू, चन्दन, गङ्गा, शाटक, अन्न, पुरुष- इनका अतद्भाव में भी तदुपचार होता है ॥ ६४ ॥ 'अतद्भाव में तदुपचार' से तात्पर्य है-'उस शब्द के न होने पर भी उस शब्द CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri