न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 192, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें१७४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० ७१. सू० ] यया जातिर्जातिलिङ्गानि च प्रख्यायन्ते तामाकृतिं विद्यात् । सा च नान्या सत्त्वावयवानां तदवयवनां च नियताद् व्यूहादिति । नियतावयव्यूहाः खलु सत्त्वावयवा जातिलिङ्गम्, शिरसा पादेन गामनुमिन्वन्ति । नियते च सत्त्वा- वयवानां व्यूहे सति गोत्वं प्रख्यायत इति । अनाकृतिव्यङ्ग्यायां जातौ मृत्, सुवर्णम्, रजतम्-इत्येवमादिष्वाकृतिर्निवर्तते, जहाति पदार्थत्वमिति ॥ ७० ॥ समानप्रसवात्मिका जातिः ॥ ७१ ॥ या समानां बुद्धिं प्रसूते, भिन्नेष्वधिकरणेषु यया बहूनीतरेतरतो न व्यावर्तन्ते । योऽर्थोऽनेकत्र प्रत्ययानुवृत्तिनिमित्तं तत्सामान्यम् । यच्च केषाञ्चिद- भेदं कुतश्चिद् भेदं करोतीति तत् सामान्यविशेषो जातिरिति ॥ ७१ ॥ इति वात्स्यायनीये न्यायभाष्ये द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयमाह्निकम् ❀ समाप्तश्चायं द्वितीयोऽध्यायः ❀ जिससे जाति, तथा जाति के चिह्न ज्ञात हों उसे 'आकृति' समझना चाहिये । वह आकृति सत्त्वावयव ( शिरःपादादि ) तथा तदवयवों ( मुखखुरादि ) के नियत व्यूह से ही जानी जाती है । सत्त्व के अवयव नियतावयव्यूह होने से जाति के ज्ञापक हैं । शिर और पैर से गौ का अनुमान करते हैं, प्राण्यङ्गों की बनावट के नियत होने पर गोत्व जाति का ज्ञान होता है । अनाकृतिव्यङ्ग्य गिट्टी, सोना, चाँदी आदि जातिद्रव्यों में आकृति निवृत्त हो जाती है, वह पदार्थत्व को छोड़ देती है ॥ ७० ॥ जाति विभिन्न आश्रयों में समान बुद्धि पैदा करनेवाली होती है ॥ ७१ ॥ जो भिन्न अधिकरणों में समान बुद्धि पैदा करे, वह 'जाति' कहलाती है । जहाँ बहुत से एक दूसरे से व्यावृत्त न होते हों । जो अर्थ अनेक स्थानों में ज्ञानानुवर्तन ( प्रतीति की अनुवृत्ति कराने का) निमित्त हो वह 'जाति' कहलाता है । तथा जो किन्हीं पदार्थों की का प्रतीति करके उन्हीं का कहीं से भेद ( व्यावृत्ति ) करे वह 'जातिविशेष' कहलाता है ॥ ७१ ॥ वात्स्यायनीय न्यायभाष्य(सहित न्यायदर्शन)में द्वितीय अध्याय का द्वितीय आह्निक समाप्त ❀ द्वितीय अध्याय भी समाप्त ❀