भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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६८. सू० ] शब्दशक्तिपरीक्षाप्रकरणम् १७३ सिद्धान्तवादः न वै पदार्थेन न भवितुं शक्यम्, कः खल्विदानीं पदार्थ इति ? व्यक्त्याकृतिजातयस्तु पदार्थः ॥ ६८ ॥ तुशब्दो विशेषणार्थः । किं विशिष्यते ? प्रधानाङ्गभावस्यानियमेन पदार्थ- त्वमिति । यदा हि भेदविवक्षा विशेषगतिश्च, तदा व्यक्तिः प्रधानम्, अङ्गं तु जात्याकृती । यदा तु भेदोऽविवक्षितः सामान्यगतिश्च, तदा जातिः प्रधानम्, अङ्गं तु व्यक्त्याकृती । तदेतद् बहुलं प्रयोगेषु । आकृतेस्तु प्रधानभाव उत्प्रेक्षितव्यः १ ॥ ६८ ॥ कथं पुनज्ञायिते-नाना व्यक्त्याकृतिजातय इति ? लक्षणभेदात् । तत्र तावत्- व्यक्तिर्गुणविशेषाश्रयो मूर्तिः ॥ ६९ ॥ व्यज्यत इति व्यक्तिरिन्द्रियग्राह्येति, न सर्वं द्रव्यं व्यक्तिः । यो गुण- विशेषाणां स्पर्शान्तानां गुरुत्वघनत्वसंस्काराणामव्यापिनः परिमाणस्याश्रयो यथासम्भवं तद् द्रव्यं मूर्तिः, मूच्छितावयवत्वादिति ॥ ६९ ॥ आकृतिर्जातिलिङ्गाख्या ॥ ७० ॥ तीनों के न मानने से तो पदार्थ ही न बनेगा; अब किसको पदार्थ कहें ?— व्यक्ति, आकृति, जाति मिलकर पदार्थ हैं ॥ ६८ ॥ सूत्र में 'तु' शब्द तीनों की विशिष्टता के बोध के लिये है । क्या विशेष बोध होता है ? इन तीनों में प्रधान-गुणभाव के अनियम से पदार्थत्व रहता है । जब पदार्थ में भेदविवक्षा तथा विशेष ज्ञान कराना हो तो वहां व्यक्ति प्रधान है; जाति, आकृति गौण रहेंगी । जब पदार्थ में भेद अविवक्षित हो, सामान्य ज्ञान कराना हो तब जाति प्रधान होगी; और व्यक्ति, आकृति गौण रहेंगी। लोक में प्रायः जाति एवं व्यक्ति में प्रयोग देखा जाता है । आकृति-प्राधान्य के उदाहरण ( मृद्गवकादि ) की भी उत्प्रेक्षा कर लेनी चाहिये ॥ ६८ ॥ यह कैसे ज्ञात होता है व्यक्ति, आकृति, जाति भिन्न-भिन्न हैं ? लक्षणभेद से ज्ञात हो जाता है । उन लक्षणों में— गुणविशेषाश्रित द्रव्य 'व्यक्ति' कहलाता है ॥ ६९ ॥ जो व्यक्त होता हो, अर्थात् इन्द्रियग्राह्य हो वही 'व्यक्ति' कहलाता है, न कि समग्र द्रव्य । जो स्पर्शान्त गुणविशेषों तथा गुरुत्व, घनत्व, द्रवत्व संस्कारों एवं अव्यापि परिमाण का यथासम्भव आश्रय हो, वह द्रव्य मूर्ति कहलाता है; क्योंकि उसके अवयव परस्पर संयुक्त हैं ॥ ६९ ॥ जिससे जाति, तथा उसके लिङ्ग प्रख्यात हो वह 'आकृति' है ॥ ७० ॥ १. अस्मिन् सूत्रार्थे वार्त्तिककारस्यारुचिर्वार्त्तिक एव द्रष्टव्या ।