भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१७२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० वस्थानं सिध्यति-अयं गौरयमश्व इति, नागृह्यमाणायाम् । यस्य ग्रहणात् सत्त्व- व्यवस्थानं सिद्धयति तं शब्दोऽभिधातुमर्हति, सोऽस्यार्थ इति । नैतदुपपद्यते; यस्य जात्या योगस्तत्र जातिविशिष्टमभिधीयते-गौरिति । न चावयव्यूहस्य जांत्या योगः, कस्य तर्हि ? नियतावयव्यूहस्य द्रव्यस्य । तस्मान्नाकृतिः पदार्थः ॥ ६५ ॥ जातिवादः अस्तु तर्हि जातिः पदार्थः- व्यक्त्याकृतियुक्तेऽप्यप्रसङ्गात् प्रोक्षणादीनां मृद्गवके जातिः ? ॥ ६६ ॥ जातिः पदार्थः । कस्मात् ? व्यक्त्याकृतियुक्तेऽपि मृद्गवके प्रोक्षणादीनाम- प्रसङ्गादिति । गां प्रोक्षय, गामानय, गां देहीति नैतानि मृद्गवके प्रयुज्यन्ते । कस्मात् ? जातेरभावात् । अस्ति हि तत्र व्यक्तिः, अस्त्याकृतिः, यदभावात् तत्रासम्प्रत्ययः स पदार्थ इति ? ॥ ६६ ॥ न, आकृतिव्यक्त्यपेक्षत्वाज्जात्यभिव्यक्ते ॥ ६७ ॥ जातेरभिव्यक्तिराकृतिव्यक्ती अपेक्षते, नागृह्यमाणायामाकृतौ व्यक्तौ च जातिमात्रं शुद्धं गृह्येत, तस्मान्न जातिः पदार्थ इति ? ॥ ६७ ॥ कहलाता है । उस आकृति के गृहीत होने पर 'यह गौ हैं', 'यह अश्व हैं'-ऐसी सत्त्व- व्यवस्था उपपन्न हो सकती है; आकृति के अगृहीत होते हुए उक्त व्यवस्था उपपन्न नहीं हो सकती । जिसके ग्रहण से उक्त सत्त्वव्यवस्थान सिद्ध होता हो, उसीको शब्द कहे- यही उचित है । वही उसका अर्थ है। अतः आकृति को पदार्थ मान लें ? आपका यह मतस्थापन उचित नहीं; क्योकि जिसका जाति से सम्बन्ध है वही यहां जातिविशिष्ट होकर अभिहित किया जाता है; जैसे-'गौ' । अवयव्यूहात्मक आकृति का जाति से योग नहीं होता; अपितु नियतावयव्यूह द्रव्य का योग बनता है । अतः आकृति पदार्थ नहीं है-यह सिद्ध हो गया ॥ ६५ ॥ तो जाति को ही पदार्थ मान लें- गौ की मिट्टी की मूर्ति में व्यक्ति तथा आकृति होते हुए भी प्रोक्षण ( बलि ) आदि की प्रसक्ति न होने से जाति ही पदार्थ है ? ॥ ६६ ॥ जाति पदार्थ हैं; क्योंकि व्यक्त्याकृतियुक्त होने पर भी मृत्तिका-मूर्ति में प्रोक्षण आनय- नादि की प्रसक्ति नहीं होती । 'गौ का प्रोक्षण करो', 'गौ लाओ', 'गौ दो'-ये व्यवहार मिट्टी की मूर्ति में नहीं बनते, क्योंकि वहाँ जाति नहीं है; यद्यपि वहाँ व्यक्ति भी है, आकृति भी है । जिसके अभाव से वहाँ उपर्युक्त ज्ञान नहीं हो पाता, वही पदार्थ हैं ? ॥ ६६ ॥ नहीं; आकृति तथा व्यक्ति की अपेक्षा लेकर जाति के सिद्ध होने से ॥ ६७ ॥ जाति की अभिव्यक्ति भी व्यक्ति तथा आकृति की अपेक्षा रखती है । आकृति तथा व्यक्ति के गृहीत हुए बिना जाति एकाकी गृहीत नहीं हो पाती; अतः जाति पदार्थ नहीं है ॥ ६७ ॥-