भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 410 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 189

६४. सू० ] शब्दशक्तिपरीक्षाप्रकरणम् १७१ सहचरणात्–'यष्टिकां भोजय' इति यष्टिकासहचरितो ब्राह्मणोऽभिधीयत इति । स्थानात्–मञ्चाः क्रोशन्तीति मञ्चस्थाः पुरुषा अभिधीयन्ते । तादर्थ्यात्– कटार्थेषु वीरणेषु व्यूह्यमानेषु कटं करोतीति भवति । वृत्ताद्–यमो राजा, कुबेरो राजेति तद्वद् वर्त्तते इति । मानाद्–आढकेन मिताः सक्तवः आढकसक्तव इति । धारणात्–तुलायां धृतं चन्दनं तुलाचन्दनमिति । सामीप्याद्–गङ्गायां गावश्च- रन्तीति देशोऽभिधीयते सन्निकृष्टः । योगात्–कृष्णेन रागेण युक्तः शाटकः कृष्ण इत्यभिधीयते । साधनात्–'अन्नं प्राणाः' इति । आधिपत्यात्–'अयं पुरुषः कुलम्', 'अयं गोत्रम्' इति । तन्नायं सहचरणाद्योगाद् वा जातिशब्दो व्यक्तौ प्रयुज्यत इति ॥ ६४ ॥ आकृतिवादः यदि गौरित्यस्य पदस्य न व्यक्तिरर्थः, अस्तु तर्हि— आकृतिः, तदपेक्षत्वात् सत्त्वव्यवस्थानासिद्धेः ? ॥ ६५ ॥ आकृतिः पदार्थः । कस्मात् ? तदपेक्षत्वात् सत्त्वव्यवस्थानासिद्धेः । सत्त्वा- वयवानां तदवयवानां च नियतो व्यूहः = आकृतिः, तस्यां गृह्यमाणायां सत्त्वव्य- का प्रयोग' । जैसे—'यष्टिका को खिलाओ' इस वाक्य में 'ब्राह्मण' शब्द के न रहने पर भी यष्टिका के सहचार से 'यष्टिकाधारी ब्राह्मण को खिलाओ'—यों ब्राह्मण में यष्टि का उपचार लोक में देखा जाता है । इसी तरह, स्थान हेतु से—'मञ्च चिल्ला रहे हैं' इस वाक्य में मञ्चस्थ पुरुष का कथन है । तादर्थ्य हेतु से—चटाई के लिये तृणविशेष को वयन करने वाले पुरुष के लिए भी 'चटाई बना रहा है'—यह प्रयोग होता है । वृत्त हेतु से—यह राजा यम है' ( क्रूर बर्ताव करने से ), या 'यह राजा कुबेर है' ( दान करने से )—यह प्रयोग होता है । मान हेतु से भी—आढक परिमाण से तोले हुए सत्तू को लोक में 'आढक सत्तू' भी कह देते हैं । धारण हेतु से—तुला में रखा हुआ चन्दन 'तुलाचन्दन' कहलाने लगता है । सामीप्य हेतु से—लोक में, गङ्गा के समीपवर्ती देश को लेकर 'गङ्गा में गायें चर रही हैं—ऐसा बोल देते हैं । योग हेतु से—काले रंग में रंगी हुई साड़ी 'काली साड़ी' कहलाती है । साधन हेतु से—अन्न प्राण के साधन होने के कारण 'अन्न प्राण हैं' ऐसा बोल देते हैं । आधिपत्य हेतु से—किसी विशिष्ट प्रभाव वाले पुरुष को लेकर 'यही कुल हैं' 'यही गोत्र है'—ऐसा लोक में प्रयोग देखा जाता है । यहाँ सहचार या अन्य सम्बन्धों से यह जातिशब्द व्यक्ति में प्रयुक्त होता है ॥ ६४ ॥ यदि 'गौ' इस शब्द का व्यक्ति अर्थ नहीं मानते हो तो— सत्त्वव्यवस्था की सिद्धि को आकृत्यपेक्षता होने से आकृति अर्थ मान लें ? ॥६५॥ आकृति पदार्थ है; क्योंकि सत्त्वव्यवस्थासिद्धि आकृत्यपेक्षित है । प्राणि आदि द्रव्य के अवयवों या उन के अवयवों का नियत रूपों में जो सन्निवेश होता है वह 'आकृति'